इस चिट्ठी में, हमारी कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा का वर्णन है।

सुबह झील से, ताज गार्डन रिट्रीट कुमारकॉम
यह मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर कड़ियों में प्रकाशित हो चुका है। यदि इसे आप कड़ियों में पढ़ना चाहें तो नीचे चटका लगा कर जा सकते हैं।
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे – बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।। आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया।। आप, टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए।। पति, पत्नी के घर में रहते हैं।। पसन्द करें – कौन सी मछली खायेंगे।।
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं
मुझे त्रिवेन्द्रम में होली के आस-पास कुछ काम था। मुझे लगा कि यह बहुत अच्छा मौका है कि जब हम होली में उत्तर भारत से दूर रह सकते हैं और केरल घूम सकते है। इसीलिए हम लोगों ने ऎसा प्रोग्राम बनाया कि मैं त्रिवेन्द्रम में अपना काम कर सकूं और हम केरल भी घूम सकें।
हम लोग दिल्ली से, हवाई जहाज के द्वारा कोचीन के लिए चले। शाम का समय था। दाहिने तरफ की खिड़की से, पश्चिम दिशा में, डूबता हुआ सूरज दिखाई पड़ रहा था और क्षितिज पर लाल सी पंक्ति दिखाई पड़ रही थी ऎसा लगता था कि क्षितिज में चारो तरफ आग लगी हुई है।
उस समय आकाश में केवल एक ही तारा चमक रहा था और बहुत देर बाद अस्त हुआ। मेरे विचार मे वह शुक्र (Venus) ग्रह था। वह तारा हमको अपने कस्बे में काफी नीचे दिखाई पड़ता है पर यहां ऊंचाई पर था। शायद, यह इसलिए था कि हम हवाई जहाज में बहुत ऊपर थे।
हम लोग हवाई जहाज पर दिल्ली से कोचीन गये। रास्ते में, एक महिला ने इस बात की घोषणा की। उसने जानकारी दी कि,
- आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है।
- यह दिन, किस प्रकार से लोगों को महिलाओं का सम्मान व आदर करने की याद दिलाता है।
- वे चाहते हैं कि महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाय।
कुछ समय बाद मेरी मुलाकात एक परिचायिका से हुई। मैंने पूछा क्या उसने महिला दिवस के बारे में घोषणा की है। उसने कहा,
‘यह घोषणा मैंने नहीं पर हवाई जहाज की महिला चालक ने की थी। उसने भी, यह अपने मन से नहीं कहा था पर उसे कम्पनी के तरफ से जो सामग्री दी गयी थी उसे केवल पढ़ा था।’
मैंने कहा कि लेकिन जो पढ़ा था क्या उसमें यह क्यों नहीं बताया गया था कि महिला दिवस क्यों शुरू हुआ क्योंकि और यह रोचक है। परिचायिका ने कहा,
‘यदि आपको इसके बारे में मालुम है तो बतायें।’
मैंने उसे बताया, कि महिला दिवस, बीसवीं शताब्दी के शुरू में, महिलाओं को वोट का अधिकार दिलवाने के लिये शुरू किया गया था। परिचायिका को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उसने पूछा,
‘क्या कभी ऎसा भी था जब महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था?’
मैंने उसे बताया कि बीसवीं शताब्दी में अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था और यूरोप के बहुत सारे देशों में तो यह बीसवीं शताब्दी में, द्वितीय विश्वयुद्व के बाद ही मिला। इंगलैंड में भी उन्नीसवी शताब्दी में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था। उन्हे भी यह अधिकार बीसवीं शताब्दी में, १९१८ में मिला।
मैंने उसे यह भी बताया कि दुनिया में पहले महिलाओं को व्यक्ति नहीं माना गया (विस्तार से यहां और यहां पढ़ें)। सबसे पहले महिलाओं को व्यक्ति इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना उन्होंने यह कॉर्निया सौरबजी नामक महिला को ९ अगस्त १९२१ में वकील के रूप में पंजीकृत कर किया। यह कार्य, हाऊस आफ लार्ड ने १९२८ में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के लगभग सात साल बाद, किया।
हम लोग साढ़े आठ बजे तक कोचीन पहुंचे। हम लोगो को रात कोचीन में ही बितानी थी और अगले दिन कुमराकॉम जाना था।
मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता है
हम लोगों ने केरल घूमने का पैकेज ‘इन्टर साइट टूरस् एवं ट्रैवल्स्‘ कम्पनी से लिया था। उनकी तरफ से हवाई अड्डे पर हमें प्रवीन लेने आये थे। उसके पास वातानुकूलित टाटा इंडिका गाड़ी थी। वे इसके चालक थे। हमें पूरा पैकेज इन्हीं के साथ लेना था। इन्हें ही अंत पर हमें त्रिवेन्द्रम के हवाई अड्डे पर छोड़ना था।
हम लोगों ने जब साउथ अफ्रीका में क्रुगर पार्क घूमने के लिये सारी बुकिंग अन्तरजाल पर ही करवायी थी। उस समय हम डर रहे थे कि सब ठीक होगा या नहीं। लेकिन वहाँ पर सब काम बहुत अच्छी तरह से हुआ। वहाँ का ड्राइवर हमेशा समय से आता था। हमारा वहां का अनुभव, बहुत अच्छा था। हमें केरल की ट्रिप में भी कुछ इसी तरह का अनुभव हुआ।
हमारी गाड़ी के चालक, प्रवीण भी समय के पाबन्द थे। इनको जो भी समय बताया जाता था उस वक्त वह वहाँ पर मौजूद रहते थे। उनकी कार एकदम साफ रहती थी। वह हमेशा साफ सुथरे, सफेद कपड़े, पहनते थे। वे बातचित करने मे भी अच्छे थे। हर जगह की खासियत बताते थे, वहां पर क्या खरीदा जा सकती है, कौन सी दुकान अच्छी है। इस तरह सूचनांए भी हम लोगों को देते रहते थे। उनका बर्ताव भी बहुत अच्छा था। हमें उनके साथ घूमना अच्छा लगा।
प्रवीन ने बताया की उसके परिवार में सब लोगों का नाम ‘प्र’ अक्षर शुरू होता मैंने पूछा की क्या प्र से नाम का शुरू होना शुभ होता है। उसने कहा,
‘हां, मेरे घर में सबका नाम प्र से शुरू होता है। मेरी पत्नी का नाम प्रविधा है मेरी बेटी का नाम प्रवीना है। न केवल मेरे पिता का नाम प्र से शुरू होता है पर भाई और भाभी एवं मेरी पत्नी तथा भाभी के मायके वालों का नाम भी प्र से शुरू होता है।’
प्रवीन एक बात से दुखी थे उन्होंने बताया,
‘केरल में बहुत से लोग घूमने के लिए आते हैं। उसके लिए बहुत सारे होटल बने हुए हैं। लेकिन होटल मालिकों ने कोई भी जगह टैक्सी चालकों के रहने के लिए नहीं रखी है। हर रात टैक्सी चालक, अपनी टैक्सी में ही सोते हैं। रात में टैक्सी चालक खिड़की नहीं खोल सकते, क्योंकि मच्छर काटते हैं। गाड़ी में, गर्मी और उमस हो जाती है। इसलिए ड्राइवर गाड़ी मे ए.सी. चलाकर सोते है। इस कारण हर रात को केरल में लगभग एक लाख लीटर पेट्रोल और डीज़ल खर्च हो जाता है। यदि हर होटल में टैक्सी चालक के रहने के लिए शयनागार हो तो यह पेट्रोल और डीज़ल का खर्चा बचाया जा सकता है।’
उसने यह भी बताया,
‘हमारे संगठन ने इस बात की लिखित तथा फोन पर शिकायत पेट्रोलियम मंत्रालय में की है। पर उन्होंने इस पर कुछ भी करने से मना कर दिया। हम लोग इस बात से बहुत ही हताश हैं।’
उसका यह भी कहना था,
‘यहां पर कानून के अन्तर्गत तो सारे होटल मालिको को चालकों के लिये शयनागार बनाना चाहिए। लेकिन कोई भी होटल का मालिक उसे नहीं बनाता है और केवल कागजी कार्यवाही की जाती है। जो सरकारी लोग उसको चेक करने के लिए आते है वह भी ठीक से चेक नही करते है और वो घूस खा लेते हैं।’
उक्त बात के अतिरिक्त, प्रवीण ने मुझसे कोई भी बात नहीं की जिसमें केरल की कोई बुरायी निकलती हो। वह अपने प्रदेश के लिए बहुत ही उत्साहित था और उसके मुताबिक वहाँ जगह- जगह उन्नति हो रही है और केरल बहुत आगे जायेगा।
मेरी पत्नी ने एक-दो बार कार का दरवाजा जोर से बंद किया तो। प्रवीण ने उसे समझाया।
‘मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता है क्योंकि इससे दरवाजा खराब हो सकता है।’
मैंने प्रवीण को बताया कि हमने मारूति की ए-स्टार खरीदी है उसका कहना था,
‘कभी भी नई निकली कार नहीं खरीदना चाहिए। उस तरह की कारें, जब छ: महीना चल ले तब लेनी चाहिए। क्योंकि इस समय के अन्दर उस तरह की कारों की कमियां पता चल जाती है और उसके बाद खरीदने पर विचार किया जा सकता है कि उसे लेना चाहिए अथवा नहीं।’
ऎसे बात तो सही है पर हम तो ए-स्टार गाड़ी खरीद चुके हैं।
यह गाड़ी प्रवीण की थी जिसे उसने बैंक से ऋण पर लिया था। कार के लिये उसने ८० प्रतिशत ऋण लिया है और २० प्रतिशत स्वयं लगाया है। इसके लिये उसकी कम्पनी ने भी उसकी मदद की थी। उन्होंने इस बात को लिखकर दिया है कि प्रवीण की गाड़ी उनकी कम्पनी के साथ सम्बद्व रहेगी और इसके लिए प्रत्येक महीने वे एक निश्चित पैसा देगें जिससे वह कार के ऋण को वापस कर सकता है।
केरल में, घूमने वाली कम्पनी की गाड़ी तीन साल से पुरानी गाड़ी नहीं लगायी जाती है। प्रवीन की गाड़ी को भी लगभग डेढ़ साल हो चुका है। उसने बताया कि वह डेढ़ साल के अन्दर गाड़ी बेचकर दूसरी गाड़ी लेगा। वह डीजल की, टाटा इन्डिका ही लेगा। उसके मुताबिक,
‘यह चलने में सबसे अच्छी गाड़ी है।’
हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है
कोचीन में, हम लोग ताज मालाबार होटल में रूके थे। होटल में पहुंचते समय अभिलाष, स्वागत कक्ष पर थे। उन्होंने मुस्कुरा कर हम लोगों का स्वागत किया और कहा कि उसने हमें अपग्रेड दे दिया है और हेल्टज रूम में रहने की सुविधा प्रदान की है। मेरे पूछने पर कि उसने ऎसा क्यों किया। उसने कहा, इसकें दो कारण बताये,‘पहला, हमें पहले पता चल गया था कि हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त सपत्नीक आ रहें हैं। हिन्दी चिट्ठाकारों को तो खास कमरा देना ही होता है।’
वाह, हिन्दी चिट्टकारी का यह फायदा तो मुझे मालुम ही न था
‘दूसरा, इस समय होटेल में, अच्छे कमरे खाली हैं। आप जब वापस जाएं तो अपने मित्रों को इस होटल के बारे में बताये और उन्हें यहां ठहरने के लिये कहें।’
होटेल के बाहर का दृश्य
ताज मालाबार होटल दो भागों में बना हुआ है पहला भाग पुराना है। इसे १९३६ में अंग्रेजों ने बनवायया था। उस समय यह नाविकों के आराम गृह की तरह प्रयोग किया जाता था। बाद में, ताज होटल ने, इसे खरीद लिया। इसमें एक नई बिल्डिंग बनवायी गयी है जो उसके बगल में बहुमंजिली इमारत है। शायद, हम लोगों का आरक्षण बहुमंजिली कमरे में था। अभिलाष ने हमें, हेल्टज रूम में यानी १९३६ में बने कमरे में भेज दिया। अभिलाष ने मुझसे पूछा,
‘इस कमरे में दोनो विस्तर अलग-अलग हैं। यदि आप चाहें तो हम आपको दूसरा कमरा दे सकते हैं जिसमें दोनो बिस्तर साथ साथ हो।’
मैंने जवाब दिया,
‘इस उम्र में हमें इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह कमरा चलेगा।’
हम लोग जब कमरे में पहुंचे तो मुझे लगा कि हमारा रात में कोचीन में रूकने का निर्णय सही था। यह होटल भी बहुत अच्छा है और उसका कमरा भी। इस कमरे का भी फर्नीचर और समान, उसी समय की स्टाइल में था। इस कमरे के बाहर देखने पर अप्रवाही जल (Back water) और समुद्र का सुन्दर दृश्य दिखायी पड़ता था।

कुछ साल पहले जब मै एक सम्मेलन में भाग लेने कोचीन आया था तब यहाँ पर ‘ला मेरिडियन’ होटल में ठहरा था। वह होटल भी एक बेहतरीन होटल है पर ताज मालाबार किसी मायने में उससे कम नहीं है।
सुबह मेरी मुलाकात होटेल के दरबान, ऑगस्टीन से हूई। मैं उसका चित्र नहीं ले पाया पर उसने बताया कि वह काम चलाऊ १८ भाषायें बोल सकता है। मैंने जब उससे पूछा कि उसने यह कैसे सीखा तो उसने बताया,
‘कोचीन में विदेशी पर्यटक आते हैं। बस उन्ही से बात करते करते उनकी भाषा सीख ली।’
मैंने ऑगस्टीन से काफी देर बात की। वह मुझे हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति लगा।
आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी
सबसे पहले हम लोग वहाँ सिनागॉग, यानी की यहूदियों के पूजा स्थल, देखने गये। इसे १५६८ में स्पैनिश एवं डच यहूदियों ने बनावाया था। इसके उपर घड़ी की टावर १७६० में बनी। इसकी देखरेख करने वाले वाले ने बताया,‘इस समय यहाँ पर यहूदियों के केवल पाँच परिवार रह गये है और उन पाँचों परिवार में केवल ग्यारह सदस्य है और पूरे केरल में केवल पन्द्रह परिवार यहूदियों के रह गये हैं।’
डच पैलेस से सियनगॉग के पीछे से दृश्य
सिनागॉग के बगल में डच पैलेस है। यह महल को पुर्तगलियों ने १५५५ में वहाँ के राजा वीर केरल वर्मा के लिए बनवाया था। १६६५ में, डच लोगों ने इसे बड़ा किया और इसकी मरम्मत करवायी। इसीलिए यह डच पैलेस के नाम से जाना जाता है। इसमें कोचीन के महाराजा की तस्वीरे, पालकियाँ, वेशभूषा व अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं।
डच पैलेस घूमते समय हमारी मुलाकात अन्य पर्यटकों के साथ, मेरी मुलाकात जैताली नामक एक प्यारी सी युवती से हुई। उसके पैरों में लगी मेंहदी बहुत सुन्दर लग रही थी। वह स्वयं भी बहुत सुन्दर थी मैंने उससे कहा,
‘आप जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैर में मेंहदी लगी है। क्या आपने यह कोचीन में लगवायी है?’
यह सुन कर वह शर्मा गयी। उसने मुझसे कहा,
‘मेरी एक सप्ताह पहले मेरी शादी हुई है। यह मेंहदी मैंने शादी के लिए लगवायी थी।’
मैंने जैताली से पूछा कि क्या में उसके पैरों में लगी मेंहदी का चित्र खींच सकता हूं। उसने कहा,
‘जरूर।’
उसने पैरों में जूते पहन रखे थे। उसने अपने जूते उतार दिये, जींस को कुछ ऊपर कर लिया ताकि पैरों की मेंहदी अच्छी तरह से दिख सके और अपने पति के साथ चित्र खिंचवाया।
जैताली हनीमून के लिए अपने पति करनाल मोदी के साथ अहमदाबाद से आयी थी। लेकिन, उसके साथ केवल उसके पति नहीं थे। साथ में पति के बड़े भाई और उनकी पत्नी भी थी। यह चारो लोग वहाँ मस्ती से घूम फिर रहे थे। करनाल, सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और न्यूट्रॉन सिस्टम नामक कम्पनी के साथ काम करते है। मैंने पूछा कि क्या वह लोग मुक्त सॉफ्टवेयर पर काम करते हैं उसने कहा नहीं
‘करनाल, जैताली, नमस्ते
करनाल मुक्त सॉफ्टवेयर का भविष्य उज्जवल है तम्हें इस पर भी काम करना चाहिये।
जैताली तुम और करनाल हमेशा सुखी रहो, खुश रहो यही ईश्वर से
प्रार्थना’
हम लोग सन्त फ्रांसिस चर्च भी देखने गये जिसे १५१६ ई० में पुर्तगलियों के द्वारा बनवाया गया था। वास्कोडिगामा के मरने के बाद, वहाँ उन्हें गाड़ दिया गया था पर कुछ साल बाद उसे पुर्तगाल ले जाया गया।
हम लोग दो साल पहले कालीकट घूमने गये थे मैंने इसके बारे में ‘प्रकृति की गोद में तीन दिन‘ नाम से यात्रा विवरण लिखा था। इसकी पहली कड़ी में कप्पड़ समुद्र-तट पर वास्कोडिगामा के बारे में हुई चर्चा का वर्णन किया था। वहां पर वास्कोडिगामा के बारे में लोगों की राय, खराब थी। फ्रांसिस चर्च में बैठे पादरी से मैंने उस चर्चा का वर्णन किया। उनका कहना था कि उस समय कोचीन और कालीकट के राजा के बीच में लड़ाई चल रही थी। वास्कोडिगामा ने कोचीन के राजा का साथ दिया, इसलिये वे लोग वास्कोडिगामा के बारे में इस तरह की बात करते हैं
यहाँ पर हम लोगों ने मछली पकड़ने के लिये चाईनीज जाल भी देखे। कोचीन मे चीन से बहुत लोग आये थे। वे अलग तरीके से मछली पकड़ते थे। अब वे नहीं रह गये हैं पर केरल के लोग, उसी तरह से मछली पकड़ रहे हैं। इसमें एक तरफ बडा सा जाल है दूसरी तरफ भारी-भारी पत्थर लगे हुए हैं। जाल के डंडो पर कुछ व्यक्ति चलते है तो वह नीचे पानी में चला जाता है जब व्यक्ति वहां से हट जाते है तो पत्थर के भार से जाल ऊपर आता है और जो मछली जाल में फंस जाती है वह जाल के साथ ऊपर आ जाती हैं। यह जाल ढ़ेकली लीवर (lever) के सिद्घान्त पर काम करता है।
साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं
हम लोग दोपहर के भोजन के समय कुमाराकॉम पहुंचे। यहां हमें ताज गार्डन रिट्रीट (Taj Garden Retreat) होटल में एक रात रूकना था।
ताज गार्डन रिट्रीट होटल मुझे बहुत सुन्दर और शान्त लगा। यहां पहले बेकर परिवार रहा करता था इसलिये इसे बेकर हाउस के नाम से जाना जाता था। केरल में, बेकर परिवार ने शिक्षा क्षेत्र में काम किया है। इनके परिवार का आखिरी सदस्य १९६२ में भारत छोड़कर चला गया और इसे १९७७ में बेच दिया। १९९२ में इसे ताज ग्रुप ने ले लिया।
यह लगभग १५ हेक्टेयर में स्थित है इसके बीचो बीच एक झील है। मन किया कि यहां कुछ दिन रुककर पुस्तकों का अध्ययन करूं, कुछ लिखूं। इस होटेल में एक जगह पुस्तकें रखीं थी। आप उन्हें कहीं पर बैठ कर पढ़ सकते थे। पूरे होटल में वाई-फाई (wi-fi) है। आप जहां चाहें वहां बैठ कर अपने लैपटॉप से काम कर सकते हैं, अन्तरजाल पर जा सकते हैं। 
हम होटेल की इसी कॉटेज में रुके थे
हम लोगों को जब मालूम चला था कि एक रात हमें ताज रिट्रीट गार्डन में ठहरना है तब हमने इसके बारे में अन्तरजाल में देखा था। हमें वहां इसकी कुछ समीक्षाएं अच्छी नहीं थी। इसलिए हम घबरा रहे थे पर यह न केवल बेहतरीन होटल है पर यहां कि सेवा भी अति उत्तम है। मुझे दुख हुआ कि मैंने वहां केवल एक रात ही रूकने का क्यों प्रोग्राम बनाया।
बेकर पिरवार जिस भाग में रहता था इस समय वह होटल का मुख्य भाग था। इसमें उनके हेरीटॅज़ कमरे थे। बाद में इसमें जगह जगह कॉटेज बना दिये गये हैं। वहां पहुंच कर हमें बताया कि यहां भी हमें अपग्रेड कर दिया गया है इसका कारण वही बताया गया जो कि ताज मालाबार होटेल में दिया गया था।
हम जिस कॉटेज़ में ठहरे थे वह सुन्दर थी इसका बाथरूम अनूठा सा था। इसका कुछ भाग ऊपर से खुला था और उसके ऊपर जाल पड़ा था। वहां पर उसे प्रयोग करने पर लगता था कि हम खुली जगह पर हैं पर वह था, प्राइवेट।
वहां बहुत सी साइकलें रखी थीं मैने स्वागत कक्ष में बैठी महिला से पूछा कि यह यहां क्यों रखी हैं। उसने कहा,
‘हमारा होटल बहुत फैला है। हमने यह साइकलें हमारे यहां ठहरने वाले मेहमानो के लिये रखी हैं। ताकि वे इसका प्रयोग कर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिये करें।’
मैंने वहां काफी साइकिल चलायी। होटेल के अन्दर आप जहां चाहें वहां साइकिल छोड़ सकते थे या कहीं भी रखी साइकिल को ले सकते थे। रात के समय होटेल वाले साइकिलों को वापस एक जगह पर रखते थे।वहां कुछ साइकिलों के टायर पतले थे और कुछ के मोटे। पतले टायरों की साइकिल चलाने में मुश्किल पड़ी। लगता था कि वह इधर उधर भाग रही है। मुझे लगा कि कहीं मैं झील में न गिर जाऊँ। मोटे टायर वाली साइकिल चलाने में ज्यादा दम लगती थी।
मैंने न केवल बचपन में पर बाद के जीवन में काफी साइकिल चलायी है। हम अक्सर मित्रों से मिलने साइकिल पर जाया करते थे पर बाद में शुभा को साइकिल चलाने में तकलीफ होने लगी तब साइकिल चलाना छोड़ दिया। मैंने जिन साइकलों को चलाया है उनके टायर इन दोनो के बीच के होते थे। वे ही बेहतर थे।
आजकल मैंने पुन: साइकिल चलाना शुरू किया है। मेरी साइकिल में बीच के ही टायर हैं। मैं, आजकल इतवार को सुबह लगभग १५-२० किलोमीटर चलाता हूं और सप्ताह में प्रयत्न करता हूं कि सारे काम साइकिल में ही करूं। पेट्रोल भी बचा और वातावरण भी दूषित नहीं हुआ। हांलाकि भीड़ के कारण सब जगह साइकिल पर नहीं जाया जा सकता है।
इस होटेल में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। वहां मुझे महिला सशक्तिकरण का नया रूप देखने को मिला।
पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें

सुबह के समय अप्रवाही जल से कुमाराकॉम का दृश्य
‘हम दोपहर को आये हैं, गर्मी है- इसलिये हमारा इस तरह से स्वागत हुआ है।’
उसमें से एक युवती ने कहा,
‘हम भी कल दोपहर को आयें थे फिर भी हमारा इस तरह से स्वागत नहीं हुआ।’
मैंने बात टालने के लिये कहा,
‘अरे, मुझे यह मालूम होता तो कोई और बहाना बनाता।‘
वे मतलब समझ गयी। इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।
इन महिलाओं को जब पता चला कि हम उत्तर भारत से हैं तो उनमें से एक बोली,
‘क्या आप सक्सेना है। मेरे पति भी सक्सेना है, और वहीं से है। लगता है कि सक्सेना लोग वहीं पाये जाते हैं।‘
मैंने कहा,
‘सक्सेना, कायस्थ होते हैं और उत्तर भारत में शायद ज्यादा तादाद में हैं इसलिये आपको ऐसा लगता है पर मैं सक्सेना नहीं हूं।‘
यह तीनों अपने तीस के या फिर चालीस के दशक में थी। इनसे बात करने पर पता चला कि यह बम्बई से आयी हैं और विज्ञापन कम्पनी में काम करती हैं।
इन तीनों के साथ इनका परिवार नहीं था। वे अपने पतियों और परिवार को छोड़कर सहेलियों के साथ मस्ती मारने आयी थीं। मुझे यह बात कुछ अजीब लगी।
परिवार के बारे में पूछने पर बताया बच्चों के स्कूल हैं, पति काम पर हैं और बच्चों की देखभाल भी कर रहे हैं। इस कारण उनके परिवार उनके साथ नहीं आ सके।
यह महिलायें ज्यादा समय अपने कॉटेज़ में रहती थीं। मैं भी वहां की शान्ति और सुन्दरता में इतना व्यस्त रहा कि इनके चित्र नहीं खींच पाया। इसलिये पोस्ट नहीं कर पा रहा हूं।
महिला सशक्तिकरण का यह रूप भी देखा – पुरुष काम के साथ बच्चों को देखे और महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ मस्ती करें
मैं और शुभा कई बार काम से अकेले गये। शुभा दुनिया के सारे कोने में अकेले जा चुकी है। कई साल उसने अकेले अमेरिका और कैनाडा में पढ़ाया है। लेकिन आज तक हम कभी भी, अपने परिवार को छोड़कर, मौज मस्ती मारने नहीं गये। हम जब भी गये, हमारा परिवार हमारे साथ रहा। ऐसे मौकों पर, जब तक मेरी मां जीवित रहीं, वे भी हमारे साथ रहती थीं। मेरे विचार से, ऐसे मौकों पर अगली पीढ़ी को साथ रखना चाहिये। इससे न केवल, वे बहुत कुछ सीखते हैं पर परिवार में संबन्ध भी प्रगाढ़ होते हैं।
लेकिन, यह भी सच है कि कभी-कभी, केवल मित्रों के साथ मस्ती मारने का अलग मज़ा है।
आइये देखते हैं, महिला सशक्तिकरण का एक दूसरा रूप।
भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं
कुमाराकॉम में, हमारी मुलाकात एक सिख दंपत्ति से भी हुई। वे शिकागो में रहते हैं और अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि वे दादा-दादी बन गये हैं और भारत घूमने के लिए आये हुए हैं। सिख महिला ने बताया, 
‘हम एल्लपी से आये हैं। यह सफर हमने कल रात नाव पर किया। रात में नाव, झील के बीचो बीच रूक गयी थी। अगले दिन मैं तो सुबह पांच बजे ही उठ गयी थी लेकिन नाव को चलाने वाले ६:३७ पर उठे। इसलिये चलने में देर हो गयी।’
मैंने उससे पूछा,
‘उस समय कितने सेकेंड हुए थे।‘
पहले तो उस महिला को मज़ाक समझ में नहीं आया कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूं। फिर वह समझ गयी कि उसने ६:३७ मिनट कहा था। इसलिए उससे सेकेंड के बारे में पूछा जा रहा है। वह मुस्कुरा कर बोली,
‘उस वक्त ४२ सेकण्ड हुये थे।‘
हमें लगा कि रात को नाव से चलना ज्यादा रोमांचकारी होता पर हम तो यात्रा शुरू कर चुके थे और अब उसमें बदलाव संभव नहीं था।
यहां हमारी मुलाकात एक अंग्रेज दंपत्ति से भी हुई। अंग्रेज महिला ने सलवार, कुर्ता पहन रखा था। मैंने उस महिला से कहा कि वे सलवार, कुर्ता में बहुत ही सुन्दर लग रही है। उसने मुस्कुरा कर कहा,
‘मैं १९७२ से लगातार भारत आ रही हूं। यहां इसी वेषभूषा को पहनना सुविधाजनक है। आप दूसरे से अलग नहीं लगते और आप इसे पहनकर किसी भी मंदिर में आसानी से जा सकते हैं।‘
मैंने कहा कि क्या लोग आपको देखकर नहीं पहचान पाते हैं क्योंकि आप देखने में भारतीय नहीं लगती हैं। उसने कहा,
‘ऐसी बात नहीं है। एक बार मैंने साड़ी पहनी थी। लोग मुझे कश्मीरी समझ गये थे। लेकिन जब मैं चलने लगी तब वह समझ गये कि मैं भारतीय नहीं हूँ क्योंकि मुझे साड़ी पहनकर चलना नहीं आता है। मैं लम्बे-लम्बे कदम रख रही थी जब कि भारतीय महिलाएं साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।‘
उसके पति ने मुझे बताया कि वह एक एरिक्सन कम्पनी में इंजीनियर थे। अब वे अवकाश प्राप्त हो गये हैं। उन्हें भारत से प्रेम हैं इसलिए वे हर साल यहां आते है। मैं, उनसे जीएसएम, सीडीएमए तकनीक और मोबाइल फोन के बारे में के बारे में बात करने लगा। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी ने अपने हाथों की हथेली को अजीब तरह से खोलना और बंद करना शुरू कर दिया मेरी समझ में नही आया कि वह ऐसा क्यों कर रही हैं। लेकिन, उसे देखकर उनके पति चुप हो गये। महिला ने बताया कि,
‘हम लोग एक मस्ती के लिए भारत आये हैं इस समय कोई व्यापार या काम की बात नहीं की जा सकती है। जब मेरे पति व्यापार या काम सम्बन्धी बातें करना शुरू कर देते है तो मै उनको इस तरह से इशारा से मना करती हूं। जब इसके बाद भी वह नहीं मानते तब मैं उन्हें पैर से ठोकर देती हूं। तब उनके समझ में आ जाता है कि इस तरह की बाते नहीं करनी है।‘
उनके पति ने इसका प्रतिवाद किया,
‘मैं कोई भी व्यापार या काम की बात नहीं कर रहा था हम तो केवल तकनीक के बारे में सूचना साझा कर रहे थे।‘
लेकिन उन्होनें इस विषय पर बात करना बंद कर दिया। महिला सशक्तिकरण का एक रूप यह भी है।
चलिये देखते हैं ऑस्ट्रेलियायी महिलाओं का महिला सशक्तिकरण।
पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं
नाव पर मेरी मुलाकात,आस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं से भी हुई। हम लोग कुमाराकॉम से त्रिवेन्द्रम जाने वाले थे जब कि वे लोग त्रिवेन्द्रम से आ रही थीं और इसके बाद कोचीन जाने वाली थीं। वहां से वे ऊटी जा रही थीं।
शाम को गर्मी और उमस थी। मैं नेकर पहने था। उस महिला ने कहा कि वह भी नेकर पहनना चाहती थी पर उनसे बताया गया था कि वे भारत में ऐसे कपड़े न पहने। मैंने बताया,
‘भारत में पुरूष लोग नेकर पहन लेते हैं पर महिलाएं नहीं। हांलाकि इस होटल में नेकर पहन कर या नहाने की ड्रेस पहन कर घूमने में कोई एतराज़ नहीं करेगा।‘
उसने कहा,
‘तब तो मैं भी कल नेकर ही पहनूगी।‘
यह दोनो महिलाएं निरोषध चिकित्सक (Physiotherapist) थीं। उनके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में इस पेशे में पैसा बहुत कम है शायद आने वाले समय में इसमें पैसा मिले।
इन दोनों ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं के पति साथ में नहीं थे न ही उनके बच्चे साथ थे। मैंने पूछा, कि क्या आपके पति ऑस्ट्रेलिया में बच्चों की देखभाल करने के लिए रूक गये हैं। उसने कहा, नहीं। हमारे बच्चे बहुत बड़े हो गये हैं। उनकी शादी भी हो गयी है। वे लोग अलग रहते है। उसके बाद बताया,
‘हमने कई बिल्लियां पाल रखी हैं। हमारे पति ऑस्ट्रेलिया में रहकर बिल्लियों की देखभाल कर रहे हैं और हम दोनों भारत में मस्ती मारने आयें हुए हैं।‘
यह भी महिला सशक्तिकरण का एक अलग रूप है। पति ऑस्ट्रेलिया में बिल्लियां देखें और पत्नियां भारत घूमे।
रात्रि भोज पर, मेरी मुलाकात फिर से इन महिलाओं से हुयी। शाम को नाव की सैर करते समय वे नेकर तो नहीं पहने थी पर अनौपचारिक परिधान पहने थीं। रात के भोजन पर वे एकदम औपचारिक परिधान पहन कर आयीं थीं। मैंने उनकी तारीफ की वे बोली,‘रात्रि का भोजन तो खास होता है। इसलिए ये खास परिधान।‘
रात्रि भोज पर कुछ युवतियां केरल के पारम्परिक नृत्य कर रही थी। केरल में, परम्परागत परिधान में सफेद या हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी जाती है। जिसमें सुनहरा किनारा होता है। वे इसी तरह की साड़ी पहने थीं। नृत्य के पहले वे मलयालम में उस नृत्य के बारे में बताती थी। यह हमारे या वहां पर भोजन कर रहे किसी के समझ में नहीं आ रहा था। मैं इनकी मुख्य नृतकी के पास गया और उससे कहा कि वह अंग्रेजी में हमें इसके बारे में बताये ताकि हम उसे ठीक से समझ सके। अगले नृत्य के पहले उसने ऎसा ही किया पर उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं थी । मै इतना ही समझ पाया कि वह नृत्य शिव वंदना से जुड़ा है।
कुमाराकॉम पक्षीशाला में
कुमाराकॉम में, एक पक्षीशाला है। हम लोग, सुबह वहां गये थे। पक्षीशाला लगभग १०० एकड़ में है इसमें ४० एकड़ की झील है। यही हमें वहां बताया गया था हांलाकि विकिपीडिया में इस पक्षीशाला का क्षेत्रफल कम लिखा है।
झील में, हमने नाव से यात्रा की। यह नाव मोटर-बोट नहीं थी । इसे लोग डंडो की सहायता से चला रहे थे।
पक्षीशाला में सुबह के समय घूमना बेहद सुखद था। दृश्य भी सुन्दर था और मौसम भी।
यहां पर हमें कई तरह के पक्षी देखने को मिले। हमारे साथ हमारा गाइड भी था वह हमें उनके नाम बता रहा था। हमने वहां इतने पक्षी देखे कि मुझे सबका नाम याद नहीं रहा पर जिनके नाम याद है वे हैं
मुझे इनके हिन्दी में नाम नहीं मालुम हैं इसलिये नहीं लिख पा रहा हूं। लेकिन कुछ के चित्र आप इस चिट्ठी पर देख सकते हैं। 
इस चिट्ठी के चित्र में, विदेशी महिला जिस तरह की नाव में सैर कर रही है हम भी उसी तरह की नाव में गये थे।
यहां-वहां एक जगह कुछ लोग झील के अन्दर से मिट्टी निकाल रहे थे। मुझे यह कुछ अजीब लगा। मेरे पूछने पर गाइड ने बताया कि यह अन्दर से सिल्ट (silt) निकाल रहे हैं। यह खेती के लिए उपयोगी होती है। यह लोग इसे किसानों को बेचकर अपनी जीविका चलाते हैं।
क्या खांयेगे – बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट
कुमाराकॉम से त्रिवेन्द्रम के लिये हम लोग टैक्सी से निकले। रास्ते में हरि पार्क नामक जगह आयी। मैंने प्रवीण से कहा कि हम लोग कहीं पर रुककर कॉफी पायेंगे और बाथरूम का प्रयोग करना चाहेंगे। वह हम लोगों को इन्डियन कॉफी हाउस ले गया।
कॉफी हाउस को कोऑपरेटिव सोसायटी चलाती हैं। इनका हेड ऑफिस त्रिशूल में है। इस कॉफी ऑफिस की दीवारों में, कुछ बड़े अक्षरों में उनके मीनू लिखे हुए थे। उस मीनू में प्रमुख था बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट और बीफ कटलेट। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि किसी भी रेंस्ट्रा में इतनी आसानी से बीफ मिल सकता है। मेरे कस्बे में तो बीफ इस तरह से नहीं बिक सकता। शायद लोग बुरा मान जाएँ। मुझे आश्चर्य लगा कि बीफ इतने खुले तरीके से बिक रहा है। प्रवीण ने बताया,
‘यहाँ पर हिन्दू भी बीफ खाते है। इसलिये यह सब जगह मिल जाता है। यह केवल केरल में ही है और दक्षिण के किसी अन्य प्रान्त में ऐसा नही है। यहाँ पर जो अलग दूसरे प्रान्त के हिन्दू लोग आकर रहते हैं वे भी बीफ नहीं खाते हैं।’
‘मैं चालीस कटलेट के लिए, एक किलो बीफ का प्रयोग करता हूं।‘
यह अनुपात शायद बहुत कम है। इसलिये इसका स्वाद पता नहीं चल पाया।
हम कटलेट खा कर आगे चले पर वहां जैम, अरे मेरे मतलब ट्रैफिक जैम इंतजार कर रहा था। यह पोंगल त्योहार के कारण था।
आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया
त्रिवेन्द्रम पहुंचते-पहुंचते यह त्योहार समाप्त हो रहा था और सब महिलाएं वापस जा रहीं थी। लौटकर जाने वाली हर कार, प्रत्येक बस, में केवल महिलाएँ थीं। वे केरल की पारंपरिक साड़ी जो सफेद या हल्के पीले रंग की होती है, पहने थी। इनमें सुनहरा बार्डर था। वे लाल कथई रंग का ब्लाउज पहने हुई थीं। हम लोग इनके ट्रैफिक जैम में फंस गये। हम त्रिवेन्द्रम में अपने होटेल में शाम को साढ़े पाँच बजे ही पहुंचे पाये।

हम लोगों ने अगले दिन अखबार में पढ़ा कि लाखों महिलाओं ने इस त्योहार में आट्टूकल भगवती मंदिर में पोंगाला चढ़ाया। इन महिलाओं में २००८ मिस वर्ल्ड की रनर्स् अप पार्वती ओमनकुट्टन भी थीं।

कुछ समय पहले, लोगों ने एक दिन यह कहना शुरू किया कि गणेश जी की मूर्ति दूध पी रही है। यह वास्तव में पृष्ट तनाव (surface tension) के कारण हो रहा था। कई लोग विज्ञान की बारीकी नहीं समझ पाते थे। उन्हें, मैं यह कह कर समझाता था कि जिस देश के करोड़ों बच्चों को एक बूंद दूध न मिले, वहां के भगवान इतना दूध क्यों और कैसे पी सकते हैं। कुछ ने समझा, पर बहुतों ने नहीं।
बहुत से उत्सवों और त्योहारों के दौरान, नदी या समुद्र में विसर्जन किया जाता है। मेरे विचार से उत्सवों और त्योहारों में इस तरह की परम्परा का कोई औचित्य नहीं है। यह प्रदूषण फैलाता है। हमें बदलना चाहिये।
त्रिवेन्दम में, हमें के.टी.डी.सी. के होटल समुद्र में ठहरना था। वहाँ वहां पर उदय समुद्र होटल भी है। मैंने अपने एक मित्र से बात की थी कि हम कहां रुके। उसका कहना था,
‘समुद्र, के.टी.डी.सी. का चार स्टार होटल है। यहां से समुद्र का दृश्य बहुत सुन्दर दिखायी पड़ता है। उदय समुद्र, तीन स्टार का होटल है। तुम्हे, समुद्र में ही रूकना चाहिए।‘
प्रवीण का कहना था,
‘यह सच है कि उदय समुद्र तीन स्टार होटल है। लेकिन, इस समय वह पाँच स्टार होटल की सुविधाऐं दे रहा है और हमें उदय समुद्र में ही रूकना चाहिए था क्योंकि वहाँ की सर्विस ज्यादा अच्छी है।‘
समुद्र होटल पहुंचते ही हम लोगों को प्राइवेट और सरकारी होटल का अन्तर समझ में आ गया।
समुद्र होटल से दृश्य बहुत सुन्दर था पर वहाँ की सर्विस अच्छी नहीं थी। इसके पहले दो जगह हम लोग ताज ग्रुप के होटल में रुके थे। वहाँ पर युवक और युवतियाँ थी। वे जब भी हमसे मिलते थे, हमेशा गुड-मॉर्निंग, गुड-आफटर-नून, या गुड-इवनिंग कहते थे, हमेशा मुस्कुराते रहते थे। होटल समुद्र पर सारा काम सरकारी था। वहां के लोगों में मुस्कुराहट नहीं थी। उनका चेहरा उदासी से भरा हुआ था। उनमें कोई जोश भी नहीं लगता था। हम, जिस कमरे में ठहरे हुए थे वह कमरा भी ताज के होटल के कमरों से कुछ छोटा था। इसके बाथरूम का फलश और सिंक टूटा था। पानी भी अच्छी तरीके से नहीं आ रहा था। यहां पर उस तरीके से भी सुविधाऐं नहीं थी जैसा कि ताज के होटलों में थी। हमें लगा कि आगे से सरकारी होटल की जगह, प्राइवेट होटल में रूकना ज्यादा अच्छा है।
भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न कि निजी
हम लोगों ने यह सोचा कि पूरे तट का एक नज़ारा ले लिया जाए। हम लोग जब एक तरफ आगे जाने लगे तो एक जगह, एक गार्ड, हम लोगों को जाने से रोकने लगा। वहां पर कोई प्राइवेट होटल था। वह उसी का गार्ड था। उसने हमसे कहा,
‘यह समुद्र तट का हिस्सा केवल उसके होटल के अतिथि के लिए है सबके लिए नहीं आप लोग नहीं जा सकते हैं।‘
मैंने उससे रौबीली आवाज़ में कहा,
‘भारत में कोई भी समुद्र तट प्राइवेट नहीं है। सारे समुद्र तट सरकारी और सार्वजनिक है। हां कुछ सुरक्षा की दृष्टि से कुछ तट सार्वजनिक तौर पर नहीं खुले है। तुम हमें यहां घूमने से नहीं रोक सकते हो।
हाँ यह बात अलग है कि हम लोग कोई अश्लील तरीके का कपड़ा पहने या कोई अश्लील काम को करें, तो रोक सकते हो। लेकिन हम लोग न अश्लील कपड़े पहने हुए हैं और न ही अश्लील हरकत कर रहे है। इसलिए हमें रोकना एकदम गलत है। तुम अपने मैनेजर को बुलाकर लाओ या फिर मुझे उसके पास ले चलो। मैं उसे समझा देता हूं।’
इतना सुनने के बाद वह थोड़ा सा घबरा सा गया। उसने कहा अच्छा-अच्छा आप लोग आगे जा सकते है। हम लोग आगे तक घूमने गये। वहां घूमते हुऐ उसकी बात समझ में आयी।
उस होटल में बहुत सारे विदेशी पर्यटक भी थे। यह लोग भारतियों से बहुत कम कपड़े पहने हुए थे और धूप का आनन्द ले रहे थे या नहा रहे थे। सारे भारतीय उन्हीं की तरफ देख रहे थे। भारत के पुरूष भी जो नहा रहे थे वह भी ठीक तरह के कपड़े पहनकर नही नहा रहे थे। मुझे ही देखने में अजीब लग रहा था तो विदेशियों को देखने में अजीब लगेगा ही। किसी को भी यह हरकत परेशान करेगी। इसीलिए वह मना कर रहा था।
हम लोग दो साल पहले गोवा गये थे वहां पर ‘सिटा दे गोवा’ नामक होटल में ठहरे थे। यह बहुत सुन्दर होटल है पर इसने अपनी इमारत इस तरह से बना ली है कि इसके सामने का समुद्र तट इन्हीं का हो गया है। इस इमारत को भी उन्होंने गैर कानूनी तौर से बनाया है। इस बारे में वहां एक लोकहित याचिका हुई। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इमारत तोड़ने का आदेश हो गया पर गोवा सरकार ने इसे बचाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है। इसलिए आजकल वहां बवाल मचा है। इस विषय पर अधिक जानकारी आप डाउन टू अर्थ नामक पत्रिका के लेख में पढ़ सकते हैं। डाउन टू अर्थ एक अच्छी पत्रिका है। मैंने इसके और पर्यावरण पर कुछ अन्य पत्रिकाओं के बारे में यहां लिखा है।समुद्र तट पर घूमते हुए वहाँ पर कुछ लोगों ने मुझसे पूछा क्या नाव पर घूमना पसन्द करूंगा। मैंने कहा,
‘इस समय तो कुछ अंधेरा हो रहा है इसलिए आज तो नहीं पर कल घूमना पसन्द करूंगा। लेकिन, इसके लिये आपको कितने पैसे देने होंगे।’
मेरा इतना ही कहना था कि शुभा मुझसे कहने लगी,
‘तुम नाव पर नहीं जाओगे। यदि तुम्हें नाव पर घूमने के लिए जाना है तो तुम अकेले आया करो या फिर मुझे अपने साथ न लाया करो।’
इतने में उस व्यक्ति ने जवाब दिया,
‘नाव में एक बार घूमने पर चार सौ पचास रूपये लगेगा और कल सुबह साढ़े नौ बजे से सैर करना शुरू होगा।’
हम जब वहां से चलने लगे, तब शुभा ने फिर से कहा,
‘चाहे जो भी हो जाए, लेकिन, तुम नाव पर घूमने नहीं जाओगे।’
मैंने उसका मन रखने के लिए कहा,
‘मैं तो उससे केवल पैसा पूछ रहा था, मैं घूमने नहीं जा रहा हूं।’
मैंने सोचा कि अगले दिन अकेले आऊँगा और चुपके से बिना बताये घूमने चला जाऊँगा लेकिन यह हो न सका। हम उसके बाद बहुत व्यस्त रहे।
रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी
त्रिवेन्दम में हम केटीडीसी के समुद्र होटेल में ठहरे थे। शाम को समुद्र तट पर घूमते हुऐ, एक चट्टान दिखायी पड़ी। हम लोग जाकर उसी पर बैठ गये। समुद्र में ऊंची लहरे उठ रहीं थी। इसलिये वहां पर कोई नहीं नहा रहा था। कुछ समय बाद, हम लोगों ने देखा कि एक विदेशी महिला आयी और समुद्र के अन्दर अकेली ही तैरती हुई चली गयी। इस कारण वह मुझे वह हिम्मती लगी। मैंने ताली बजाकर और हाथ हिला कर, उसका अभिवादन किया और उसकी हिम्मत की दाद दी।
अंधेरा होते ही हम लोग होटल में आ गये। हम लोगों ने सुबह से दिन का खाना नही खाया था इसलिए भूख भी जोरों से लग रही थी। हम लोग स्वागत कक्ष पर, यह पूछने के लिये गये कि रात का खाना खाने कहां जाना है। हम जल्दी खाना खाकर सोना चाहते थे क्योंकि अगले दिन सुबह कन्याकुमारी जाना था।
स्वागत कक्ष में एक जगह बेचने की मशीन लगी थी। वहां पर काजू वगैरह मिल रहे थे। मशीन में पैसा डालने पर वह पैकेट बाहर कर देती थी। मैं स्वागत कक्ष पर बैठी महिला से बात करने लगा। शुभा उस मशीन को देखने लगी। इतने में समुद्र तट पर अकेले नहाने नहाने वाली युवती आयी। वह इटैलियन थी। उसने अपना नाम सिलविया बताया। उसके पास काजू का का पैकेट था। उसने मुन्ने की मां से पूछा कि क्या वह काजू खरीदना चाहती हैं। शुभा ने कहा,
‘नहीं इसमे बहुत कैलरी होती है। मैं तो केवल देख रही थी कि यहां क्या मिल रहा है।’
सिलविया ने कहा फिर भी वह उसे कुछ काजू खाने के लिए देगी। हमने, उसके दिये काजू खाये। सिलविया पैरों में सुन्दर सुनहरे पायल पहने हुयी थी मैंने इसकी तारीफ की तो उसने कहा,
‘यह असली सोने के नही हैं पर बनावटी हैं। मैंने इसे स्पेन में खरीदा था।’
सिलविया अगली रात हमें पुन: खाने में मिली पर वह केवल एक पैर में पायल पहने थी। मैने पूछा कि वह एक पायल क्यों पहने है। उसने वह पैर दिखाते हुए कहा,
‘सुबह जब मै समुद्र में नहा रही थी तब लहरें मेरे एक पैर का पायल ले गयीं।’
रात के खाने पर वह मुझे कुछ गुस्से में लगी। मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसका कहना था कि वेटर उसके पेपर नैपकिन के प्रयोग करने पर आपत्ति कर रहा है। उस दिन रात के खाने में स्वादिष्ट फ्राइड फिश बनी थी पर उसमें तेल ज्यादा था। सिलविया पेपर नैपकिन में उसे सुखा कर, खा रही थी इस कारण उसने कुछ अधिक पेपर नैपकिन इस्तेमाल कर लिये। वेटर इसी पर आपत्ति कर रहा था। मुझे लगा कि वह, कितने भी पेपर नैपकिन प्रयोग करे आपत्ति नहीं करनी चाहिये। मैंने वेटर को अलग बुला कर बात की। उसने कहा,’यह युवती आज पहली बार यहां खाने आयी है और लगभग २०० पेपर नैपकीन प्रयोग कर चुकी है।’
मैंने उसकी मुश्किल बतायी तो वेटर ने कहा,
‘यदि उसने हमें बताया होता तो उसके लिए कम तेल वाली मछली बनवा देते पर २०० नैपकीन का दाम २०० रूपये से भी ज्यादा है जो कि रात के खाने से ज्यादा है।’
मैंने उससे कहा कि विदेशी है और युवती गुस्से में है। तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हे उसके सामने डाटूंगा। तुम माफ़ी मांग लेना बात इसी तरह समाप्त हो जायेगी। तुम उसके लिए कम तेल की मछली बनवा दो।
मैंने वेटर को सिलविया के सामने डांट दिया उसका गुस्सा शांत हो गया।
अगले दिन वेटर मुझे पुन: मिला और कहने लगा कि उस युवती ने आज नाश्ता नही किया है उसका पेट खराब हो गया है कल उसने ज्यादा मछली खा ली थी।
मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके
एक दिन हम लोग त्रिवेन्द्रम से कन्याकुमारी के लिये चले। कन्याकुमारी पहुंचने में लगभग ढाई घन्टे का समय लगता है। कहा जाता है कि बाणासुर नामक दैत्यों का राजा था उसने ब्रह्मा जी की पूजा कर उनसे अमृत देने का वर मांगा। ब्रह्माजी ने कहा,
‘अमृत तो नहीं मिल सकता है पर जिस तरह से तुम अपनी मृत्यु चाहते हो वह मांग सकते हो।‘
इस पर उसने कुमारी कन्या से ही मृत्यु मांगी। वह सोचता था कि कोई भी कुमारी कन्या उसे नहीं मार सकती है।
इसके पश्चात बाणासुर, देवताओं को तंग करने लगा। तंग होकर, देवताओं ने भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी से सहायता की गुहार लगायी। उन्होंने उन्हें पराशक्ति, जो कि देवी पार्वती का ही एक रूप हैं, की पूजा करने को कहा। ब्रह्मा जी के वर के कारण वे ही बाणासुर से मुक्ति दिला सकती थीं। देवताओं की पूजा से प्रसन्न हो कर, देवी पराशक्ति ने, बाणासुर को मारने का वायदा किया। उन्होंने कुमारी कन्या के रूप में जन्म लिया।
पराशक्ति हमेशा शिव जी के साथ ही रहना चाहती हैं। इसलिये समुद्र में एक चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर, उन्होंने शिव जी की पूजा की। शिव जी ने उससे प्रसन्न होकर वर मांगने का कहा। उन्होंने शिवजी को वर के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। शिव जी ने उन्हे इसका वायदा कर दिया लेकिन देवता यह नहीं चाहते थे। क्योंकि, यदि वह शादी कर लेती तो वे कुमारी नहीं रहती और तब बाणासुर का वध नहीं हो पाता। देवताओं ने, नारद जी को अपनी दुविधा बतायी। नारद जी ने शिवजी से कहा,
‘भगवन आपकी शादी का शुभ मुहूर्त सुबह के पहले है। इसलिए वह सुबह के पहले ही शादी करें।‘
शिवजी अपनी बारात लेकर सुचीन्द्रम नामक जगह पर रूके। सुबह के पूर्व उनके बारात लेकर शादी के लिए निकलने के पहले ही, नारद जी ने मुर्गे का रूप धारण करके बांग देना शुरू कर दिया। जिससे उन्हें लगा कि सुबह हो गयी है और महूर्त नहीं रहा। इसलिए वे शादी के लिए नहीं गये।
कहा जाता है कि कुमारी कन्या की जब शादी नहीं हो पायी तो उसके सारे गहने और जेवरात रंग बिरंगे पत्थरों में बदल गये, जो कि इस समय भी कन्याकुमारी के समुद्र तट पाये जाते हैं।
बाणासुर को, कुमारी कन्या की सुंदरता के बारे में पता चला। उसने उनसे शादी करने की इच्छा प्रकट की जिसे, उन्होंने मना कर दिया। बाणासुर, उन्हें बलपूर्वक जीतकर उनसे शादी करनी चाही। इस पर दोनो के बीच युद्घ हुआ और बाणासुर मारा गया । इस तरह से उस अत्याचारी की मृत्यु हुयी। इसलिये इस जगह का नाम कन्याकुमारी पड़ा।
इस कहानी में मुझे कुछ संशय लगता है। जहां तक मुझे मालुम है बाणासुर बालि का पुत्र था और भगवान शिव का भक्त। उसने वर के रूप में ऐसे योद्दा से युद्ध करने की इच्छा प्रगट की थी जो उसे हरा सके। उसे भगवान कृष्ण ने पराजित किया। बाद में वह हिमालय में भगवान शिव की तपस्या करने चला गया। मुझे कन्याकुमारी में बाणासुर की कथा, महिसासुर और देवी दुर्गा कहानी का दूसरा रूप लगता है।

सुचीन्द्रम में, सुचीन्द्र मन्दिर है। यह शिव जी का मंदिर है हालांकि इसमें ब्रम्हा और विष्णु जी की भी मूर्ति है। यहां पर गणेश जी की पत्नी की भी मूर्ति है।
कहा जाता है जिस चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर कुमारी कन्या ने अपनी पूजा की, वहां पर उसका एक निशान बना हुआ है। स्वामी विवेकानंद उस निशान को देखने के लिए वहां गये जिससे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी चट्टान पर विवेकानंद रॉक मेमोरियल बना हुआ है। यह जगह देखने लायक है। कन्याकुमारी में, देवी कुमारी मन्दिर भी है।
आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया
कहा जाता है जिस चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर कुमारी कन्या ने अपनी पूजा की, वहां पर उसका एक निशान बना हुआ है। स्वामी विवेकानंद उस निशान को देखने के लिए वहां गये जिससे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी चट्टान पर विवेकानंद रॉक मेमोरियल बना हुआ है। यह जगह देखने लायक है।विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के बगल की चटटान पर एक बहुत ऊंची सी मूर्ती सन्त थिरूवलुवर की भी है इसे तमिलनाडू सरकार द्वारा बनवायी गयी है। विवेकानंद रॉक मेमोरियल देखने जाने के लिए स्टीमर से जाना पड़ता है। यह स्टीमर पहले आपको विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पर छोड़ता है। इसके बाद यह सन्त थिरूवलुवल की चट्टान पर छोड़ता है फिर वापस लाता है। यह चक्कर लगाता रहता है कोई चाहे तो वहां रूक कर उसके अगले चक्कर में चढ़े या बैठा रहे।
विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पहुंचते समय तक काफी धूप हो गयी थी। वहां हमे जूते उतारने पड़े। इस कारण वहां चलने में मुश्किल हुयी, पैर में छाले से पड़ने लगे। विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के बाद जब वह हमें सन्त थिरूवलुवर मूर्ति की चट्टान पर ले जाने लगा तो हम लोग वहां नहीं उतरे। क्योंकि यहां पर भी जूते उतारने थे। हमें लगा कि अब नंगे पैर न चल पायेंगे। हमने इस मूर्ति को दूर से ही देखा।गांधी जी की अस्थियां विसर्जित होने के लिए कन्या कुमारी इसलिये लाई गयीं थी क्योंकि वहां पर तीन समुद्रों, अरेबियन सागर, हिन्द महासागर, और बंगाल की खाड़ी-का संगम है। वहां जिस जगह पर उनका अस्थि कलश रखा गया था वहां पर गांधी मेमोरियल मंडपम बना है।
यह मंडपम जमीन से ८९ फिट ऊंचा है। यह इसलिए है क्योंकि महात्मा गांधी भी ८९ साल तक जीवित रहे।
इस मंडपम की खास बात यह है कि इसका दरवाजा मंदिर जैसा है। अंदर की ओर, यह एक मस्जिद की तरह बना हुआ है तथा ऊपर की तरफ, यह चर्च की स्टाइल में है। महात्मा गांधी सब धर्मो का समावेश चाहते थे। इसलिये इसे इस तरह का बनाया गया है कि उनके दर्शन को ठीक प्रकार से दिखा सके।
जहां पर मंडपम में, उनका अस्थि कलश रखा गया था वहां पर स्तंभ सा बना हुआ है। इसके ऊपर एक छेद है वह छेद इस तरह से बनाया गया कि दो अक्टूबर के दिन, १२ बजे सूरज की रोशनी उसी स्तम्भ पर गिरती है लेकिन किसी अन्य दिन सूरज की रोशनी अंदर नहीं आती है। बरसात का पानी भी, इस छेद से अंदर नहीं आ पाता है।गांधी मेमोरियल मंडपम देखते देखते दोपहर हो गयी, भोजन का समय हो रहा था। गर्मी भी बहुत बढ़ गयी थी और हम लोग थक गये थे। मैने प्रवीन से किसी साफ सुथरी शाकाहारी भोजन मिलने की जगह ले चलने को कहा। प्रवीन हमें एक गुजराती भोजनालय में ले गया।
भोजनालय में हमें लोग गुजराती समझ बैठे और गुजराती में बात करने लगे। मैंने उनसे माफी मांगी और कहा कि मुझे गुजराती नहीं आती है। उन्होंने आश्चर्य से पूछा,
‘क्या आप गुजराती नहीं हैं?’
मैंने कहा नहीं, यह तो आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया। इसके बाद हमने हिन्दी में बात की। मुझे इसी तरह का अनुभव, कश्मीर यात्रा के दौरान गुलमर्ग मे भी हुआ।
भोजनालय बहुत साफ था। वहां पर गुजराती तरह का भोजन मिल रहा था। ६० रू० में एक थाली और आप जितना चाहें उतना खा सकते थे। खाना भी बहुत स्वादिष्ट था।
उस दिन एक खास तरह की स्वीटडिश, पूरणपोली बनी थी जिसे लेने के लिए २० रू० और देने पड़ते थे। मैंने ये नाम कभी नहीं सुना था इसलिए सोचा कि इसे भी चख कर देखना चाहिए। संजय जी ने मुझे बताया,
‘यह एक प्रकार का “स्टफ्ड” पराठा है। भीगी चने की दाल को पीस कर सेका जाता है, कुछ कुछ हलवे जैसी प्रक्रिया होती है। फिर इस मीठे “पेस्ट” जिसे पूरण कहा जाता है, गेहूँ के गुंदे आटे की लोईयों में भर कर बेला जाता है फिर पराठे की तरह सेका जाता है। जो तैयार मीठा भरवाँ पराठा तैयार हुआ वह पुरणपोली कहलाता है। यह मुझे यह खास पसन्द नहीं है।’
मुझे तो यह खाने में मीठी लगी इसलिये इसे न खा सका।
कन्याकुमारी में देवी कुमारी का मंदिर, कामराज मेमोरियल कुमारी हाल आफ हिस्ट्री, लेडी ऑफ रैनसम (Lady of Ransom) भी देखने की जगहें हैं। खाना खाने के बाद, इसमें से कुछ जगह तो हमने देखी और कुछ जगह नहीं जा पाये और वापस त्रिवेन्द्रम आ गये।
आप, टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए
केरल में, तरह-तरह की आयुवेर्दिक मालिश होती है। मैं इसके पहले तीन बार केरल जा चुका हूं। लेकिन कभी भी मालिश नहीं करवायी थी। मुझे लगा कि इसका भी अनुभव लेना अच्छा रहेगा।
कन्या कुमारी से लौटते समय हमारा टैक्सी चालक प्रवीन हमें ऐसी जगह ले गया इसका नाम प्रकृति था। वहां पर पहुंचने पर हमारी मुलाकात एक विदेशी जोड़े से हुई। वे इसराइल से आये थे। मैंने उनसे जब मालिश के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हे इसमें बहुत आनन्द आया और हमें भी करवाना चाहिये।
मैंने टाइम पत्रिका मे पढ़ा था कि इस्रायल में सापों से मालिश होती है। मैंने उनसे पूछा,
‘क्या आपने कभी सापों से मालिश करवायी है?’
‘मुझे नहीं मालुम कि इस्रायल में कहीं पर सापों से मालिश होती है। आप मेरी बात मानिये, टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए।’
तेल मालिश करवाने में एक घण्टे का समय लगा और इसका उन्होंने छ: सौ रुपया लिया। मेरी मालिश करने वाले लड़के का नाम जैकब था। उसने बताया,
‘मैंने मालिश करने की ट्रेनिंग केरल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कॉलेज से ली है। इसमें बारहवीं पास करने के बाद, डेढ़ साल का कोर्स करना पड़ता है। उसी के बाद आप मालिश कर सकते हैं।’
उसने बताया कि उसने जयपुर और जालंधर मे भी काम किया है। मैंने पूछा कि क्या वहाँ भी केरल की तरह आयुर्वेदिक मालिश होती है। उसने कहा वहां, केरल के लोग ही आयुर्वेदिक मालिश करते हैं। वह वहां, कई महीनों रहा पर वह केरल का है इसलिये त्रिवेन्द्रम वापस आ गया है। यह जगह उसकी नहीं थी पर वह उस व्यक्ति के यहां वेतन पर काम करता था, जिसने सारी सुविधाऐं दे रखी थी।
वहां महिलाओं
के लिये भी मालिश करवाने की सुविधा थी। महिलाओं को मालिश करने के लिए कोई महिला ही रहती है। शुभा ने भी मालिश करवायी। लेकिन उसे मालिश करवाने के बाद, कुछ प्रतिक्रिया हो गयी। उसका बदन लाल हो गया और छाले पड़ गये। इससे मुझे लगा, कि शायद वहाँ पर हर व्यक्ति को मालिश करवाना ठीक नहीं है।
दूसरी बात यह भी लगी कि शायद और सफाई होती तो ठीक रहता। मालिश एक बेंच पर हो रही थी। इस पर एक चादर बिछा था। वह साफ नहीं था। मैंने जैकब से इसके बारे में कहा, तो उसने बताया कि उसने अभी चादर बदली है। लेकिन यह काम मेरे सामने नहीं हुआ था और यह शायद सच नहीं था।
मालिश शुरू करने से पहले जैकब ने मुझे अपने कपड़े उतारने के लिए कहा और एक छोटा सा कपड़ा नीचे व्यक्तिगत भाग पर बांधने के लिए दिया। जिसने मुझे बपचन में फैंटम की पढ़ी हुई कॉमिक्स में हबशियों की कपड़ों की याद आ गयी।
इस मालिश में उन्होनें काफी तेल डाला। जब मैं अपने कस्बे में कभी मालिश करवाता हूं तो उसमें इतना तेल नही पड़ता। हाँ यह बात जरूर है कि उनके मालिश करने का तरीका कुछ भिन्न था और उन्होंने पूरे बदन में तेल लगाया और बदन के हर भाग में मालिश की थी।
मुझे इस मालिश के लिये छ: सौ रूपया ज्यादा लगा यदि कोई मुझसे कहता कि तुम फिर वहाँ जाकर मालिश करा लो तो मैं उतना पैसा खर्च करना ठीक न समझता। हांलॉकि अगली बार केरल जाऊँ और मेरे पास समय हो और पैसे की चिन्ता न हो तो मै शायद इसे पुन: कराने की सोचूं।
पति, पत्नी के घर में रहते हैं
हम केरल घूमने, इसलिये गये थे क्योंकि मुझे त्रिवेन्द्रम में मुझे कुछ काम था। इस काम के लिये, मैंने यात्रा के आखरी दिन, दोपहर के भोजन के बाद, का समय रखा था। हमारे पास सुबह का समय था। हमने वह समय त्रिवेन्द्रम घूमने का प्रोग्राम बनाया। हम लोग सबसे पहले वहाँ के राजा के महल गये। वहां हमने एक गाइड लिया। उसने बताया,
‘केरल राज्य तीन राज्यों को मिलाकर बना है। इसकी स्थापना १९५६ में हुई थी। त्रिवेन्द्रम पहले त्रावणकोर राज्य (Travancore State) में था। यहाँ पर राजा का लड़का तो नहीं, पर उस की बहन का लड़का राजा बनता था।’
महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते हैं।
मेरे पूछने पर कि ऎसा क्यों होता था, तब उसका जवाब था,
’यह इसलिये होता था क्योंकि ट्रावनकोर राज्य मातृ प्रधान राज्य था। यदि परिवार में लड़की नहीं है तो लड़की गोद ले ली जाती थी।’
इसने मुझे शिलॉग में खसी लोगों की याद दिलायी। वह भी मातृ प्रधान समाज है। वहां पर पुरूष अपनी पत्नी का सर नाम रख लेतें हैं और उसी के घर रहने चले जाते हैं। गाइड के मुताबिक,
‘यहां पुरुष शादी के बाद महिलाओं का सर नेम तो नहीं रखते पर अधिकतर पति, पत्नियों के साथ उनके घर में रहते हैं और यह गलत नहीं समझा जाता है।’
हमारी तरफ तो ऎसे लोगों को घर जमाई कहा जाता है और अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है।
महल को देखते समय गाइड ने यह बताया,
‘इस महल को हजार आदमियों ने मिलकर चार साल में बनाया था। लेकिन राजा इसमे सात महीने ही रह पाये। क्योंकि उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद राजा के परिवार वालों ने इस महल को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि यह महल अपशकुन है। इसलिए उसके बाद इस महल में कोई नहीं रहा।’
राजा के महल के बगल में ही एक भगवान विष्णु का मंदिर है। इस मंदिर में कोई कोट, पैंट पहनकर नहीं जाया जा सकता है और महिलायें सलवार, कुर्ता पहनकर नहीं जा सकती हैं। इसे देखने जाने के लिए आपको ऊपर के कपड़े उतारने पड़ेगें और एक धोती पहनकर जाना होगा। महिलायें सलवार, कुर्ता के ऊपर धोती पहन सकती है।
शुभा मंदिर को भीतर से देखने नहीं गयी पर मुझे लगा कि इसे अन्दर से देखना चाहिए। फिर मुश्किल पड़ी धोती पहनने की। वहां पर धोती किराये पर भी मिल रही थी पर मैने वहीं पर एक केरल में पहनी जाने वाली शर्ट और धोती खरीदी। उसे ही पहन कर अन्दर गया।
मन्दिर, अन्दर से बहुत भव्य है। इसमें एक जगह सारी महिलायें भजन गा रही थीं। इसमें, भगवान विष्णु की, शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए मूर्ति है। इस मूर्ति को एक बार में नहीं देखा जा सकता है। इसके लिऐ कई दरवाजे हैं।
मैं इस मूर्ति के किसी भाग को नहीं देख पाया क्योंकि वहाँ पर भीड़ थी और मुझे लगा कि यदि में लाइन में खड़ा होऊँगा तो शायद सब समय यहीं पर चला जायेगा। मैंने महल में ही उस मूर्ति का
छोटा सा मॉडल देख लिया था। त्रिवेन्द्रम में एक ताराघर (Planetarium) और चिड़ियाघर (Zoo) भी है। मैं इन्हें भी देखना चाहता था।
मंदिर देखने के बाद, हम लोग ताराघर देखने गये। वहां पता चला कि केवल एक प्रदर्शन अंग्रेजी में है और बाकी सब मलयालम में हैं। अंग्रेजी का प्रदर्शन बारह बजे था लेकिन वह तभी चलेगा जब कि कम से कम चालीस व्यक्ति देखने के लिए आये। हम लोगों को लगा कि यहां इन्तजार करने से अच्छा है कि हम चिड़िया घर देख लें।
चिड़ियाघर में
तरह तरह के जानवर देखने को मिले। मैंने वहां पर जानवरों की तसवीर इस चिट्ठी में प्रकाशित की हैं। चिड़ियाघर में एक बात अजीब लगी। वहां पेड़ों पर बहुत से चमगादड़ लटके थे। हम लोग भोजने के समय वापस आ गये। मुझे अपना काम भी करना था।
साड़ी पहने मराठी महिला का चित्र, जो मुझे भेंट में मिला
मुझे काम के बाद, वहां के लोगों ने यादगार के रूप में राजा रवी वर्मा का एक चित्र यादगार के लिये भेंट किया। वे अप्रैल २९,१८४८ में जन्में त्रावणकोर राज्य के चित्रकार थे। उनकी मृत्यु अक्टूबर २, १९०६ में हो गयी।
रवी वर्मा, महाभारत एवं रामायण की घटनाओं और पारंपरिक परिधान साड़ी पहने भारतीय महिलाओं के सुन्दर चित्र बनाने के लिये जाने जाते हैं। उनके चित्र, भारतीय परम्परा और युरोपीय कला के एकीकरण के, सबसे अच्छे उदाहरण भी हैं। उन्हें १८७३ में वियाना चित्रकला प्रदर्शनी में प्रथम पुरुस्कार भी मिला। उनके अन्य चित्र आप यहां देख सकते हैं।
पसन्द करें – कौन सी मछली खायेंगे

त्रिवेन्दम में हम केटीडीसी के होटेल में ठहरे थे। इस होटल के सामने के समुद्र तट का नाम ‘समुद्र’ था। यह बहुत सुन्दर है पर हमारे टैक्सी चालक प्रवीन के अनुसार,
‘समुद्र तट बहुत जल्दी गहरा हो जाता है और बहुत लहरें आती हैं। इसमें यदि आप अच्छा तैरना नहीं जानते हैं तो नहीं नहा सकते हैं। कोवलम समुद्र तट में पानी जल्दी गहरा नहीं होता है। इसलिए इसमें आप बहुत दूर तक नहाने जा सकते हैं और यदि आपको बहुत अच्छा तैरना नहीं भी आता है तो भी आप नहा सकतें है। इसमें लहरें भी बहुत ऊँची- ऊँची नहीं आती हैं। इसलिये अधिकतर विदेशी कोवलम समुद्र तट पर जाते हैं। इसे अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट भी कहा जाता है। आपको वह तट भी देखना चाहिए।’
हम लोगों ने पहले सोचा था कि कन्याकुमारी से लौटते समय हम लोग कोवलम तट पर भी जायेगें। लेकिन लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। इसलिये वहां नहीं जा पाये।
त्रिवेन्डम में काम समाप्त करने के बाद, हम कोवलम समुद्र तट पर गये। हांलाकि, जब हम वहां पहुंचे तब सूरज डूब चुका था पर यह हमारा आखिरी दिन था। हमारे पास इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।
कोवलम अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट के बारे में, हम लोगों ने कई तरह की बाते सुन रखीं थी पर हमें वैसा कोई दृश्य देखने को नहीं मिला। शायद वहां पहुंचते सूर्यास्त हो चुका था और अन्धेरा शुरू हो गया था।
मेरे बेटे को शर्ट पसन्द है। उसका कहना है कि हम जहां जायें वहां से उसके लिये शर्ट ले आया करें। समुद्र तट पर बहुत सी दुकाने थीं जहां पर शर्ट मिल रही थीं। हम लोग एक दुकान पर गये वहां पर एक साधारण सी महिला बैठी थी पर जब हमने उससे बात शुरू की तब वह शुद्घ उच्चारण में अंग्रेजी बोलने लगी। यहां पर दुनिया भर से, विदेशी आते हैं इसलिये यहां के लोग कई भाषा सीख लेते हैं। मैंने कई दुकानदारों को अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच और स्पैनिश भाषा बोलते सुना।
कोवलम समुद्र तट के किनारे खाने की जगहें थी। हर खाने की जगह की टेबल से समुद्र दिखायी देता था। आप खाना भी खायें और समुद्र का आनन्द भी लें।
कोवलम तट का चक्कर लगाने के बाद हम वापस आ गये। हम खाना खा कर, जल्दी सो गये। हमें अगले दिन सुबह ही हवाई जहाज पकड़ना था। इसी के साथ केरल – ईश्वर की भूमि – यात्रा विवरण समाप्त होता है अब हम चलेंगे, देव भूमि हिमाचल की यात्रा पर।
सांकेतिक शब्द
। matriarchy, Trivandum, Thiruvananthapuram, Travancore, Raja Ravi Verma,
। massage, तंदुरुस्ती, स्वास्थ्य, health, society, Ayurved,
।seashore, beach, Trivandum,
।Kanyakumari, Suchindram,
। pongala, Attukal Bhagwati temple, Taj Garden Retreat, Beef, Pond Heron, Purple Heron, Stork billed Kingfisher, White breasted kingfisher, cormorant, Bronze winged Jacana, Terns, Openbill Stork, Darter (Snake bird), Bird sanctuary, Taj Garden Retreat, synagogue, Taj Malabar hotel,
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बहुत सुन्दर वर्णन. “उस दिन बहुत मात्रा में खीर बर्बाद हो जाती है” इस कथन से सहमत होने का मन नहीं कर रहा है. महिलायें दूर दूर के गावों से आती है और उस पूजा के बाद बने हुए खीर को प्रसाद के रूप में अपने अपने घर ले जातीं हैं जहाँ घर भर के लोग खाते हैं. तस्वीर में केवल पकवान सहित पत्तल दिख रहा है इसका मतलब यह नहीं की उन्हें discard किया गया हो. महिलायें अपने अपने भोग के पीछे खडी हैं जिनका चित्रांकन नहीं किया गया है.
सुब्रमणियन जी, यह बात किसी ने बतायी होती तब कुछ और बात थी। यह दृश्य मैंने स्वयं देखा है। हो सकता है कुछ महिलायें अपने गांव ले जाती हों। हो सकता है कि आपने जो चित्र खींचा हो उसमें पीछे महिलायाऐं खड़ी हों। लेकिन मैंने हज़ारों की संख्या में इस तरह के पत्ते फिके देखे। वहां पर कोई महिलायें नहीं थीं।
शायद इसके पहले, गणेश जी के दूध पीने वाले दिन पर भी दूध बरबाद होते देखा था। इसलिये वह भी लिखा है। यह बात बहुत दुख से लिखी गयी है।
मेरे विचार से आस्था का यह मतलब नहीं होना चाहिये। लेकिन अपने-अपने विचार हैं – भिन्नता तो होती है। आपके विचारों का स्वागत है। लेकिन आपको दुख लगा, इसलिये क्षमा प्रार्थी हूं – उन्मुक्त।
“यह बात किसी ने बतायी होती तब कुछ और बात थी” आपने बताया होता तो साथ हो लेते.