क्या भूलूं क्या याद करूं

May 11, 2008

अमिताभ बच्चन के पिता, मधुशाला के लेखक - हरिवंश राय बच्चन का जन्म २७ नवम्बर २००७ पर इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होने अपनी अधिकतर पढ़ायी इलाहाबाद में की और यहीं पर नौकरी भी की। १९५५ में, जवाहर लाल नहरू, इन्हें दिल्ली ले गये। वे राज्य सभा के सदस्य रहे। १९६९ में उन्हें साहित्य आकदमी का पुरुस्कार मिला। वे पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान, और यश भारती सम्मान से भी नवाज़े गये। उनकी मृत्यु १८ जनवरी २००३ में हो गयी।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। इस चिट्ठी में उनकी आत्मकथा के पहले भाग क्या भूलूं क्या याद करूं की समीक्षा है।

बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माना जाता है। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,

‘कायस्थ के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,

‘मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है - इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? - यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! - मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।’

इलाहाबाद विश्वविद्याल जहां बच्चन जी अपने जीवन के सबसे सृजनात्मक साल गुजारे

बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे यहां तो टौमी है। टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये - बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। कुत्तों के बारे में बच्चन जी के विचार यह हैं,

‘देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।’

यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें इलाहाबाद के मुहल्लों, शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो अच्छा रहता। यह इसको नीरस बनाता है।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

  • क्या भूलूं क्या याद करूं;
  • नीड़ का निर्माण;
  • बसेरे से दूर;
  • दशद्वार से सोपान तक।

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन - विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

अमिताभ बच्चन मधुशाला का पाठ करते हुऐ


रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन

August 1, 2006

मैं और फाइनमेन का संसार

बीसवीं शताब्दी के पहले भाग के सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आईनस्टाइन थे और रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन (फाइनमेन) बीसवी शताब्दी के अन्तिम भाग के। वे १९६६ मे नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित हुए। बीसवीं शताब्दी के बीच मे अच्छे विश्वविद्यालयों मे भौतिक शास्त्र को पढ़ाये जाने के तरीके पर विवाद चल रहा था।

 

  • क्या भौतिक शास्त्र मे उसी तरह से उन्ही विषयों के साथ पढ़ाया जाय जैसे अभी तक पढ़ाया जा रहा था; या
  • फिर नये तरह से नये विषयों के साथ पढ़ाया जाय।

इस विवाद को फाइनमेन जैसा ही व्यक्ति अन्जाम दे सकता था। उनका रुतबा सब मानते थे। उनका सम्मान इसलिये नहीं था कि वह कैल टेक मे थे पर कैल टेक दुनिया का सबसे अचछा भौतिक शास्त्र का विश्वविद्यालय इसलिये माना जाता था क्योंकि फाइनमेन वहां थे फाइनमेन ने १९६१-६३ मे कैल-टेक मे स्नातक के विद्यार्थियों को भौतिक शास्त्र पढ़ाया - कितने भाग्यशाली थे वह विद्यार्थी। इतिहास गवाह है कि आज तक इतने बड़े वैज्ञानिक ने कभी स्नातक के विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया। इन तीन साल ने भौतिक शास्त्र को पढ़ाने की नयी दिशा दी और भौतिक शास्त्र नयी तरह से नये विषयों के साथ पढ़ाया जाने लगा। इन लेक्चरों को तीन किताबों ने बदला गया। यह लाल बाईंडिंग मे थीं और ‘Lectures on Physics by Richard P Feynman के नाम से मशहूर हुईं। यदि आप भौतिक शस्त्र में महआरत हासिल करने की सोचते हैं तो इन किताबों को पढ़ना आवश्यक है।

गणित और भौतिक शास्त्र हमेशा से मेरे प्रिय विषय थे। मैने स्कूली जीवन, हवाई-जहाज के मौडल, ट्रांजिस्टर, तथा अन्य मौडल बनाते गुजारा। १९६० के दशक मे १२वीं पास कर जब स्नातक की कक्षा मे कदम रखा तो हमे भौतिक शास्त्र इन्ही लाल बाईंडिंग की ‘Lectures on Physics by Richard P Feynman’ की किताबों से पढ़ाया जाना शुरू किया गया। उस समय अपने देश मे शायद यह किताब और कहीं नहीं चलती थी। तब से हम सब, न केवल कैल-टेक जाने की सोचने लगे, पर फाईनमेन के साथ काम करने का भी सपना संजोने लगे। मै तो फाईल पलटने वाला बन गया पर मेरे कुछ मित्र न केवल कैल-टेक गये पर उन्होने फाइनमेन के साथ काम भी किया।

फाईनमेन का बचपन

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन, का जन्म ११ मई १९१८ में हुआ था और मृत्यु १९८८ में कैंसर से हो गयी। छुटपन में फाइनमेन अक्सर सोचा करते थे कि वह बडे होकर क्या बनें: विदूषक या वैज्ञानिक। बडे होकर उन्होंने इन दोनो भूमिकाओं को एक साथ बाखूबी निभाया। लोग कहते हैं कि वह इतने मशहूर क्यों हुये पर उनके बारे में वैज्ञानिक ठीक ही कहते हैं:

‘फाइनमेन तो ऐतिहासिक व्यक्ति हैं उनको जितना सम्मान मिला वे उस सब के अधिकारी हैं।’

फाइनमेन के पिता का बातों को बताने का अपना ही ढंग था। एक बार का किस्सा है कि पिता और पुत्र पार्क मे घूम रहे थे पिता ने एक चिड़िया की तरफ वह इशारा करके बताया कि यह चिड़िया दुनिया में अलग-अलग नामो से जानी जाती है। यह जरूरी नहीं है कि आप उन सब नामो को जाने, न ही महत्वपूर्ण है। पर महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या और कैसे करती है। वे बच्चे के मन मे जिज्ञासा जगाने की कोशिश करते थे यह बताने की जरूरत नहीं है कि फाइनमेन बचपन से जिज्ञासु तथा कुतुहली थे।

फाइनमेन के पिता को आजकल के टीवी के क्विज प्रोग्रामो जैसे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से तुलना करें कितना अन्तर पायेंगे। इस तरह के क्विज प्रोग्राम तो केवल यह बताते हैं कि कौन कितना रट सकता है। आज के क्विज प्रोग्रामो से यह पता नहीं चलता कि कौन कितना अच्छा सोच सकता है, किसमे कितना बूता है और कौन विज्ञान की दुनिया को बदलने की ताकत रखता है।

सोच कर रेडियो ठीक करना

फाइनमेन बचपन के दिनों में रेडियों ठीक किया करते थे। उस समय वाल्व रेडियो हुआ करते थे। उनके पड़ोसी का रेडियो में शुरू होने के थोड़ी देर बाद खरखराने लगता था। उसने फाइनमेन से रेडिये ठीक करने के लिये कहा। फाइनमेन रेडियो को छूने के बजाय वही बैठ कर सोचने लगे। उन्हे लगा कि गर्म होने पर बिजली का अवरोध बढ जाता है जिससे खरखराहट बढ जाती है और दो वाल्वों को एक दूसरे से बदलने में यह दूर हो सकती है। उसने ऐसे ही किया और खरखराहट बन्द हो गयी और तभी से कई लोग उन्हे उस लड़के की तरह से याद रखते हैं जो केवल सोच कर रेडियो ठीक किया करता था।

स्कूल में वह गणित में सबसे अच्छे और गणित टीम के हीरो थे। पर उन्होंने गणित को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि गणित मे उच्च शिक्षा प्राप्त करके वे दूसरों को गणित पढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। वह कुछ व्यवहारिक करने का सोच कर, पहले इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग की तरफ गये पर बाद में भौतिक शास्त्र की पढ़ाई की। शायद यही ठीक था। यह बीसवीं शताब्दी थी - भौतिक शास्त्रियों की शताब्दी। इस शताब्दी मे यदि कोई विज्ञान की दुनिया को बदलने का दम रखता था तो भौतिक शास्त्र ही उसका विषय था। यह उसी तरह से जैसे इक्कीसवीं शताब्दी जीव शास्त्रियों की शताब्दी है। चलिये हम वापस फाइनमेन पर चलें।

युवा फाइनमेन

फाइनमेन ने स्नातक की शिक्षा मैसाचुसेट इं‍स्टिट्यूट आफ टेक्नोलोजी से पूरी की। वह वहीं पर शोध कार्य करना चाहते थे पर फिर प्रिंक्सटन मे शोध कार्य करने के लिये चले गये। बाद में वे कहा करते थे,

‘यह ठीक ही था। मैने वहां जाना कि दुनिया बहुत बड़ी है और काम करने के लिये बहुत सी अच्छी जगहें हैं।’

व्हीलर और घड़ी

यहां पर युवा फाइनमेन को व्हीलर के साथ शोध करने का मौका मिला। उस समय तक व्हीलर को नोबेल पुरूस्कार तो नहीं मिला था पर वे वह काम कर चुके थे जिस पर उन्हे बाद मे नोबेल पुरूस्कार मिला। वे कुछ आडम्बर प्रिय थे कुछ अपनी अहमियत भी जताते थे। उन्होंने फाइनमेन को सप्ताह में एक दिन का कुछ निश्चित समय मिलने का दिया । पहले दिन मुलाकात के समय वह सूट पहने थे उन्होंने अपनी जेब से अपनी सोने की विराम घडी निकाल कर मेज पर रख दी ताकि फाइनमेन को पता चल सके कि कब उसका समय समाप्त हो गया है। फाइनमेन उस समय विद्यार्थी थे। उन्होंने एक बाजार से एक सस्ती विराम घड़ी खरीदी - उनके पास मंहगी घड़ी खरीदने के लिये पैसे नहीं थे। अगली मीटिंग पर उन्होंने अपनी सस्ती घड़ी उस सोने की घड़ी के पास रख दी। व्हीलर को भी पता चलना चाहिये कि उनका समय भी महत्वपूर्ण है। व्हीलर को मजाक समझ में आया और दोनो दिल खोल कर हंसे। दोनों ने घड़ियां हटा ली। उनका रिश्ता औपचारिक नहीं रहा, वे मित्र बन गये, उनकी बातें हंसी मजाक में बदल गयीं, और हंसी-मजाक नये मौलिक विचारों मे।

लॉस एलमॉस

इसी बीच दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। जर्मनी मे परमाणु बम बनाने का काम हो रहा था, यदि पहले वहां बन जाता तो हिटलर अजेय था। अमेरिका की लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी मे दुनिया के वैज्ञानिक इक्कठा होकर परमाणु बम बनाने के लिये एकजुट हो गये। फाइनमेन को भी वहां बुलाया गया और उन्होने वहां काम किया।

लॉस एलमॉस मे सुरक्षा का जिम्मा सेना का था जिनके अपने नियम अपने कानून थे। यह नियम फाइनमेन को अक्सर समझ मे नहीं आते थे। फाइनमेन ताले खोलने मे माहिर थे। वे सेना के अधिकारियों को तंग करने के लिये की लेबोरेटरी की तिजोरियों खोल कर उसमे कागज परguess whoलिख कर छोड़ देते थे पर तिजोरियों से कुछ निकालते नहीं थे। यह वह केवल, सेना के अधिकारियों को बताने के लिये करते थे कि उनकी सुरक्षा प्रणाली कितनी गलत है।

अरलीन

उनके जीवन का एक और दृष्टान्त - बिल्‍कुल असम्भव सा लगता है, मै तो हमेशा सोचता था कि यह सब कहानियों या पिक्चरों में होता है इस वास्तविक दुनियां में नहीं।

स्कूल के दिनों में फाइनमेन का अपनी सहपाठिनी अरलीन से प्रेम हो गया। उन्होने शादी तब करने की सोची जब फाइनमेन को कोई नौकरी मिल जाय। जब फाइनमेन शोध कार्य कर रहे थे तब अरलीन को टी.बी. हो गयी उसके पास केवल चन्द सालों का समय था। उन दिनों टी.बी. का कोई इलाज नहीं था। अरलीन को टी.बी. हो जाने के कारण, फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे। उन्हे मालुम था कि अरलीन के साथ उसके सम्बन्ध केवल अध्यात्मिक (Platonic) ही रहेगें। इन सब के बावजूद, फाइनमेन अरलीन से शादी करना चाहते थे। उनके परिवार वाले और मित्र इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे मे उनकी अपने पिता से अनबन भी हो गयी। इसके बावजूद फाइनमेन ने अरलीन के साथ शादी की।

फाइनमेन, जब लॉस एलमॉस में काम कर रहे थे तो वहां के निदेशक रौबर्ट ओपेन्हाईमर ने अरलीन को पास ही के सैनीटेरियम में भरती करवा दिया ताकि फाइनमेन उससे मिल सके| फाइनमेन के लॉस एलमॉस रहने के दौरान ही अरलीन की मृत्यु हो गयी। इस घटना चक्र पर एक पिक्चर भी बनी है जिसका नाम इंफिनिटी (Infinity) है इसे मैथयू बौरडविक (Malthew Bordevick) ने इसे निर्देशित किया है।

कौरनल विश्वविद्यालय

फाइनमेन जीवन्त थे और अक्सर मौज मस्ती के लिये काम करते थे। मौज मस्ती मे ही उन्होने उस विषय पर काम किया जिस पर उन्हे नोबेल पुरुस्कार मिला। यह भी एक रोचक किस्सा है।

दूसरे महायुद्ध के दौरान लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी में फाइनमेन की मित्रता बेथ से हुई जिनसे उनकी काफी पटती थी। बेथ कौरनल में थे, इसलिये फाइनमेन भी कौरनल चले गये। एक दिन वे कौरनल के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे 2:1 का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,

‘इसका कोई महत्व नहीं है मैं यह सब मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।’

पर वह इसके महत्व के बारे मे ठीक नहीं थे। वे जब एलेक्ट्रौन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कौरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी गणित फिर से याद आने लगी। इसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला। सच है जीवन में बहुत कुछ वह भी आवश्यक है जो केवल मौज मस्ती के लिये हो, चाहे उसका कोई और महत्व हो या न हो - मौज मस्ती ही अपने आप मे एक महत्व की बात है। यदि आप मौज मस्ती में ही अपनी जीविका ढ़ूढ सके तो क्या बात है, यदि यह नहीं हो सकता तो शायद जीविका में ही मौज मस्ती ढ़ूढ पाना दूसरी अच्छी बात है।

कैल-टेक

फाइनमेन न ही एक महान वैज्ञानिक थे पर एक महान अध्यापक भी थे। उन्हे मालुम था कि अपनी बात दूसरे तक कैसे पहुंचायी जाय। व्याख्यानशाला उनके लिये रंगशाला थी, जिसमें नाटक भी था और आतिशबाजी भी।

फाइनमेन के द्वारा भौतिक शास्त्र पर कैल-टेक के लेक्चरों का जिक्र मैने इस लेख को शुरूवात मे किया है। इन लेक्चरों को उन्होने सितम्बर 1961-मई 1963 मे दिया था। यह लेक्चर खास थे इसलिये इन्हें हमेशा के लिये सुरक्षित रखा गया और बाद मे ये तीन लाल किताबों के रूप में छापे गये। फाइनमेन सप्ताह में केवल दो लेक्चर देते थे बाकी समय वह इन लेक्चरों को तैयार करने में लगाते थे। लेक्चर की हर लाइन, हर मजाक को (जो वह लेक्चरों के दौरान करते थे) पहले से सोच विचार कर रखते थे। कभी भी उनके साथ लेक्चर के नोटस नहीं होते थे। बस केवल एक छोटा सा कागज रहता था जिसमें आगे बताने के लिये कुछ खास शब्द केवल संकेत देने के लिये रहते थे। यह तीन साल, संसार मे किसी भी विश्वविद्यालय के, किसी भी विषय पर के लेक्चरों मे अद्वितीय हैं। न कभी ऐसे हुये न शायद फिर कभी होंगे। क्योंकि मालुम नहीं कि फिर कभी ऐसा व्यक्ति आयेगा कि नहीं।

फाइनमेन के लिये अंग्रेजी - बेकार, और दर्शन शास्त्र - तिरस्कृत विषय था। Religion से उनका कोई वास्ता नहीं था। चक्करों पर बात करना उनकी फिज़ा में नहीं था। वह हमेशा सीधी बात करते थे। उनका मतलब वही होता था जो वे कहते थे। वे इस बात से भ्रमित हो जाते थे यदि उनकी सीधी बात दूसरे को परेशान कर देती थी।

चैलेंजर दुर्घटना जांच कमीशन

फाइनमेन को लोग अलग अलग तरह से याद रखते हैं - कुछ लोग,

  • उस लडके की तरह जो केवल सोच कर रेडियो ठीक करता था;
  • उस वैज्ञानिक की तरह से जो भौतिक शास्त्र की गणना टौपलेस रेस्तराँ में करना पसन्द करता था;
  • उस चंचल युवा के रूप में याद रखते हैं जो लौस एलमौस की लेबॉरेटरी के तिजोरियों को खोल कर अलग अलग तरह के नोट लिखे कागज को रख कर, सेना के अधिकारियों को तंग करता था;
  • उन्हें बोंगों बजाने वाले की तरह याद करते हैं।

सम्भवत: सबसे ज्यादा लोग उन्हें उस व्यक्तिि की तरह से याद करते हैं जिसने टीवी के सामने सार्वजनिक रूप से बताया कि चैलेंजर-दुर्घटना क्यों हुई।

28 जनवरी 1986 में चैलेंजर स्पेसशिप का विस्फोट आकाश में हो गया था, इसकी जांच करने के लिये एक कमीशन बैठा। फाइनमेन उसमें वैज्ञानिक की हैसियत से थे। यह विस्फोट, स्पेसशिप में कुछ घटिया किस्म का सामान लगाने के कारण हुआ था। नासा का प्रशासन (जिस पर सेना का जोर है) इसे दबाना चाहता था पर वैज्ञानिक इसे उजागर करना चाहते थे। कमीशन ने अपने निष्कर्ष को टीवी के सामने सीधे प्रसारण मे बताना शुरू किया (इसमें घटिया किस्म के सामान लगाने की बात स्पष्ट नहीं थी )। उस समय टीवी पर ही, सबके सामने फाइनमेन ने एकदम ठन्डे पानी के अन्दर घटिया सामान को डाल कर दिखाया कि वास्तव में विस्फोट क्यों हुआ था। यह सीधा प्रसारण था इसलिये फाइनमेन का प्रदर्शन रोका नहीं जा सका और यह दो मिनट की क्लिप कुछ घन्टो के अन्दर दुनिया की टीवी पर सबसे ज्यादा दिखायी जाने वाली न्यूस क्लिप बन गयी।

टौपलेस परिवेषिकायें

फाइनमेन पैसाडीना में अक्सर वहीं के एक रेस्तराँ मे जाते थे, जहां पर टौपलेस परिवेषिकायें ( Waitress) रहती थीं। उस रेस्तराँ में वे उसके मालिक को भौतिक शास्त्र बताते थे और वह उन्हे चित्रकारी। एक बार पुलिस वालों को लगा कि उस रेस्तराँ में कुछ गड़बड़- सड़बड़ होता है और रेस्तराँ के मालिक पर अश्लीलता का मुकदमा चलाया। वास्तव में वहां पर इस तरह का कोई कार्य नहीं होता था। उस रेस्तराँ में कई प्रतिष्ठित व्यक्ति आते थे रेस्तराँ के मालिक ने उन सबसे गवाही देने की प्रार्थना की| सबने चुप्पे से कन्नी काट ली, पर फाइनमेन ने नहीं। उन्होंने रेस्तराँ मालिक के पक्ष में गवाही दी और अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर सबसे मुख्य खबर के रूप में छपी।

‘Caltech’s Feynman tells lewd case jury, he watched the girls while doing his equations’

फाइनमेन की जीवन की घटनाओं के बारे में यदि कोई लिखने बैठे तो एक किताब भी पूरी न पड़े। शायद इसलिये फाइनमेन पर कई किताबें लिखी गयीं हैं।

  • Surely You’re Joking, Mr. Feynman! by Richard Feynman & Ralph Leighton;
  • What Do You Care What Other People Think? by Richard Feynman & Ralph Leighton;
  • Richard Feynman-A life in Science’ by John Gribbin & Mary Gribbin;
  • Tuva or Bust! by Ralph Leighton;
  • No Ordinary Genius: The Illustrated Richard Feynman; edited by Christopher Sykes;
  • Most of the Good stuff; edited by Laurie Brown & John Rigden;
  • Genius: Richard Feynman and Modern Physics by James Gleik;
  • The Beat of The Different Drum; by Jagdish Mehra.

यह सब पढ़ने यो‍ग्य हैं पर इनमें से यदि आप एक किताब पढना चाहें तो आप Richard Feynman-A life in Science’ by John Gribbin & Mary Gribbin पढ़ें।

उन्मुक्त
ईमेल: unmukt.s@gmail.com

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