क्या भूलूं क्या याद करूं

अमिताभ बच्चन के पिता, मधुशाला के लेखक - हरिवंश राय बच्चन का जन्म २७ नवम्बर २००७ पर इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होने अपनी अधिकतर पढ़ायी इलाहाबाद में की और यहीं पर नौकरी भी की। १९५५ में, जवाहर लाल नहरू, इन्हें दिल्ली ले गये। वे राज्य सभा के सदस्य रहे। १९६९ में उन्हें साहित्य आकदमी का पुरुस्कार मिला। वे पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान, और यश भारती सम्मान से भी नवाज़े गये। उनकी मृत्यु १८ जनवरी २००३ में हो गयी।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। इस चिट्ठी में उनकी आत्मकथा के पहले भाग क्या भूलूं क्या याद करूं की समीक्षा है।

बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माना जाता है। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,

‘कायस्थ के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,

‘मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है - इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? - यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! - मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।’

इलाहाबाद विश्वविद्याल जहां बच्चन जी अपने जीवन के सबसे सृजनात्मक साल गुजारे

बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे यहां तो टौमी है। टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये - बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। कुत्तों के बारे में बच्चन जी के विचार यह हैं,

‘देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।’

यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें इलाहाबाद के मुहल्लों, शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो अच्छा रहता। यह इसको नीरस बनाता है।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

  • क्या भूलूं क्या याद करूं;
  • नीड़ का निर्माण;
  • बसेरे से दूर;
  • दशद्वार से सोपान तक।

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन - विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

अमिताभ बच्चन मधुशाला का पाठ करते हुऐ

सांकेतिक चिन्ह

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2 Responses to “क्या भूलूं क्या याद करूं”

  1. समीर लाल Says:

    क्या भूलूँ क्या याद करुँ-इस यात्रा के दौरान पढ़ी. आपकी प्रस्तुति बहुत पसंद आई।

  2. नीड़ का निर्माण फिर « लेख Says:

    [...] क्या भूलूं क्या याद करूं; [...]

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  • मैं और यह चिठ्ठा

    बातों का है यह मायाजाल,

    बातों का है यह संसार।

    उन्मुक्त पर है मेरी छुटपुट बातें,

    छुटपुट पर हैं औरों कि मुक्त बातें,

    और यहां है मेरी पूरी बातें।

    जी हां, मै उन्मुक्त ही हूं। भारत के एक कसबे से, एक आम भारतीय। मैं वर्ड-प्रेस पर भी छुटपुट के नाम से एक ब्लौग लिखता हूं; ब्लौगर पर उंमुक्त के नाम से एक ब्लौग लिखता हूं। फिर यह तीसरा ब्लौग क्यों?

    छुटपुट मे इस दुनिया मे और लोग क्या कह रहें हैं मेरी टिप्पणी के साथ रहता है। उन्मुक्त मे मेरे विचार रहते हैं पर यह अक्सर कड़ियों मे रहते हैं। किसी भी विचार पर लिखने के पहले मे रूप रेखा तो बना लेता हूं पर लेख कड़ियों के साथ ही लिखता हूं - एक साथ बड़ा लेख लिखना मुशकिल रहता है।

    लेखों को कड़ियों मे लिखने मे आसानी होती है पर पढ़ने मे पूरे लेख ही अच्छे लगते हैं - कारण,

    इससे लगा कि बाद मे सारी कड़ियों को जोड़ कर पूरा लेख एक जगह कर दिया जाय और यदि उस विषय पर कुछ नया आये तो कड़ियों पर जोड़ने की जगह उसे पूरे लेख पर ही जोड़ा जाय तो ठीक रहेगा तथा उस विषय पर एक जगह पूरी जानकारी भी रहेगी। पूरे लेख को एक साथ पढ़ने का आनंद ही अलग है।

    ब्लौगर के अपने फायदे हैं तो वर्ड-प्रेस के अपने। बस इसी उधेड़-बुन मे यह नया चिठ्ठा शुरू कर दिया। जो लेख पहले कड़ियों मे उन्मुक्त मे प्रकाशित हो चुके हैं उसमे से कुछ लेखों की कड़ियों को एक लेख मे परिवर्तित करके यहां प्रकाशित किया जा रहा है। इन लेखों मे कुछ संशोधन तारत्म्यता के लिये या फिर कुछ नया आ गया हो तो उसे जोड़ने के लिये किया गया है। यदि इस विषय पर कुछ नया आता है तो उंमुक्त के चिठ्ठे पर लिख कर इसमे उसी लेख पर जोड़ दूंगा ताकि एक जगह सारी सूचना मिल जाये। यहां इन लेखों की पीडीएफ फाईल भी है उसे आप चाहें तो डाउनलोड करके कमप्यूटर मे या मुद्रित करके पढ़ सकते हैं।

    मेरे एक मित्र के पुत्र की आखें कमजोर हैं वह अक्सर ऐसे प्रोग्राम के बारे में पूछता रहता है जिसमें पढ़ना न पड़े और वह सुन सके। इसलिये एक पॉडकास्ट ' बकबक' नाम से शुरू की। पॉडकास्ट की अधिकतर फाईलें ogg, ओपेन सोर्स फॉरमैट, मे हैं। मैंने इसे ogg फॉरमैट में क्यों रखा है यह आप मेरे उन्मुक्त चिट्ठे की पापा, क्या आप उलझन में हैं चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,

  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;

  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और

  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,

  • सुन सकते हैं।

    मेरे तीनो चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सारी पोस्टें, कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या इस पॉडकास्ट को दें और अच्छा हो कि उस पोस्ट से लिंक दे दें। मुझे और भी प्रसन्नता होगी यदि इनका उपयोग ऐसे लोगों के लिये किया जा सके जिनकी आखें कमज़ोर हैं।

    मैंने एक फीड एक्रेगेटर देवनागरी चिट्ठे नाम से बनाया है। इसमें देवनागरी में लिखे सारे चिट्ठों की प्रविष्टियों की सूचना आती है। इसका भी आप जैसा चाहे वैसा प्रयोग कर सकते हैं।

    मेरी पत्नी भी एक चिट्ठा ' मुन्ने के बापू' के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। हमारे में बारे में आप 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं।

    मुझसे सम्पर्क का पता यह है।
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