वन्दे मातरम्
October 5, 2006
इतिहास
आधुनिक युग में बंगला साहित्य का उत्थान उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरु हुआ। इसमें राजा राम मोहन राय, ईशवर चन्द्र विद्यासागर, परिचन्द्र मित्रा, माईकल मदसूदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टेगोर ने अग्रणी भूमिका निभायी। इसके पहले बंगाल के साहित्यकार बंगला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसन्द करते थे। बंगला साहित्य में जनमानस तक पैंठ बनाने वालों मे शायद बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय पहले साहित्यकार थे।
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म १८३८ में एक परंपरागत और समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था उनकी पहली प्रकाशित बांग्ला कृति ‘दुर्गेशनंदिनी’ मार्च १८६५ में छपी थी। उनकी शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। १८५७ में उन्होंने बीए पास किया और १८६९ में क़ानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होने सरकारी नौकरी कर ली और १८९१ में सरकारी सेवा से रिटायर हुए। उनका निधन अप्रैल १८९४ में हुआ।
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और १८७० में जब अंग्रेजी हूकमत ने God save the King/Queen गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पैराग्राफ १८७६ में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पैराग्राफ में केवल मार्त-भूमि की वन्दना है। बंकिम चन्द्र ने १८८२ में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बंगला में लिखा और इस गीत को उसका हिस्सा बनाया। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पैराग्राफ बंगला भाषा में जोड़े गये। इन बाद के पैराग्राफ में दुर्गा की स्तुति है।
कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (१८९६) में, रवींद्र नाथ टैगौर ने इसे लय और संगीत के साथ गाया। श्री अरविन्दो ने इस गीत का अंग्रेजी में (नोट-२ देखें) और हाल में सांसद आरिफ मौहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद (नोट-३ देखें) किया है,
१९३७ में इस गीत के बारे में कांग्रेस में बहस हुई और जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता वाली समिति ने इसके पहले दो पैराग्राफ को ही मान्यता दी। इस समिति में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी थे। पहले दो पैराग्राफ को मान्याता देने का कारण यही था कि इन दो पैराग्राफ में किसी देवी देवता की स्तुति नहीं थी और यह देश के सम्मान में थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में एक बयान २४ जनवरी १९५० में दिया जो कि सवीकार कर लिया गया। इस ब्यान में वन्दे मातरम् के केवल पहले दो पैराग्राफ को मान्यता दी गयी है। यह ही दो पैराग्राफ प्रसांगिग हैं और इन्हीं को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया है। डा. राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया ब्यान यह है,
The composition consisting of words and music known as Jana Gana Mana is the National Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song Vande Mataram, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with Jana Gana Mana and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)
यह गीत सबसे पहले १८८२ में प्रकाशित हुआ था और तब से १२५ साल हो गये हैं। इस गीत को पहले पहल ७ सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। २००५ में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में १ साल के समारोह का आयोजन किया गया। यह ७ सितम्बर को समाप्त हुआ। इस समापन का अभिनन्दन करने के लिये मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को ७ सितम्बर २००६ में स्कूलों में गाने की बात की। (नोट-४ देखें) हालांकि बाद में अर्जुन सिंह ने संसद में कह दिया कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, जिसे गाना हो गाए, न गाना हो, न गाए।
विवाद
आनन्द मठ उपन्यास पर कुछ विवाद है कुछ लोग इसे मुसलमान विरोधी मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें मुसलमानो को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है। वन्दे मातरम् गाने पर भी विवाद किया जा रहा है। इस गीत के पहले दो पैराग्राफ, जो कि प्रसांगिग हैं, में कोई भी मुसलमान विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की अराधना है। पर इन लोगों का कहना है कि,
- मुस्लिम धर्म किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में वस्तु की वन्दना की गयी है;
- यह ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो कि मुस्लिम विरोधी है;
- दो पैराग्राफ के बाद का गीत – जिसे कोई महत्व नहीं दिया गया, जो कि प्रसांगिग भी नहीं है – में दुर्गा की अराधना है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को इस पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर जोर देते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले संगीतकार ए.आर. रहमान ने, जो ख़ुद एक मुसलमान हैं, ‘वंदेमातरम्’ को लेकर एक एलबम तैयार किया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ है। ज्यादतर लोगों का मानना है कि यह विवाद राजनीतिक विवाद है। यहां पर गौर तलब है कि ईसाई लोग भी मूर्त पूजन नहीं करते हैं पर इस समुदाय से इस बारे में कोई विवाद नहीं है, शायद इनकी संख्या कम है।
कानून
जहां तक कानून की बात है, उच्चतम न्यायालय ने Bijoe Emmanuel Vs. State of Kerala AIR 1987 SC 748 में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बारे में फैसला दिया है। यह फैसला तीन विद्यार्थियों के बारे में है। ये विद्यार्थी Jehovah’s Witness नामक ईसाइयों का एक पंथ के सदस्य थे। ये विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे; इसका हमेशा सम्मान करते थे, पर गाते नहीं थे। यह इसलिये कि यह इनके धर्म के खिलाफ था। उनका न गाना आपत्तिजनक और देशप्रेम की कमी मानी गयी और उनहें इसलिये स्कूल से निकाल दिया गया। केरल उच्च न्यायालय ने इनकी याचिका खारिज कर दी पर उच्चत्तम न्यायालय ने स्वीकार कर इन्हे स्कूल को वापस लेने को कहा। इस फैसले का आधार यही है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान करता है पर उसे गाता नहीं है तो न गाने के लिये दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। यदि कोई राष्ट्रगान नहीं गाता है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है (नोट-५ देखें)। वंदेमातरम् को जबरदस्ती गाने के लिये कहना शायद कानूनन ठीक नहीं था।
नोट-१: यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठे पर ‘मां तुझे सालाम’ के नाम से दो कड़ियों में प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। यदि इसे आप मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर पढ़ना चाहें तो इसकी अनतिम कड़ी यहां है। यहां पर पहले की कड़ियों का भी लिंक है।
नोट-२: श्री अरबिन्दो के द्वारा किया गाया अंग्रेजी का अनुवाद निम्न है,
I bow to thee, Mother,
richly-waterred, richly-fruited,
cool with the winds of the south, dark with the crops of the harvests,
the Mother!
Her rughts rejoicing in the glory of moonlight,
her lands clothed beautifully with her trees in flowering bloom,
sweet of laughter, sweet of speech,
The Mother, giver of bones, giver of bliss!Terrible with the clamorous shouts of seventy million throats,
and the sharpness of swords raised in twice seventy million hands,
who sayeth to thee, Mother, that thou are weak?
Holder of multitudinous strength,
I bow to her who saves,
to her who drives from her the armies of her foremen,
the Mother!
नोट-३: आरिफ खान के द्वारा किया गाया उर्दू का अनुवाद निम्न है,
तसलीमात, माँ तसलीमात
तू भरी है मीठे पानी से
फल-फूलों की शादाबी से
दक्किन की ठंडी हवाओं से
फसलों की सुहानी
फिजाओं से
तसलीमात, माँ तसलीमात
तेरी रातें रोशन चांद से
तेरी रौनक सब्जे-फाम से
तेरी प्यार भरी मुस्कान है
तेरी मीठी बहुत जुबान है
तेरी बांहों में मेरी राहत है
तेरे कदमों में मेरी जन्नत है
तसलीमात, माँ तसलीमात
मां तुझे सलाम – विवाद
नोट-४: मानव संसाधन मंत्रालय के मन्त्री अर्जुन सिंह का ८ अगस्त २००६ का पत्र यह है।
1. A National Committee under the Chairmanship of Hon’ble Prime Minister of India has been constituted for commemoration of events which, amongst others, include the centenary of adoption of ‘Vande Mataram’ as a National Song.
2. Vande Mataram was composed by Bankim Chandra Chatterjee in 1876 and Rabindranath Tagore recited it for the first time during the Congress session at Bombay in 1896. It was during the movement against the Partition of Bengal, Bang Bhang Andolan, in the year 1905 that Vande Mataram became the battle song in the fight against imperialism. It was adopted as a National Song at the Varanasi session of the AICC on September 7, 1905.
3. The year long commemoration of 100 years of adoption of Vande Mataram as a National Song started on September 7, 2005 and will be coming to a close on September 7, 2006. As a befitting finale to the commemoration year, it has been decided that the first two stanzas of the National Song, Vande Mataram should be sung simultaneously at 11.00 AM on 7th September, 2006 in all schools, colleges and other educational institutions throughout the country. This nationwide simultaneous singing should be widely covered in the print and electronic media appropriately.
4. I shall be grateful if you could kindly issue necessary instructions to all concerned in your State in this regard.
नोट-५: इस फैसले के बारे में लोगों की आम राय है कि इसकी अन्तिम आज्ञा तो सही है पर इसमें बहुत कुछ ऐसा कह दिया गया जिसकी कोई जरूरत नहीं थी और जो शायद सही नहीं है। वे लोग यह, इस फैसले के तथ्य के आधार पर कहते हैं। इसके तथ्य यह थे कि,
- ये विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रीय गीत ‘जन गण मन’ के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे
- राष्ट्रीय गीत का हमेशा सम्मान करते थे;
- इस तरह का न तो उस समय कोई कानून था न इस केस में न्यायालय को दिखाया गया कि यदि राष्ट्रीय गीत नहीं गाया जायगा तो जुर्म होगा या स्कूल से निकाल दिया जायागा;
- केरल सरकार द्वारा इस बारे में जो भी सरकारी पत्र दिखाये गये उनका कोई भी विधिक आधार नहीं था।
इसी लिये यह लोग कहते हैं कि अन्तिम आज्ञा तो सही है पर उनका कहना है कि,
- इसमें अमेरिकी कानून का सहारा लिया गया है जो कि अनुचित है;
- अमेरिका का संविधान हमारे देश के संविधान से अलग है ;
- अमेरिका में मौलिक अधिकार निर्बाध रूप से हैं और हमारे संविधान में इन अधिकारों पर युक्तिपूर्ण प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं
- इस अन्तर का ख्याल इस फैसले में नहीं रखा गया है।
koi jawab nahi aapke es website ka mere pas shabd nahi hain ki mai vyakt kar sakoon ki ye site kitni jyada labhprad hai. mai aapka bahut aabhari hoon – Chandre Mohan Dixit
चन्द्रमोहन जी, आपका शुक्रिया कि आप इस वेब साइट पर आये और इसे पसन्द किया – उन्मुक्त
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