पेटेंट

August 28, 2006

भूमिका

बौद्धिक सम्पदा अधिकार मस्तिष्क की उपज हैं और इनमे सबसे महत्वपूर्ण हैं - पेटेंट। पेटेंटी, पेटेंट का उल्लंघन करने वाले तरीके या उत्पाद के निर्माण को न्यायालय द्वारा रूकवा सकता है। बहुत से लोग यह कहते हैं कि पेटेंट तकनीक को आगे बढाता हैं पर बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि इस युग में पेटेंट तकनीक की प्रगति पर बाधा पहुंचा रहा है। इसलिये य‍ह जरूरी है कि हम पेटेंट को समझें और देखें कि वह हमारे देश की उन्नति में बाधा न बने।

पेटेंट की चर्चा हम निम्न क्रम से करेंगे।

  1. Agreement on the Trade Related Aspect of Intellectual Property Rights, (TRIPS या ट्रिप्स );
  2. इतिहास की दृष्टि मे पेटेंट ;
  3. अपने देश में पेटेंट कानून का इतिहास;
  4. पेटेंट प्राप्त करने की विधि का सरलीकरण;
  5. पेटेंट किसके लिये दिया जा सकता है; और
  6. पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व।

ट्रिप्स (TRIPS)

20वीं शताब्दी के अन्त होते, होते यह लगने लगा था कि 21वीं शताब्दी में बौद्धिक सम्पदा अधिकार महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। इसलिये 1980 के दशक में General Agreement of Trade and Tariff (G A T T या गैट ) के आंठवें चक्र में, अमेरिका ने यह कहना शुरू किया कि इन अधिकारों को भी गैट में रखा जाय। 1990 के दशक में विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) (WTO या डब्लू.टी.ओ.) की स्थापना हुई इसके चार्टर में कई समझौते हैं उनमें से एक Agreement on the Trade Related Aspect of Intellectual Property Rights, ( TRIPS या ट्रिप्स ) है। हम डब्लू. टी. ओ. के सदस्य हैं इसलिए यह हम पर भी लागू है । ट्रिप्स सात प्रकार की बौद्धिक संपत्ति अधिकारों की चर्चा करता है:

  1. Copyright and Related Rights, प्रतिलिपि प्राप्त करने तथा उससे सम्बन्धित अधिकार (कौपीराईट एवं रिलेटेड राईटस)
  2. Trade Mark, ट्रेड मार्क
  3. Geographical Indication, भौगोलिक उपदर्शन
  4. Industrial Design, औद्योगिक डिज़ाईन
  5. Patents, पेटेंट
  6. Layout- designs (Topography ) of Integrated Circuit, इन्टीग्रेटेड सर्किट की डिज़ाईन
  7. Protection of undisclosed Information,अप्रकाशि‍त सूचना का संरक्षण या Trade Secret ट्रेड सीक्रेट

ट्रिप्स, बौद्धिक सम्पत्ति के अधिकारों के न्यूनतम मानकों को तय करता है और सदस्य देशों को उसके अनुपालन के लिए बाध्य करता है । इसीलिये हमें बौद्धिक संपदा अधिकार से सम्बन्धित कानूनों को संशोधित करना पडा। यह संशोधन करने के लिये अलग अलग तरह के देशों के लिये अलग समय की सीमा है। हमें 31-12-2004 तक कानून में संशोधन करना था। हमारी सरकार के अनुसार यह कर दिया गया है।

बौद्धिक सम्पदा अधिकार के क्षेत्र में बहुत कुछ करना बाकी है जो कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ही उठा कर किया जा सकता है। हमें, इसके लिये प्रयत्न करना चाहिये।

इतिहास की दृष्टि में

‘पेटेंट’ का शब्द, लैटिन के शब्द Lilterae Patents से आया है। पेटेंट का अर्थ है ‘खुला’, और Lilterae Patents का शाब्दिक अर्थ है ( Letters patents) या खुले पत्र। पुराने जमाने में शासको या सरकारों के द्वारा पदवी‚ हक‚ विशेष अधिकार पत्र के द्वारा दिया जाता है। यह शासकीय दस्तावेज होता था और इन्हे चूंकि सार्वजनिक रूप से दिया जाता था, इसलिए यह हमेशा ‘खुले’ रहते थे।

यूरोप में 6वीं शताब्‍दी में से इस तरह के पत्र दिये जाते थे। यह शासक की ओर से विदेशी भूमि की खोज तथा उस पर विजय के लिये जारी किये जाते थे। आजकल पेटेंट शब्द का प्रयोग आविष्कारों के संबंध में होता है। इस तरह का प्रयोग पहली बार 15वीं शताब्दी के आस-पास आया। सर्वप्रथम, पेटेंट कानून जैसा इसे आज समझा जाता हैं, 14 मार्च, 1474 को वियाना सिनेट (Venetian Senate) के द्वारा को पारित किया गया।

पेटेंट‚ आविष्कारकों को अनन्य (Exclusive) अधिकार देता है । यह बहुत जल्दी इटली से यूरोप के अन्य देशों तक फैल गया। जिन देशों के पास प्रौद्योगिकी नहीं थी, उन्होंने प्रौद्योगिकी को स्थापित करने के लिए विदेशी आविष्कारकों को पेटेंट देना शुरू कर दिया। इंगलैंड में पहले इसकी अवधि नहीं थी पर ब्रिटिश संसद ने 1623 में नया कानून बनाकर इसे 14 वर्षो तक सीमित कर दिया।

अमेरिका के संविधान के अनुच्छेद 1 अनुभाग 8 के अन्तर्गत अमेरिकी कॉग्रेस को विज्ञान और कलाओं की प्रगति के लिये कानून बनाने का अधिकार है। इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस ने 1790 में पहला पेटेंट कानून पारित किया। फ्रान्स ने इसके अगले वर्ष पेटेंट कानून बनाया। 19वीं शताब्दी के अंत तक अनेक देशों ने अपना (जिसमें भारतवर्ष भी सम्मिलित है ) पेटेंट कानून बनाया।

 

भारतवर्ष में पेटेंट कानून का इतिहास

भारतवर्ष में पहला पेटेंट सम्बन्धित कानून, १८५६ में पारित अधिनियम था। इसे २५ फरवरी‚ १८५६ को गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त हो गयी थी पर यह कानून १८५७ में अधिनियम सं. ९ के द्वारा इसलिये खारिज कर दिया गया कि इसे बनाने के पूर्व इंगलैंड की महारानी की मंजूरी नहीं प्राप्त की गयी थी।

नये अविष्कार के उत्पादकों को प्रोत्साहित करने के लिये १८५९ में, अधिनियम सं. १५ पारित किया। बाद में यह Inventions and Designs Act 1888 के द्वारा प्रतिस्थपित कर दिया गया। इसके बाद १९११ में Indian Patents and Designs Act १९११ आया। 1967 में भारत सरकार ने पार्लियामेंट में पेटैंट बिल पेश किया जो Patent Act १९७० (पेटेंट अधिनियम ) के रूप में पास हुआ। पेटेंट अधिनियम को तीन बार संशोधित किया गया है। कुछ संशोधन तो ट्रिप्स के मुताबिक कानून बनाने के लिये किये गये और कुछ अपने अधिकारों (जैसे परम्परागत सूचना) को सुरक्षित करने के लिये किये गये। यह संशोधन निम्न हैं,

  • संशोधन अधिनियम सं. १७, १९९९ (१९९९ संशोधन);
  • संशोधन अधिनियम सं. ३८,२००२ (२००२ का संशोधन);
  • संशोधन अधिनियम सं. १५, २००५ (२००५ का संशोधन)।

 

पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण

प्रत्येक देश का अपना पेटेंट कानून है। साधारण तौर पर आविष्कारको को प्रत्येक देश में पेटेंट के लिए आवेदन देना आवश्यक है, जहां वे अपने आविष्कारों का प्रयोग करना चाहते हैं। हर देश में अलग अलग आवेदन पत्र देना कठिन कार्य है। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए निम्न अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास किये गये हैं।

  • देशों में पेटेंट संबंधी अन्तरों को कम करने का पहला प्रयास International Convention for the protection of Industrial Property था। इसे पेरिस में 1883 में अंगीकार किया गया है। इसे अनेक बार संशोधित किया गया। इसने आविष्कारकों को किसी एक सदस्य देश में आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की प्रथम तारीख का लाभ अन्य सदस्य राज्यों में आवेदन पत्र दाखिल करने की तिथि के लिये दिया ।
  • Patent Cooperation Treaty 1970 (P.C.T. या पी.सी.टी.) पेटेंट के लिये आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में सुविधा प्रदान करती है। यह पेटेंट के लिये आवेदन पत्र का मानकीकृत फॉरमैट बताती है और इसके साथ उन्हे दाखिल करने की केन्द्रीयकृत सुविधा भी देती है। हमने इसके अनुच्छेद 64 के उप अनुच्छेद 5 के अलावा‚ इसे7-12-98 को स्वीकार किया है।
  • European patent Convention, 1977 में लागू हुआ। इसके द्वारा एक यूरोपियन पेटेंट कार्यालय की स्थापना हुई। इसके द्वारा दिया गया पेटेंट, आवेदक द्वारा नामित सदस्य देशों में पेटेंट का कार्य करता है।
  • World Intellectual Property Organisation WIPO (वाईपो) ने Patent Law Treaty (PLT) (पी.एल.टी.) बनायी है। यह 1 जून 2000 को अंगीकार कर ली गयी है। हमने इस पर अभी तक हस्ताक्षर नहीं किये हैं। पी.एल.टी., पी.सी.टी. के अधीन है और विभिन्न देशों में पेटेंटो को प्राप्त करने की प्रक्रिया को और सरल बनाती है। यह पेटेंट के Substantive Law को प्रभावित नहीं करती है।
  • Substantive Patent Law को एक लय में लाने के लिए वाईपो, Substantive Patent Law Treaty (SPLT) (एस.पी.एल.टी.) का आयोजन कर रही है । जहां तक मुझे मालुम है हम इसमें भाग नहीं ले रहे। हमें इसमें भाग लेकर अपनी बात कहनी चाहिये।

 

आविष्कार

पेटेंट आविष्कारों के लिए दिया जाता है। ‘आविष्कार’ का अर्थ उस प्रक्रिया या उत्पाद से है, जो कि औद्योगिक उपयोजन (Industrial application) के योग्य है। अविष्कार नवीन एवं उपयोगी होना चाहिये तथा इसको उस समय की तकनीक की जानकारी में अगला कदम होना चाहिए। यह आविष्कार उस कला में कुशल व्यक्ति के लिए स्पष्ट (Obvious) भी नहीं होना चाहिये।

आविष्कार को पेटेंट अधिनियम की धारा 3 के प्रकाश में भी देखा जाना चाहिये । यह धारा परिभाषित करती है कि क्या आविष्कार नहीं होते हैं । किसी बात को आविष्कार तब तक नहीं कहा जा सकता है जब तक वह नवीन न हो । यदि किसी बात का पूर्वानुमान किसी प्रकाशित दस्तावेज के द्वारा किया जा सकता था या पेटेंट आवेदन के प्रस्तुत करने के पूर्व विश्व में और कहीं प्रयोग किया जा सकता था तो इसे नवीन नहीं कहा जा सकता। यदि कोई बात सार्वजनिक क्षेत्र में है या पूर्व कला के भाग की तरह उपलब्ध है तो उसे भी आविष्कार नहीं कहा जा सकता। हमारे देश में परमाणु उर्जा से सम्बन्धित आविष्कारों का पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है।

 

पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

पेटेंट एक सम्पत्ति है जो कि विरासत में प्राप्त की जा सकती है। पेटेंटी उसे किसी और को दे (assign) सकता है, या बन्धक रख सकता है। यदि दूसरे लोगों ने यदि पेटें‍टी से लाइसेंस न लिया हो तो, पेटेंटी उन्हें अपने पेटेंट का प्रयोग करने से या उसका विक्रय करने से रोक सकता है। उसे अधिकार है कि वह लाइसेंस के द्वारा दूसरे लोगों को यह कार्य करने के लिये अनुमति दे और इसके लिये वह रॉयल्टी भी ले सकता है। यदि कोई व्यक्ति, पेटेंटी से बिना लाइसेंस लिए या उसके पेटेंट का अनाधिकृत प्रयोग करता है तो पेटेंटी उस पर हर्जाने का मुकदमा या injunction का मुकदमा दायर कर उचित अनुतोष प्राप्त कर सकता है।

ट्रिप्स, ट्रेड मार्क या कॉपीराईट के उल्लंघन के मामलों में दाण्डिक प्रक्रियाओं एवं शास्तियों का प्रावधान बनाने के लिए सदस्यों को कहता है लेकिन पेटेंट के उल्लंघन के लिए नहीं। हमने भी पेटेंट का उल्लंघन करने वाले के लिये दाण्डिक अभियोजन का उपबन्ध नहीं किया है। हां झूठ बोलकर पेटेंट प्राप्त करने पर दाण्डिक अभियोजन की बात अवश्य है।

उन्मुक्त
ईमेल: unmukt.s@gmail.com

नोट:-

 

  • यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठे पर पेटेंट नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है।
  • यदि आप इसे सुनना चाहें तो इसे मेरे पॉडकास्ट बकबक पर सुन सकते हैं।

२ की पॉवर के अंक, पहेलियां, और कमप्यूटर विज्ञान

August 15, 2006

भूमिका

कुछ दिन पहले, पहेली चिठ्ठे पर नारद जी की छड़ी नाम की यह पहेली बूझी गयी।

‘तो हुआ ऐसा कि नारद जी एक बार अपनी ७ इन्च लम्बी सोने की छड़ी लेकर धरती पर भ्रमण को आए। अब उन्हें सारे चिट्ठों की जानकारी वाले सजाल बनाने में सप्ताह भर का समय लगना था। तो वे एक होटल में एक कक्ष लेने का विचार बना कर वहाँ पहुँच गए। अब इनके पास कोई धनराशि तो थी नहीं , पर सात दिन के किराए के रूप में होटल के मैनेजर ने नारद जी से ७ (सात) इन्च लम्बी सोने की छड़ी लेना स्वीकार कर लिया। पर मैनेजर ने हर रोज का किराया उसी दिन लेना चाहा। तो इस बार की पहेली यह है कि नारद जी को कम से कम छड़ी के कितने टुकड़े करने होंगे, ताकि वो,
होटल का किराया चुका सकें? और
उन टुकड़ों की लम्बाई क्या होगी?’

श्री र.च. मिश्र ने इसका सही जवाब दिया और वह है, १, २ और ४ इन्च के टुकड़े करने होंगे।

इस पहेली के कई रूप हैं और यह रूप इसका सबसे आसान रूप है। इसके कठिन रूप का जवाब इतनी आसानी से नहीं दिया जा सकता है। यह जवाब २ की पॉवर के अंक (१, २, ४, ८, १६, ….) की एक सिरीस है; अंकों की यह सिरीस मूलभूत है। इसका सम्बन्ध बहुत चीजों से है,

  • शतरंज के जादू;
  • सृष्टि के अन्त; और
  • उससे भी, जिससे हम सब जुड़े हैं यानि कि कमप्यूटर विज्ञान से।

शतरंज का जादू , सृष्टि का अन्त? यह क्या बला है? चलिये एक क्रम से चर्चा करते हैं ताकि हम कहीं चक्कर न खा जायें। चर्चा का क्रम यह रहेगा:

  • शतरंज का जादू क्या है;
  • सृष्टि का अन्त;
  • नारद जी की छड़ी वाली पहेली के अन्य रूप;
  • इस पहेली के हल का शतरंज के जादू एवं सृष्टि का अन्त से रिश्ता;
  • इस पहेली के हल का कमप्यूटर विज्ञान से सम्बन्धों का जिक्र।

पहेलियों की कई अच्छी पुस्तके हैं जिनका जिक्र मैने पहेलियां और मर्टिन गर्डनर नाम के लेख पर किया है। इसमे हिन्दी की एक अच्छी पुस्तक ‘गणित की पहेलियां’ है। इसके लेखक गुणाकर मुले हैं। इसे १९६१ मे राजकमल प्रकाशन ने छापा था और लगभग इसी समय मेरे बाबा ने यह पुस्तक मुझे भेंट की थी। गुणाकर मुले मेरे बचपन मे अकसर इस तरह के लेख लिखते थे। मालुम नहीं आप में से कितनो को इनकी याद है या उस समय के हैं। यह पहेलियों की मेरी पहली पुस्तक थी।

शतरंज का जादू
गुणाकर मुले की किताब ‘गणित की पहेलियां’ मे एक अध्याय ‘अंकगणित की पहेलियों’ पर है इसी मे वह ‘शतरंज के जादू’ के बारे मे बताते हैं। इसका बयान करने से पहले मैं आपको एक सांकेतिक चिन्ह के बारे मे बता दूं क्योंकि इसका प्रयोग मै करूंगा।
१=२/२=२^०
२=२=२^१
४=२x२=२^२
८=२x२x२=२^३
१६= २x२x२x२=२^४

यह सब नम्बर दो को दो से एक बार या दो से कई बार गुणा करके मिले हैं या यह कह लीजये कि ये दो की पावर (power) हैं। इन्टरनेट पर पावर को लिखने के लिये ^ चिन्ह का प्रयोग किया जाता है और मै भी इस चिठ्ठे पर इसी प्रकार से लिखूंगा। अब देखते हैं कि गुणाकर मुले किस तरह से शतरंज के जादू के बारे मे ब्यान करते हैं। यह उन्ही के शब्दों मे,

‘शतरंज के खेल के नियमों को आप न भी जानते हों तो कम से कम इतना तो सभी जानते हैं कि शतरंज चौरस पटल पर खेला जाता है । इस पटल पर ६४ छोटे-छोटे चौकोण होते हैं।

प्राचीन काल में पर्सिया में शिर्म नाम का एक बादशाह था। शतरंज की अनेकानेक चालों को देखकर यह खेल उसे बेहद पसंद आया। शतरंज के खेल का आविष्कर्ता उसी के राज्य का एक वृद्ध फकीर है, यह जानकर बादशाह को खुशी हुई। उस फकीर को इनाम देने के लिये दरबार में बुलाया गया: “तुम्हारी इस अदभुत खोज के लिये मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हूं । मांगो, जो चाहे मांगो,” बादशाह ने कहा।

फकीर - उसका नाम सेसा था - चतुर था। उसने बादशाह से अपना इनाम मांगा - “हुजूर, इस पटल में ६४ घर हैं। पहले घर के लिये आप मुझे गेहूं का केवल एक दाना दें, दूसरे घर के लिये दो दाने, तीसरे घर के लिये ४ दाने, चौथे घर के लिये ८ दाने और …. इस प्रकार ६४ घरों के साथ मेरा इनाम पूरा हो जाएगा।”

“बस इतना ही ?” बादशाह कुछ चिढ गया,” खैर, कल सुबह तक तुम्‍हें तुम्‍हारा इनाम मिल जाएगा। “

सेसा मुस्कराता हुआ दरबार से लौट आया और अपने इनाम की प्रतीक्षा करने लगा।

बादशाह ने अपने दरबार के एक पंडित को हिसाब करके गणना करने का हुक्म दिया। पंडित ने हिसाब लगाया … १+ २+ ४+ ८+ १६+ ३२+ ६४+ १२८… (६४ घरों तक ) अर्थात १+ २^२ + २^३ + २^४… = (२^६४)-१ अर्थात १८,४४६,७४४,०७३,७०९,५५१,६१५ गेहूं के दाने। गेहूं के इतने दाने बादशाह के राज्य में तो क्या संपूर्ण पृथ्वी पर भी नहीं थे। बादशाह को अपनी हार स्वीकार कर लेनी पड़ी।’

राजा तो समझ रहा था कि फकीर ने बहुत छोटा इनाम मांगा है उसकी समझ मे नहीं आया कि उसे कितना गेहूं देना था - यही है शतरंज का जादू।

गौर फरमाइयेगा कि हर खाने मे कितने गेहूं के दाने रखे जा रहे हैं क्योंकि यही हमारे इस विषय के लिये महत्वपूर्ण है।

सृष्टि का अन्त
गुणाकर मुले अपनी किताब मे सृष्टि का अन्त की कथा का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं। यह उन्ही के शब्दों मे,

‘कथा बहुत प्राचीन है। उस समय काशी में एक विशाल मन्दिर था। कहा जाता है कि ब्रम्हा ने जब इस संसार की रचना की, उसने इस मंदिर में हीरे की बनी हुई तीन छड़ें रखी और फिर इनमें से एक में छेद वाली सोने की ६४ तश्तरियां रखीं सबसे बडी नीचे और सबसे बडी उपर। फिर ब्रम्हा ने वहां पर एक पुजारी को नियुक्त किया। उसका काम था कि वह एक छड की तश्तरियां दूसरी छड़ में बदलता जाए। इस काम के लिए वह तीसरी छड़ का सहारा ले सकता था। परन्तु एक नियम का पालन जरूरी था। पुजारी एक समय केवल एक ही तश्तरी उठा सकता था और छोटी तश्तरी के उपर बडी तश्तरी वह रख नहीं सकता था। इस विधि से जब सभी ६४ तश्तरियां एक छड से दूसरी छड़ में पहुंच जाएंगी, सृष्टि का अन्त हो जाएगा।

आप कहेंगे, “तब तो कथा की सृष्टि का अन्त हो जाना चाहिए था। ६४ तश्तरियों को एक छड़ से दूसरी छड़ में स्थानान्तरित करने में समय ही कितना लगता है।”

नहीं, यह ‘ब्रम्ह-कार्य’ इतनी शीघ्र समाप्त नहीं हो सकता। मान लीजिए कि एक तश्तरी के बदलने में एक सेकेंड का समय लगता है। इसके माने यह हुआ कि एक घंटे में आप ३६०० तश्तरियां बदल लेंगे। इसी प्रकार एक दिन में आप लगभग १००,००० तश्तरियों और १० दिन में लगभग १,०००,००० तश्तरियां बदल लेंगे।

आप कहेंगे, “इतने परिवर्तनो में तो ६४ तश्तरियां निश्चित रूप से एक छड़ से दूसरी छड़ में पहुंच जाएगीं।” लेकिन आपका अनुमान गलत है । उपरोक्त ‘ब्रम्ह-नियम’ के अनुसार ६४ तश्‍तरियों को बदलने में पुजारी महाशय को कम से कम ५००,०००,०००,००० वर्ष लगेंगे ।

इस बात पर शायद यकायक आप विश्वास न करें । परन्तु गणित के हिसाब से कुल परिवर्तनों की संख्या होती है, (२^६४)-१ अर्थात १८,४४६,७४४,०७३,७०९,५५१,६१५’

आपने गौर किया कि यह वही नम्बर है जितने गेहूं के दाने राजा को देने थे। इसका हल भी गुणाकर मुले की किताब मे इस प्रकार है,

‘उपरोक्त गणना को एक संवाद द्वारा स्पष्ट कर देना उचित होगा । अपने बचपन की एक घटना मुझे याद आती है। एक दिन मेरे बडे भाई साहब ने सिक्कों का एक खेल समझाया। उन्होंने मेज पर तीन प्लेटें रखीं और इनमें से एक में 5 अलग अलग सिक्के रखें, क्रमश: एक के उपर एक - रूपया, अठन्नी, चवन्नी, एकन्नी और एक पैसा। इन पांचों सिक्‍कों को, इसी क्रम में, दूसरी प्लेट में रखना था। परन्तु तीन नियमों का पालन जरूरी था,

(१) एक समय में केवल एक ही सिक्का उठाया जा सकता था।
(२) छोटे सिक्के पर बडे सिक्के को रखने की मनाही थी।
(३) इस परिवर्तन - क्रिया में तीसरी प्लेट का उपयोग किया जा सकता था। परन्तु अन्त में सभी सिक्के दूसरी प्लेट में पहुंच जाने चाहिए थे, और वह भी अपने आरंभिक क्रम में ( रूपया, अठन्नी, चवन्नी, एकन्नी और पैसा) - एक के उपर दूसरा।
“नियम तुम्हें समझ में आ गए ‍ होंगे, अब अपना काम शुरू करो ! ” भैया ने मुझसे कहा।
मैंने पैसा उठाया और तीसरी तश्तरी में रखा। फिर इकन्नी उठाकर दूसरी तश्तरी में रखी। फिर चवन्नी उठाई, परन्तु इसे कहां रखूं? (सिक्‍कों के आकार पर विचार न करें, इनके मूल्यों के अनुसार ही इन्‍हें हम छोटा-बडा मानेंगे)। यह तो दोनों से बड़ी है।
भाई साहब ने मदद की,” पैसे को इकन्नी पर रखो। तब तुम्हें तीसरी तश्तरी खाली मिलेगी।”
मैंने वैसा ही किया । परन्तु इससे मेरी कठिनाइयों का अन्त नहीं हुआ। अब अठन्‍नी कहां रखूं? थोडा सोचने पर रास्ता निकल आया। पैसे को मैंने दूसरी तश्तरी से पहली तश्तरी में रख दिया और इकन्नी को तीसरी तश्तरी में चवन्नी के उपर। फिर पहली तश्तरी का पैसा तीसरी तश्तरी में इकन्नी पर रख दिया। अब अठन्नी रखने के लिए दूसरी तश्तरी खाली थी । इसी प्रकार, कई परिवर्तनों के बाद, सभी सिक्के दूसरी तश्तरी में बदलने में मुझे सफलता मिली।
भाई साहब ने प्रशंसा करते हुए पूछा, “अच्छा, अब यह तो बताओ कि तुमने कुल कितने परिवर्तन किये ?”
“नहीं जानता, मैंने गिनती ही नहीं की ।” मैंने जवाब दिया।
“खैर आओं हम गिनती करें। मान लो कि पांच की बजाय हमारे पास केवल दो ही सिक्के हैं इकन्नी और पैसा । तब कितने परिवर्तन होंगे ?”
“तीन।” उत्तर आसान था।
“और यदि तीन सिक्के हों तो?”
मैंने थोडा और हिसाब लगाकर उत्तर दिया — “३+१+३= ७ परिवर्तन।”
“और चार सिक्के हों तो?”
“७+१+७= १५ परिवर्तन, मैंने उत्साह से कहा।
“बहुत अच्छे ! और यदि पांच सिक्के हों तो?”
“१५+१+१५= ३१ परिवर्तन,” मैंने उत्तर दिया।
“अब तुम इस समस्या को ठीक तरह से समझ गए हो। परन्तु मैं तुम्हें और सरल तरीका बताता हूं।” भाई ने कहा।
इन संख्याओं - ३, ७, १५, ३१, … - को तुम निम्न तरीके से रख सकते हो,
३ = (२x२) -1
७ = (२x२x२) - 1
१५ = (२x२x२x२) - 1
३१ = (२x२x२x२x२) - 1
इस (उपरोक्त‍त) तालिका पर विचार करने से यह स्प‍ष्ट हो जाता है कि जितने सिक्के हों, उतनी बार २ को अपने आप से गुणा करके और फिर उसमें से १ को घटा देने से इच्छित परिवर्तनों की संख्या प्राप्त होती है । जैसे, यदि ५ की बजाय ६ सिक्के हों तो हमें (२x२x२x२x२x२) - १ या १२७ परिवर्तन होंगे।’

पहेली के अन्य रूप
नारद जी की छड़ी पहेली के कई स्तर हैं और कई अन्य रूप। यह पहेली जिस रूप मे पूछी गयी है वह इसका सबसे आसान रूप है इस पहेली के कुछ कठिन स्तर हैं उनके बारे मे बात करने से पहले इसका एक दूसरा रूप देखें।

नारद जी को अपने भक्तों को लड्डू बांटने हैं नारद जी थोड़े से नये युग के हो गये हैं वे लड्डू डिब्बे मे रख कर देना चाहते हैं। समय न बर्बाद हो इसलिये पहले से पैक करके रखना है वे अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते जिसने जितने मांगे उतने दे दिये उनके पास ७ लड्डू हैं डिब्बों की कमी है इसलिये कम से कम डिब्बों का प्रयोग करना है। हर एक डिब्बे मे कितने लड्डू पैक किये जांये कि यदि उनसे कोई १ से ७ तक जितने भी लड्डू मांगे, वे दे सकें।

इसका जवाब है कि उन्हे ३ डिब्बे चाहिये और पहले मे १, दूसरे २, और तीसरे मे ४ लड्डू रखने होंगे।

चलिये अब इसके दूसरे स्तर पर चले - लड्डूवों कि संख्या बढ़ा देते हैं। मान लिया जाय कि १०२३ लड्डू हों तो हर डिब्बे मे कितने लड्डू रखे जायेंगे। इसका जवाब है १० डिब्बे और उनमे लड्डू निम्न क्रम मे रखें जायेंगे
१, २, ४, ८, १६, ३२, ६४, १२८, २५६, ५१२

यदि १००० लड्डू होते तो पहले ९ डिब्बे मे तो उतने ही पर आखरी डिब्बे मे ५१२-२३=४८९ लड्डू रखने होंगे। यदि नारद जी के पास ५१२ से १०२३ तक लड्डू हों तो उन्हे हमेशा १० डिब्बों की जरूरत होगी। पहले ९ डिब्बों मे उतने ही जिनका योग है ५११ और दसवें मे बाकी सारे।

चलिये थोड़ा और ऊपर चले। यदि उनके पास अनगिनत लड्डू हों तो वह डिब्बों मे किस तरह से रखें। जवाब सरल है उनको निम्न क्रम मे रखें
१, २, ४, ८, १६, ३२, ६४, १२८, २५६, ५१२, १०२४, २०४८, …..
यानि कि उन्हे २ की पावर मे रखें।

इस पहेली का एक इससे भी कठिन स्तर है पर उसकी यहां जरूरत नहीं है इस लिये छोड़ देता हूं, वह फिर कभी।

शतरंज के जादू और सृष्टि का अन्त का इस पहेली के हल से सम्बन्ध
क्या आपने नारद जी की छड़ी की पहेली के जवाब पर गौर किया। नारद जी की छड़ जितने दिन रुकना चाहेंगे उतनी लम्बी छड़ होगी पर टुकड़े हमेशा १, २, ४, ८, १६ ….. के होंगे। यदि इसे लड्डू के रूप मे देखें तो डिब्बों मे लड्डू हमेशा १, २, ४, ८, १६, …. के नम्बर से रखने होंगे। यह सब नम्बर दो को दो से एक बार या दो से कई बार गुणा करके मिले हैं या यह कह लीजये कि ये दो की पावर (power) हैं। शतरंज के खानो मे गेहूँ के दाने और सृष्टि का अन्त मे छड़ों के बदलाव की संख्या का भी सम्बन्ध २ की पावर से है।

शतरंज का जादू और सृष्टि का अन्त इस पहेली के एक ही रूप हैं तथा नारद जी की छड़ी या नारद जी के लड्डू इसका दूसरा रूप हैं नारद जी की छड़ी या लड्डू - जोड़ से शुरू होकर उसके टुकड़ों तक जाती है तो शतरंज का जादू - टुकड़ों से शुरू होकर उसके जोड़ तक जाता है। यानि कि नारद जी की छड़ी कि पहेली का अन्त शतरंज के जादू की शुरुवात है और शतरंज का जादू का अन्त नारद जी की छड़ी की शुरुवात है: यह पहेलियां एक दूसरे विलोम रूप हैं।

इस पहेली के हल का कमप्यूटर विज्ञान से सम्बन्ध
अब कुछ शब्द इसके हमारे साथ के सम्बन्ध से, हालांकि इसकी वृस्तित चर्चा कभी और - शायद ‘गणित, चिप और कमप्यूटर विज्ञान सिरीस’ मे - यहां केवल भूमिका।

इस विषय पर चर्चा शुरू करने से पहले मैने कहा था कि इस पहेली का सम्बन्ध उससे भी है जिससे हम सब जुड़े हैं। जी हां, इन नम्बरों का बहुत गहरा सम्बन्ध कमप्युटरों से है आप देखें तो पायेंगे कि इन नम्बरों मे दो खास बाते हैं।
पहली, यह वह नम्बर हैं,

  • जिसकी दूरी पर नारद जी की छड़ को काटने पर सबसे कम बार काटा जायेगा; या
  • यह वह नम्बर है जिसमे लड्डुवों को डिब्बों मे रखने पर सबसे कम डिब्बों की जरूरत होगी; और
  • जिनकी सहायता से हम हर दिन को अलग अलग छड़ से मिला कर निश्चित रूप से चिन्हित कर सकते हैं; या
  • जिनकी सहायता से जो भक्त जितने लड्डू चाहे उसे अलग अलग डिब्बों मे रख कर दे सकते हैं।

दूसरी, यह वह नम्बर हैं,

  • जिसकी दूरी पर नारद जी की छड़ को काटने पर सबसे कम बार काटा जायेगा; या
  • यह वह नम्बर है जिसमे लड्डुवों को डिब्बों मे रखने पर सबसे कम डिब्बों की जरूरत होगी; और
  • इनकी सहायता से हम हर दिन को अलग अलग छड़ से मिला कर निश्चित रूप से चिन्हित कर सकते हैं; या
  • जो भक्त जितने लड्डू चाहे उसे अलग अलग डिब्बों की सहायता से दे सकते हैं।

कमप्यूटर विज्ञान मे दो बाते अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं

  • किसी कार्य को कितने कम से कम steps में किया जा सकता है; और
  • हम analog से digital पर कैसे पहुंचे।

हम digital तभी हो सकतें है जब हम किसी भी चीज को नम्बरों के द्वारा निश्चित रूप चिन्हित कर सकें। यह यदि आप नारद जी की छड़ी के हल पर गौर करें तो उससे यह दोनो कार्य होते हैं।

हमारा जीवन, हमारी गणित, डेसीमल सिस्टम पर आधारित है, यानि कि १० नम्बरों से (०, १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, और ९) बाकी सारे नम्बर लिखे जा सकते हैं। बाइनरी सिस्टम दो नम्बर पर आधारित होता है इसमे दो नम्बर ० और १ हैं इसी से बाकी नम्बर लिखे जाते हैं कम्प्यूटर विज्ञान बाइनरी सिस्टम पर आधारित है तथा १, २, ४, ८, १६ …. नम्बर इन दोनो सिस्टम को आपस मे जोड़ते हैं। यह नम्बर (१, २, ४, ८, १६ ….) हमारी दुनिया को डिजिटल-दुनिया से, कम्प्यूटर की दुनिया से, जोड़ते हैं।

विज्ञान के हर क्षेत्र के विषेशज्ञों का योगदान, कमप्यूटर विज्ञान में है पर सबसे बड़ा योगदान गणितज्ञों का है। कम्प्यूटर विज्ञान अपने पठार पर पहुंच रहा है और इसका ज्यादा विस्तार applications में हो रहा है। पर

  • क्या कम्प्यूटर विज्ञान का विस्तार यहीं समाप्त हो जायगा और केवल applications मे सीमित हो जायेगा? या
  • क्या इसमे कोई क्रान्ति (quantm jump) आयेगी?
  • यदि आयेगी तो किस तरफ से आने की सम्भावना सबसे अधिक है?

जाहिर है कि क्रान्ति गणित की तरफ से आयेगी और इसमे शायद गणित के निम्न दो क्षेत्र महत्वपूण भूमिका निभायें।

  • Artificial Intelligence
  • Knot theory/ Topology

इसकी चर्चा हम फिर कभी करेंगे

कम्प्यूटर विज्ञान मे क्रान्ति गणित के किसी भी क्षेत्र से आये पहेलियां उसका हमेशा से उसका हिस्सा रहेंगी। इसलिये बहुत सारी कमप्यूटर फर्म नौकरी देने से पहले पहेलियों कि भी परीक्षा लेती हैं। गूगल ने तो कुछ समय पहले अमेरिका की सड़कों पर, सार्वजनिक रूप से पहेली बूझ कर, नौकरी दी। उसके बारे मे इन्टरनेट पर देख सकते हैं। इसलिये गणित और पहेलियों को नज़रअन्दाज मत कीजये, उन्हे मुन्ने और मुन्नी के साथ सुलझाते जाईये। क्या मालुम स्वयं आप या आपका मुन्ना या मुन्नी कम्प्यूटर विज्ञान मे क्रान्ति ले आये।

२ की पॉवर के अंक, पहेलियां, और कमप्यूटर विज्ञान

यह इस लेख की pdf फाईल है इसे आप डाउनलोड कर सकते हैं।
नोट
(१) यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठेपर ‘नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू’ के नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है।
(२) मेरे हर चिठ्ठे की तरह इस लेख की सारी चिठ्ठियां भी कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को) दें और अच्छा हो कि इस चिट्ठे की चिट्ठी से लिंक दे दें।


रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन

August 1, 2006

मैं और फाइनमेन का संसार

बीसवीं शताब्दी के पहले भाग के सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आईनस्टाइन थे और रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन (फाइनमेन) बीसवी शताब्दी के अन्तिम भाग के। वे १९६६ मे नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित हुए। बीसवीं शताब्दी के बीच मे अच्छे विश्वविद्यालयों मे भौतिक शास्त्र को पढ़ाये जाने के तरीके पर विवाद चल रहा था।

 

  • क्या भौतिक शास्त्र मे उसी तरह से उन्ही विषयों के साथ पढ़ाया जाय जैसे अभी तक पढ़ाया जा रहा था; या
  • फिर नये तरह से नये विषयों के साथ पढ़ाया जाय।

इस विवाद को फाइनमेन जैसा ही व्यक्ति अन्जाम दे सकता था। उनका रुतबा सब मानते थे। उनका सम्मान इसलिये नहीं था कि वह कैल टेक मे थे पर कैल टेक दुनिया का सबसे अचछा भौतिक शास्त्र का विश्वविद्यालय इसलिये माना जाता था क्योंकि फाइनमेन वहां थे फाइनमेन ने १९६१-६३ मे कैल-टेक मे स्नातक के विद्यार्थियों को भौतिक शास्त्र पढ़ाया - कितने भाग्यशाली थे वह विद्यार्थी। इतिहास गवाह है कि आज तक इतने बड़े वैज्ञानिक ने कभी स्नातक के विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया। इन तीन साल ने भौतिक शास्त्र को पढ़ाने की नयी दिशा दी और भौतिक शास्त्र नयी तरह से नये विषयों के साथ पढ़ाया जाने लगा। इन लेक्चरों को तीन किताबों ने बदला गया। यह लाल बाईंडिंग मे थीं और ‘Lectures on Physics by Richard P Feynman के नाम से मशहूर हुईं। यदि आप भौतिक शस्त्र में महआरत हासिल करने की सोचते हैं तो इन किताबों को पढ़ना आवश्यक है।

गणित और भौतिक शास्त्र हमेशा से मेरे प्रिय विषय थे। मैने स्कूली जीवन, हवाई-जहाज के मौडल, ट्रांजिस्टर, तथा अन्य मौडल बनाते गुजारा। १९६० के दशक मे १२वीं पास कर जब स्नातक की कक्षा मे कदम रखा तो हमे भौतिक शास्त्र इन्ही लाल बाईंडिंग की ‘Lectures on Physics by Richard P Feynman’ की किताबों से पढ़ाया जाना शुरू किया गया। उस समय अपने देश मे शायद यह किताब और कहीं नहीं चलती थी। तब से हम सब, न केवल कैल-टेक जाने की सोचने लगे, पर फाईनमेन के साथ काम करने का भी सपना संजोने लगे। मै तो फाईल पलटने वाला बन गया पर मेरे कुछ मित्र न केवल कैल-टेक गये पर उन्होने फाइनमेन के साथ काम भी किया।

फाईनमेन का बचपन

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन, का जन्म ११ मई १९१८ में हुआ था और मृत्यु १९८८ में कैंसर से हो गयी। छुटपन में फाइनमेन अक्सर सोचा करते थे कि वह बडे होकर क्या बनें: विदूषक या वैज्ञानिक। बडे होकर उन्होंने इन दोनो भूमिकाओं को एक साथ बाखूबी निभाया। लोग कहते हैं कि वह इतने मशहूर क्यों हुये पर उनके बारे में वैज्ञानिक ठीक ही कहते हैं:

‘फाइनमेन तो ऐतिहासिक व्यक्ति हैं उनको जितना सम्मान मिला वे उस सब के अधिकारी हैं।’

फाइनमेन के पिता का बातों को बताने का अपना ही ढंग था। एक बार का किस्सा है कि पिता और पुत्र पार्क मे घूम रहे थे पिता ने एक चिड़िया की तरफ वह इशारा करके बताया कि यह चिड़िया दुनिया में अलग-अलग नामो से जानी जाती है। यह जरूरी नहीं है कि आप उन सब नामो को जाने, न ही महत्वपूर्ण है। पर महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या और कैसे करती है। वे बच्चे के मन मे जिज्ञासा जगाने की कोशिश करते थे यह बताने की जरूरत नहीं है कि फाइनमेन बचपन से जिज्ञासु तथा कुतुहली थे।

फाइनमेन के पिता को आजकल के टीवी के क्विज प्रोग्रामो जैसे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से तुलना करें कितना अन्तर पायेंगे। इस तरह के क्विज प्रोग्राम तो केवल यह बताते हैं कि कौन कितना रट सकता है। आज के क्विज प्रोग्रामो से यह पता नहीं चलता कि कौन कितना अच्छा सोच सकता है, किसमे कितना बूता है और कौन विज्ञान की दुनिया को बदलने की ताकत रखता है।

सोच कर रेडियो ठीक करना

फाइनमेन बचपन के दिनों में रेडियों ठीक किया करते थे। उस समय वाल्व रेडियो हुआ करते थे। उनके पड़ोसी का रेडियो में शुरू होने के थोड़ी देर बाद खरखराने लगता था। उसने फाइनमेन से रेडिये ठीक करने के लिये कहा। फाइनमेन रेडियो को छूने के बजाय वही बैठ कर सोचने लगे। उन्हे लगा कि गर्म होने पर बिजली का अवरोध बढ जाता है जिससे खरखराहट बढ जाती है और दो वाल्वों को एक दूसरे से बदलने में यह दूर हो सकती है। उसने ऐसे ही किया और खरखराहट बन्द हो गयी और तभी से कई लोग उन्हे उस लड़के की तरह से याद रखते हैं जो केवल सोच कर रेडियो ठीक किया करता था।

स्कूल में वह गणित में सबसे अच्छे और गणित टीम के हीरो थे। पर उन्होंने गणित को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि गणित मे उच्च शिक्षा प्राप्त करके वे दूसरों को गणित पढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। वह कुछ व्यवहारिक करने का सोच कर, पहले इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग की तरफ गये पर बाद में भौतिक शास्त्र की पढ़ाई की। शायद यही ठीक था। यह बीसवीं शताब्दी थी - भौतिक शास्त्रियों की शताब्दी। इस शताब्दी मे यदि कोई विज्ञान की दुनिया को बदलने का दम रखता था तो भौतिक शास्त्र ही उसका विषय था। यह उसी तरह से जैसे इक्कीसवीं शताब्दी जीव शास्त्रियों की शताब्दी है। चलिये हम वापस फाइनमेन पर चलें।

युवा फाइनमेन

फाइनमेन ने स्नातक की शिक्षा मैसाचुसेट इं‍स्टिट्यूट आफ टेक्नोलोजी से पूरी की। वह वहीं पर शोध कार्य करना चाहते थे पर फिर प्रिंक्सटन मे शोध कार्य करने के लिये चले गये। बाद में वे कहा करते थे,

‘यह ठीक ही था। मैने वहां जाना कि दुनिया बहुत बड़ी है और काम करने के लिये बहुत सी अच्छी जगहें हैं।’

व्हीलर और घड़ी

यहां पर युवा फाइनमेन को व्हीलर के साथ शोध करने का मौका मिला। उस समय तक व्हीलर को नोबेल पुरूस्कार तो नहीं मिला था पर वे वह काम कर चुके थे जिस पर उन्हे बाद मे नोबेल पुरूस्कार मिला। वे कुछ आडम्बर प्रिय थे कुछ अपनी अहमियत भी जताते थे। उन्होंने फाइनमेन को सप्ताह में एक दिन का कुछ निश्चित समय मिलने का दिया । पहले दिन मुलाकात के समय वह सूट पहने थे उन्होंने अपनी जेब से अपनी सोने की विराम घडी निकाल कर मेज पर रख दी ताकि फाइनमेन को पता चल सके कि कब उसका समय समाप्त हो गया है। फाइनमेन उस समय विद्यार्थी थे। उन्होंने एक बाजार से एक सस्ती विराम घड़ी खरीदी - उनके पास मंहगी घड़ी खरीदने के लिये पैसे नहीं थे। अगली मीटिंग पर उन्होंने अपनी सस्ती घड़ी उस सोने की घड़ी के पास रख दी। व्हीलर को भी पता चलना चाहिये कि उनका समय भी महत्वपूर्ण है। व्हीलर को मजाक समझ में आया और दोनो दिल खोल कर हंसे। दोनों ने घड़ियां हटा ली। उनका रिश्ता औपचारिक नहीं रहा, वे मित्र बन गये, उनकी बातें हंसी मजाक में बदल गयीं, और हंसी-मजाक नये मौलिक विचारों मे।

लॉस एलमॉस

इसी बीच दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। जर्मनी मे परमाणु बम बनाने का काम हो रहा था, यदि पहले वहां बन जाता तो हिटलर अजेय था। अमेरिका की लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी मे दुनिया के वैज्ञानिक इक्कठा होकर परमाणु बम बनाने के लिये एकजुट हो गये। फाइनमेन को भी वहां बुलाया गया और उन्होने वहां काम किया।

लॉस एलमॉस मे सुरक्षा का जिम्मा सेना का था जिनके अपने नियम अपने कानून थे। यह नियम फाइनमेन को अक्सर समझ मे नहीं आते थे। फाइनमेन ताले खोलने मे माहिर थे। वे सेना के अधिकारियों को तंग करने के लिये की लेबोरेटरी की तिजोरियों खोल कर उसमे कागज परguess whoलिख कर छोड़ देते थे पर तिजोरियों से कुछ निकालते नहीं थे। यह वह केवल, सेना के अधिकारियों को बताने के लिये करते थे कि उनकी सुरक्षा प्रणाली कितनी गलत है।

अरलीन

उनके जीवन का एक और दृष्टान्त - बिल्‍कुल असम्भव सा लगता है, मै तो हमेशा सोचता था कि यह सब कहानियों या पिक्चरों में होता है इस वास्तविक दुनियां में नहीं।

स्कूल के दिनों में फाइनमेन का अपनी सहपाठिनी अरलीन से प्रेम हो गया। उन्होने शादी तब करने की सोची जब फाइनमेन को कोई नौकरी मिल जाय। जब फाइनमेन शोध कार्य कर रहे थे तब अरलीन को टी.बी. हो गयी उसके पास केवल चन्द सालों का समय था। उन दिनों टी.बी. का कोई इलाज नहीं था। अरलीन को टी.बी. हो जाने के कारण, फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे। उन्हे मालुम था कि अरलीन के साथ उसके सम्बन्ध केवल अध्यात्मिक (Platonic) ही रहेगें। इन सब के बावजूद, फाइनमेन अरलीन से शादी करना चाहते थे। उनके परिवार वाले और मित्र इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे मे उनकी अपने पिता से अनबन भी हो गयी। इसके बावजूद फाइनमेन ने अरलीन के साथ शादी की।

फाइनमेन, जब लॉस एलमॉस में काम कर रहे थे तो वहां के निदेशक रौबर्ट ओपेन्हाईमर ने अरलीन को पास ही के सैनीटेरियम में भरती करवा दिया ताकि फाइनमेन उससे मिल सके| फाइनमेन के लॉस एलमॉस रहने के दौरान ही अरलीन की मृत्यु हो गयी। इस घटना चक्र पर एक पिक्चर भी बनी है जिसका नाम इंफिनिटी (Infinity) है इसे मैथयू बौरडविक (Malthew Bordevick) ने इसे निर्देशित किया है।

कौरनल विश्वविद्यालय

फाइनमेन जीवन्त थे और अक्सर मौज मस्ती के लिये काम करते थे। मौज मस्ती मे ही उन्होने उस विषय पर काम किया जिस पर उन्हे नोबेल पुरुस्कार मिला। यह भी एक रोचक किस्सा है।

दूसरे महायुद्ध के दौरान लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी में फाइनमेन की मित्रता बेथ से हुई जिनसे उनकी काफी पटती थी। बेथ कौरनल में थे, इसलिये फाइनमेन भी कौरनल चले गये। एक दिन वे कौरनल के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे 2:1 का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,

‘इसका कोई महत्व नहीं है मैं यह सब मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।’

पर वह इसके महत्व के बारे मे ठीक नहीं थे। वे जब एलेक्ट्रौन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कौरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी गणित फिर से याद आने लगी। इसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला। सच है जीवन में बहुत कुछ वह भी आवश्यक है जो केवल मौज मस्ती के लिये हो, चाहे उसका कोई और महत्व हो या न हो - मौज मस्ती ही अपने आप मे एक महत्व की बात है। यदि आप मौज मस्ती में ही अपनी जीविका ढ़ूढ सके तो क्या बात है, यदि यह नहीं हो सकता तो शायद जीविका में ही मौज मस्ती ढ़ूढ पाना दूसरी अच्छी बात है।

कैल-टेक

फाइनमेन न ही एक महान वैज्ञानिक थे पर एक महान अध्यापक भी थे। उन्हे मालुम था कि अपनी बात दूसरे तक कैसे पहुंचायी जाय। व्याख्यानशाला उनके लिये रंगशाला थी, जिसमें नाटक भी था और आतिशबाजी भी।

फाइनमेन के द्वारा भौतिक शास्त्र पर कैल-टेक के लेक्चरों का जिक्र मैने इस लेख को शुरूवात मे किया है। इन लेक्चरों को उन्होने सितम्बर 1961-मई 1963 मे दिया था। यह लेक्चर खास थे इसलिये इन्हें हमेशा के लिये सुरक्षित रखा गया और बाद मे ये तीन लाल किताबों के रूप में छापे गये। फाइनमेन सप्ताह में केवल दो लेक्चर देते थे बाकी समय वह इन लेक्चरों को तैयार करने में लगाते थे। लेक्चर की हर लाइन, हर मजाक को (जो वह लेक्चरों के दौरान करते थे) पहले से सोच विचार कर रखते थे। कभी भी उनके साथ लेक्चर के नोटस नहीं होते थे। बस केवल एक छोटा सा कागज रहता था जिसमें आगे बताने के लिये कुछ खास शब्द केवल संकेत देने के लिये रहते थे। यह तीन साल, संसार मे किसी भी विश्वविद्यालय के, किसी भी विषय पर के लेक्चरों मे अद्वितीय हैं। न कभी ऐसे हुये न शायद फिर कभी होंगे। क्योंकि मालुम नहीं कि फिर कभी ऐसा व्यक्ति आयेगा कि नहीं।

फाइनमेन के लिये अंग्रेजी - बेकार, और दर्शन शास्त्र - तिरस्कृत विषय था। Religion से उनका कोई वास्ता नहीं था। चक्करों पर बात करना उनकी फिज़ा में नहीं था। वह हमेशा सीधी बात करते थे। उनका मतलब वही होता था जो वे कहते थे। वे इस बात से भ्रमित हो जाते थे यदि उनकी सीधी बात दूसरे को परेशान कर देती थी।

चैलेंजर दुर्घटना जांच कमीशन

फाइनमेन को लोग अलग अलग तरह से याद रखते हैं - कुछ लोग,

  • उस लडके की तरह जो केवल सोच कर रेडियो ठीक करता था;
  • उस वैज्ञानिक की तरह से जो भौतिक शास्त्र की गणना टौपलेस रेस्तराँ में करना पसन्द करता था;
  • उस चंचल युवा के रूप में याद रखते हैं जो लौस एलमौस की लेबॉरेटरी के तिजोरियों को खोल कर अलग अलग तरह के नोट लिखे कागज को रख कर, सेना के अधिकारियों को तंग करता था;
  • उन्हें बोंगों बजाने वाले की तरह याद करते हैं।

सम्भवत: सबसे ज्यादा लोग उन्हें उस व्यक्तिि की तरह से याद करते हैं जिसने टीवी के सामने सार्वजनिक रूप से बताया कि चैलेंजर-दुर्घटना क्यों हुई।

28 जनवरी 1986 में चैलेंजर स्पेसशिप का विस्फोट आकाश में हो गया था, इसकी जांच करने के लिये एक कमीशन बैठा। फाइनमेन उसमें वैज्ञानिक की हैसियत से थे। यह विस्फोट, स्पेसशिप में कुछ घटिया किस्म का सामान लगाने के कारण हुआ था। नासा का प्रशासन (जिस पर सेना का जोर है) इसे दबाना चाहता था पर वैज्ञानिक इसे उजागर करना चाहते थे। कमीशन ने अपने निष्कर्ष को टीवी के सामने सीधे प्रसारण मे बताना शुरू किया (इसमें घटिया किस्म के सामान लगाने की बात स्पष्ट नहीं थी )। उस समय टीवी पर ही, सबके सामने फाइनमेन ने एकदम ठन्डे पानी के अन्दर घटिया सामान को डाल कर दिखाया कि वास्तव में विस्फोट क्यों हुआ था। यह सीधा प्रसारण था इसलिये फाइनमेन का प्रदर्शन रोका नहीं जा सका और यह दो मिनट की क्लिप कुछ घन्टो के अन्दर दुनिया की टीवी पर सबसे ज्यादा दिखायी जाने वाली न्यूस क्लिप बन गयी।

टौपलेस परिवेषिकायें

फाइनमेन पैसाडीना में अक्सर वहीं के एक रेस्तराँ मे जाते थे, जहां पर टौपलेस परिवेषिकायें ( Waitress) रहती थीं। उस रेस्तराँ में वे उसके मालिक को भौतिक शास्त्र बताते थे और वह उन्हे चित्रकारी। एक बार पुलिस वालों को लगा कि उस रेस्तराँ में कुछ गड़बड़- सड़बड़ होता है और रेस्तराँ के मालिक पर अश्लीलता का मुकदमा चलाया। वास्तव में वहां पर इस तरह का कोई कार्य नहीं होता था। उस रेस्तराँ में कई प्रतिष्ठित व्यक्ति आते थे रेस्तराँ के मालिक ने उन सबसे गवाही देने की प्रार्थना की| सबने चुप्पे से कन्नी काट ली, पर फाइनमेन ने नहीं। उन्होंने रेस्तराँ मालिक के पक्ष में गवाही दी और अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर सबसे मुख्य खबर के रूप में छपी।

‘Caltech’s Feynman tells lewd case jury, he watched the girls while doing his equations’

फाइनमेन की जीवन की घटनाओं के बारे में यदि कोई लिखने बैठे तो एक किताब भी पूरी न पड़े। शायद इसलिये फाइनमेन पर कई किताबें लिखी गयीं हैं।

  • Surely You’re Joking, Mr. Feynman! by Richard Feynman & Ralph Leighton;
  • What Do You Care What Other People Think? by Richard Feynman & Ralph Leighton;
  • Richard Feynman-A life in Science’ by John Gribbin & Mary Gribbin;
  • Tuva or Bust! by Ralph Leighton;
  • No Ordinary Genius: The Illustrated Richard Feynman; edited by Christopher Sykes;
  • Most of the Good stuff; edited by Laurie Brown & John Rigden;
  • Genius: Richard Feynman and Modern Physics by James Gleik;
  • The Beat of The Different Drum; by Jagdish Mehra.

यह सब पढ़ने यो‍ग्य हैं पर इनमें से यदि आप एक किताब पढना चाहें तो आप Richard Feynman-A life in Science’ by John Gribbin & Mary Gribbin पढ़ें।

उन्मुक्त
ईमेल: unmukt.s@gmail.com

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