पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम

October 16, 2006

भूमिका

यह विवादास्पद विषय है कि कंप्यूटर प्रोग्राम पेटेंट कराया जा सकता है कि नहीं। इस बारे में अलग-अलग देशों के नियम भी भिन्न हैं। इसमें कराये जाने के तरीके पर भी विवाद है इसको समझने के लिये इस विषय को तीन भागों में बांटना उचित होगा,

  • अलग-अलग देशों में क्या नियम हैं?
  • यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम पेटेंट हो सकते हैं तो उसकी क्या कालावधि होनी चाहिये?
  • कं‍प्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट कराने का क्या तरीका होना चाहिये ?

पहला भाग भी अपने में बहुत बड़ा है इसे भी कुछ कड़ियों में करना होगा।

  • अमेरिका में पेटेंट का कानून
  • अमेरिका में पेटेंट का कानून यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम औद्योगिक प्रक्रिया के साथ हो
  • अमेरिका में पेटेंट का कानून यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम व्यापार के तरीके के साथ हो
  • अमेरिका में कं‍प्यूटर प्रोग्राम से जुड़े पेटेंट के कुछ उदाहरण
  • यूरोप में पेटेंट का कानून
  • भारतवर्ष में पेटेंट का कानून

अमेरिका में पेटेंट का कानून

पेटें‍ट आविष्कार के लिये दिये जा सकते हैं। भारतीय पेटेंट अधिनियम की धारा 3 बताती है कि क्या आविष्कार नहीं है और जो आविष्कार नहीं है उसका पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है। अमेरिका के पेटेंट कानून में ऐसी कोई सीमा नहीं है। अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने चक्रवर्ती केस (Diamond Vs. Chakravarty 447,45303:65 LED 2d 144) में पेटेंट कानून की व्याख्या की है। न्यायालय ने कहा कि अमेरिकी काग्रेंस, उन सब का पेटें‍ट करने का आशय रखती है जो कि मनुष्य द्वारा निर्मित की जाती हैं पर यह भी स्पष्ट किया कि,

  • इसका यह अर्थ नहीं है कि पेटें‍ट कानून की कोई सीमाएं नहीं हैं और प्रत्येक खोजों को पेटें‍ट कराया जा सकता है;
  • प्रकति के नियम, भौतिक घटनाए, तथा विचारों को पेटेंट नहीं कराया जा सकता है;
  • भूमि में खोजा गया नवीन खनिज या जंगल में पाया गया नवीन पौधा को पेटेंट नहीं कराया जा सकता है।
  • न तो आइं‍स्टाइन अपने प्रसिद्ध नियम ई=एमxसी^२ को पेटें‍ट नहीं कर सकते थे और न ही न्यूटन गुरूत्वकर्षन के नियम को पेटें‍ट करा सकते थे।
  • ऐसी खोजें, प्रकृति की अभिव्यक्तियां हैं, ये सभी व्यक्तियों के लिए स्वतंत्र हैं तथा किसी के भी लिए अनन्य रूप से आरक्षित नहीं हैं।

पार्कर केस (Parker vs Flook) 437, US. 504 : 57 L.Ed 2d 451) में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने कहा कि गणितीय सूत्र का पेटेंट नहीं कराया जा सकता है।

अमेरिकी पेटेंट अधिनियम न तो कंप्यूटर प्रोग्राम और न ही व्यापार करने के तरीकों के बारे में अलग से जिक्र करता है। गॉटसचाल्क केस (Gottschalk vs Benson 40 US 63= 34 L.Ed 2d 273) में, अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने यह तय किया कि डेसीमल नम्बरो को शुद्ध बाइनरी नम्बरों में बदलने वाले कं‍प्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट नहीं किया जा सकता है। यह इसलिये क्योंकि इसे मंजूर करने का परिणाम एक विचार के लिए अनुचित रूप से पेटेंट जारी करना होगा।

संक्षेप में अमेरिका में, न तो एलगोरथिम (Algorithm) को पेटेंट कराया जा सकता है, न ही कं‍प्यूटर प्रोग्राम यदि वह अकेले में हो। लेकिन यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम, औद्योगिक प्रक्रिया या व्यापार तरीके का एक हिस्सा हो तो क्या यही स्थिति रहेगी? चलिये इसके बारे में चर्चा करें।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम - औद्योगिक प्रक्रिया के साथ

कं‍प्यूटर प्रोग्राम, औद्योगिक प्रक्रिया के साथ हो तो उसे पेटेंट कराया जा सकता है कि नहीं, इस सम्बन्ध में सबसे चर्चित और शायद सबसे विवादित मुकदमा डार्ह केस (Diamond Vs. Diehr, (1981) 450 U.S.. 175: 67 L.E.D. 2d घ/55) है। इस मुकदमे में जिस आविष्कार को पेटंट कराया जा रहा था उसमें कं‍प्यूटर प्रोग्राम को रबर साफ करने की एक प्रक्रिया के साथ प्रयोग किया गया था। रबर को साफ करने के लिये उसे गर्म किया जाता है उसे कितनी देर गर्म किया जाय यह उसके तापमान पर निर्भर है तापमान ज्यादा तो कम समय के लिये गर्म किया जायेगा यदि तापमान कम तो ज्यादा समय के लिये गर्म किया जायेगा यह आर्हेनियस नियम के अनुसार निश्चित होता है। जिस ढांचे के अन्दर रबर को गर्म किया जाता था उसके अन्दर के तापमान को कंप्यूटर में डाला जाता था जो आर्हेनियस नियम के अनुसार समय की गणना करता था और ठीक समय ढांचे को खोल देता था ताकि रबर बाहर आ जाये। सवाल यह था कि क्या यह आविष्कार था जिसका पेटें‍ट कराया जा सकता है।

अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने चार के मुकाबले पांच से अपना फैसला सुनाया कि,

  • यह पेटेंट कराया जा सकता है; और
  • पेटेंट होने योग्य दावा मात्र केवल इस बात से पेटेंट करने के लिये अयोग्य नहीं हो जाता है कि उसमें गणितीय फार्मूला, या कं‍प्यूटर प्रोग्राम, या कं‍प्यूटर का प्रयोग हुआ है।

संक्षेप में, एक कं‍प्यूटर प्रोग्राम यदि किसी एक औद्योगिक प्रक्रिया का हिस्सा है तो उसके साथ में पेटें‍ट हो सकता है। यहीं से शुरु हुआ कं‍प्यूटर प्रोग्राम का, अमेरिकी पेटेंट कानून के साथ सफर। ऐसा सफर जो कि कईयों के मुताबिक एक खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा है।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम - व्यापार के तरीके के साथ

परम्परागत तौर पर, मात्र प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित प्रक्रियाओं को ही पेटेंट किया जा सकता था। अनेक दूसरे कार्यकलाप जिनके अन्तर्गत व्यापार के ढंग या आंकड़ा विश्लेषण जो कि प्रक्रियाएं कही जा सकती है, को पेटेंट नहीं किया जाता था। पर र्डाह केस के बनाय अमेरिका में पेटें‍ट देने की प्रक्रिया में बदलाव आया है। यू.एस. पेटेंट एन्ड ट्रेड आफिस (यू.एस.पी.टी.ओ.) ने पेटेंट करने के मार्गदर्शन की मैन्युवल में परिवर्तन किया है। इसकी कं‍प्यूटर प्रोग्राम के लिए व्यापार के तरीकों से सम्बन्धित पूर्वतर पॉलिसी जो { (पैराग्राफ 706.03 (क) } निम्नलिखित थी।

‘Though seemingly within the category of a process or method, a method of doing business can be rejected as not being within the statutory classes.’

इसे बदल कर निम्न कर इस प्रकार कर दिया गया है।

‘Office personnel have had difficulty in properly treating claims directed to methods of doing business. Claims should not be categorized as methods of doing business. Instead such claims should be treated like any other process claims’.

उर्पयुक्त परिवर्तन को मद्देनजर रखते हुये स्टेट स्ट्रीट केस (State Stree Bank vs Signature Finencial Group 149 F3d ,1352) में अमेरिका के एक अपीली न्यायालय ने कहा कि कोई प्रक्रिया पेटेंट करने योग्य है या नहीं, यह इस पर नहीं तय होना चाहिए कि प्रक्रिया व्यापार करती है पर यह देखना चाहिये कि, पेटेंट की जाने वाली प्रक्रिया एक उपयोगी तरीके से प्रयोग की जा रही है अथवा नहीं। अमेरिका में व्यापार के तरीकों के के लिए दिये पेटेंट के कुछ उदाहरण निम्न है :

  • सामान खरीदने की स्वीकृत देने के लिये एक क्लिक का प्रयोग करना;
  • लेखा लिखने की एक आन-लाइन पद्धति;
  • आन-लाइन पारिश्रमिक प्रोत्साहन पद्धति;
  • आन-लाइन बारम्बार क्रेता कार्यक्रम; और
  • उपभोक्ता को अपने दिये गये दाम पर सर्विस की सूचना प्राप्त करने की सुविधा।

संक्षेप में, अमेरिका में विचार पेटें‍ट नहीं कराये जा सकते पर जब विचार व्यावहारिक तौर पर एक उपयोगी, कंक्रीट तथा मूर्त परिणाम देते हैं तो उन्हें पेटें‍ट कराया जा सकता है। आजकल अमेरिका में यू.एस.पी.टी.ओ. के मैन्युवल में व्यापार के तरीके के पेटें‍ट के ऊपर एक अध्याय है और उपयोगी व्यापार के तरीके तथा आंकड़ा विश्लेषण के लिए कंप्यूटर प्रोग्राम के पेटें‍ट मंजूर हो रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी अमेरिका का अनुसरण किया है।

अमेरिका में व्यापार करने के तरीको सुधार लाने के लिये Business Patent Improvement Act 2000 लाया गया था पर यह अभी तक पारित नहीं किया गया है और शायद यह कभी भी पारित नहीं हो।

यूरोप में पेटेंट का कानून

यूरोपियन पेटें‍ट कनवेशंन १९७३ (ई.पी.सी.) का अनुच्छेद ५२(२) कहता है कि मानसिक कार्य करने की प्रक्रिया, खेल खेलने के तरीके, व्यापार तरीके, और कं‍प्यूटर प्रोग्राम आविष्कार नहीं माने जायेगें। यानी कि, कं‍प्यूटर प्रोग्राम और व्यापार तरीकों को पेटेंट नहीं किया जा सकता। यही ई.पी.सी. के सदस्य देशों का भी कानून है। किन्तु व्यवहार में, यह नियम बदल गया है। इस तरह के पेटेंटों के लिए यदि आवेदन पत्र - कंप्यूटर प्रोग्राम या व्यापार के तरीकों की जगह - तकनीकी में बढ़ोत्तरी की तरह प्रस्तुत किये जांय तो उन पर विचार किया जा रहा है।

यूरोप के भिन्न भिन्न देशों अलग अलग नियम है और यूरोपियन कमीशन उसमें समानता लाने का वह प्रयास कर रहा है। वह इसमें सफल होगा कि नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा।

भारतवर्ष में पेटेंट का कानून

भारतवर्ष में पेटें‍ट अधिनियम की धारा ३ को २००२ संशोधन के द्वारा संशोधित किया गया है। इसने पेटेंट अधिनियम में धारा ३ (K) को प्रतिस्थापित किया है। इसमें गणित, व्यापार के तरीकों, कं‍प्यूटर प्रोग्राम अकेले में (Computer Programme per se), अल्गोरिथम को अविष्कार नहीं माना गया है। यानि कि यह पेटेंट नहीं हो सकते हैं।

यहां ‘कं‍प्यूटर प्रोग्राम’ को per se के द्वारा प्रतिबन्धित किया गया है। Per se का अर्थ अकेले में या अपने आप में है। इसका अर्थ यह हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्राम अपने आप में अविष्कार नहीं है पर इसका यह भी अर्थ हुआ कि यदि वह अकेले में न हो तो अविष्कार माने जा सकते हैं और उसका पेटेंट भी हो सकता है। आगे न्यायालय इसका क्या मतलब निकालेगें - क्या हम अमेरिका की राह जायेंगे या यूरोप की - यह तो केवल भविष्य ही बता सकता है।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम के पेटेंट की कालावधि

पुरानी तकनीक में प्रशिक्षणा‍र्थियों को प्रशिक्षण देने में लगभग सात वर्ष लगते थे तथा प्रशिक्षणार्थियों की दो पीढ़ियों को प्रशिक्षित करने में चौदह वर्ष लगते थे इसलिए पहले पेटेंट को चौदह वर्षो के लिए दिया जाता था। इंगलैण्ड में बीसवीं शताब्दी के शुरू में इसे बढ़ा कर सोलह साल कर दिया गया। हमने भी इसी का अनुसरण किया और पेटेंट १६ साल के लिए दिया जाने लगा किया गया । पेटेंट अधिनियम में इसे पुन १४ साल कर दी गयी। हांलाकि कुछ श्रेणियों के लिए पांच या सात साल ही रही। ट्रिप्स पेटेंट के लिए बीस वर्षो के लिए पेटेंट को संरक्षण करने को कहता है । हमने भी २००२ संशोधन द्वारा यही किया किया है।

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति ज्यामितीय ढ़ंग से गतिशील है। अनेक लोग यह कहते हैं कि,

  • यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम या इन्टरनेट पर व्यापार करने के तरीके के लिये पेटें‍ट दिया जाय तो उसके लिये 20 वर्षो की कालावधि अत्यधिक लम्बी है;
  • कंप्यूटर प्रोग्राम हर दो साल में बदल जाता है;
  • दो साल से ज्यादा समय के लिये पेटें‍ट की कालावधि बेकार है।

पर यह तब तक नहीं किया जा सकता जब तक ट्रिप्स में बदलाव न किया जाय।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट कराने तरीका

जब कंप्यूटर प्रोग्राम से सम्बन्धित किसी प्रक्रिया या उत्पाद का पेटें‍ट कराया जाता है तब कंप्यूटर प्रोग्राम का सोर्स कोड नहीं बताया जाता है उसे केवल फ्लो चार्ट के द्वारा दिखाया जाता है। यह भी विचारणीय प्रश्न है कि, क्या यह‍ सही है? क्या यह उस प्रक्रिया या उत्पाद की पूरी जानकारी देता है? आशा है कि इस प्रश्न का भी उत्तर जल्दी मिलेगा।

निष्कर्ष

कंप्यूटर प्रोग्राम पेटें‍ट हो सकता है कि नहीं, के बारे में कानून स्पष्ट नहीं है। फिर भी, यदि सब किसी न किसी तरह से कंप्यूटर प्रोग्राम पेटें‍ट करा रहे हैं तो हमें भी पीछे नहीं रहना चाहिये - यदि कंप्यूटर प्रोग्राम पेटें‍ट हो सकता है तो उसे पेटेंट कराना चाहिये। यदि यह समय या खर्च के कारण पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है तो इसको वेबसाइट पर प्रकाशित करना चाहिये। इस कारण यह पूर्व कला के रूप में रहेगा और कम से कम दूसरे लोग इसको पेटेंट कराने में समर्थ नहीं होंगे।

नोट

  1. यह लेख मेरे उन्मुक्त चिठ्ठे () पर पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। इसकी आखरी कड़ी यहां है जहां से आप पहले की कड़ियों में जा सकते हैं।
  2. यदि आप इसे सुनना चाहें तो इसे मेरे पॉडकास्ट बकबक पर सुन सकते हैं।

वन्दे मातरम्

October 5, 2006

इतिहास

आधुनिक युग में बंगला साहित्य का उत्थान उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरु हुआ। इसमें राजा राम मोहन राय, ईशवर चन्द्र विद्यासागर, परिचन्द्र मित्रा, माईकल मदसूदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टेगोर ने अग्रणी भूमिका निभायी। इसके पहले बंगाल के साहित्यकार बंगला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसन्द करते थे। बंगला साहित्य में जनमानस तक पैंठ बनाने वालों मे शायद बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय पहले साहित्यकार थे।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म १८३८ में एक परंपरागत और समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था उनकी पहली प्रकाशित बांग्ला कृति ‘दुर्गेशनंदिनी’ मार्च १८६५ में छपी थी। उनकी शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। १८५७ में उन्होंने बीए पास किया और १८६९ में क़ानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होने सरकारी नौकरी कर ली और १८९१ में सरकारी सेवा से रिटायर हुए। उनका निधन अप्रैल १८९४ में हुआ।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और १८७० में जब अंग्रेजी हूकमत ने God save the King/Queen गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पैराग्राफ १८७६ में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पैराग्राफ में केवल मार्त-भूमि की वन्दना है। बंकिम चन्द्र ने १८८२ में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बंगला में लिखा और इस गीत को उसका हिस्सा बनाया। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पैराग्राफ बंगला भाषा में जोड़े गये। इन बाद के पैराग्राफ में दुर्गा की स्तुति है।

कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (१८९६) में, रवींद्र नाथ टैगौर ने इसे लय और संगीत के साथ गाया। श्री अरविन्दो ने इस गीत का अंग्रेजी में (नोट-२ देखें) और हाल में सांसद आरिफ मौहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद (नोट-३ देखें) किया है,

१९३७ में इस गीत के बारे में कांग्रेस में बहस हुई और जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता वाली समिति ने इसके पहले दो पैराग्राफ को ही मान्यता दी। इस समिति में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी थे। पहले दो पैराग्राफ को मान्याता देने का कारण यही था कि इन दो पैराग्राफ में किसी देवी देवता की स्तुति नहीं थी और यह देश के सम्मान में थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में एक बयान २४ जनवरी १९५० में दिया जो कि सवीकार कर लिया गया। इस ब्यान में वन्दे मातरम् के केवल पहले दो पैराग्राफ को मान्यता दी गयी है। यह ही दो पैराग्राफ प्रसांगिग हैं और इन्हीं को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया है। डा. राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया ब्यान यह है,

The composition consisting of words and music known as Jana Gana Mana is the National Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song Vande Mataram, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with Jana Gana Mana and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)

यह गीत सबसे पहले १८८२ में प्रकाशित हुआ था और तब से १२५ साल हो गये हैं। इस गीत को पहले पहल ७ सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। २००५ में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में १ साल के समारोह का आयोजन किया गया। यह ७ सितम्बर को समाप्त हुआ। इस समापन का अभिनन्दन करने के लिये मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को ७ सितम्बर २००६ में स्कूलों में गाने की बात की। (नोट-४ देखें) हालांकि बाद में अर्जुन सिंह ने संसद में कह दिया कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, जिसे गाना हो गाए, न गाना हो, न गाए।

विवाद

आनन्द मठ उपन्यास पर कुछ विवाद है कुछ लोग इसे मुसलमान विरोधी मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें मुसलमानो को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है। वन्दे मातरम् गाने पर भी विवाद किया जा रहा है। इस गीत के पहले दो पैराग्राफ, जो कि प्रसांगिग हैं, में कोई भी मुसलमान विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की अराधना है। पर इन लोगों का कहना है कि,

  • मुस्लिम धर्म किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में वस्तु की वन्दना की गयी है;
  • यह ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो कि मुस्लिम विरोधी है;
  • दो पैराग्राफ के बाद का गीत – जिसे कोई महत्व नहीं दिया गया, जो कि प्रसांगिग भी नहीं है - में दुर्गा की अराधना है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को इस पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर जोर देते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले संगीतकार ए.आर. रहमान ने, जो ख़ुद एक मुसलमान हैं, ‘वंदेमातरम्’ को लेकर एक एलबम तैयार किया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ है। ज्यादतर लोगों का मानना है कि यह विवाद राजनीतिक विवाद है। यहां पर गौर तलब है कि ईसाई लोग भी मूर्त पूजन नहीं करते हैं पर इस समुदाय से इस बारे में कोई विवाद नहीं है, शायद इनकी संख्या कम है।

कानून

जहां तक कानून की बात है, उच्चतम न्यायालय ने Bijoe Emmanuel Vs. State of Kerala AIR 1987 SC 748 में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बारे में फैसला दिया है। यह फैसला तीन विद्यार्थियों के बारे में है। ये विद्यार्थी Jehovah’s Witness नामक ईसाइयों का एक पंथ के सदस्य थे। ये विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे; इसका हमेशा सम्मान करते थे, पर गाते नहीं थे। यह इसलिये कि यह इनके धर्म के खिलाफ था। उनका न गाना आपत्तिजनक और देशप्रेम की कमी मानी गयी और उनहें इसलिये स्कूल से निकाल दिया गया। केरल उच्च न्यायालय ने इनकी याचिका खारिज कर दी पर उच्चत्तम न्यायालय ने स्वीकार कर इन्हे स्कूल को वापस लेने को कहा। इस फैसले का आधार यही है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान करता है पर उसे गाता नहीं है तो न गाने के लिये दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। यदि कोई राष्ट्रगान नहीं गाता है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है (नोट-५ देखें)। वंदेमातरम् को जबरदस्ती गाने के लिये कहना शायद कानूनन ठीक नहीं था।

नोट-१: यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठे पर ‘मां तुझे सालाम’ के नाम से दो कड़ियों में प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। यदि इसे आप मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर पढ़ना चाहें तो इसकी अनतिम कड़ी यहां है। यहां पर पहले की कड़ियों का भी लिंक है।

नोट-२: श्री अरबिन्दो के द्वारा किया गाया अंग्रेजी का अनुवाद निम्न है,

I bow to thee, Mother,
richly-waterred, richly-fruited,
cool with the winds of the south, dark with the crops of the harvests,
the Mother!
Her rughts rejoicing in the glory of moonlight,
her lands clothed beautifully with her trees in flowering bloom,
sweet of laughter, sweet of speech,
The Mother, giver of bones, giver of bliss!

Terrible with the clamorous shouts of seventy million throats,
and the sharpness of swords raised in twice seventy million hands,
who sayeth to thee, Mother, that thou are weak?
Holder of multitudinous strength,
I bow to her who saves,
to her who drives from her the armies of her foremen,
the Mother!

नोट-३: आरिफ खान के द्वारा किया गाया उर्दू का अनुवाद निम्न है,

तसलीमात, माँ तसलीमात
तू भरी है मीठे पानी से
फल-फूलों की शादाबी से
दक्किन की ठंडी हवाओं से
फसलों की सुहानी
फिजाओं से
तसलीमात, माँ तसलीमात
तेरी रातें रोशन चांद से
तेरी रौनक सब्जे-फाम से
तेरी प्यार भरी मुस्कान है
तेरी मीठी बहुत जुबान है
तेरी बांहों में मेरी राहत है
तेरे कदमों में मेरी जन्नत है
तसलीमात, माँ तसलीमात
मां तुझे सलाम - विवाद

नोट-४: मानव संसाधन मंत्रालय के मन्त्री अर्जुन सिंह का ८ अगस्त २००६ का पत्र यह है।

1. A National Committee under the Chairmanship of Hon’ble Prime Minister of India has been constituted for commemoration of events which, amongst others, include the centenary of adoption of ‘Vande Mataram’ as a National Song.

2. Vande Mataram was composed by Bankim Chandra Chatterjee in 1876 and Rabindranath Tagore recited it for the first time during the Congress session at Bombay in 1896. It was during the movement against the Partition of Bengal, Bang Bhang Andolan, in the year 1905 that Vande Mataram became the battle song in the fight against imperialism. It was adopted as a National Song at the Varanasi session of the AICC on September 7, 1905.

3. The year long commemoration of 100 years of adoption of Vande Mataram as a National Song started on September 7, 2005 and will be coming to a close on September 7, 2006. As a befitting finale to the commemoration year, it has been decided that the first two stanzas of the National Song, Vande Mataram should be sung simultaneously at 11.00 AM on 7th September, 2006 in all schools, colleges and other educational institutions throughout the country. This nationwide simultaneous singing should be widely covered in the print and electronic media appropriately.

4. I shall be grateful if you could kindly issue necessary instructions to all concerned in your State in this regard.

नोट-५: इस फैसले के बारे में लोगों की आम राय है कि इसकी अन्तिम आज्ञा तो सही है पर इसमें बहुत कुछ ऐसा कह दिया गया जिसकी कोई जरूरत नहीं थी और जो शायद सही नहीं है। वे लोग यह, इस फैसले के तथ्य के आधार पर कहते हैं। इसके तथ्य यह थे कि,

  • ये विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रीय गीत ‘जन गण मन’ के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे
  • राष्ट्रीय गीत का हमेशा सम्मान करते थे;
  • इस तरह का न तो उस समय कोई कानून था न इस केस में न्यायालय को दिखाया गया कि यदि राष्ट्रीय गीत नहीं गाया जायगा तो जुर्म होगा या स्कूल से निकाल दिया जायागा;
  • केरल सरकार द्वारा इस बारे में जो भी सरकारी पत्र दिखाये गये उनका कोई भी विधिक आधार नहीं था।

इसी लिये यह लोग कहते हैं कि अन्तिम आज्ञा तो सही है पर उनका कहना है कि,

  • इसमें अमेरिकी कानून का सहारा लिया गया है जो कि अनुचित है;
  • अमेरिका का संविधान हमारे देश के संविधान से अलग है ;
  • अमेरिका में मौलिक अधिकार निर्बाध रूप से हैं और हमारे संविधान में इन अधिकारों पर युक्तिपूर्ण प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं
  • इस अन्तर का ख्याल इस फैसले में नहीं रखा गया है।

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