नीड़ का निर्माण फिर

May 19, 2008

नीड़ का निर्माण फिर बच्चन जी की जीवनी का दूसरा भाग है, यह भाग उनकी पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु से शुरू होकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुनः दाखिले, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नियुक्ति, तेजी जी से मिलन, अमिताभ एवं अजिताभ पुत्र रत्न की प्राप्ति, और उनके शिखर पर पहुंचने की कथा है। इस दौरान उन्होने अपने बसेरे का निर्माण किया शायद इसलिये इस भाग का नाम उन्होंने ‘नीड़ का निर्माण फिर’ रखा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यापक

बीसवीं शताब्दी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय Oxford of East के नाम से जाना जाता था यह भारतवर्ष का सबसे अच्छा विश्‍वविद्यालय था। नीड़ के निर्माण फिर में वह विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पढ़ाई पूरी करने की कथा बताते हैं कि उन्हें कैसे वहां नौकरी मिली।अंग्रेजी विभाग के दो प्रसिद्ध अध्यापक अमर नाथ झा और एम.सी. देव के बारे में बताते हैं।

‘पंडित अमरनाथ झा अंग्रेजी-साहित्‍य का इतिहास और शेक्सपियर पढ़ाते थे। साहित्य के इतिहास पर उनका एक व्याख्यान प्रति सप्ताह होता था और उसमें बी.ए. कें लड़के भी आकर बैठ सकते थे-विभाग के बीचोंबीच वाले सबसे बड़े हाल में, जिसमें अपराहन में लॉ के क्लास होते थे। शेक्सपियर वाला क्लास वे अपने कमरे में लेते थे। हाजिरी लेने में वे अपना वक्त नहीं खराब करते थे । लड़के उनके क्लास में पहुंचे, उन्होंने एक नजर सब पर दौड़ाई, रजिस्टर खोला और अनुपस्थित लड़कों के नाम के आगे बिन्दी धर दी। किसी प्रकार का नोट हाथ में लेकर पढ़ाते मैंने कभी न देखा था; प्रो.एस.सी. देब को भी यह कमाल हासिल था, पर दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर था। झा साहब जब किसी विषय पर व्याख्यान देने लगते तो महसूस होता थ कि आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसकी पतवार ठीक दिशा में लगी हुई है और जिसका खेवनहार नाव को समगति से खेता आपको ४५ मिनट के निश्चित घाट पर उतार देगा। देब साहब की नाव में न पतवार होती थी न डांड़। वह शब्दों के तूफान में डगमग डोलती कभी कभी दाएं-बाएं, कभी आगे, और कभी पीछे भी खिंचती, किसी भी जगह जाकर टकरा सकती थी।‘

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज़ियानगरम् हॉल

एक साल गर्मियों में बच्‍चन जी तेजी जी के साथ झा साहब के साथ मसूरी में रहे। उसके अनुभव पर बच‍चन जी कहते हैं कि,

‘झा साहब के साथ कोई कितने ही दिन रहे, उनसे निकटता का अनुभव नहीं कर सकता था। वे अपने भीतर कहीं बहुत एकाकी, स्वकेन्द्रित और स्वयं-पर्याप्त थे। वे यह तो चाहते थे कि उनके आस-पास लोग रहें पर अपने निकट वे किसी को न आने देते थे। झा साहब में बहुत गुण थे, पर वे अच्छे मेजबान नहीं थे। धर्मशाला और घर रहने में कुछ अन्तर का अनुभव तो होना चाहिए। उनके घर में सब-कुछ ठंडा-ठंडा सा था ! हृदय की गर्माहट की प्रतीति कहीं नहीं होती थी।
कैसे अनासक्त भाव से रहता था वह शख्स! सुबह से शाम तक सारे काम बिना किसी घबराहट के, थकावट के, बिना किसी शिकवा-शिकायत के, कर्तव्य की गरिमा से करते जाना रोज-ब-रोज, माह-ब-माह, साल-ब-साल। इतना जब्त करने वाला, इतना अपने को जाब्ते में रखने वाला मैंने दूसरा आदमी नहीं जाना।‘

आइरिस, और अंग्रेजी

बच्चन जी के जीवन में कई लड़कियां आयीं कुछ का नाम वह बताते हैं तो कुछ का नाम छिपा जाते हैं। इन सम‍बन्धों का जिक्र करने का उनका ढंग भी निराला है। विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते समय आइरिस‍ नाम की इसाई लड़की उनके सम्पर्क में आयी और उसे वे दिल से चाहने लगे । वे कहते हैं कि,

‘आइरिस ने प्रथम दृष्टि में ही मुझे आकर्षित किया। वैसे तो मुझमें कुछ विशेष आकर्षक नहीं था, पर मेरे बालों ने उसे आकर्षित किया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। यदि पहले से मेरा परिचय उसे कवि के रूप में दे दिया गया होता तो बालों के सम्बन्ध में मेरी रोमानी लापरवाही उसे अप्रत्याशित और अस्वाभाविक न लगी होगी। कद से लम्बी, बदन से इकहरी, और रंग से विशेष गौर वर्ण की, उसमें कहीं ऐंग्‍लो-इंडियन रक्त का मिश्रण अवश्य था। गर्दन लम्बी, चेहरा आयताकार, आंखें नीली, गाल की हड्डियां उभरी, होठ भरे, बाल सुनहरे, कटे, फिर भी इतने बड़े कि दायेँ-बायेँ कन्धों पर और पीठ के उपरी भाग पर लहराते। शायद उसके शरीर में उसके बाल ही उसके मनोभावों के सबसे अधिक अभिव्यंजक थे। वह थोड़ी-थोड़ी देर पर उन्हें कभी दाहिने और कभी बायेँ झटकती और इससे उसके सौन्दर्य में एक गतिशीलता –सी आ जाती।‘

आयरिस ने बच्चन जी के प्रेम प्रणय को अस्वीकार कर दिया। उससे पत्र व्यवहार अंग्रेजी में होता था। अस्वीकार होने के बाद बच्चन जी ने अंग्रेजी के पत्रों को नष्ट कर दिया। ‘नीड़ का निर्माण फिर’ लिखते समय उन्हें लगा कि उन्होंने उन पत्रों का गलत अर्थ शायद इसलिये लगा लिया था कि पत्र अंग्रेजी भाषा में थे। उन पत्रों को याद कर अंग्रेजी के बारे में कहते हैं कि,

‘अंग्रेजी बिना लेशमात्र कृतज्ञता अनुभव किए ‘थैंक यू’ कह सकती है। जब यह ‘सारी’ कहती है तब अफसोस इसे शायद ही कहीं छूता हो। ‘आई ऐम ऐफ्रेड’ से इसका तात्‍पर्य बिलकुल यह नहीं होता कि यह जरा भी डरी है; और इसकी उक्ति ‘एक्‍सक्यूज मी’ (यानी मुझे क्षमा करें) आपके गालों पर थप्‍पड़ लगाने की भूमिका भी हो सकती है। मेरी ‘मधुशाला’ की अंग्रेजी अनुवादिका कुमारी मार्जरी बोल्टन की एक बात मुझे याद आ गई। जब मैं इंग्लैंड-प्रवास में एक छुट्टी में उनके घर गया तो एक शाम को वे अपने जीवन की दुखद अनुभूति मुझसे बताने लगीं। उनके एक प्रेमी ने कई वर्षो तक उनसे पत्र-व्यवहार किया। क्या भावना में भीगे पत्र थे वे! और एक दिन सहसा उसने उन्हें भुला दिया! मैं मार्जरी का वाक्‍य नहीं भूला-Since that day I have lost faith in English language [उस दिन से अंग्रेजी भाषा पर से मेरा विश्वास उठ गया]। अंग्रेजी औपचारिक शिष्टता, पटुता, प्रदर्शन और डिसेप्शन यानी धोखा-धड़ी की इतनी परिपूर्ण माध्यम हो गई है कि आज अभिव्यक्ति से अधिक यह गोपन और डिसटार्शन यानी विरूपन की भाषा है। क्या भाषाएँ विकसित और परिष्कृत होकर अपनी सूक्ष्म अभिव्यंजन शक्ति, सच्चाई, सिधाई, गहराई और ईमानदारी खो देती हैं?‘

मुझे बच्चन जी की यह बात ठीक नहीं लगती। यह दूसरी संस्कृति के संस्कार हैं न कि भाषा की कमी - अंग्रेजी भाषा किसी प्रकार से हिन्दी से कम नहीं। किसी स्त्री द्वारा किसी पुरुष का प्रणय अस्वीकार किया जाना हमेशा उसके सम्मान को ठेस पहुंचता है। यह कहना इस कारण भी हो सकता है।

तेजी जी से मिलन

आइरिस के द्वारा बच्चन जी का प्रेम निवेदन स्वीकार न किये जाने पर वे अकेले हो गये और जीवन में नारी को ढूढ़ने लगे। वे अपने मित्र प्रकाश के पास बरेली गये थे वहां पर उनकी मुलाकात तेजी जी से हुई जो कि लाहौर में साइकोलोजी पढ़ाती थीं। प्रथम मुलाकात के अनुभव को बच्चन जी इस प्रकार से वर्णित करते हैं।

‘आज प्रेमा ने अपनी सहेली का परिचय मुझसे कराया है, और बारह वर्ष पहले लिखी अपनी एक तुकबन्दी मेरे कानों में बार-बार गूँजती रही -
इसीलिये सौन्दर्य देखकर
शंका यह उठती तत्काल,
कहीं फँसाने को तो मेरे
नहीं बिछाया जाता जाल
पर अदृश‍य देख रहा था कि जाल बिछ चुका था और करूणा अवसाद के जाल में फँस चुकी थी या अवसाद ने करूणा को अपने पाश-अपने बाहुपाश- में बाँध लिया था ! यह तो मैं दूसरे दिन कह सकता था, लेकिन उस दिन मैं उस सौन्दर्य से असंपृक्त, उदासीन, दूर, डरा-डरा रहा- ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का क्या कोई रहस्यपूर्ण अर्थ है?’

रात्रि में कविता पाठ पर उनका तेजी जी से भावात्मक मिलन होता है जिसका वर्णन वे कुछ इस प्रकार करते हैं,

‘न जाने मेरे स्वर में कहाँ की वेदना भर गयी कि पहले पद पर ही सब लोग बहुत गम्भीर हो गए। जैसे ही मैंने यह पंक्ति पूरी की
उस नयन में बह सकी कब
इस नयन की अश्रुधरा
कि देखता हूँ कि मिस [तेजी] सूरी की ऑंखें डबडबाती हैं और टप-टप उनके ऑँसू की बूँदें प्रकाश के कंधे पर गिर रही हैं, और यह देखकर मेरा कंठ भर आता है—मेरा गला रूंध जाता है—मेरे भी आँसू नहीं रूक रहे हैं। — और अब मिस सूरी की आँखों से गंगा -जमुना बह चली है — मेरी आँखों से जैसे सरस्वती — कुछ पता नहीं कब प्रकाश, प्रेमा, आदित्य और उमा कमरे से निकल गये र्हैं और हम दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे हैं और आँसुओं के उस संगम से हमने एक-दूसरे से कितना कह डाला है, एक-दूसरे को कितना सुन लिया है, … चौबीस घंटे पहले हमने इस कमरे में अजनबी की तरह प्रवेश किया था, और चौबीस घंटे बाद हम उसी कमरे से जीवन-साथी (पति-पत्नी नहीं) बनकर निकल रहे हैं- यह नए वर्ष का नव प्रभात है जिसका स्वागत करने को हम बाहर आए हैं।
शादी का प्रण लिया, सगाई वहीं की। कुछ दिन बाद शादी इलाहाबाद में।’

इन्दिरा जी से मित्रता

बच्चन परिवार एवं नेहरू परिवार के सम्बन्ध आजकल वैसे नहीं है जैसे के पहले थे। इसका क्या कारण है यह तो वह ही लोग जानते हैं पर कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन ने राहुल गांधी के कथन पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि बच्चन परिवार और नेहरू परिवार के सम्बन्ध बहुत पुराने हैं और शायद राहुल गांधी को इसका अन्दाजा नहीं है।

यह चित्र टाईमस् ऑफ इंडिया के इस पेज से है।

बच्चन परिवार और गांधी परिवार कर सम्बन्धों की शुरूवात कैसे हुई, कैसे थे वे सम्बन्ध, इसके बारे में बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में कहते हैं कि,

‘उस फरवरी में सरोजिनी नायडू प्रयाग आई थीं ; आनन्द-भवन में ठहरी थीं। झा साहब ने एक रात को उनके सम्मान में भोज दिया था और उसमें सम्मिलित होने को तेजी को और मुझे निमन्त्रित किया था। तेजी के सौन्दर्य, सुरूचिपूर्ण पहनाव, शिष्टतापूर्ण बौद्धिक वार्तालाप से मिसेज नायडू इतनी प्रभावित हुई कि दूसरे दिन उन्‍होंने हमें आनन्द-भवन में चाय पर निमन्त्रित कर दिया। जब मैं तेजी के साथ वहाँ पहुँचा तो उन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से हमारा परिचय नेहरू-परिवार से कराया। हमारी ओर हाथ करके बोलीं, ‘The Poet and the poem’- ‘आप कवि, आप कविता’। इस परिचय के फलस्वरूप तेजी सबसे अधिक निकट इंदिरा जी के आई - उस समय तक उनका विवाह नहीं हुआ था - और तब से आज तक उनकी मैत्री बनी हुई है।‘

बच्चन जी ने मांस और मदिरा क्यों छोड़ी

कायस्थ, मांस खाने और मदिरा पीने में कोई परहेज नहीं करते हैं। बच्चन जी भी इसका उपभोग करते थे पर उन्होंने इसको छोड़ दिया। इसके छोड़ने का कारण उनके पुत्रों की बीमारी थी।

जब अमिताभ बीमार पड़े तो उस समय वह महू में विश्वविद्यालय के एन.सी.सी. से सम्‍बन्धित 8 सप्ताह की ट्रेनिंग में थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि ‘अगर अमित अच्‍छा हो जाएगा तो वे कभी शराब नहीं पियेंगे।’ नीड़ का निर्माण फिर में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं कि,

‘इस प्रण से ही मेरा मन कुछ शान्त हो गया।
तेजी का जो दूसरा पत्र आया, उसमें लिखा था कि अमित की दशा में सुधार हो चला है।
मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहा, भले ही कोई अफसर या अफसर का चचा बुरा माने।
तेजी के तीसरे पत्र से अमित के और अच्छे होने की खबर आई।
और एक समाचार आया कि अमित बिल्‍कुल अच्छा हो गया है।
पचीस वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। तब से मैंने शराब छुई नहीं।’

इसी तरह की कुछ बात तब हुई जब अजिताभ बीमार पड़े वह २-३ महीने का था तो उसे दाने निकल आये और लोगों ने समझा कि उसे चेचक हो गयी है। बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में कहते हैं,

‘मैंने किसी तरह की प्रार्थना-विनती न की। एक पिछली बात याद आई। अमित के लिए मैंने सदा के लिए मदिरा छोड़ दी थी। मैंने अपने मन से कहा, यदि अजित बच जाएगा तो मैं कभी मांस नहीं खाऊंगा। रात का पिछला पहर था या सुबह का मुँह अँधेरा तेजी ने मुझे जोर से आवाज दी! मैंने समझा, कुछ अनिष्ट हो गया। पर वह तो तेजी के हर्ष-आश्चर्य का स्वर था। अजित के बदन से सारे दाने गायब हो गए थे! उसका बुखार उतर गया था और वह मुस्करा रहा था! चमत्कार हो गया था, चमत्कार ! मैंने किसी अज्ञात को धन्यवाद दिया।’

बच्चन जी, पन्त जी और निराला जी

कलाकार भी कुछ अजीब होते हैं सुमित्रा नन्दन पंत जहां सुकुमार, वहां निराला जी पहलवान। इनके सम्बन्ध भी कुछ अजीब थे। एक दिन तो दोनों में कुश्ती ही हो गयी।

यह छवि निराला जी के युवा अवस्था यानी 1939 की है। तब वे 43-44 साल के थे। यह चित्र सरस्वती पत्रिका के 1961 के दीपावली अंक के सौजन्य से है। यह मुझे यहां से मिला है।

बच्चन जी नीड़ का निर्माण फिर में लिखते हैं कि,

‘पंत और निराला एक-दूसरे से जितने “एलर्जिक” (एक-दूसरे के लिए कितने असह्य) थे, इसका अनुभव पहली बार मुझे हुआ।

निराला जी पंत जी को देखते तो अवज्ञा से पीठ या मुंह फेर लेते । पंत जी निराला को देखते तो अपने कमरे में जा बैठते। एक दिन तो निराला जी मेरे ड्राइंग रूम में आ धमके और उन्होंने पंत जी को कुश्ती के लिए ललकारा।

अपने मनोविकारों से ग्रस्त-विवश निराला मुझे इससे दयनीय कभी नहीं दिखे।‘

बच्चन जी - नियम और सिद्धान्त

बच्चन जी नियमों और सिद्धान्तों से नहीं बंधना चाहते थे इसलिये किसी क्लब या कला सदस्य के सदस्य नहीं रहे पर यदि निमंत्रण होता तो अवश्य जाते थे। इसके बारे में कहते हैं कि,

’मेरा कार्य युनिवर्सिटी में पढ़ाने और अपने अध्ययन-कक्ष में पढ़ने-लिखने तक सीमित हो गया। मैं कभी किसी क्लब वगैरह का सदस्य नहीं बना, किसी कला-साहित्य संस्था का भी नहीं। … संस्थाऍ किसी-न-किसी सिद्धान्त से बंधती हैं- मैं अपने को किसी सिद्धान्त से बांधना नहीं चाहता था। … संस्था … मैंने अपने घर पर ही खोल दी थी। इसका नाम मैंने ‘निशान्त’ रख दिया था। इसके न कोई नियम थे, न सदस्यता की कोई फीस थी। कुछ लोग जिनमें अधिकतर युनिवर्सिटी के नाते मेरे विद्यार्थी थे - महीने के अन्तिम शनिवार को १० बजे रात से बैठते थे। और काव्‍य-पाठ, साहित्य चर्चा में रात बिताते थे। एक या दो बजे रात को हमीं लोग मिल-मिलाकर कॉफी अथवा कोई ताजी-गरम खाने की चीज बनाते, खाते-पीते, और तारों की महफिल के उठने तक हम अपनी बैठक जमाए रहते।’


मैंने पिछली बार अमिताभ बच्चन के द्वारा मधुशाला का पाठ की चिट्ठी में लगाया था। इसे भी आप सुने। यह किसी तरह उससे कम नहीं है

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन - विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

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क्या भूलूं क्या याद करूं

May 11, 2008

अमिताभ बच्चन के पिता, मधुशाला के लेखक - हरिवंश राय बच्चन का जन्म २७ नवम्बर २००७ पर इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होने अपनी अधिकतर पढ़ायी इलाहाबाद में की और यहीं पर नौकरी भी की। १९५५ में, जवाहर लाल नहरू, इन्हें दिल्ली ले गये। वे राज्य सभा के सदस्य रहे। १९६९ में उन्हें साहित्य आकदमी का पुरुस्कार मिला। वे पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान, और यश भारती सम्मान से भी नवाज़े गये। उनकी मृत्यु १८ जनवरी २००३ में हो गयी।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। इस चिट्ठी में उनकी आत्मकथा के पहले भाग क्या भूलूं क्या याद करूं की समीक्षा है।

बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माना जाता है। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,

‘कायस्थ के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,

‘मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है - इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? - यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! - मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।’

इलाहाबाद विश्वविद्याल जहां बच्चन जी अपने जीवन के सबसे सृजनात्मक साल गुजारे

बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे यहां तो टौमी है। टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये - बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। कुत्तों के बारे में बच्चन जी के विचार यह हैं,

‘देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।’

यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें इलाहाबाद के मुहल्लों, शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो अच्छा रहता। यह इसको नीरस बनाता है।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

  • क्या भूलूं क्या याद करूं;
  • नीड़ का निर्माण;
  • बसेरे से दूर;
  • दशद्वार से सोपान तक।

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन - विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

अमिताभ बच्चन मधुशाला का पाठ करते हुऐ

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