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	<title>लेख &#187; दर्शन</title>
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	<description>उन्मुक्त पर हैं मेरी छुटपुट बातें, छुटपुट पर हैं औरों कि मुक्त बातें - यहां है मेरी पूरी बातें।</description>
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		<title>लेख &#187; दर्शन</title>
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		<title>हमने जानी है रिश्तों में रमती खुशबू</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/</link>
		<comments>http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 18 Apr 2009 09:35:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[Family]]></category>
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		<category><![CDATA[Life]]></category>
		<category><![CDATA[Relationship]]></category>

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		<description><![CDATA[This post is about relationship, about friendship, about happiness that they bring. 
yeh chittthi rishton ke baare mein hai, mitrataa ke baare mein hai, unse niklti khushboo ke baare mein hai.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=247&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:center;">
<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/relationship.html"><em><img class="alignright" title="Unmukt" src="http://bp2.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkV8q-B5kI/AAAAAAAAAE8/Nm9pcBjxl58/s200/Unmukt.jpg" alt="" width="80" height="200" /></em></a><em>यह चिट्ठी रिश्तों के बारे में है,  उनसे निकलती खुशबू, जीवन के भावात्मक पहलू दर्द, प्रेम, मित्रता के बारे में है। </em></p>
<p style="text-align:center;"><em>यह मेरे &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त</a>&#8216; चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुकी है। इसका कुछ भाग मेरी पत्नी ने अपने चिट्ठे &#8216;<a href="http://munnekimaa.blogspot.com/">मुन्ने के बापू</a>&#8216; पर लिखा है। उसके कहने पर, उन चिट्ठियों को भी यहां जोड़ रहा हूं।  यह लेख इन सारी कड़ियों को सम्पादित कर, प्रकाशित किया जा रहा हूं। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहते हैं तो नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।</em></p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/relationship.html"> भूमिका</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/percy-bysshe-shelley.html">सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण &#8211; दर्द की यादें हैं। sweetest songs are those that tell of saddest thought</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-has-no-conditions.html">कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-story.html">प्यार में अफसोस नहीं</a> ।।  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/roman-holiday.html">रोमन हॉलीडे &#8211;  पत्रकारिता</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/unending-love-rabindra-nath-tagore.html">अनन्त प्रेम</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/mother.html">अम्मां &#8211; बचपन की यादों में</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/everything-you-always-wanted-to-know.html">यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/father-emergency.html">करो वही, जिस पर विश्वास हो</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/father.html">जो करना है वह अपने बल बूते पर करो</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/mother-deathbed.html">अम्मां &#8211; अन्तिम समय पर</a>।। <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2008/04/i-love-you.html">मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी</a>।। <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2009/01/surprise-birthday-party-present.html">पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/07/love-is-faith-can-not-be-bound.html">प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर  रिशतों की दुहाई न दो</a>।। निष्कर्ष &#8211; <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/08/love-can-not-be-expressed-it-can-only.html">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो</a>।। पुनः लेख &#8211; <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2009/03/blog-post_23.html">जीना इसी का नाम है</a>।।</p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण &#8211; दर्द की यादें हैं<br />
</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;"> रिश्ते अक्सर दर्द दे जाते हैं। क्या इनमें दर्द ही होता है? क्या यही है रिश्तों में  रमती खुशबू? क्या यही है रिश्तों का अंजाम। क्या यही  है जीवन का निचोड़, या फिर कुछ और।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसमें शक नहीं कि  दर्द  और मिठास में अनोखा रिश्ता है और इसे सबसे अच्छी तरह से व्यक्त करती है यह पंक्ति,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Our sweetest songs are those that tell of saddest thought&#8217;</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमारे सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण वह हैं जो सबसे दर्द भरे हैं।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="size-full wp-image-277 alignright" title="percy_bysshe_shelley_by_curran_18191" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/percy_bysshe_shelley_by_curran_18191.jpg?w=107&#038;h=138" alt="percy_bysshe_shelley_by_curran_18191" width="107" height="138" />यह पंक्तियां अंग्रेजी कवि शेली (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Percy_Bysshe_Shelley">Percy Bysshe Shelley</a>) कि कविता &#8216;To a Skylark</span><span style="font-size:medium;">&#8216;  से ली गयी हैं।</span></p>
<p style="text-align:right;"><em>शैली का चित्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/File:Portrait_of_Percy_Bysshe_Shelley_by_Curran,_1819.jpg">विकिपीडिया </a>से </em></p>
<p><span style="font-size:medium;">अंग्रेजी साहित्य में पांच प्रसिद्घ रूमानी कवि हुए हैं, पर्सी बिश शैली उनमें से एक हैं, बाकी चार हैं &#8211; वर्डस्वर्थ (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/William_Wordsworth">William Wordsworth</a>), कोलरिज (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Samuel_Taylor_Coleridge">Samuel Taylor Coleridge</a>), बाइरन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/George_Gordon_Byron%2C_6th_Baron_Byron">Lord Byron</a>) और कीटस् (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/John_Keats">John Keats</a>) हैं। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली एक उपदेशक थे और अपनी कविता के द्वारा समाज सुधार करना चाहते थे। उनकी मृत्यु ३० साल की कम उम्र में हो गयी इसलिए कहना मुश्किल है कि यदि वे जीवित रहते तो यह सम्भव होता या नहीं।  यह भी अपने में एक प्रश्न है कि कविता के द्वारा ऐसा कार्य संभव है या नहीं। मेरे विचार ऐसा कार्य केवल कर्मों से सम्भव है न कि कविता से।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली का जन्म ४ अगस्त १७९२ में हुआ था। इन्होंने अपना  स्कूली जीवन ईटन कॉलेज (<a href="http://www.etoncollege.com/">Eton College</a>) में व्यतीत किया और उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। १९११ में, उन्होंने  &#8216;The necessity of Atheism&#8217; नाम से एक पर्चा प्रकाशित किया जिसके कारण  उन्हें  आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से निष्कासित कर  दिया गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से निष्कासित किये जाने के बाद ही, उन्नीस साल की उम्र में शैली का प्रेम १६ साल की हैरियट बेस्टब्रुक (Hariatte Bestbrook) से हुआ जिसके साथ उन्होंने शादी रचायी।  शैली भावनात्मक व्यक्ति थे और बहुत जल्द ही उनका प्रेम एक दूसरी १६ साल की लड़की मैरी गाडविन (Mary Shelley) के साथ चलने लगा; वे उसके साथ १८१४ में यूरोप भाग गये। १८१६ में जब वे वापस इंगलैंड आये तो शैली की पहली पत्नी हैरियट की मृत्यु,  दुर्घटना के कारण हो गयी। शैली ने मैरी  से शादी कर ली। वे पुन: १८१८ में यूरोप गये वहां बाइरन के साथ रहे और इन दोनों के कहने पर मैरी ने फ्रैंकेस्टाइन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Frankenstein">Frankenstein: or, The Modern Prometheus</a>) नामक उपन्यास १८१८ में लिखा <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/01/favourite-sci-fi-writer.html">यह उपन्यास</a> विज्ञान की कल्पित कहानियों में  सबसे ज्यादा जाना-माना उपन्यास है। ८ जुलाई १९२२ में जब शैली ३० साल के भी नहीं हुये थे, इटली के पास  समुद्र में,  नाव डूब जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली  और मैरी दोनों ही शाकाहारी होने की वकालत करते थे और उन्होंने इस बारे में कई लेख भी लिखे जिसमें कि प्रमुख है, &#8216;A Vindication of Natural Diet&#8217; और &#8216;On the Vegetable System of Diet&#8217;.</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली की कवितायें अंग्रेजी साहित्य की धरोहर है इनकी एक कविता &#8216;<a href="http://www.keats-shelley-house.org/poem_shelley_1.php">To a Skylark</a>&#8216; है। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Skylark">स्काईलार्क</a> एक छोटी सी चिड़िया है जिसकी आवाज मधुर होती है। यह ऊंचे आकाश में उड़ना पसन्द करती है। यदि आप इस चिड़िया की आवाज सुनना चाहें या फिर इसके बारे में जानना चाहें तो बीबीसी रडियो पर <a href="http://www.bbc.co.uk/radio4/science/rams/nature_20060605.ram">यहां</a> सुन सकते हैं।</span><a href="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RjdHe6-B5fI/AAAAAAAAAEU/EoAmKp5bhnQ/s200/skylark.jpg"><img class="alignright" title="skylark bird" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RjdHe6-B5fI/AAAAAAAAAEU/EoAmKp5bhnQ/s200/skylark.jpg" alt="" width="140" height="93" /></a></p>
<p style="text-align:right;"><em>यह चित्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Main_Page">वीकिपीडिया</a> से<br />
</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">&#8216;To a Skylark&#8217; कविता के पहले भाग में, शैली इस चिड़िया के बारे में बात करते हैं और दूसरे भाग में, उससे प्रेरित होकर अपनी भावनायें बताते हैं। उपर उद्धरित पंक्ति,  जिस छन्द से ली गयी हैं वह इस प्रकार है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;We look before and after,<br />
And pine for what is not:<br />
Our sincerest laughter<br />
With some pain is fraught;<br />
Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यह छन्द बताता है कि हम, भावनात्मक स्तर पर,  सबसे ज्यादा  बीते हुऐ पलों से जुड़े होते हैं। यह पल ही हमारे लिये बहुमूल्य हैं। वे ही हमारे जीवन के सबसे सुनहरे पल हैं। वे बीते हुऐ हैं &#8211; वापस नहीं आ सकते। इसी लिये उनके लिये हम सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। यही कारण है दर्द और मिठास के अनोखे रिश्ते का।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली की कविता की उद्धरित पंक्ति  &#8211; कुछ उदास, कुछ मायूस, कुछ निराश, कुछ नकारात्मक  सी है। यह तो बन्धन के कारण ही होता है &#8211; पर प्यार तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है।  फिर यह क्यों?  प्यार है क्या?  क्या यह एक खामोशी है, या खामोशी के रुके हुऐ अफसाने, या केवल एक एहसास, या फिर कुछ और?</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">प्यार में अफसोस नहीं</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक अभिनेता की पत्नी की तबियत ठीक नहीं रहती थी। पत्नी के डाक्टर ने अभिनेता से मिलने की इच्छा जाहिर की। जब अभिनेता,  डाक्टर से मिला तो उसने बताया कि उसकी पत्नी को  कैंसर है और  छ: महीने के अन्दर ही उसकी मृत्यु हो जायेगी।  अभिनेता ने  अपने काम से छुट्टी ली और वह अपनी पत्नी से यह बिना बताये कि उसकी मृत्यु होने वाली है, उन जगहों पर ले गया जहाँ उसकी पत्नी हमेशा जाना चाहती थी। उसकी पत्नी की मृत्यु ६ महीने के अन्दर ही हो गयी। इसके बाद यह सवाल उठा कि कौन अच्छा अभिनेता था: वह पति जिसने अपनी पत्नी के साथ आखिरी छ: महीने उस की पसन्द की जगह, उसे बिना यह बताये गुजारे कि उसकी ज्लद ही  मृत्यु होने वाली है या फिर  वह पत्नी, जो यह जानते हुए कि वह छ:  महीने बाद नहीं रहेगी सारी  जगह गयी और अपने पति को नहीं मालुम होने दिया कि उसे अपनी मृत्यु के बारे में मालुम  है। यह मेरी </span><span style="font-size:medium;">प्रिय प्रेम कहानियों में  से एक है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस कहानी को एक दूसरे रूप में, एरिक सीगल (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Erich_Segal">Erich Segal</a>) ने प्रेम कहानी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Story_%28novel%29">Love Story</a>) नामक पुस्तक में लिखा है। यह पुस्तक १९७० में छपी थी। यह ऑलिवर बैरेट और जेनी कैविलरी की प्रेम कहानी है। ऑलिवर अमीर है, बेहतरीन खिलाड़ी है, और हावर्ड में पढ़ता है। जैनी गरीब है, संगीत प्रेमी है, और  रेडक्लिफ में पढ़ती थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह कहानी कुछ इस तरह से शुरू होती है।</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;What can you say about a twenty-five-year-old girl who died ?</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">That she was beautiful. And brilliant. That she loved Mozart and Bach. And the Beatles. And me. Once, when she specifically lumped me with those musical types, I asked her what the order was, and she replied, smiling, “Alphabetical.” At the time I smiled too. But now I sit and wonder whether she was listing me by my first name&#8211; in which case I would trail Mozart &#8211; or by my last name, in which case I would edge in there between Bach and the Beatles. Either way I don&#8217;t come first, which for some stupid reason bothers hell out of me, having grown up with the notion that I always had to be number one. Family heritage, don&#8217;t you know?&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">जेनी की भी मृत्यु ६ महीने के अन्दर कैंसर से हो जाती है। इस पुस्तक का अन्त इस प्रकार होता है कि ऑलिवर का पिता जब अस्पताल में पहुंचता है तो जेनी की मृत्यु हो चुकी होती है।</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">“Oliver,” said my father urgently, “I want to help.” “Jenny&#8217;s dead,” I told him. “I&#8217;m sorry,” I told him. “I&#8217;m sorry,” he said in a stunned whisper.</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">Not knowing why, I repeated what I had long ago learned from the beautiful girl now dead.</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">“Love means not ever having to say you&#8217;re sorry.”</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">And then I did what I had never done in his presence, much less in his arms. I cried.</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस कहानी के दूसरी अन्तिम पंक्ति है,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Love means not ever having to say you&#8217;re sorry.&#8217;</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार में कभी अफसोस करना नहीं होता।<br />
</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Love Story" src="http://bp3.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkSTPK-B5hI/AAAAAAAAAEk/vSQ3_iDy8lc/s200/Love+story.jpg" alt="" width="106" />यह पंक्ति प्यार का एक अर्थ बताती है  और प्यार के संदर्भ में, सबसे ज्यादा उद्धरित पंक्ति है।  इस कहानी पर, इसी नाम से <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Story_%281970_film%29">एक पिक्चर भी बनी</a> है जिसे ऑर्थर हिलर ने निर्देशित किया है और मुख्य भूमिका रायन ओ&#8217;नील एवं एली मैक्ग्रॉ ने निभायी है। यह पंक्ति पिक्चरों के डायलॉगो में, दस सबसे लोकप्रिय डायलॉग में से एक है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई जब मैं विश्वविद्यालय  में पढ़ता था। विश्वविद्यालय के जीवन में लड़कियां भी साथ पढ़ती थीं। वह उम्र ही अलग थी, वह समय भी अलग था। किशोरावस्था में पैर रखते समय, लड़कियों का साथ पढ़ना, अलग अनुभूति ही था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सीगल की लिखी पुस्तक &#8216;प्रेम कहानी&#8217; और उस पर बनी फिल्म मुझे  बहुत पसन्द आयी।  यह पुस्तक पढ़ने और पिक्चर देखने योग्य है। मैंने यह पुस्तक भी बहुतों को उपहार में दी। इस चिट्ठी को लिखने से पहले मैंने इसे फिर पढ़ा। मुझे यह उतनी ही अच्छी लगी जितनी कि ३५ साल पहले लगी थी। यदि आपने नहीं पढ़ी हो तो जरूर पढ़ कर देखिये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">लोग कहते हैं कि खून का रिश्ता ही सच्चा रिश्ता होता है पर यह सच नहीं। मित्रता का रिश्ता अक्सर उससे ज्यादा मजबूत होता है। आइये बात करते हैं एक और रूमानी फिल्म की और उसके कलाकारों के बीच मित्रता के रिश्ते की।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने बचपन में एक अंग्रेजी  की रुमानी फिल्म देखी थी। वह फिल्म, एक पत्रकार और एक राजकुमारी की प्रेम कहानी है। इस फिल्म ने, रुमानी फिल्मों में नये आयाम स्थापित किये। यह पत्रकारिता की मर्यादाओं के भी आयाम स्थापित करती है। यह फिल्म उन कलाकारो के द्वारा अभनीत की गयी है जो कि न केवल अंग्रेजी फिल्मों में बेहतरीन कलाकार हो कर उभरे पर जिनहोंने अपने वास्तविक जीवन में भी मित्रता, सम्मान का एक अनोखा रिश्ता कायम किया। जी हां, मैं बात कर रहा हूं &#8216;रोमन हॉलीडे&#8217; (Roman Holiday) की।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Roman holiday" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/Rld-6z4l8DI/AAAAAAAAAFs/YkFK9EfkK-M/s200/Roman+Holiday.jpg" alt="" width="120" />कहा जाता है कि यह फिल्म, राजकुमारी मार्ग्रेट  के रोम यात्रा में घटी घटनाओं से प्रेरित है। इस कहानी में एक देश की राजकुमारी  रोम  जाती  है।  उसे  वहाँ अपने देश के प्रतिनिधि  की तरह बर्ताव  करना है।  वहाँ वह  अपने देश के राजदूत  के साथ टिकती है। उसे राजकुमारी की तरह बर्ताव करना बहुत मुश्किल लगता है वह इस तरह के  जीवन से ऊब चुकी है और  साधारण व्यक्ति की तरह जीना  चाहती है। इस कारण,  वह उन्मादी (hysterial) हो जाती है तब डाक्टर उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता है। इसके  पहले वह इंजेक्शन कारगर हो,  वह खिड़की से निकल कर, भाग जाती है। सड़क पर,  उसकी मुलाकात एक अमेरिकी पत्रकार से होती है। राजकुमारी,  इंजेक्शन के कारण,  रास्ते में ही सोने लगती है।  इस पर पत्रकार, राजकुमारी को  अपने घर ले जाता है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अगले दिन उस राजकुमारी को  पत्रकार सम्मेलन में भाग लेना था जिसमें इस पत्रकार को भी  जाना था।  उसमें जाने के लिये जब वह दफ्तर  पहुँचता  है तो उसका सम्पादक बताता  है कि राजकुमारी की बीमारी के कारण पत्रकार सम्मेलन स्थगित कर दिया गया है।  सम्पादक,   पत्रकार को राजकुमारी का  चित्र दिखाता है तब उसे पता चलता है कि राजकुमारी वही लड़की है जो उसके घर में  है। वह सम्पादक से पूछता है कि यदि वह राजकुमारी की कुछ खास चित्र उसे दे दे तो उसे क्या मिलेगा।  संपादक उसे बहुत पैसा देने की बात कहता है।  वह वापस अपने घर आता है और अपने एक मित्र को लेकर  राजकुमारी के साथ घूमने जाता है।  वे लोग साधारण व्यक्ति की तरह सैर सपाटा करते  हैं और मौज मस्ती करते हैं।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पत्रकार के मित्र के पास एक लाइटर है जो कि एक कैमरा है। उससे वह राजकुमारी की फोटो  लेता रहता  है। वे लोग  रात को समुद्र तट  पर पार्टी में  जाते है।  यहां पर राजकुमारी के देश की खुफिया पुलिस, जो उसे ढूढ़ रही होती है, पहचान लेती है और उसे वापस ले जाना चाहती  है। पत्रकार और राजकुमारी, वहां से भाग जाते हैं।  जब राजकुमारी वापस लौट रही होती है तो उसे  लगता है कि उसका अपने देश के प्रति भी कर्तव्य है </span><span style="font-size:medium;">और उसे वापस जाना चाहिए। वह वापस चली जाती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Audrey Hepburn princess" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RleAiz4l8GI/AAAAAAAAAGE/6ouDcCEhUBY/s200/Audrey.jpg" alt="" width="159" /></span><span style="font-size:medium;">अगले दिन, राजकुमारी पत्रकार सम्मेलन को सम्बोधित करती है जिसमें वह उनके जवाब भी देती है। यह अमेरिकी पत्रकार और उसका मित्र भी उस प्रेस कान्फ्रेंस में होते हैं। उसका मित्र,  राजकुमारी का  चित्र, उसी लाइटर से  लेता है तब राजकुमारी को पता चलता है कि यह लोग पिछले दिन भी उसकी फोटो ले रहे थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान, राजकुमारी से सवाल पूछा जाता है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;आप देशों की दोस्ती के बारे में क्या सोचती हैं?&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">राजकुमारी जवाब देती है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मेरा उस पर उतना ही विश्वास है जितना विश्वास मुझे दो व्यक्तियों के संबंध में है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस पर अमेरिकी पत्रकार कहता  है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;राजकुमारी आपका विश्वास गलत साबित नहीं होगा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">राजकुमारी कहती है कि उसे यह सुनकर प्रसन्नता हुई।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">जब वह पत्रकार सम्मेलन समाप्त होता है तो राजकुमारी  सबसे हाथ मिलाती है।   अमेरिकी पत्रकार राजकुमारी को एक खास तोहफ़ा देता है जिसमें उनके द्वारा खींचे हुये  सारे चित्र  और निगेटिव रहते  है । इसे राजकुमारी मुस्कराहट के साथ स्वीकार करती है और धीरे-धीरे  वहां चली जाती है जहां से शायद यह लोग फिर कभी नहीं मिल पाये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस फिल्म में मुख्य भूमिका ऑड्री हेपबर्न और ग्रेगरी पेक ने निभायी है और इसका निर्देशन वाइलर ने किया है। यह आड्री हेपबर्न की पहली अमेरिकन पिक्चर थी और उन्हें इस पिक्चर में सबसे अच्छे कलाकार ऑस्कर पुरस्कार भी मिला। यह दोनो मेरे प्रिय कलाकार रहे हैं। इनका अभिनय लाजावाब था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अंग्रेजी पिक्चरों में, अक्सर, शब्दों के उच्चारण समझने में मुश्किल होती थी।  आड्री हेपबर्न तो ब्रिटानी कलाकारा थी उनका उच्चारण आसानी से समझ में आता है पर ग्रेगरी पेक अमेरिकन थे फिर भी उनका उच्चारण एकदम स्पष्ट था। इस कारण से इनकी फिल्में ज्यादा समझ में आती थीं। यह  एक प्रेम कहानी है जो कि रिश्तों के बीच आदर  और सम्मान की सीमा भी बताती है। यह अच्छी फिल्म है और सपरिवार देखने  योग्य है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं नहीं जानता कि यह वास्तविक जीवन में होता है कि नहीं। यह तो एक फिल्म थी पर मेरे विचार में यह पत्रकारिता की मर्यादा को ठीक तरह से परिभाषित करती है  और मित्रता का सही अर्थ भी बताती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">देखें इन दोनो कलाकारों का वास्तविक जीवन भी मित्रता की मिसाल था। आईये इन दोनो के बारे में कुछ और जाने।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>अनन्त प्रेम</strong><br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="My Fair lady" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RoYpz0wiNRI/AAAAAAAAAGs/9uTpF_zw5rA/s200/My+Fair+lady.jpg" alt="" width="86" /></span><span style="font-size:medium;">आड्री हेपबर्न (४/५/१९२९ – २०/१/१९९३) की सगाई १९५० में, जेम्स हेन्सन के साथ हुई,</span><span style="font-size:medium;"> तारीख भी तय हो गयी पर दोनों को लगा कि उनके कैरियर उन्हें अलग रखेंगे इसलिये शादी नहीं की। आड्री हेपबर्न की पहली शादी १९५४ में मेल फेरर, कलाकार, से हुई। यह १४ साल चली। उनके लड़के के अनुसार यह ज्यादा खिंची। तलाक लेने से पहले यह दोनो अलग हो गये थे। उस समय आड्री हेपबर्न एक मनोचिकित्सक एन्ड्रिया डॉटी के यहां जाने लगी। बाद में उसी से १९६९ में शादी कर ली। यह शादी भी १३ साल तक चली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे १९५३ में बनी थी। आड्री हेपबर्न इसे अपनी सबसे बेहतरीन फिल्म मानती थीं क्योंकि इस फिल्म ने उन्हें सितारा बनाया था। मैंने उनकी सारी फिल्में देखीं  और रोमन हॉलीडे के अतिरिक्त जो फिल्में पसन्द आयीं वह हैं,  &#8216;शराड&#8217;, &#8216;माई फेयर लेडी&#8217;, &#8216;वार एण्ड पीस&#8217;, &#8216;हाउ टू स्टील मिलियन&#8217;, &#8216;वेट अन्टिल डार्क&#8217;।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Audry Hepburn stamp" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RoYsa0wiNYI/AAAAAAAAAHk/nBHMfhyfG-k/s200/Audrey+Hepburn+stamp.jpg" alt="" width="103" />२००३ में, आड्री हेपबर्न के सम्मान में , अमेरीका ने एक स्टैम्प भी निकाला।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ग्रेगरी पेक (५/४/१९१६ – १२/६/२००३), रोमन हॉलीडे के बनते समय (१९५३),  हॉलीवुड में बेहतरीन कलाकार के रूप में नाम कमा चुके थे हालांकि उन्हें सबसे अच्छे कलाकार के लिये ऑस्कर पुरस्कार, १९६२ में &#8216;हाउ टू किल ए मॉकिंग बर्ड&#8217; के लिये मिला। यह पुरस्कार, आड्री हेपबर्न को  ऑस्कर पुरस्कार के मिलने के बाद था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ग्रेगरी पेक ने भी अपने जीवन में दो शादियां की। १९४३ में गेटा कुकोनेन और १९५५ में विरोनीक पसानी के साथ।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने ग्रेगरी पेक की लगभग सारी फिल्में देखीं हैं। रोमन हॉलीडे के अतिरिक्त , &#8216;मोबी डिक&#8217;, &#8216;हाउ टू किल ए मॉकिंग बर्ड&#8217;, &#8216;द गन्स ऑफ नेवरॉन&#8217;, और &#8216;मैकेन्नाज़ गोल्ड&#8217; उनकी बेहतरीन और देखने योग्य फिल्में हैं।<img class="alignright" title="Guns of Navron" src="http://bp3.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RoYqzUwiNUI/AAAAAAAAAHE/ktecXNUsR6Y/s200/Guns+of+Navarone.jpg" alt="" width="97" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे, में वे और आड्री हेपबर्न ने पहली बार साथ काम किया। इन दोनों के बीच, इस फिल्म के दौरान हुई मित्रता जीवन पर्यन्त चली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे फिल्म बनते समय उसके विज्ञापन देने की बात चली। इस फिल्म के निर्माताओं ने उसमें ग्रेगरी पेक को ज्यादा स्थान दिया जाने की पेशकश की। उस समय ग्रेगरी पेक हॉलीवुड में स्थापित कलाकार थे पर ऑड्री हेपबर्न की यह पहली हॉलीवुड फिल्म थी। यह ग्रेगरी पेक का बड़प्पन था कि उन्होने कहा कि  आड्री हेपबर्न ने इस फिल्म में बहुत अच्छा काम किया है उसे आस्कर पुरस्कार मिलेगा। उसे मेरे बराबर स्थान दिया जाय।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ऑड्री हेपबर्न की मृत्यु के बाद, ग्रेगरी पेक ने नम आंखों के साथ ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की &#8216;द अनइन्डिंग लव&#8217; (The Unending Love) कविता सुनायी।</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;I seem to have loved you in numberless forms, numberless times&#8230;</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">In life after life, in age after age, forever.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">My spellbound heart has made and remade the necklace of songs,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">That you take as a gift, wear round your neck in your many forms,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">In life after life, in age after age, forever.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Whenever I hear old chronicles of love, it&#8217;s age old pain,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">It&#8217;s ancient tale of being apart or together.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">As I stare on and on into the past, in the end you emerge,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Clad in the light of a pole-star, piercing the darkness of time.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">You become an image of what is remembered forever.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">You and I have floated here on the stream that brings from the fount.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">At the heart of time, love of one for another.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">We have played along side millions of lovers,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Shared in the same shy sweetness of meeting,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">the distressful tears of farewell,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Old love but in shapes that renew and renew forever.&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यह आड्री हेपबर्न को सबसे प्रिय कविता थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">आड्री हेपबर्न और गेगरी पेक बेहतरीन कलाकार, बहुत अच्छे मित्र, फिर भी कभी रूमानी तौर से नहीं जुड़े। रोमन हॉलीडे फिल्म में प्रेम के साथ सम्मान की सीमा थी तो वास्तविक जीवन में मित्रता के साथ उसकी लक्षमण रेखा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रिश्तों में सबसे पवित्र रिश्ता है मां का &#8211; कुछ बाते मेरी मां के बारे में।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">अम्मां बचपन की यादों में</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">बसंत पंचमी १९३९ &#8211; मेरी मां, पिता की  शादी। मां , उस समय ११वीं कक्षा की छात्रा थीं और पिता उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। १९४० में, पिता ने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और मां ने  इण्टरमीडिएट पास किया। पिता तो, बाबा के कस्बे में, वापस आकर व्यवसाय में लग गये पर मां  उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर चली गयीं। वे अगले चार वर्ष छात्रावास में रह कर उन्होने स्नातक और कानून की शिक्षा पूरी की। १९४४ में, वे  अपने विश्वविद्यालय की पहली महिला विधि स्नातक बनीं।   उनकी उच्च शिक्षा पूरी हो जाने के बाद ही, हम भाई-बहन इस दुनिया में आए। १९५० में,  मेरे पिता, इस कस्बे में,  व्यवसाय की बढ़ोत्तरी के लिये  आये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पिता चाहते थे कि हमारा लालन-पालन एक सामान्य भारतीय के अनुसार हो। वह इतना पैसा जरूर कमाते थे कि हमें हिन्दुस्तान के किसी भी स्कूल में  आराम से पढ़ने भेज सकते थे पर उन्होंने  हम सब को वहीं पढ़ने भेजा जहाँ हिन्दुस्तान के बच्चे सामान्यत: पढ़ते हैं।  हमने अपनी पढ़ाई एक साधारण से स्कूल में पूरी की।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पिता हिन्दी के  समर्थक थे। हम भाई बहन हिन्दी मीडियम स्कूल में गये। घर में अंग्रेजी में बात करना मना था। मेरे पड़ोस के सारे बच्चे कस्बे के अंग्रेजी मीडियम विद्यालयों में और कई कस्बे के बाहर हिन्दुस्तान के सबसे अच्छे पब्लिक विद्यालयों में पढ़ते थे। वे सब अंग्रेजी में ही बात करते थे। यह हमें कभी, कभी शर्मिंदा भी करता था। मां हमेशा हमें दिलासा देती,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;ये लोग अपने स्कूल पर गर्व करते हैं पर तुम्हारा स्कूल तुम पर।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मां की अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वे अंग्रेजी के महत्व को समझती भी थीं। वे हमें बीबीसी सुनने के लिये प्रेरित करती। प्रतिदिन शाम को, हम सब भाई-बहनों को उन्हें अंग्रेजी की कोई न कोई कहानी या तो रीडर्स डाइजेस्ट से या फिर  अखबार पढ़ कर सुनाना पड़ता था। वे हमारा उच्चारण ठीक करती और अर्थ समझाती थीं। किसकी बारी पड़ेगी यह तो हम लोग यह खेल से ही निकालते थे,</span></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल,</span></em></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">अस्सी नब्बे पूरे  सौ।</span></em></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">सौ में लगा धागा,</span></em></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">चोर निकल भागा।</span></em></p>
<p><span style="font-size:medium;">बस जिस पर भागा आया उसे ही पढ़नी पड़ती थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक बार मैंने  मां से पूंछा कि तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो, तुमने वकालत  या  कोई और काम क्यों नहीं किया।  उनका जवाब था कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैं घर की सबसे बड़ी बहूं हूं।  तुम्हारे बाबा के कस्बे से तुम्हारे चाचा,  बुआ,  उनके लड़के,  लड़कियां सब यहीं पढ़ने आए। वे सब हमारे साथ ही रहे, यदि मैं कुछ काम करती तो उनका ख्याल, तुम लोगों का ख्याल  कैसे रख पाती।  पैसे तो तुम्हारे पिता, हम सबके लिए कमा ही लेते हैं बस इसलिए घर के बाहर जाना ठीक नहीं समझा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने उन्हें हमेशा सफेद रंग की साड़ी पहने हुए देखा। उनके सफेद रंग की साड़ी पहनने के कारण, गोवा में चर्च के अन्दर, क्रॉस के ऊपर सफेद कपड़े को देख कर, <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/church.html">उनकी याद आ गयी</a>। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने मां को कभी सिंदूर लगाये नहीं देखा। एक बार हम ट्रेन में सफर कर रहे थे। एक महिला ने मां से पूछा कि क्या वे विधवा हैं? मां मुस्करायीं और हमारी ओर इशारा कर बोली, </span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;इनके पिता को सफेद रंग पसन्द है, बस इसलिये, मैंने इसे अपना लिया। शादी के बाद, जब भी सिंदूर लगाया तो सर में दर्द हो गया &#8211; शायद कुछ मिलावट हो। इनके पिता ने सिंदूर लगाने के लिए मना कर दिया। बस इसलिये सिंदूर नहीं लगाती।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"> उस महिला ने मां से माफी मांगी पर ट्रेन पर हमारी उनसे अच्छी मित्रता हो गयी। मुझे भी, होली के रंगों से, एलर्जी हो जाती है। शायद, यह मैंने उन्हीं से पाया है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">बहन और मां के बीच में पिक्चर देखने का एक अजीब  रिश्ता  था। वे दोनों हर हिन्दी पिक्चर को पहले दिन, पहले प्रदर्शन पर जाया  करती थीं और  पिता के घर वापस  पहुँचने के पहले वापस।  मैं समझता हूं  कि मेरी  बहन ने स्कूल वा विश्वविद्यालय से भागकर जितनी फिल्में देखी हैं वह किसी और लड़की ने नहीं देखी होंगीं। जब मेरी बहन ने पढ़ाना शुरू किया तब उसका स्कूल शनिवार को आधे दिन का  होता था। तब वे दोनों  पहले दिन को छोड़कर  शनिवार को  पहला शो  देखने लगी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमें हिन्दी पिक्चर देखने की अनुमति नहीं थी। हम केवल अंग्रेजी पिक्चर ही देख सकते थे।    बहन की शादी, मेरे विश्विद्यालय के जीवन के अन्तिम चरण पर हुई। उसके बाद, मेरी मां को पिक्चर देखने के लिए साथी  मिलना बन्द हो गया तब मैंने उनके साथ हिन्दी  पिक्चर देखना शुरू किया। कुछ दिनों के बाद मेरे दोस्त भी हमारे गुट में शामिल हो गये। टिकट और कोकाकोला के पैसे तो मेरी मां ही देती थी।  शादी  के बाद मेरी अपनी पत्नी के  साथ अनलिखी शर्त थी, </span></p>
<p><em><span style="font-size:medium;">हिन्दी पिक्चर में मेरी मां भी  साथ चलेंगी। </span></em></p>
<p><span style="font-size:medium;">वे जब तक जीवित रहीं ऎसा ही रहा। ऐसे हम जब भी कस्बे के बाहर गये, वे हमारे साथ ही गयीं।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां की सबसे बड़ी खासियत  यह थी कि वे छोटी-छोटी बातों से जीवन को भरपूर जीना जानती थीं, दशहरे की झांकी हो या कोई मेला हो, वह हमेशा उसमें जाने में उत्साहित रहती थीं और हम लोगों को भी वहां ले जाती थीं। वहां पर चाट खाना, कचौड़ी खाना उनको प्रिय था और हमें भी। मुझे यह अब भी प्रिय है पर मुन्ने की मां को नहीं। बस जब वह नहीं होती है तब ही इसका आनन्द उठाता हूं <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /><br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरी मां एक गरीब परिवार से थीं और वह कहती थीं कि उनके घर एक बार ही खाना बनता था।  वे हर का,  खास तौर से गरीब रिश्तेदारों का ख्याल ज्यादा ही रखती थीं। उनका कहना था कि जो जीवन में बहुत नहीं कर पाया उसका बहुत ख्याल रखना चाहिए क्योंकि वह शायद हिचक के कारण कुछ न कह पाये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने  मां को  पिता से कभी बात करते नहीं देखा पर उनके कुछ न कहने पर वह मेरे पिता के मन की हर इच्छा जान जाती थीं। वे पिता की हर बात नहीं  मानती थीं कई बार वे  हमारा साथ देती थीं पर जिसे वे मानती थी वह उनके न बताये भी जान जाती थीं जैसे कि वे उनका मन पढ़ लेती हों।  मैं अक्सर सोचता हूं कि  मुन्ने की मां क्यों नहीं मेरे मन की  बात समझ पाती। वह मुझसे कहती है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;तुम्हारे  मन में जो है  वह मुझे बताते क्यों नहीं। मुझे कैसे मालुम चले कि तुम क्या चाहते हो।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">लगता है कि मेरी मां किसी और मिट्टी की बनी थीं। वह मेरे पिता के बिना बोले ही उनका मन जान जाती थीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सेक्स का विषय हर जगह वर्जित है। हांलाकि कि बीबीसी के मुताबिक बहुत कुछ बदल रहा है। सीबीएससी में यौन शिक्षा को पाठ्य-क्रम में रखा गया है। हांलाकि इसे कई राज्य सरकारों ने रखने से मना कर दिया। मैं यौन शिक्षा का पक्षधर हूं पर यह किस तरह से हो इसमें जरूर संशय है। आइये कुछ बात करते हैं मेरे परिवार में किस तरह से हुई।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">परिवार में यौन शिक्षा</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह चिट्ठी रिश्तों के बारे में है। इस चिट्ठी में यौन शिक्षा के ऊपर बात करना &#8211;  कुछ अजीब लग रहा है न आपको। चलिये मैं पहले यह स्पष्ट कर दूं कि यह इस चिट्ठी के अन्दर क्यों है? </span><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="hands-tehlka" src="http://unmukts.files.wordpress.com/2008/09/hands-tehlka.jpg?w=136&amp;h=187&#038;h=156" alt="" width="136" height="156" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ भीड़-भाड़  की जगह होती है पर यौन उत्पीड़न  सगे संबन्धी या</span><span style="font-size:medium;"> जान पहचान व्यक्ति के द्वारा ही ज्यादा होता है। कुछ समय पहले, मैंने इसका उल्लेख &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2008/09/20/sex-family/">उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी</a>&#8216; चिट्ठी में  किया है। पारिवारिक रिश्तों के अन्दर,  यौन शिक्षा किस तरह से हो,  एक नाजुक  पर महत्वपूर्ण विषय है। इसीलिये मैं इसे  इस चिट्ठी में रख रहा हूं। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं नहीं जानता कि इस विषय को बताने का क्या सबसे अच्छा तरीका है पर मैं वह तरीका अवश्य जानता हूं जैसा कि हमारे परिवार में हुआ। मैंने यह विषय कैसे अपनी आने वाली पीढ़ी को बताया। मुझे, अक्सर स्कूल, विद्यालय, विश्व विद्यालय में जाना पड़ता है। बच्चों से मुकालात होती है। अक्सर,  मेरे पास बच्चे यह पूछने के लिये आते हैं कि वे क्या कैरियर चुने, कहां जायें।  कभी कभी, मैं उनसे इस विषय पर भी बात करता हूं। मैं, क्या उन्हें बताता हूं, यहां कुछ उसी के बारे में।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे  बचपन का एक बहुत अच्छा मित्र, टोरंटो इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापक रहा।  कुछ समय पहले उसकी मृत्यु हो गयी। बचपन में ही उसके पिता का देहान्त हो चुका था। भाई, बहनो की भी शादी के बाद, वह और उसकी मां हमारे ही कस्बे में रहते थे। अक्सर उसकी मां उसके भाई या बहनो के पास रहने चली जाती थी। उस समय उसका घर खाली रहता था। उस समय, उसके घर,  काफी धमाचौकड़ी रहती थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह १९६० का दशक था। हेर संगीत नाटक का मंचन हो चुका था। मैंने, इसका जिक्र &#8216;<a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/">ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और  टोने-टुटके</a>&#8216; श्रंखला की <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/hair-musical.html">इस कड़ी</a> में किया है।  हिप्पी आंदोलन अपने चरम सीमा पर था। इस धमाचौकड़ी में, अक्सर लड़कियों भी शामिल रहती थीं।  कभी कभी चरस और गांजा भी चलता था।  मैं खेल में ज्यादा रुचि रखता था। मुझे जिला, विश्वविद्यालय एवं अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य मिला।  इसी कारण इस तरीके की धमाचौकड़ी में शामिल नहीं रहता था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक बार मेरे मित्र को कुछ ब्लू फिल्में मिल गयीं।  एक दूसरे मित्र ने प्रोजेक्टर का इंतजाम कर दिया। उन लोगों ने फिल्म को भी देख लिया। यह सोचा गया कि उसे फिर देखा जायगा पर सवाल था कि ब्लू फिल्म कहां रखी जाय। कोई भी उसे रखने को तैयार नहीं था।  मैं ही ऐसा था जो कि इस धमाचौकड़ी मे शामिल नहीं था। इसलिये मेरे पास ही रखना सबसे सुरक्षित समझा गया या यह समझ लीजये कि मुझे उन ब्लू फिल्मों को रखने में कोई हिचक नहीं थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं ने यह ब्लू फिल्में अपने कपड़े की अलमारी में रख दी।  एक दिन  मेरे कपड़े लगाते समय मां को ब्लू फिल्में मिल गयीं। उनके पूछने पर मैंने सारा किस्सा बताया और यह भी बताया कि  मैंने कोई भी ब्लू फिल्म नहीं देखी है। मां पूछा कि मुझे सेक्स के बारे में कितना ज्ञान है। मेरा जवाब था थोड़ा बहुत। उन्होने कहा कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;ब्लू फिल्मों मे बहुत कुछ नामुमकिन बात होती है और अधिकतर जो भी होता है वह ठीक नहीं। तुम्हें मालुम होना चाहिये कि क्या ठीक नहीं  है। इसलिये इसे, तुम्हें देख लेना चाहिये पर उसके पहले सेक्स का अच्छा ज्ञान भी होना चाहिये।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="everything you always wanted to know about sex" src="http://bp3.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RmSx-rDvfJI/AAAAAAAAAGM/B4r7eggjZvM/s200/everything+you+always+wanted+to+know+about+sex-1.jpg" alt="" width="126" />हम लोग किताबों की दुकान पर गये और वहां से एक पुस्तक   Everything you always wanted to know about sex but were afraid to ask by David Reuben खरीद कर लाये। यह पीले रंग की पुस्तक है इसलिये यह पीली पुस्तक के नाम से भी मशहूर हुई।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सेक्स के सम्बन्ध में उत्तेजना  चित्र देख कर या उसके वर्णन से होती है। इस पुस्तक में कोई भी चित्र नहीं हैं। इसमें सारा वर्णन प्रश्न और उत्तर के रूप में है।  इसे पढ़ कर कोई उत्तेजना नहीं होती है।  इस पुस्तक में कुछ सूचना समलैंगिक रिश्तों और सेक्स परिवर्तन के बारे में है। यह इस तरह के विषयों को नकारती है। इसी लिये कुछ लोग इस पुस्तक पर विवाद करते हैं।  यह दोनो विषय विवादस्पद हैं। मैंने इनके बारे में  &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/06/trans-gendered.html">Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री</a>&#8216;,  &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/06/04/mirror-mirror/">आईने, आईने यह तो बता &#8211; दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन</a>&#8216;, &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/10/11/how-to-inform-mother/">मां को दिल की बात कैसे बतायें</a>&#8216;, और &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_31.html">मां को दिल की बात कैसे पता चली</a>&#8216; नाम से लिखा है। यदि आप इस पुस्तक में इस विषय की सूचना को छोड़ दें तो बाकी सूचना के बारे में कोई विवाद नहीं है और लगभग सही है। मेरे विचार से यह एक अच्छी पुस्तक है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने,  इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ब्लू फिल्म देखना जरूरी नहीं समझा। ब्लू फिल्म न देखने के निर्णय में, कई अन्य बातों ने भी महत्वपूर्ण रोल निभाया। मां ने,</span></p>
<ul>
<li><span style="font-size:medium;">मुझे न तो उन  फिल्मों को रखने के कारण डांटा, न ही देखने के लिये मना किया, जिसकी मनाही हो उसी के बारे में उत्सुकता ज्यादा रहती है;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;">हमेशा हमें, बाहर के खेल पर, पढ़ाई से भी ज्यादा ध्यान देने के लिये प्रोत्साहित  करती थीं।  उस समय  पढ़ाई का वैसा बोझ नहीं था जैसा कि आजकल होता है।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size:medium;">मां का प्रिय वाक्य थे,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;पढ़ाई बन्द करो और बाहर जा कर खेलो।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यदि हम रात को देर तक पढ़ते थे तो हमेशा कहती थीं,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;चलो,  सोने जाओ। बहुत रात तक पढ़ना ठीक नहीं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">परीक्षा के दिनो में तो हमारे कमरे की बत्ती बहुत ज्लद ही बन्द कर दी जाती थी। वे कहती थीं,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;परीक्षा के समय दिमाग एकदम तरोताजा रहना चाहिये।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने अपने बेटे को, जब स्कूल में ही था तब यह पुस्तक पढ़ने के लिये दी। वह बारवीं के बाद आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चला गया और होस्टल में ही रहा। मैं समझता हूं कि उन्हें इस पुस्तक के पढ़ने के कारण मदद मिली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">देश के कुछ महाविद्यालयों में, पास-ऑउट करने वाले छात्रों की एक पत्रिका निकाली जाती है। आई.आई.टी. कानपुर में भी ऐसा होता है।  यह पत्रिका विद्यार्थी ही निकालते हैं इसमें उनके साथी ही उन्हीं के बारे में लिखते हैं।  मैं एक बार उनकी इस पत्रिका को पढ़ने लगा तो उन्होने मना किया,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;पापा, तुम मत पढ़ो। इसे पढ़ कर तुम्हे   अच्छा नहीं लगेगा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कहा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैं भी अपने विद्यार्थी जीवन में इन सब से गुजर चुका हूं इसलिये कोई बात नहीं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उनकी पत्रिका में बहुत सारी बातें स्पष्ट रूप से लिखी थीं। हमारे समय में भी उस तरह की बातें होती थी पर इतना स्पष्ट रूप से नहीं लिखा जाता था।  मैंने School Reunion चिट्ठी लिखते समय लिखा था कि  मेरे बेटा आई.आई.टी.  कानपुर की  पत्रिका में दी गयी पहली दो सूची में नहीं हैं  पर विद्यार्थियों की इस पत्रिका में उनके बारे में यह अवश्य लिखा है कि वह  सबसे साथ सुथरा बच्चा है। हो सकता है यह उसके संस्कारों के कारण हो पर मेरे विचार से यह उनके  इस पुस्तक को पढ़ने और यौन शिक्षा को अच्छी तरह से समझने के कारण भी है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे विचार में, परिवार के अन्दर, आने वाली पीढ़ी को  अच्छी किताबें बताना, मुक्त पर स्वस्थ यौन चर्चा करना, एक अच्छी बात है। अन्यथा, नयी पीढ़ी को गलत सूचना मिल सकती है और वे गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">करो वही, जिस पर विश्वास हो</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">कई दशक पहले, जून १९७५ में आपातकाल की घोषणा हुई थी। उस समय, मैं कश्मीर में था। लोग पकड़े जाने लगे। मुझे लगा कि मुझे कस्बे पहुंचना चाहिये। मेरे पिता पकड़े जा सकते हैं और मां अकेले ही रह जांयगी। यही हुआ भी। मेरे कस्बे पहुंचते पता चला कि पिता  को झूठे केस में डी.आई.आर. में बन्द किया गया। उन पर इल्जाम लगाया गया कि वे यह भाषण दे रहे थे कि जेल तोड़ दो, बैंक लूट लो। यह एकदम झूट था। उस समय देश की पुलिस और कार्यपालिका से सरकारी तौर पर जितना झूट बुलवाया गया उतना तो कभी नहीं, यहां तक अंग्रेजों के राज्य में भी नहीं। डी.आई.आर. में मेरे पिता की  जनामत हो गयी पर वे जेल से बाहर नहीं आ पाये। उन्हें मीसा में पकड़ लिया गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह समय हमारे लिये मुश्किल का समय था। समझ में नहीं आता था कि पिता कब छूटेंगे।  इस बीच, मित्रों, नातेदारों ने मुंह मोड़ लिया था। लोग देख कर कतराते थे। उनको डर लगता था कि कहीं उन्हें ही न पकड़ लिया जाय। मां यह समझती थीं। उन्होंने खुद ही ऐसे रिश्तेदारों और मित्रों को घर से आने के लिये मना कर दिया ताकि उन्हें शर्मिंदगी न उठानी पड़े। मुझे ऐसे लोगो से गुस्सा आता था। मैंने बहुत दिनो तक अपने घर कर बाहर पोस्टर लगा रखा था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;अन्दर संभल कर आना, यहां डिटेंशन ऑर्डर रद्दी की टोकड़ी पर पड़े मिलते हैं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस मुश्किल समय पर कइयों ने हमारा साथ भी दिया। उन्हें भूलना मुश्किल है और उन्हें भी जो उस समय डर गये थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">दो साल (१९७५-७७), मैंने न कोई पिक्चर देखी, न ही आइसक्रीम खायी, न ही कोई दावत दी, न ही किसी दावत पर गये। पैसे ही नहीं रहते थे। उस समय भी लोग,  अक्सर हमसे पैसे मांगने आते थे। उन्हें भी मना नहीं किया जा सकता था वे भी मुश्किल में थे, उनके प्रिय जन भी जेल में थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">आपातकाल के समय, कई लोग माफी मांग कर जेल से बाहर आ गये पर पिता ने नहीं मांगी। उनका कहना था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैंने कोई गलत काम नहीं किया। मैं क्यों माफी मांगू। माफी तो सरकार को मागनी चाहिये।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वे  लगभग दो साल तक जेल में रहे। १९७७ के चुनाव के बाद पुरानी सत्तारूढ़ पार्टी, चुनाव हार गयी  तभी वे छूट पाये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां से संबन्धित आपतकाल की एक घटना मुझे  आज भी अच्छी तरह से याद है।  वे  हमेशा कहती थीं,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;करो वही, जिस पर विश्वास हो। दिखावे के लिये कुछ करने की कोई जरूरत नहीं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वे न इसे कहती थीं पर इसे अमल भी करती थीं। नि:संदेह, ढ़कोसलों का उनके जीवन पर कोई स्थान नहीं था।</span></p>
<div style="border-top:7px solid #5c8a64;border-bottom:7px solid #5c8a64;font-size:12pt;font-weight:bold;line-height:100%;padding-bottom:7px;padding-top:7px;width:375px;text-align:center;margin:10px;">शिव आराधना &#8230; से कोई नहीं छूटेगा</div>
<p><span style="font-size:medium;">आपतकाल के दौरान, जब मेरे पिता जेल में थे तो हमारे शुभचिन्तक हमारे घर आये।  उन्होंने मेरी मां से अकेले में बात करने को कहा। बाद में मैंने मां से पूछा कि वे क्यों आये थे और क्या चाहते थे। मां ने बताया,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;वे कह रहे थे कि यदि मैं मंदिर में शिव भगवान की  आराधना करूंगी, तो तुम्हारे पिता छूट सकेंगे।&#8217; </span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मां ने यह नहीं किया।  वे आर्यसमाजी थीं और इस तरह के कर्मकाण्ड (ritual) पर उनका विश्वास नहीं था। उनका कहना था कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;शिव अराधना केवल मन की शान्ति के लिये है। उससे कोई नहीं छूटेगा। लोग तो छूटेंगे न्यायालाय से या फिर जनता के द्वारा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उच्च न्यायालय ने तो हमारा साथ दिया पर सर्वोच्च न्यायालय ने हमें शर्मिन्दा किया। </span><span style="font-size:medium;">सीरवाई एक</span><span style="font-size:medium;"> प्रसिद्ध न्यायविद रहे हैं। वे बहुत साल तक महाराष्ट्र राज्य के महाधिवक्ता रहे और उनकी भारतीय संविधान पर लिखी पुस्तक अद्वतीय है। इस पुस्तक  (Constitution of India: Appendix Part I The Judiciary Of India) में वे कहते हैं कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">‘The High Courts reached their finest hour during the emergency; that brave and courageous judgements were delivered; &#8230;  the High Courts had kept the doors ajar which the Supreme Court barred and bolted’.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">आपातकाल का समय,  उच्च न्यालयों के लिये  सुनहरा समय था। उस समय  उन्होने हिम्मत और बहादुरी से फैसले दिये। उन्होने स्तंत्रता के दरवाजों को खुला रखा पर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बन्द कर दिया।</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">आपातकाल के बाद, वे सब हमारे पास पुन: आने लगे जिन्होंने हमसे मुंह मोड़ लिया था।   मां, पिता ने उन्हें स्वीकार कर लिया, हमने भी। सरकार ने पिता को राजदूत बनाकर विदेश भेजने की बात की पर उन्होने मना कर दिया। वे अपने सिद्घान्त के पक्के थे। आपातकाल के समय न माफी मांगी और न ही बाद में कोई पद लिया। उनका कहना था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैंने किसी पद के लिये </span><span style="font-size:medium;">समाज सेवा</span><span style="font-size:medium;"> नहीं की।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मुझे अच्छा लगता है, गर्व भी होता है कि मेरी मां, मेरे पिता ऐसे थे।  जिन्होंने हमेशा वह किया जो उन्हें ठीक लगता था &#8211; दुनिया के दिखावे के लिये नहीं।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">जो करना है वह अपने बल बूते पर करो</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे पिता हमेशा अपने व्यवसाय या फिर समाजिक सेवा में व्यस्त रहते थे। उनके पास हमारे या मां के लिये कभी समय नहीं होता था। हमें, इसका हमेशा मलाल रहा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं अक्सर अपने मित्रों को पिता के साथ मौज करते देखता था, जलन भी होती थी। यह सारी कमी मां ही ने पूरी की। पिता यदि चाहते तो बहुत पद मिल सकते थे हमारे लिये बहुत कुछ कर सकते थे पर कभी   किया नहीं। सबके पिता करते थे इसीलिये हमें अपने पिता समझ में नहीं आते थे।  उनका कहना था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;जो करना है वह अपने बल बूते पर करो। यही जीवन सार्थक जीवन है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">आज, जीवन के तीन चौथाई बसन्त देख लेने के बाद, अब पिता समझ में आने लगे हैं, उनके सिद्धान्त भी समझने लगा हूं, उन पर गर्व भी होने लगा है।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे विचार में, पिता की कही बातों के साथ, यह भी आवश्यक है कि हम आने वाली पीढ़ी के साथ समय व्यतीत करें। हमारे बच्चे ही हमारे सबसे बड़ी सम्पदा हैं। पिता के सिद्धन्तो के कारण हम उस स्कूल में गये जहां एक साधरण हिंदुस्तानी जाता है। शायद यही कारण हो कि  मैंने अपने मुन्ने का दाखिला देहरादून में, हिन्दुस्तान के एक सबसे जाने माने बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया। दाखिले के समय उस स्कूल के प्रधानाचार्य (या शायद उप- प्रधानाचार्य) ने कहा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;हमारा स्कूल हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा स्कूल उन बच्चों के लिये है जिनके माता पिता के पास बच्चों के लिये समय नहीं है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मुझे अपना जीवन याद आया। मैंने मुन्ने को वहां नहीं भेजा। मैं नहीं चाहता था कि मेरा बेटा कभी सोचे कि हमारे पास उसके लिये समय नहीं था। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन</a> (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Feynman">Richard Philips Feynman</a>) भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार विजेता थे। वे </span><span style="font-size:medium;">पिछली शताब्दी के दूसरे भाग के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक रहें हैं। </span><span style="font-size:medium;">उनकी गोद ली हुई पुत्री ने उनके पत्रों को सजों कर, </span><span style="font-size:medium;"> &#8216;</span><span style="font-size:medium;">Don&#8217;t you have time to think</span><span style="font-size:medium;">&#8216; पुस्तक लिखी है। </span><span style="font-size:medium;"> मैंने, इस पुस्तक के बारे में </span><span style="font-size:medium;">&#8216;<a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/">क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है?</a></span><span style="font-size:medium;">&#8216;</span><span style="font-size:medium;"> नाम से </span><span style="font-size:medium;">श्रंखला लिखी </span><span style="font-size:medium;">है। अपने मुन्ने के साथ बिताये कुछ पलों का जिक्र </span><span style="font-size:medium;">मैंने इस </span><span style="font-size:medium;">श्रंखला की &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think.html">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</a>&#8216; </span><span style="font-size:medium;">चिट्ठी </span><span style="font-size:medium;">में किया है। </span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">अम्मा &#8211; अन्तिम समय पर</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे पिता  अपने काम में व्यस्त रहते थे या फिर समाज सेवा में। उनके पास,  हमारे या मां के  लिये समय नहीं रहता था।  इसलिए मां को जहां भी जाना होता था,  वे  हमारे साथ ही जाती थीं।  यह रवैया हमारी शादी के बाद भी चला।  मेरी पत्नी ने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां दूसरों के मन की बात समझती थीं और उसे  पूरा करने का भरसक प्रयत्न करती थीं। १९८० के दशक में उन्हें दिल की बीमारी हो गयी, अक्सर डाक्टर उन्हें देखने आया करते थे। मेरी सास ने कई साल अमेरिकी विश्विद्यालयों में पढ़ाया है। मेरी शादी के बाद जब वे सबसे पहले पढ़ाने के लिये गयीं तो <a href="http://www.blogger.com/profile/15090591980327578036">मुन्ने की मां</a>, मेरी मां की बीमारी के कारण उन्हें दिल्ली तक  छोड़ने नहीं जा पा रही थी। उसने मुझे कहा कि मैं दिल्ली जाकर उन्हें छोड़ आऊं। मैंने दिल्ली जाने का प्रोग्राम भी बना लिया।  शाम को उसने फोन करके  बताया कि अम्मा  की तबियत खराब है और मैं घर आ जाऊं।  उसने डाक्टर को भी बुला लिया था। जब तक मैं घर पहुँचा, डाक्टर साहब मां  को देख चुके थे और जाने लगे। चलते-चलते जब मैं डाक्टर साहब को उनकी कार तक छोड़ने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;अम्मा की तबियत ठीक है और तुम दिल्ली जा सकते हो।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कहा कि मैं इस बारे में सोचूंगा।  मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था और  दिल्ली नहीं गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां  की तबियत अगले दिन बहुत अच्छी हो गयी। मुझे लगा कि मैंने बेकार ही दिल्ली प्रोग्राम रद्द किया। इसके अगले दिन ही, मां ने सुबह  चाय बनायी। अखबार  पढ़ते-पढ़ते, चाय की चुस्की लेते,  उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे वहां चली गयी जहां से कोई वापस नहीं आता। वे अन्त तक सारे काम स्वयं करती रहीं। उन्हें न कभी किसी सहारे की जरूरत पड़ी, न ही उन्होंने किसी का सहारा लिया, न ही वे ऐसा जीवन पसन्द करती थीं। शायद भगवान भी, जिससे ज्यादा प्यार करता है &#8211; उसे इसी तरह की जिन्दगी, इसी तरह की मौत देता है। हे ईश्वर, मुझे भी इसी तरह की मौत देना।</span></p>
<div style="border-top:7px solid #5c8a64;border-bottom:7px solid #5c8a64;font-size:12pt;font-weight:bold;line-height:100%;padding-bottom:7px;padding-top:7px;width:375px;text-align:center;margin:10px;">अम्मां ने डाक्टर साहब को अपनी तबियत के बारे में न बताने कि कसम दी थी</div>
<p><span style="font-size:medium;">कुछ दिनों बाद,  बातचीत के दौरान मैंने मुन्ने की मां से कहा कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;अच्छा हुआ कि मैं दिल्ली नहीं गया और चला जाता तो मैं कभी अपने आपको माफ नहीं कर पाता पर  मेरी समझ में नहीं  आया कि डाक्टर साहब ने यह कैसे कह दिया  कि मैं दिल्ली जा सकता हूं जबकि अम्मां की तबियत ठीक नहीं थी।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उसने जवाब दिया,<br />
</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;">&#8216;<span style="font-size:medium;">जब तुम नहीं थे तो अम्मा ने डाक्टर साहब से कहा था कि, तुम दिल्ली जाना चाहते हो,  प्रोग्राम बना है और टिकट भी आ गया है, इसलिए डाक्टर साहब तुमसे कह दें कि उनकी तबियत एकदम ठीक है और यह न कहें कि कुछ  टेस्ट करवाने  हैं।   जो भी टेस्ट करवाना है वे अगले दिन आकर लिख देंगे। वे उसकी फीस अलग से दे देंगी। उन्होंने मुझे और डाक्टर सहब को तुम्हें यह न बताने कि    कसम भी  दिलवा दी थी।  इसलिए मैंने तुम्हे नहीं बताया और डाक्टर साहब ने तुम्हे दिल्ली जाने को कह दिया।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मुझे लगा कि वह मरते समय भी, इस बात का ख्याल रखती थी कि हम क्या चाहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हो सकता है कि आज के समय में बेटे और बेटियों का मां से रिश्ता  मदर-डे पर एक कार्ड देना ही रह गया हो पर मैं नहीं समझता कि मां का अपने बेटे और बेटियों से रिश्ता कार्ड तक है। यह कहीं  ज्यादा गहरा, कहीं ज्यादा सच्चा  है। मैं नहीं समझता कि इसे आंकने के लिये कोई नपना है, न कभी कोई नपना बनाया जा सकेगा।</span></p>
<div style="border-top:7px solid #5c8a64;border-bottom:7px solid #5c8a64;font-size:12pt;padding-bottom:7px;padding-top:7px;width:375px;text-align:center;margin:10px;">अगले दो शीर्षक &#8216;<em>मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी</em>&#8216; और &#8216;<em>रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है</em>&#8216; के अन्दर लिखी सामग्री मेरे पत्नी के चिट्ठे &#8216;<a href="http://munnekimaa.blogspot.com/">मुन्ने के बापू</a>&#8216; से है और उसी द्वारा लिखी गयी है। उसी के कहने पर उसे यहां जोड़ा जा रहा है।</div>
<p><strong><span style="font-size:medium;">मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी</span></strong><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Munne ki Maa" src="http://bp0.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkWHK-B5lI/AAAAAAAAAFE/XEcq3ni6U1k/s200/Munne+Ki+maa.jpg" alt="" width="52" height="200" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अधिकतर भारतीय पति पत्नी को आपसी स्नेह  प्रगट करना बहुत मुश्किल है क्या इस पर बदलाव आयेगा?</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">उन्मुक्त  ने भी, आज तक मुझसे,  स्नेह प्रगट करने वाले  शब्द  नहीं कहे हैं, मुझे इनका  <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/04/blog-post_30.html">इंतजार है</a> पर हमारे जीवन में कुछ ऐसा अवश्य हुआ है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह मेरा जन्मदिन हमेशा याद रखते हैं पर लगभग दो दशक पहले मेरे जन्मदिन पर एक बार मुझसे कुछ नहीं कहा। मुझे लगा कि यह मेरा जन्मदिन भूल गये हैं। मैंने भी इन्हे याद नहीं दिलाया पर बुरा जरूर लगा। उस दिन शाम को हमारे मित्र की बिटिया के जन्मदिन की पार्टी एक रेस्ट्राँ में थी। उस समय इनकी एक मीटिंग थी इसलिये ये वहां नहीं जा सकते थे। इन्होने मुझसे जाने के लिये और एक उपहार देने के लिये कहा। मुझे बहुत गुस्सा आया &#8211; मेरा तो जन्म दिन भी याद नहीं और दूसरे के लिये उपहार।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं और हमारा बेटा शाम को रेस्ट्राँ में गये। थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि हमारे मित्र और रेस्ट्रां मालिक मेरे बारे में बात कर रहे हैं। वे मेरी तरफ देख रहे थे और कुछ इशारा सा कर रहे थे। मुझे कुछ अजीब सा लगा। इसके बाद रेस्ट्रां मालिक, फूलों का एक सुन्दर सा गुलदस्ता लाया। मैं समझती रही कि यह तो उस लड़की के लिये होगा जिसका जन्मदिन है पर उसने वह मुझे भेंट किया और कहा कि कोई सज्जन इसे मुझे देने के लिये कह गये थे। मैंने उससे उस सज्जन का नाम पूछा तो उसने कहा कि वह उस व्यक्ति को शक्ल से पहचानता है पर नाम नहीं मालुम। गुलदस्ते के साथ लगे कार्ड में लिखा था</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या बताने की जरूरत है कि यह किसकी तरफ से है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">हमारे मित्र ने बताया कि वह रेस्ट्राँ मालिक, मुझे गुलदस्ता देने में डर रहा था कि कहीं मैं बुरा न मान जाऊं। वह हमारे मित्र से इसी बारे में पूछ रहा था। रेस्ट्राँ मालिक को वास्तव में इनका नाम नहीं मालुम था पर जब उसने हमारे मित्र को गुलदस्ता देने वाले का हुलिया बताया तो मित्र ने उसे अश्वस्त किया कि वह व्यक्ति कोई और नहीं पर मेरे पति ही हैं, वे <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/11/blog-post_28.html">इसी तरह के काम करते हैं</a>। गुलदस्ता देने में कोई हर्ज नहीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शायद रिशतों में यह भी महत्वपूर्ण है कि जीवन  में कुछ न कुछ अप्रत्याशित होते रहना चाहिये।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है<img class="alignright" title="Munne ki Maa" src="http://bp0.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkWHK-B5lI/AAAAAAAAAFE/XEcq3ni6U1k/s200/Munne+Ki+maa.jpg" alt="" width="52" height="200" /></span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">वर्ष २००८ में, उन्मुक्त  फिर से मेरा जन्मदिन फिर भूल गये थे। यह एक बिमारी जूझ कर उठे थे &#8230; मौत के करीब से गुजरे थे। मुझे यही लगा कि यह उसी उलझन में भूल गये। यह समय इन सब बातों को याद दिलाने का नहीं है। मैं भी भूल गयी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे घर के पास एक स्वामी जी योग सिखाते हैं। शाम को वे महिलाओं को अलग से सिखाते हैं। मैं अपनी सखियों के साथ वहां पैदल जाती हूं। उस दिन शाम को लौटते समय, मेरे घर के सामने कई कारें खड़ी थीं। मेरी सखी ने मुझसे कहा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या तुम्हारे यहां कोई दावत है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignleft size-full wp-image-239" title="birthday-cake" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/birthday-cake.png?w=139&#038;h=139" alt="birthday-cake" width="139" height="139" /></span><span style="font-size:medium;">मैंने कहा नहीं, पर लगता है कि कुछ लोग मिलने आयें हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अन्दर पोर्टिको में एकदम नयी बिना नम्बर की कार खड़ी थी। उसमें रिबन लगा था। मुझे लगा कि हमारा कोई मित्र अपनी नयी कार दिखाने आया है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अन्दर ड्रॉइंग रूम में मेरे परिवार के सदस्य, मेरे मित्र थे, एक केक था जिसमें लिखा था जन्मदिन मुबारक और मुझे बाहर नयी कार, मेरे जन्ददिन पर इनकी तरफ से उपहार।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">कार मारुति की ए-स्टार है जो कि ११ नवम्बर को निकली थी। यह उसका सबसे अच्छा और सबसे मंहगा (चार लाख दस हज़ार रुपये) वाला मॉडेल है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="aligncenter" title="Maruti star A" src="http://1.bp.blogspot.com/_XF7hUkNrRB4/SWFIuWxAYJI/AAAAAAAAAF4/E6RrnSQ7-WI/s320/Maruti+star-A.jpg" alt="" width="218" height="129" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह हमारे कस्बे में बिकने वाली इस तरह की पहली कार है। इस कार को, न तो मैंने न ही इन्होंने, इसे चलाया या देखा था। उसके बारे में इन्होंने बिमारी के दौरान नर्सिंग होम के कमरे में टीवी में देखा था और हमारे मित्र से इसे चुपचाप ऑर्डर देने के लिये कहा था। सबके चले जाने के बाद, मैंने इनसे पूछा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;इस समय इतना मंहगा उपहार क्यों? हमें इस समय न केवल पैसों की जरूरत है पर तुम्हें अपने स्वास्थ और समय का भी ध्यान रखना है। तुमने व्यर्थ में ही इस अप्रत्याशित मंहगे उपहार को खरीदा और दावत इन्तजाम करने में समय जाया किया। यह समय इसके लिये नहीं है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इनका जवाब था।</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;हमने ३० साल साथ साथ गुजार लिये हैं। इतने समय बाद <span style="font-size:medium;">रिश्तों में बासीपन आ जाता है। ऐसे में यदि पुराने रिश्तों में नयापान न लाया जाय तो नये रिश्ते कायम हो सकते हैं। पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें कायम होने से बेहतर है।&#8217;</span></span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">महत्वपूर्ण है </span><span style="font-size:medium;">रिश्तों में नयापन लाना, देखना कि वे टूटें नहीं।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर  रिशतों की दुहाई न दो<img class="alignright" title="Unmukt" src="http://bp2.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkV8q-B5kI/AAAAAAAAAE8/Nm9pcBjxl58/s200/Unmukt.jpg" alt="" width="80" height="200" /></span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह कोई बीस साल पहले की बात है, पहली बार, मुन्ने की मां लम्बे समय के लिये विदेश जा रही थी। मुन्ने को कुछ गर्व था तो कुछ दुख कि मां इतने लम्बे समय के लिये छोड़ कर जा रही है। एक दिन उसने मुझसे पूछा, क्या मां हमें प्यार नहीं करती। मैंने कहा नहीं वह हम सबसे बहुत प्यार करती है पर तुम ऐसा क्यों सोचते हो। उसने पूछा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;यदि वह हमसे प्यार करती है तो इतने दिन तक हमें क्यों छोड़ कर जा रही है। हमें कुछ मुश्किल होगी तो कौन बतायेगा।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैं  उसे कैसे बताऊं ।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमने बैठ कर कई मुद्दों पर बात की। मैंने कहा, मैं तो रहूंगा, तुम्हें कोई मुश्किल नहीं होगी। उन्होने पूछा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या तुम्हारे पास समय है&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कहा कि जब मां थी तो वह समय निकालती थी, जब तक वह नहीं है, तब मैं निकालूंगा। उनको यह बताने का प्रयत्न किया,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;प्यार तो विश्वास है, यह लोगों को बांधता नहीं पर उन्हें अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता देता है जो  उनके जीवन में महत्वपूर्ण है। रिश्तों का बांध कर रखना ठीक नहीं।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैं नहीं जानता कि मुन्ना कितना समझ पाया पर यह सच है कि उसने अपनी मां का विदेश जाना, स्वीकार कर लिया। उसके पीछे, वह बहुत खुश भी रहा। मैं नहीं जानता कि वह इसलिये की उसे </span><span style="font-size:medium;">मेरी बात समझ में आयी या इस लिये कि उसकी मां तो आर्मी की जनरल साहिबा हैं और मैं &#8211; शायद भावना में हर पल को जीने वाला। मुन्ने को इतनी छूट कभी नहीं मिली &#8211; इस समय भी नहीं,  जब वह अपना बसेरा, सात समुन्दर पार, बहुत दूर, बसाने चला गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पिछले साल हम सब, मेरा बेटा, बिटिया रानी (मेरी बहूरानी) साथ थे। मैंने पूछा,</span><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Munna and Parri" src="http://unmukts.files.wordpress.com/2009/02/munna-pari.jpg?w=164&amp;h=262&#038;h=140" alt="" width="164" height="140" /></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उनका जवाब था,</span></p>
<blockquote><p>&#8216;<span style="font-size:medium;">पापाऽऽ!! यह कैसा सवाल है।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने बहुत सीरियस हो  कर पूछा तुम लोग  बहुत दूर,  सात समुंदर पार चले गये हो बस इसलिये जानना चाहा। वह, मेरी सीरियस मुद्रा देखकर समझ गया। उसने मुस्कराते हुऐ, जवाब दिया,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;पापा, हमें तुम्हारी बीस साल पहले की बात आज भी याद है।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वह मुझसे कहता है कि मैं भी वहीं उसके पास आ जाऊं  पर मैं जानता हूं कि मेरा जीना यहां ही है और मेरी मौत भी यहीं होगी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार तो है बस विश्वास, इसे बांध कर  रिशतों की दुहाई न दो। यदि बांध कर रोका तो यही होगा, जैसा यहां हुआ <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">खामोशी फिल्म १९६९ में आयी। इसका निर्देशन असित सेन ने किया है। इसमें राजेश खन्ना और वहीदा </span><span style="font-size:medium;">रहमान ने मुख्य भूमिका निभायी थी।  कहानी इस प्रकार है कि राजेश खन्ना एक असफल प्रेम प्रसंग के कारण अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। पागलखाने में राधा नाम की एक नर्स हैं जिसका किरदार वहीदा रहमान ने निभाया है। डाक्टर, वहीदा रहमान को राजेश खन्ना के साथ प्रेम का नाटक करने को कहते हैं। राजेश खन्ना तो ठीक हो जाते हैं पर वहीदा रहमान अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है क्योंकि इसके पहले धर्मेन्द्र के साथ प्रेम का नाटक करते-करते वह सच में उससे प्रेम करने लगती है और बार-बार प्रेम का नाटक नहीं कर सकती।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">खामोशी की सहृदय नर्स राधा के किरदार में वहीदा का अभिनव अद्वितीय है इसको उनकी जैसी संवेदनशील कलाकारा ही अभिनीत कर सकती थीं कोई और नहीं। हांलाकि मुझे इस फिल्म की कहानी में कोई दम या सत्यता नहीं लगती।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस फिल्म में गुलजार का लिखा एक गीत है जिसे लता मंगेशकर ने गाया है। यह गाना मेरे प्रिय गानो में से एक है। इसके बोल इस प्रकार हैं:</span><span style="font-size:medium;"><img class="alignright size-full wp-image-280" title="khamoshi" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/khamoshi.jpg?w=205&#038;h=234" alt="khamoshi" width="205" height="234" /></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हाँथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार कोई भूल नहीं, प्यार आवाज नहीं,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक खामोशी है, सुनती है कहा करती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">न ये झुकती है न रूकती है न ठहरी है कहीं,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मुस्कराहट से खिली रहती है आँखों में कहीं,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">और पलकों के उजाले से झुकी रहती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">होंठ कुछ कहते नहीं काँपते ओठों से मगर,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसमें खामोशी के अफसाने रूके रहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस गाने को, विडियो में भी सुन सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/"><img src="http://img.youtube.com/vi/n794N0DzMQc/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">जहां तक मैं समझता हूं, यही है इस चिट्ठी का सरांश, यही है। इस जमाने की रमती खुशबू, यही है &#8211; रिश्तों की महकती खुशबू। रिश्ते तो हैं विश्वास, इसे बांध कर  मत रखो &#8211;  प्रेम तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">पुनःलेख &#8211; जीना इसी का नाम है</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह श्रंखला मुझे, मेरे बचपन के जीवन की यादों में, मेरे उन्मुक्त दिनों के बीच ले गयी। वे दिन ही मेरे जीवन के सबसे सुखद दिन थे, चिन्ता रहित थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस श्रंखला को लिखते समय, एक शादी के समय, हम सब भाई, बहन, हमारे बेटे, बेटियां, बहुरानियां, दामाद सब साथ थे। हमने अपनी मां के साथ के, अपने बचपन के दिनों को फिर से जिया। उन चिट्ठियों को पढ़ने के बाद हम सब की आंखें नम थीं। हांलाकि हमारी आने वाली पीढ़ी उसे उतना नहीं समझ पायी जितना हम चाहते थे। समय बदल गया, समीकरण बदल गये, समाज का ढांचा बदल गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हम सब ने अपने सुखद दिनो की याद की, उनमें पुनः जिया। इस तरह की अनुभूति जीवन में प्रसन्नता एवं उत्साह भरता है और जीवन में कुछ नया करने को न केवल प्रेरित करता है पर इसकी हिम्मत भी देता है। इस श्रंखला ने वह सब न केवल मेरे साथ पर हमारे परिवार के साथ किया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस श्रंखला कि एक चिट्ठी शैली (Percy Bysshe Shelley) कि कविता &#8216;To a Skylark&#8217; की एक पंक्ति &#8216;Our sweetest songs are those that tell of saddest thought&#8217; है। इस कविता आप <a href="http://www.keats-shelley-house.org/poem_shelley_1.php">यहां</a> पढ़ सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं अंग्रेजी या हिन्दी साहित्य का कभी भी विद्यार्थी नहीं रहा। कुछ थोड़ा बहुत अपने आप ही पढ़ा है। शैली को भी तभी पढ़ा था। जब मैं इस विषय पर लिखने की सोचने लगा तो मैंने अपने एक मित्र उसकी पत्नी से फोन कर शैली की उस पंक्ति का मतलब समझाने को कहा। वे दोनो अंग्रेजी विषय पढ़ाते हैं। तीन दिन बाद मिलना तय हुआ। हम लोग रात में देर तक शैली और रुमानी कवियों के बारे में बात करते रहे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">कुछ देर बाद मेरे मित्र की पत्नी ने मुझ धन्यवाद दिया। मझे आश्चर्य हुआ और पूछा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;तुम मुझे क्यों धन्यवाद दे रही हो? धन्यवाद तो, मुझे तुम लोगों को देना चाहिये।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उसने कहा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;हम दोनो अंग्रेजी पढ़ाते हैं। पढ़ाना, हमारे लिय उस दैनिक कार्य की तरह है जैसे दाल रोटी खाना, बस और कुछ नहीं। तुम्हारे द्वारा, शैली की उस पंक्ति का अर्थ पूछने पर, अन्य अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच इस विषय पर चर्चा हुई और एक अच्छी बहस हुई कि उस पंक्ति का क्या अर्थ है। हमने तुम्हारे सवाल के जवाब पाने के लिये कई सुनहरे पल बहस में गुजारे। यह सब इसलिये हुआ कि तुम्हें शैली के बारे में उतनी उत्सुकता है। यह धन्यवाद, हमें सुनहरे पल वापस देने के लिये है।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="size-full wp-image-269 alignright" title="Anari" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/anari.jpg?w=108&#038;h=148" alt="Anari" width="108" height="148" /></span><span style="font-size:medium;">मुझे <a href="http://unmukth.wordpress.com/2008/10/19/goa-india/">गोवा यात्रा</a> से हवाई जहाज पर लौटते समय, विमान परिचारिका की कही बात, &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/goa.html">अंकल तो बच्चे हैं</a>&#8216;, याद आ गयी। जीवन में जिज्ञासू बनना, उत्सुक रहना, कुतूहल जताना तो बच्चों का काम है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शायद जिंदादिली ही उत्सुकता का दूसरा नाम है और यही है, जीवन, जीने का दर्शन।</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">जीवन को दुसरे रूप में देखने की बात तो अनाड़ी फिल्म का यह गाना भी बताता है।  यह गाना मुकेश ने गाया है और इसे राज कपूर पर फिल्माया गया है। इसका भी आनन्द लीजिये।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/"><img src="http://img.youtube.com/vi/awelkdyDTBc/2.jpg" alt="" /></a></span><br />
</span></p>
<p style="text-align:center;">सांकेतिक शब्द</p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:small;"><a href="http://technorati.com/tag/Culture">culture</a>, <a href="http://wordpress.com/tag/life/">Life</a>, </span><span style="font-size:small;"><a href="http://technorati.com/tag/Life">life</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%80">जीवन शैली</a>, <a href="http://samaj.chitthajagat.in/">समाज</a>, कैसे जियें, जीवन, दर्शन, </span><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8">दर्शन</a>, <span style="font-size:small;">जी भर कर जियो, </span><br />
<a href="http://vijyan.chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE">धर्म</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;amp;amp;amp;TagText=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE">धर्म- अध्यात्म</a>,</p>
<div><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sex_education">Sex education</a>,  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AF%E0%A5%8C%E0%A4%A8%20%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">यौन शिक्षा</a>,</div>
<div>film, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Film">film</a>, film review, फिल्म, फिल्म समीक्षा, <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">फिल्म समीक्षा</a>,  <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%A8">फिल्म टेलिविज़न</a>,</div>
<p><span style="font-size:small;"> </span>book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
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			<media:title type="html">Munna and Parri</media:title>
		</media:content>

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			<media:title type="html">khamoshi</media:title>
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			<media:title type="html">Anari</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है?</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/</link>
		<comments>http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 15:19:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवनी]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[book review]]></category>
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		<description><![CDATA[यह चिट्ठी रिचर्ड मिशेल फाइनमेन के द्वारा फिलिप्स फाइनमेन के पत्रों को संकलित कर प्रकाशित पुस्तक 'डोन्ट यू हैव टाइम' की समीक्षा है। This is book review of the book 'Don’t you have time to think’ written by Michelle Feynman.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=72&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="center"><em>यह लेख रिचार्ड फाइनमेन के लिखे पत्रों संग्रहीत कर लिखी गयी पुस्तक &#8216;क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है&#8217; (Don&#8217;t you have time to think) की पुस्तक समीक्षा है और इन पत्रों के माध्यम से उनके दर्शन, उनके जीवन के मूल्यों पर भी एक नज़र डालती है।</em></p>
<p align="center"><em>यह लेख मेरे ‘<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com">उन्मुक्त</a>‘ चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुकी है। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहते हैं तो नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।</em></p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think.html">पुस्तक &#8211; Don’t you have time to think?</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/do-you-have-time-to-think.html">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think_29.html">गायब</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/time-to-think.html">मानद उपाधि</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/time-to-think_10.html">खेलो कूदो और सीखो</a>।।  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/time-to-think_25.html">अधिकारी, विशेषज्ञ</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/time-to-think.html">काम  से ज्यादा महत्व,  उसे करने में है</a>।।  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/time-to-think_23.html">गणित</a>।।</p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि २०वीं शताब्दी के पहले भाग में सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन (<a class="zem_slink" title="Albert Einstein" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Albert_Einstein">Albert Einstein</a>) थे तो दूसरे भाग में यह श्रेय <a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन</a> (<a class="zem_slink" title="Richard Feynman" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Feynman">Richard Philips Feynman</a>) को है। १९६६ में उन्हें,  भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार मिला। मिशेल (<a class="zem_slink" title="Michelle Feynman" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Michelle_Feynman">Michelle Feynman</a>) उनकी गोद ली पुत्री हैं। उन्होने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों का संकलन कर के &#8216;Don’t you have time to think’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है।</span></p>
<p><a title="dont-you-have-time-to-think.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg?w=116&#038;h=172" alt="dont-you-have-time-to-think.jpg" width="116" height="172" /></a></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस पुस्तक की प्रस्तावना में मिशेल अपने बचपन वा अपने पिता के बारे में बताती हैं। वे अपने पिता और अपने बड़े भाई कार्ल को एक दूसरे से विज्ञान के बारे में बात करते हुऐ सोचती हैं कि उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में क्यों नहीं कार्य किया। उन्हें लगता है कि इस कारण कार्ल अपने पिता के साथ ज्यादा पास थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">उन्हें अपना घर और घरों से अलग लगता था। रविवार के दिन फाइनमेन सुबह अखबार नहीं पढ़ते थे पर वह सब लोगों के साथ, संगीत सुनाते थे; ड्रम बजाते थे; और कहानी किस्से सुनाते थे। जब कभी प्रारम्भिक शिक्षा के स्कूल में बच्चों को ले जाने की फाइनमेन की बारी होती थी तो वह अक्सर गाड़ी चलाते हुये या तो केलटेक की तरफ चले जाते थे या नाटक करते थे कि वे रास्ता भूल गये। इस पर सब बच्चे चिल्लाने लगते थे कि यह गलत रास्ता है। फिर फाइनमेन का जवाब होता था कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;अच्छा, यह रास्ता नहीं है&#8217;</span></p></blockquote>
<p><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-4.thumbnail.jpg" alt="feynman-4.jpg" /><em>फाईनमेन लॉस एलमॉस की प्रयोगशाला जाते समय।</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह कहकर वह पुन: दूसरा गलत रास्ता पकड़ लेते थे। बच्चे फिर चीखते थे,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>‘नहीं..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ।’</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">बच्चों को लगता था कि वे स्कूल समय से नहीं पहुंच पायेंगे और उन्हें सजा मिलेगी पर फाइनमेन हमेशा बच्चों को स्कूल समय से पहुंचा देते थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मिशेल कहती हैं कि,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>&#8216;मेरे पिता कई हुनर में माहिर थे पर उनका वह हुनर सबसे खास था जिसमें वह अपने को एक बेवकूफ सा दिखने का नाटक करते थे और मुझे सोचने देते थे कि वे मेरी बातों से बेवकूफ बन गये हैं। इस बात ने मेरे बचपन को सबसे ज्यादा निखारा है।&#8217;</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मिशेल यह भी बताती हैं कि, वे बहुत सालों तक नहीं जानती थी कि सब लोग उनके पिता फाइनमेन का सम्मान एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति की तरह से करते थे। उनके मुताबिक,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>&#8216;मेरे पिता फाइनमेन हमेशा लोगों को अपने बारे में अश्रद्धा रखने को प्रेरित करते थे। वे अक्सर ऐसी कहानियां सुनाया करते थे जिसमें उनकी बेवकूफी झलकती थी। रात के खाने पर वे बताया करते थे कि, किस तरह वह अपना स्वेटर भूल गये; या कुछ महत्वपूर्ण सूचना भूल गये; या लोगों से बात होने के बाद उन्हें उनका नाम याद नहीं रहा। उनकी कान्फ्रेन्स नये-नये होटलों में होती थी। वे अक्सर उससे बोर होकर अपना सामान लेकर जंगल चले जाया करते थे और वहीं कैम्पिंग कर रात बिताते थे। लौट कर, चटकारे लेकर इसका अनुभव हमें सुनने को मिलता था। मेरी मां इस पर हमेशा टिप्‍पणी करती थीं “ओह रिचर्ड” वह हमेशा अपने ऊपर हंसते थे और हम उनके ऊपर।‘</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाईनमेन अपने स्कूल की सहपाठी अरलीन से प्यार करते थे। नौकरी मिलने के बाद उसी के साथ शादी रचाने की बात थी। लेकिन अरलीन को तपेदिक की बीमारी हो गयी। फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे फिर भी उन्होंने उससे शादी की।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं हमेशा सोचता था कि इस तरह की बात तो केवल कहानियों या फिर फिल्मों में होता है, वास्तविक जीवन मैं नहीं, पर मैं गलत था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे में फाइनमेन ने अपनी मां को एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें लिखा कि,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>‘I want to marry Arline because I love her &#8211; which means I want to take care of her. That is all there is to it. I want to take care of her.’<br />
<span style="font-size:medium;">मैं अरलीन से शादी करना चाहता हूं क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूं &#8211; इसका अर्थ यह है कि मैं उसकी देख भाल करना चाहता हूं</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार का यह भी एक अर्थ – एकदम सत्य।  हां इसका एक और अर्थ <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-story.html">यहां</a> भी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस किताब में एक पत्र श्री वी.के. सिंह, अध्यापक भौतिक शास्त्र, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर, का भी है। ये फाइनमेन की पुस्तक <a class="zem_slink" title="The Feynman Lectures on Physics" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Feynman_Lectures_on_Physics">Lectures on Physics</a> की तुलना रामायण से करते है और कहते हैं कि इसका अध्ययन भी, उतनी ही बारीकी से करना चाहिए जैसे कि रामायण का किया जाता है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसमें इलाहाबाद के श्री मदन मोहन पंत के पत्र का जिक्र है जिसमें पंत ने फाइनमेन को अपना पेन टीचर के कहा है।<a title="feynman-3.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.jpg"><br />
</a><br />
</span></p>
<p align="center"><strong><span style="font-size:medium;">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">&#8216;कयामत से कयामत तक&#8217; की पिक्चर का एक गाना है,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा,<br />
<span style="font-size:medium;">बेटा हमारा ऐसा काम करेगा।<br />
<span style="font-size:medium;">मगर यह तो कोई न जाने,<br />
<span style="font-size:medium;">कि मेरी मंजिल है कहां।</span><br />
</span></span></span></p>
<p align="center"><em>इस गाने को देखें और सुने</em>
</p>
<p align="center"><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/cFAtfdFHaDk/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">
<p align="left">मैंने इस पिक्चर को नहीं देखा है पर यह गाना मुझे बहुत पसन्द है। लेकिन किसी के पापा का केवल यह कहना या सोचना कि &#8211; बेटा ऐसा काम करेगा &#8211; पर्याप्त नहीं है। बेटा कोई अच्छा काम करे, इसके लिये पापा को बहुत कुछ करना पड़ेगा। अब यदि फाइनमेन के जीवन को देखें तो पायेंगे कि उसमें, उनके पिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उनको विज्ञान में रुचि पैदा करने में, उनके पिता का बहुत बड़ा हाथ था।</p>
<p><span style="font-size:medium;">NBC टेलीविजन ने १९६१ में &#8216;About time&#8217; नामक फिल्म विज्ञान सीरीस के अर्न्तगत बनायी थी। फाइनमेन इसमें वैज्ञानिक सलाहकार थे। इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले जब इसके बारे में जब लिखा जाने लगा तो फाइनमेन से पूछा गया कि उन्हें विज्ञान मे किस प्रकार से रुचि आयी तो उन्होंने बताया कि,</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>&#8216;My father, a businessman, had a great interest in science. He told me fascinating things about the stars, numbers, electricity, etc. Wherever we went there were always new wonders to hear about; the mountains, the forest, the sea. Before I could talk he was already interesting me in mathematical designs made with blocks. So I have always be a scientist. I have always enjoyed it, and thank him for this great gift to me.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">मेरे पिता व्यपारी थे पर उन्हें विज्ञान में उन्हें रुचि थी।  वे मुझे विज्ञान की रोचक बातें बताते थे &#8230; इसलिये मैंने वैज्ञानिक बनने की सोची। मुझे इसमें हमेशा मजा आया और इसके लिये मैं अपने पिता को धन्यवाद देता हूं।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">१९८१ में रौडिनी ल्यूस को पत्र लिखते हुऐ फइनमेन बताते हैं कि नीरस पाठ्य पुस्तक से मत घबराओ। उनको केवल तथ्यों के लिये पढ़ो, फिर उन बातों को प्रकृति के आश्चर्य की तरह सोचो और अपनी तरह से समझने की कोशिश करो। वे आगे बताते हैं कि किस प्रकार उनके पिता ने उन्हें इस तरह से सोचने के लिये प्रेरित किया। वे कहते हैं कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p>&#8216;My father taught me how to do that when I was a little boy on his knee and he read the Encyclopaedia Britannica to me! He would stop every once in a while and say—now what does that really mean. For example, “the head of tyrannosaurus rex was four feet wide, etc.” —it means if he stood on the long outside his head would look in at your bedroom on the second floor, and if the poked it in the window it would break casement on both sides. Then when I was a little older when would read that again he would remind me of how strong the next muscles had to be—of ratios of weight and muscle area—and why land animals can’t become size of whales—and why grasshoppers can jump just about as high as a horse can jump. All this, by thinking about the size of a dinosaur’s head!&#8217;</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">सच, हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। उनको अच्छे संस्कार मिलना, उनका ठीक दिशा में रहना ही हमारी सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वे अच्छे व्यक्ति बने, इसका दायित्व हम पर है। पुरानी कहावत है,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">हम अक्सर अपने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हे अच्छी बातें बताना &#8211; जो कि सबसे महत्वपूर्ण है &#8211; भूल जाते हैं।</span></p>
<p align="center"><a title="mischelle-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.thumbnail.jpg" alt="mischelle-1.jpg" /></a></p>
<p align="center"><em>मिशेल का यह चित्र फइनमेन ने बनाया है</em></p>
<p align="center"><strong>गायब</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कुछ समय पहले दो चिट्ठियां &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/07/22/invisible-1/">अदृश्य हो जाने का वरदान</a>&#8216;, और &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/08/05/invisible-curse/">अदृश्य हो जाने का अभिशाप</a>&#8216; शीर्षक से छुटपुट चिट्ठे पर लिखीं। इसमें यह बताया कि अदृश्य हो जाना अभिशाप है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अन्धा हो जायेगा। लोग, अन्धे हो जाने वाली बात न समझते हुऐ, अदृश्य हो जाने कि इच्छा रखते हैं और इसके लिये तरीका ढूढते रहते हैं। नेवा नामक व्यक्ति ने एक बार फाइनमेन से यह सवाल पूछा कि क्या कोई तरीका है जिसके द्वारा अदृश्य हुआ जा सकता है। इसका उत्तर देते समय फाइनमेन अगस्त १९७५ लिखते हैं कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;I would suggest that the best way to get a good answer to your question is to ask a first-rate professional magician. I do not mean this answer to be facetious or humorous, I am serious. A magician is very good at his making things appear in an unusual way without violating any physical laws, by arranging matter in a suitable way. I know of no physical phenomenon such as X-rays, etc., which will create invisibility as you want, therefore, if it is possible at all it will be in accordance with familiar physical phenomenon. That is what a first-rate magician is good for, to create apparently impossible effect from “ordinary” causes.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इसका अर्थ तो यह हुआ कि असंभ्व है।<br />
</span></p>
<p align="center"><strong>मानद उपाधि</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">आजकल मानद उपाधि का जमाना है। जिस विश्व विद्यालय को देखो वही दे रहा है और सब इसे स्वीकार कर रहें हैं। फाइनमेन को दुनिया के हर देश के विश्वविद्यालय मानद उपाधि से विभूषित करना चाहते थे। १९६७ में, सबसे पहले शिकागो विश्व विद्यालय ने उन्हें मानद उपाधि से विभूषित करने की बात की। उन्होने इसे अपने लिये सम्मान की बात बतायी, पर स्वीकारा नहीं। उनका कहना था कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;I remember the work I did to get a real degree at Princeton and the guys on the same platform receiving honorary degrees without work — and felt an “honorary degree” was a debasement of the idea of a “degree which confirms certain work has been accomplished.” It is like giving an “honorary electrician license”. I swore then that if by chance I was ever offered one I would not accept it.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">जब कभी कोई उन्हे मानद उपाधी देने की बात करता, तो हमेशा उनका यही जवाब रहता था।<br />
</span></p>
<p align="center"><strong>खेलो, कूदो और सीखो</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">जीवन में हमें वह करना चाहिये जो हमें पसन्द हो &#8211; चाहे उसका कोई महत्व हो अथवा नहीं। महत्व अपने आप निकल आता है। मैंने फाइनमेन के बारे में लिखते समय वह किस्सा बताया था जब वे कॉरनल विश्विद्यालय के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे २:१ का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;इसका कोई महत्व नहीं है मैं यह सब मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">लेकिन जब वे एलेक्ट्रॉन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कॉरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी<br />
<a title="feynman-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.thumbnail.jpg" alt="feynman-1.jpg" align="right" /></a> गणित फिर से याद आने लगी। उस काम का महत्व हो गया। उसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला।</span></p>
<p><a title="feynman-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg"><br />
</a></p>
<p><a title="feynman-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg"> </a></p>
<p><span style="font-size:medium;">उन्होने इस बात को न केवल अपने जीवन में उतारा पर यही सलाह औरों को भी दी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><span style="font-size:medium;">एक बार सोलह साल के लड़के ने उन्हें पत्र लिख कर यह सलाह मांगी कि वह क्या करे। उनका जवाब था कि,<br />
</span></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;It is wonderful if you can find something you love to do in your youth which is big enough to sustain your interest through all your adult life. Because, whatever it is, if you do it well enough (and you will, if you truly love it) people will pay you to do what you want to do anyway.&#8217;</span></p></blockquote>
<p>उनके मुताबिक,</p>
<ul>
<li> <span style="font-size:medium;">बहुत ज्यादा पढ़ना; या</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> किताबी कीड़ा बना रहना; या</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">अपने उम्र से ज्यादा पढ़ाई करना,</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size:medium;">ठीक नहीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">वे देखने और सीखने में विश्वास करते थे। एक बार , एक भारतीय बच्चे ने उन्हें एक पत्र परमाणु विज्ञान के बारे में लिखा। उनकी सलाह थी,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Your discussion of atomic forces shows that you have read entirely too much beyond your understanding. What we are talking about is real and at hand: Nature. Learn by trying to understand simple things in terms of other ideas—always honestly and directly. What keeps the clouds up, why can’t I see stars in the day time, why do colours appear on oily water, what makes the lines on the surface of water being poured from a pitcher, why does a hanging lamp swing back and forth &#8211; and all the innumerable little things you see all around you. Then when you have learn to explain simpler things, so you have learn what an explanation really is, you can then go on to more subtle questions.<br />
<span style="font-size:medium;">Do not read so much, look about you and think what you see there.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">तुम्हारी बातों से लगता है कि तुमने अपनी समझ से ज्यादा पढ़ लिया है &#8230; इतना मत पढ़ो, अपने चारों तरफ देखो और इसके बारे में सोचो।</span></span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">बचपन में बड़े, बूढ़ों से सुना करता था,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;खेलो कूदोगे तो होगे बर्बाद,<br />
<span style="font-size:medium;">पढ़ोगे लिखोगे तो होगे नवाब।&#8217;</span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">शायद इसे इस तरह से कहना चाहिये,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;खेल, कूद कर सीखोगे,<br />
<span style="font-size:medium;">केवल तब ही बनोगे, नवाब।&#8217;</span></span></p></blockquote>
<p><a title="feynman-3.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.thumbnail.jpg" alt="feynman-3.jpg" align="right" /></a></p>
<p align="right"><em>फाइनमेन को बॉंगो बजाना प्रिय था</em></p>
<p align="center"><strong>अधिकारी, विशेषज्ञ</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन का हमेशा कहना था कि किसी बात को तब स्वीकार करो जब वह तर्क पर खरी उतरे, उसे केवल किसी के कहने पर न स्वीकार करो। १९७६ में मार्क को पत्र लिखते समय सलाह दी कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Don’t pay attention to “authorities,” think yourself.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">अपनी पुस्तक Lectures on Physics में एक जगह उन्होने लिखा था कि<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;No static distribution of charges inside a closed conductor can produce any electric field outside.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">एलिज़बेथ ने भौतिक शास्त्र में एक कोर्स लिया था। परीक्षा में एक सवाल का यही जवाब दिया। इस पर उसके शिक्षक ने उसे कोई नम्बर नहीं दिया क्योंकि यह बात गलत थी। शिक्षक ने एलिज़बेथ को यह भी बताया कि यह किस प्रकार से गलत है। एलिज़बेथ ने जब इसके बारे में फाइनमेन को पत्र लिखा। तो फाइनमेन का जवाब था,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Your instructor was right not to give you any points for your answer was wrong, as he [the teacher] demonstrated using Gauss’ Law. You should, in science, believe logic and arguments, carefully drawn, and not authorities.<br />
&#8230;<br />
<span style="font-size:medium;">You also read the book correctly and understood it. I made a mistake, so the book is wrong &#8230; I am not sure how I did it, but I goofed. And you goofed too, for believing me.<br />
<span style="font-size:medium;">तुम्हारे अध्यापक ने ठीक तुम्हें नंबर नहीं दिये क्योंकि तुम्हारा जवाब सही नहीं था   विज्ञान में तुम्हे तर्क पर विश्वास करना चाहिये न कि किसी अधिकारी,या विशेषज्ञ पर। &#8230;<br />
<span style="font-size:medium;">तुमने मेरी किताब को सही समझा, मैंने ही गलती कर दी थी &#8230; मैं नहीं जानता कि यह कैसे हो गया पर मैं गलत था और तुम भी &#8211; मुझ पर विश्वास करने के लिये।</span></span></span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">बड़े व्यक्तियों का पहला गुण – यदि वे गलत हैं, तो स्वीकार करने में कभी नहीं हिचकते।</span></p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/HKTSaezB4p8/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>बॉंगो बजाते हुऐ फइनमेन</em></p>
<p align="center"><strong>काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">हम सब के जीवन में कोई न कोई आदर्श रहा है। मेरे जीवन में &#8211; एक नहीं, कई रहे। उन्होने अलग अलग तरह से मेरे जीवन, मेरी विचारधारा पर असर डाला। इनमे से कईयों से कभी नहीं मिला। फाइनमेन उनमें से एक थे। उनके मुताबिक काम से ज्यादा महत्व उसे करने में है: जो अच्छा लगे, जिसमें मन लगे &#8211; वह करो पर करो उसे बढ़िया।</span></p>
<p align="right">
<p><span style="font-size:medium;">एक बार कोची नामक एक विद्यार्थी ने फाइनमेन को पत्र लिखा कि वह भौतिक शास्त्र के साधारण विषय पर काम कर कर रहा है और नामरहित है। इस पत्र ने फइनमेन को दुखी किया। उन्हें लगा कि कोची के अध्यापक ने उसे ठीक से नहीं बताया कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं है। फाइनमेन ने कोची को पत्र लिखा कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;The worthwhile problems are the once you can really solve or help solve, the ones you can really contribute something to. A problem is grand in science if it lies before us unsolved and we see some way for us to make a little headway into it.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन का सुझाव था कि पहले छोटी छोटी और आसान मुश्किलों का हल खोजो जो कि आसानी से मिल सकता है। उनके मुताबिक,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;"><span style="font-size:medium;">&#8216;You will get the pleasure of success, and of helping your fellow man, even if it is only to answer a question in the mind of a colleague less able than you. You must not take away from yourself these pleasures because you have some erroneous idea of what is worthwhile.&#8217;</span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन ने पत्र में यह भी बताया कि उन्होने स्वयं,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;I have worked on innumerable problem that you would call humble, but which I enjoyed and felt very good about because I sometimes could partially succeed.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन का मानना था कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;You do any problem that you can, regardless of field.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">न तो सरदर्द लेने की जरूरत है न ही घबराने की &#8211; कयोंकि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;In no field is all the research done. Research leads to new discoveries and new questions to answer by more research.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उनके अनुसार,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;No problem is too small or too trivial if we can really do something about it.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">यदि हम किसी मुश्किल का हल ढूढ़ने में कुछ कर सकते हैं तो वह न तो छोटी है और न ही बेकार।</span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">पत्र में फानमेन, आगे लिखते हैं कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;You say you are a nameless man. You are not to your wife and to your child. You will not long remain so to your immediate colleagues if you can answer their simple question when they come into your office. You are not nameless to me. Do not remain nameless to yourself — it is too sad a way to be. Know your place in the world and evaluate yourself fairly, not in terms of the naïve ideals of your own use, nor in terms of what you erroneously imagine your teacher’s ideals are.&#8217;</span></p></blockquote>
<p align="center"><strong>गणित</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">भौतिक शास्त्र मेरा प्रिय विषय था। <a href="http://www.blogger.com/profile/15090591980327578036">मुन्ने की मां</a> को गणित अच्छी लगती है। मैं हमेशा कहता हूं कि भौतिक शास्त्र तो रानी है और गणित नौकरानी &#8211; जहां चाहो लगा लो।</span></p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/hRAbke411Zw/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>फाइनमेन तो जिज्ञासू थे। उनके कुछ अन्य विडियो <a href="http://www.youtube.com/results?search_query=richard+feynman&amp;search=Search">यहां </a>देखिये।</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">फ्रेड्रिक हिप्प १६ साल के नवयूवक ने १९६१ में फाइनमेन को पत्र लिख कर बताया कि भौतिक शास्त्र उसे अच्छा लगता है पर गणित पसंद नहीं आती है। वह क्या करे। फाइनमेन ने उसे लिखा कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;To do any important work in physics a very good mathematical ability and aptitude are required. Some work in applications can be done without this, but it will not be very inspired.<br />
<span style="font-size:medium;">If you must satisfy your “personal curiosity concerning the mysteries of nature” what will happen if these mysteries turn out to be laws expressed in mathematical terms (as they do turn out to be )? You cannot understand the physical work in any deep or satisfying way without using mathematical reasoning with facility.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">भौतिक शास्त्र में अच्छा काम करने के लिये अच्छी गणित का ज्ञान होना आवश्यक है &#8230; विज्ञान के बहुत सारे रहस्य, वे नियम हैं जो गणित के द्वारा ही समझे जा सकते हैं।  भौतिक विज्ञान को अच्छी तरह से बिना गणित के नहीं समझा जा सकता है।</span></span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">गणित के यही गुण उसे गणित को राजरानी बनाते हैं। विज्ञान में गणित के बिना ठौर नहीं। मुझे तो मालुम है कि मुन्ने की मां तो हमेशा सही रहती है, उससे जीत पाना संभव नहीं।</span></p>
<p><a title="feynman-2.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.jpg"></a></p>
<p style="text-align:center;"><a title="feynman-2.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.thumbnail.jpg" alt="feynman-2.jpg" width="141" height="107" /></a></p>
<p align="center"><em>कैल टेक में पढ़ाते हुऐ</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस पुस्तक ने मुझे कई बातों की याद दिलायी:</span></p>
<ul>
<li> <span style="font-size:medium;">मेरे बचपन की;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">कई ऐसे व्यक्तियों की जिन्होने मेरे बचपन में, मुझ पर सबसे ज्यादा असर डाला;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">कुल्लू मनाली में एक बिस्किट के पीछे, पूरी नदी पैदल पार करने की;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उन क्षणों की भी, जो मैंने अपने बच्चों के साथ पहेली बूझते हुऐ बिताये;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उनके साथ बिताये, नदी के किनारे तारों, लियोनिडस्, और पुच्छल तारे को देखते हुऐ रातों की;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उनके साथ बिताये, दुधुवा, जिम कौर्बेट, कान्हा, बान्धवगढ़, मदुमलाई, और बंदीपुर के जंगलों की;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> उन पिकनिकों की, जिसमें हमने सारा समय केकड़े और मछलियां पकड़ने में बिता दिया;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">मेले में उन रातों की, जो हमने हांथ की रेखायें पढ़ने, और नौटंकी , जादू देखने में गुजार दिये;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">पंचमढ़ी के जंगलों की, जब हम पानी के झरने के लिये छोटे रास्ते पर चलते जंगल में खो गये थे;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">पंचमढ़ी में पीछा करती मधुमक्खियों की, जिससे पानी के झरने में कूद कर जान बचायी;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> बम्बई में गोरे गांव में मिल्क डेरी की, जहां पर रेलिंग ही मुन्ने के उपर गिर गयी और बस हमें वहीं छोड़ के चली गयी, तब कई किलोमीटर की दूरी मुन्ने को गोदी में ले जाने की;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> चुनाव में उस उपद्रव की, जब चुनाव की निष्पक्षता कराने के पीछे मेरा सर पर अध्धा मार दिया गया, पांच टीके लगे, और मैं अब भी नहीं समझ पाता कि में उस दिन कैसे बच गया;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उस सभा की जब अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के खिलाफ बोलने पर लोग चप्पल से मारने मंच पर आ गये।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size:medium;">यह आपको भी कुछ ऐसी ही यादों पर वापस ले जायगी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस पुस्तक में फाइनमेन के लिखे हुये बहुत सारे पत्र हैं, जिससे उनके चरित्र के बारे में पता चलता है और यह पुस्तक बेशक पढ़ने योग्य है।</span></p>
<p style="text-align:center;">सांकेतिक चिन्ह</p>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">पुस्तक समीक्षा</a>, book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/books/">books</a>,  <a href="http://hi.wordpress.com/tag/book-review/">book review</a>, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://wordpress.com/tag/review/">Review</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/reviews/">Reviews</a>, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
<div class="zemanta-pixie" style="margin-top:10px;height:15px;"><a class="zemanta-pixie-a" title="Zemified by Zemanta" href="http://www.zemanta.com/"><img class="zemanta-pixie-img" style="border:medium none;float:right;" src="http://img.zemanta.com/pixie.png" alt="Zemanta Pixie" /></a></div>
<p></span></span></p>
<p></span></span></span></span></span></p>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/unmukth.wordpress.com/72/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/unmukth.wordpress.com/72/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=72&subd=unmukth&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>उर्मिला की कहानी</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Mar 2007 13:32:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[दर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://unmukth.wordpress.com/2007/03/05/urmila/</guid>
		<description><![CDATA[(यह कहानी नहीं, सच है। लेकिन यह  किसी एक लड़की या महिला की कहानी नहीं है। यह उन कई महिलाओं और लड़कियों की दास्तान और अनुभवों को मिला कर लिखी गयी है जिनसे मुझे मिलने का, बात करने का, मौका मिला -  और जीवन की सच्चाई भी पता चली। उर्मिला एक काल्पनिक नाम है। [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=63&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="center"><em>(यह कहानी नहीं, सच है। लेकिन यह  किसी एक लड़की या महिला की कहानी नहीं है। यह उन कई महिलाओं और लड़कियों की दास्तान और अनुभवों को मिला कर लिखी गयी है जिनसे मुझे मिलने का, बात करने का, मौका मिला -  और जीवन की सच्चाई भी पता चली। उर्मिला एक काल्पनिक नाम है। मैं आज तक किसी लड़की या महिला से नहीं मिला जिसका नाम उर्मिला हो। )</em></p>
<p>एक दिन औफिस से घर पहुंचा तो महौल कुछ तना, तना सा लगा। मुन्ने की मां चाय बड़े बेमन से रख कर चली गयी मैने चुप रहने में ही खैर समझी। चाय चुपचाप पी, फिर नहाने चला गया। नहाया, कपड़े बदले और कमप्यूटर पर। थोड़ी देर बाद लगा कि पीछे से कोई घूर रहा है &#8211; आज तो शामत है। मैने चुप रहने मे ही भलायी समझी।</p>
<p>इतने में मुन्ने की मां की तन्नाई हुई अवाज़ सुनायी पड़ी, &#8216;यह क्या है&#8217;।</p>
<p>मैंने तिरछी नज़र से देखा: कुछ पिकनिक की फोटो थीं। मैने कहा,</p>
<blockquote><p>&#8216;मुन्ना या मुन्नी से पूछो कहीं पिकनिक पर गये होंगे वंही की फोटो होंगी।&#8217;</p></blockquote>
<blockquote><p>&#8216;यह ब्लैक एन्ड वाईट हैं और आजकल रंगीन फोटो होती हैं और न तो मुन्ना, मुन्नी दिखायी पड़ रहें हैं न ही उनके कोई दोस्त। फिर यह फोटो तुम्हारे बक्से में क्या कर रहीं थीं।&#8217;</p></blockquote>
<p>लगा कि जैसे कोई गुर्रा रहा हो। अब तो ठीक से देखना लाज़मी हो गया।</p>
<p>देखा तो कई पुरानी यादें ताज़ी हो गयी। विश्यविद्यालय के समय में हम लोग पिकनिक में गये थे, तभी की फोटो थीं मैं कुछ भावुक हो कर उसे पिकनिक के बारें में बताने लगा। इकबाल, जो अब वकील हो गया है; अनूप जो बड़ा सरकारी अफसर हो गया; दिनेश जो कि जाना माना वैज्ञानिक है।</p>
<blockquote><p>&#8216;मुझे इन सब में कोई दिलचस्पी नहीं है पर यह लड़की कौन जिसकी तुमने इतनी फोटूवें खींच रखी हैं और क्यों इतना सहेज कर रखे हो, आज तक बताया क्यों नही&#8217;</p></blockquote>
<p>मुझे एक पतली सी चीखती हुई आवाज़ सुनायी पड़ी। सारा गुस्सा समझ में आ गया।</p>
<p>यह लड़की उर्मिला थी। वह हम लोगों के साथ पढ़ती थी, अच्छा स्वभाव था, बुद्धिमान भी थी। वह सब लड़कों से बात करती थी और अक्सर क्लास में, बेन्च खाली रहने के बावजूद भी, लड़कों के साथ बेन्च में बैठ जाती थी। वह इस बात का ख्याल रखती थी कि वह सबसे बात करे तथा सब के साथ बैठे। हम सब उसे पसन्द करते थे। पर वह हम से किसी को खास पसन्द करती हो ऐसा उसने किसी को पता नही लगने दिया।</p>
<blockquote><p>&#8216;कहां रहती है&#8217;</p></blockquote>
<p>फिर वही तन्नाती हुई आवाज़।</p>
<blockquote><p>&#8216;विश्वविद्यालय में साथ पढ़ती थी। मुझे मालुम नहीं कि वह आजकल कहां है,  शायद नहीं रही।&#8217;</p></blockquote>
<blockquote><p>&#8216;तुम्हे कैसे मालुम कि वह नही रही&#8217;</p></blockquote>
<blockquote><p>&#8216;विश्वविद्यालय के बाद वह मुझसे कभी नही मिली पर इकबाल से मुकदमे के सिलसिले में मिली थी। उसी ने बताया था&#8217;</p></blockquote>
<p>इकबाल मेरा विश्वविद्यालय का दोस्त है और इस समय वकील है, उसके बारे में फिर कभी &#8211; पर अभी केवल इतना कि मुन्ने की मां उसकी बात का विश्वास करती है।</p>
<blockquote><p>&#8216;इकबाल भाई, उर्मिला के बारे मे क्या बता रहे थे&#8217;</p></blockquote>
<p>आवाज से लगा कि उसका गुस्सा कुछ कम हो चला था।</p>
<p>उर्मिला पढ़ने में तेज, स्वभाव में अच्छी वा जीवन्त लड़की थी। पढ़ाई के बाद उसकी शादी एक आर्मी औफिसर से हो गयी। मेरा उससे संपर्क छूट गया था। बाकी सारी कथा यह है जो कि इकबाल ने मुझे बतायी है।</p>
<p>शादी के समय उर्मिला का पति बौर्डर पर तैनात था। शादी के बाद कुछ दिन रुक कर वापस चला गया। एक दो बार वह और कुछ दिनो के लिये आया और फिर वापस चला गया। वह उससे कहता था कि उसकी तैनाती ऐसी जगह होने वाली है जहां वह अपने परिवार को रख सकता है तब वह उसे अपने साथ ले जायगा। जब उर्मिला का पती रहता था तो वह ससुराल में रहती पर बाकी समय ससुराल और मायके के दोनो जगह रहती। उर्मिला की नन्द तथा नन्दोई भी उसी शहर में रहते थे जहां उसका मायका था इसलिये वह जब मायके में आती तो वह उनके घर भी जाती थी।</p>
<p>एक दिन उर्मिला बज़ार गयी तो रात तक वापस नही आयी। उसके पिता परेशान हो गये उसके ससुराल वालों से पूछा, नन्दोई से पूछा, सहेलियों से पूछा &#8211; पर कोई पता नहीं चला। पिता ने हारकर पुलिस में रिपोर्ट भी की। वह अगले दिन वह रेवले लाईन के पास लगभग बेहोशी कि हालत में पड़ी मिली। उसके साथ जरूर कुछ गलत कार्य हुआ था। उसका पति भी आया वह कुछ दिन उसके पास रहने के लिये गयी और वह उर्मिला को मायके छोड़ कर वापस ड्यूटी पर चला गया। उर्मिला फिर कभी भी अपने ससुराल वापस नहीं जा पायी।</p>
<p>कुछ महीनो के बाद उर्मिला पास उसके पती की तरफ से शादी के सम्बन्ध विच्छेद की नोटिस आयी। उसमे लिखा था कि,</p>
<ul>
<li>उर्मिल अपने पुरुष मित्र (पर कोई नाम नहीं) के साथ बच्चा गिरवाने गयी थी;</li>
<li>उसके पुरुष मित्र ने उसे धोका दिया तथा उसके साथ गैंग-रेप हुआ है;</li>
<li>ऐसी पत्नी के साथ, न तो बाहर किसी पार्टी में (जो कि आर्मी औफिसर के जीवन में अकसर होती हैं) जाया जा सकता है, न ही समाज में रहा जा सकता है;</li>
</ul>
<p>इसलिये दोनो के बीच सम्बन्ध विच्छेद कर दिया जाय।</p>
<p>उर्मिला का कहना था कि,</p>
<ul>
<li>वह बाज़ार गयी थी वंहा उसके नन्दोई मिल गये;</li>
<li>नन्दोई के यह कहने पर कि उर्मिला पति का फोन उससे बात करने के लिये आया था तथा फिर अयेगा और वे उससे बात करना चाहते हैं वह उनके साथ घर चली गयी क्योंकि उसके घर का फोन कुछ दिन से खराब चल रहा था ;</li>
<li>नन्दोई के यहां  चाय पीने के बाद उसकी तबियत खराब हो गयी। जब उठी तो उसने अपने आप को रेलवे लाईन के पास पाया;</li>
<li>उसे कुछ याद नहीं कि उसके साथ क्या हुआ।</li>
<li>वह अपने पति से प्रेम करती है सम्बन्ध विच्छेद न किया जाय।</li>
</ul>
<p>सम्बन्ध विच्छेद के मुकदमे आज कल पारवारिक अदालतों मे चलते हैं। इन में फैमिली कांउन्सलर होते हैं जो कि महिलायें ही होती हैं इन फैमिली कांउन्सलर ने उर्मिला से बात की और अपनी रिपोर्ट में कहा कि,</p>
<ul>
<li>उर्मिला ज्यादातर समय रोती रही;</li>
<li>सारी बात नही बताना चाहती थी; और</li>
<li>लगता है कि झूट बोल रही है।</li>
</ul>
<p>निचली आदालत ने फैमिली कांउन्सलर की बात मान कर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया। तब वह ईकबाल के पास पंहुची। ईकबाल ने हाई कोर्ट में अपील करके उसे जितवा दिया।</p>
<p>हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस बात पर विश्वास नही किया जा सकता कि उर्मिला किसी पुरुष मित्र के साथ बच्चा गिरवाने गयी थी, क्योंकि,</p>
<ul>
<li>उर्मिला के किसी भी पुरुष मित्र का नाम भी किसी ने नहीं बताया;</li>
<li>किसी ने भी उर्मिला को पुरुष मित्र के साथ जाते देखने की बात नहीं कही;</li>
<li>इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उर्मिला का चरित्र खराब है बलकि उसके अच्छे चरित्र की गवाही है (यह बात तो उर्मिला के ससुर ने गवाही में माना था);</li>
<li>उर्मिला की शादी हो चुकी थी वह पती के साथ रह चुकी थी जो समय उसने अपने पती के साथ बिताया था उसके कारण वह गर्भवती हो सकती थी। उसको बच्चा गिरवाने का कोई कारण नही था।</li>
</ul>
<p>हाई कोर्ट ने फैमिली कांउन्सलर की रिपोर्ट खारिज करते हुऐ कहा कि,</p>
<ul>
<li>जिस महिला के साथ ऐसी बुरी दुर्घटना हुई हो उसके लिये वह सब बयान कर पाना मुशकिल है;</li>
<li>ऐसे मौके की याद ही किसी को दहला सकती है;</li>
<li>कोई भी महिला ऐसी बात को बताते समय सुसंगत नही रह सकती; और</li>
<li>ऐसी महिला के लिये उस बात के बारे में पूछे जाने पर रोना स्वाभाविक है।</li>
</ul>
<p>हाई कोर्ट ने उर्मिला की अपील मंजूर की तथा उसके पति के सम्बन्ध विच्छेद के मुकदमे को यह कहते हुऐ खारिज किया कि ऐसे मौके पर पती को पत्नी,</p>
<ul>
<li>के हालात समझने चाहिये; तथा</li>
<li>उसे सहारा देना चाहिये न कि तिरस्कारना।</li>
</ul>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बहाल रखा।</p>
<p>हाई कोर्ट ने उर्मिला की अपील मंजूर करते हुऐ उसे जीवन भत्ते के लिये पैसे भी दिलवाये पर यह नहीं मालुम कि उर्मिला ने पैसे लिये कि नहीं क्योंकि इस सब के कुछ महीनो के बाद उर्मिला तथा उसका परिवार शहर छोड़ कर मालुम नहीं कहां चला गया। न मुझे न ही ईकबाल को कुछ भी उसके बारे में पता है।</p>
<blockquote><p>&#8216;क्या उर्मिला को बिलकुल कुछ याद नहीं था कि उसके साथ क्या हुआ&#8217;</p></blockquote>
<p>मुन्ने की मां ने पूंछा।</p>
<blockquote><p>&#8216;सब याद था, मुन्ने की मां, सब, वह शहर छोड़ने के एक दिन पहले ईकबाल के पास गयी थी और ईकबाल को उस रात की सच्चाई बतायी। पर यह नहीं बताया था कि वह अगले दिन शहर छोड़ कर जा रही है।&#8217;</p></blockquote>
<p>मैने कहा।</p>
<p>यह भी अजीब कहानी है उस दिन उर्मिला नन्दोई के घर मे चली गयी थी वहां उसे पता चला कि उसकी ननन्द नहीं थी। वह अपने मायके यानि कि उर्मिला के ससुराल में थी घर में नन्दोई के मित्र थे। उर्मिला वापस अपने मायके आना चाहती थी पर नन्दोई ने उससे सबके लिये चाय बनाने के लिये अनुरोध किया। इसको वह मना नहीं कर पायी क्योंकि घर में चाय बनाने के लिये और कोई नहीं था।</p>
<p>वह जब चाय बनाने गयी तब नन्दोई तथा उनके मित्रों ने दरवाजा बन्द कर दिया। उसके साथ उन सब ने रात भर जबरदस्ती गलत कार्य किया। वे लोग अगले दिन उसे बेहोशी की हालत में रेवले लाईन के पास छोड़ आये। मैने जब इकबाल से पूछा कि उसने यह बात क्यों नहीं अपने पति या कोर्ट मे कही। ईकबाल ने बताया कि उसने उर्मिला से यह पूछा था पर उर्मिला ने उसे कोई जवाब नहीं दिया।</p>
<p>यह कहानी बताने के बाद मैंने ऐसी ही टिप्पणी की,</p>
<blockquote><p>&#8216;उर्मिला बेवकूफ थी उसे यह बात कोर्ट में कहनी चाहिये थी&#8217;</p></blockquote>
<p>मुन्ने की मां ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। कुछ देर बाद मैने उसकी आखों की तरफ देखा तो उसका सारा गुस्सा काफूर हो चुका था और वह किसी गहरे सोच में डूबी लग रही थी; वह मेरी बात से सहमत नहीं लगती थी। मुझे तो उसके हाव-भाव से लगा कि वह कहना चाह रही है कि मर्द क्या समझें औरत का जीवन।</p>
<p>लक्षमण की उर्मिला के दर्द को तो तुलसी दास जी भी नही समझ पाये। वह तो केवल सीता जी के त्याग को समझ पाये। उर्मिला के त्याग तथा दर्द को समझने के लिये नव-युग में मैथली शरण गुप्त को जन्म लेना पड़ा।</p>
<p align="center"><em>हा स्वामी! कहना था क्या क्या</em><br />
<em>कह न सकी कर्मों का दोष!</em><br />
<em>पर जिसमें सन्तोष तुम्हे हो </em><br />
<em>मुझे है सन्तोष!</em>
</p>
<p align="left"> वह क्या इस पर विशवास करती थी, मालुम नहीं, कह नहीं सकता। पर इस उर्मिला के दर्द को क्या उसका लक्षमण या कोई और समझेगा?</p>
<p>मैं एक बात अवश्य जानता हूं कि उर्मिला एक साधारण लड़की नहीं थी वह एकदम सुलझी, समझदार, बुधिमान, वा जीवन्त लड़की थी। उसने पुरानी बातों को भुला कर नया जीवन अवश्य शुरू कर दिया होगा। उसका एक भाई विदेश में था क्या उसी के पास चली गयी। कुछ पता चलेगा तो बतांऊगा। आप में से तो बहुत लोग विदेश में रहतें हैं कभी आपको उर्मिला मिले तो कहियेगा कि हम सब उसे याद करते हैं; मिलना चाहेंगे और मुन्ने की मां भी मिलना चाहेगी।</p>
<p align="center">यह लेख मेरे <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त</a> चिठ्ठे पर  कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। यदि आप इसे, चिठ्ठे पर पढ़ना चाहें तो इसकी <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/05/blog-post.html">अन्तिम कड़ी</a> यहां पर देखें। वहीं से पहले की कड़ियों पर जा सकते हैं।</p>
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			<media:title type="html">उन्मुक्त</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/</link>
		<comments>http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 31 Dec 2006 12:11:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[खगोलशास्त्र]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[Alpha Centauri]]></category>
		<category><![CDATA[Astronomy]]></category>
		<category><![CDATA[Centaurus]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/</guid>
		<description><![CDATA[This post in Hindi (Devnagree) explains that astology, numerology and palmistry have no science behind them: they are merely supertitious but they often please your mind. In order to read it in Roman or any other Indian script - see right hand widget.
is chitthi mein bataya gayaa hai ki jyotish, ank vidya, aur hast vidya ke peeche koi bhi vigyaan nheen hai: yeh andhvishvaas hai. lekin log ise prayog karate hain kyonkee yh aapke mastikshk ko kabhee kabhee tasalee deti hai. ise roman ya kisee aur bharteeya lipi mein pardhne ke liye daahine tarf ka widget dekhein. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=62&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:center;"><em>यह लेख <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त चिठ्ठे</a> पर &#8216;ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके&#8217; के नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहें तो नीचे कड़ियों पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।</em></p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_30.html">भूमिका</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_07.html">तारे और ग्रह</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_10.html">प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_15.html">यूरोप में खगोल शास्त्र</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/hair-musical.html">हेर संगीत नाटक</a> (Hair Musical)।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_26.html">पृथ्वी की गतियां</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/signs-of-zodiac.html">राशियां</a> (Signs of Zodiac)।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/precession-of-equinoxes.html">विषुव अयन</a> (<a class="zem_slink" title="Precession (astronomy)" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Precession_%28astronomy%29">precession of equinoxes</a>): हेयर संगीत नाटक के शीर्ष गीत का अर्थ।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/blog-post_21.html">ज्योतिष या अन्धविश्वास</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/blog-post_26.html">अंक विद्या, डैमियन &#8211; शैतान का बच्चा</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_13.html">अंक लिखने का इतिहास</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_25.html">हस्तरेखा विद्या और निष्कर्ष</a>।।</p>
<p><span style="font-size:medium;">आज ज्योतिष, अंक, और हस्तरेखा विद्या समाज के अंग बन चुके हैं पर इनके पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं है। यह विद्यायें कुछ लोगो के जीवन व्यापन का साधन हैं तो कुछ लोगो को, कष्ट से मुक्ति दिलाने की झूटी दिलासा दे कर, शान्ति पहुंचाते हैं। इस लेख में उन बातों की चर्चा होगी जिससे पता चलता है कि इनका विज्ञान से कोई संबन्ध नहीं है। सबसे पहले हम ज्योतिष विद्या के बारे में बात करेंगे, पर पहले तारे, ग्रह और तब राशि के बारे में।<br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<strong>तारे और ग्रह</strong><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
रात में आकाश में कई पिण्ड चमकते रहते हैं, इनमें से अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं और एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा (Star) कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्ड के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे &#8211; यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है जिसका अर्थ इधर-उधर घूमने वाला है। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया।</span></span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
हमारे लिये आकाश में सबसे चमकीला पिण्ड सूरज है, फिर चन्द्रमा और उसके बाद रात के तारे या ग्रह। तारे स्वयं में एक सूरज हैं। ज्यादातर, हमारे सूरज से बड़े ओर चमकीले, पर इतनी दूर हैं कि उनकी रोशनी हमारे पास आते आते बहुत क्षीण हो जाती है इसलिये दिन में नहीं दिखायी पड़ते पर रात में दिखायी पड़ते हैं। कुछ प्रसिद्ध तारे इस प्रकार हैं:</span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>सबसे प्रसिद्ध तारा,  <a href="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/ap991006.html">ध्रुव तारा</a> (<a class="zem_slink" title="Polaris" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Polaris">Polaris</a> या North star) है। यह इस समय पृथ्वी की धुरी पर है इसलिये अपनी जगह पर स्थिर दिखायी पड़ता है। ऐसा पहले नहीं था या आगे नहीं होगा। ऐसा क्यों है, इसके बारे में आगे चर्चा होगी।</li>
<li>तारों में सबसे चमकीला तारा <a href="http://apod.gsfc.nasa.gov/apod/ap000611.html">व्याध</a> (<a class="zem_slink" title="Sirius" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sirius">Sirius</a>) है। इसे Dog star भी कहा जाता है क्योंकि यह <a class="zem_slink" title="Canis Major" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Canis_Major">Canis major</a> (बृहल्लुब्धक) नाम के तारा समूह का हिस्सा है।</li>
<li><a href="http://apod.gsfc.nasa.gov/apod/ap030323.html">मित्रक</a> (<a class="zem_slink" title="Alpha Centauri" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Alpha_Centauri">Alpha Centauri</a>), नरतुरंग (<a class="zem_slink" title="Centaurus" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Centaurus">Centaurus</a>) तारा समूह का एक तारा है। यदि सूरज को छोड़ दें तो तारों में यह हमसे सबसे पास है। प्रकाश की किरणें १ सेकेन्ड मे ३x(१०)८ मीटर की दूरी तय करती हैं। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जो कि प्रकाश की किरणें एक साल में तय करती हैं। इसकी हमसे दूरी लगभग ४.३ प्रकाश वर्ष है। वास्तव में यह एक तारा नहीं है पर तीन तारों का समूह है जो एक दूसरे के तरफ चक्कर लगा रहें हैं, इसमें Proxima Centauri हमारे सबसे पास आता है।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
ग्रह और चन्द्रमा, सूरज नहीं हैं। यह अपनी रोशनी में नहीं चमकते पर सूरज की रोशनी को परिवर्तित करके चमकते हैं।, तारे टिमटिमाते हैं पर ग्रह नहीं। तारों की रोशनी का टिमटिमाना, हवा में रोशनी के अपवर्तन (refraction) के कारण होता है। यह तारों की रोशनी पर ही होता है क्योंकि तारे हमसे बहुत दूर हैं और इनके द्वारा आती रोशनी की किरणें हम तक पहुंचते पहुंचते समान्तर हो जाती हैं पर ग्रहों कि नहीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
<strong>प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र</strong><span style="font-size:medium;"><br />
पहले के ज्योतिषाचार्य वास्तव में उच्च कोटि के खगोलशास्त्री थे और अपने देश के खगोलशास्त्री दुनिया में सबसे आगे। अपने देश में तो ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ चक्कर लगाती है। यजुर्वेद के अध्याय ३ की कण्डिका ६ इस प्रकार है,</span></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">आयं गौ: पृश्रिनरक्रमीदसदन् मातरं पुर: ।<br />
पितरं च प्रचन्त्स्व:।।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
डा. कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह द्वारा इसका काव्यानुवाद एवं टिप्पणी की है। इसे भुवन वाणी ट्रस्ट, मौसम बाग, सीतापुर रोड, लखनऊ-२२६०२० ने प्रकाशित किया है। उन्होंने इस कण्डिका में काव्यानुवाद व टिप्पणी इस प्रकार की है,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;प्रत्यक्ष वर्तुलाकार सतत गतिशीला।<br />
है अंतरिक्ष में करती अनुपम लीला।।<br />
अपनी कक्षा में अंतरिक्ष में संस्थित।<br />
रवि के सम्मुख हैं अविरत प्रदक्षिणा-रत।।<br />
दिन, रात और ऋतु-क्रम से सज्जित नित नव।<br />
माता यह पृथ्वी अपनी और पिता दिव।।<br />
हे अग्नि। रहो नित दीपित, इस धरती पर।<br />
शत वर्णमयी ज्वालाओं से चिर भास्वर।।<br />
फैले द्युलोक तक दिव्य प्रकाश तुम्हारा।<br />
मेघों में विद्युन्मय हो वास तुम्हारा।।<br />
लोकत्रय में विक्रम निज करो प्रकाशित।<br />
त्रयताप- मुक्त हो मानव पर निर्वृत्तिरत।।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
टिप्पणी &#8211; यह मंत्र बड़ा कवित्वपूर्ण है। इसमें अग्नि के पराक्रम का चित्रात्मक वर्णन है। इसमें श्लेषालंकार है। ‘गौ पृश्नि:’ का अर्थ गतिशील बहुरंगी ज्वालाओं वाला अग्नि किया गया है। महर्षि दयानन्‍द ने ‘गौ:’ का अर्थ पृथ्वी किया है। यह पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर अंतरिक्ष में घूमती है। इसी से दिन-रात, कृष्ण-शुक्ल पक्ष, अयन, वर्ष, ऋतु आदि का क्रम चलता है। अनुवाद में यही अर्थ ग्रहण किया गया है। अग्नि पृथ्वी का पुत्र भी कहा गया है। इस मंत्र में विशेष ध्यान देने की बात है- पृथ्वी का अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमना। इससे सिद्ध है कि वैदिक ऋषि को पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने का ज्ञान था।&#8217;</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
प्राचीन भारत में अन्य प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:</span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>याज्ञवल्क्य (ईसा से दो शताब्दी पूर्व) हुऐ थे। उन्होने यजुर्वेद पर काम किया था। इसलिये यह कहा सकता है कि अपने देश ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है। यूरोप में इस तरह से सोचना तो 14वीं शताब्दी में शुरु हुआ।</li>
<li>आर्यभट्ट (प्रथम) (४७६-५५०) ने आर्य भटीय नामक ग्रन्थ की रचना की। इसके चार खंड हैं &#8211; गीतिकापाद, गणितपाद, काल क्रियापाद, और गोलपाद। गोलपाद खगोलशास्त्र (ज्योतिष) से सम्बन्धित है और इसमें ५० श्लोक हैं। इसके नवें और दसवें श्लोक में यह समझाया गया है कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है।</li>
<li>भास्कराचार्य ( १११४-११८५) ने सिद्धान्त शिरोमणी नामक पुस्तक चार भागों में लिखी है &#8211; पाटी गणिताध्याय या लीलावती (Arithmetic), बीजागणिताध्याय (Algebra), ग्रह गणिताध्याय (Astronomy), और गोलाध्याय। इसमें प्रथम दो भाग स्वतंत्र ग्रन्थ हैं और अन्तिम दो सिद्धांत शिरोमणी के नाम से जाने जाते हैं। सिद्धांत शिरोमणी में पृथ्वी के सूरज के चारो तरफ घूमने के सिद्धान्त को और आगे बढ़ाया गया है।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>यूरोप में खगोल शास्त्र</strong><br />
<span style="font-size:medium;">यूरोप के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>टौलमी (९०-१६८) नाम का ग्रीक दर्शनशास्त्री दूसरी शताब्दी में हुआ था। इसने पृथ्वी को ब्रम्हाण्ड का केन्द्र माना और सारे पिण्डों को उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हुये बताया। इस सिद्धान्त के अनुसार सूरज एवं तारों की गति तो समझी जा सकती थी पर ग्रहों की नहीं।</li>
<li>कोपरनिकस (१४७३-१५४३) एक पोलिश खगोलशास्त्री था, उसका जन्म १५वीं शताब्दी में हुआ। यूरोप में सबसे पहले उसने कहना शुरू किया कि सूरज सौरमंडल का केन्द्र है और ग्रह उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हैं।</li>
<li>केपलर (१५७१-१६३०) एक जर्मन खगोलशास्त्री था, उसका जन्म १६वीं शताब्दी में हुआ था। वह गैलिलियो के समय का ही था। उसने बताया कि ग्रह सूरज की परिक्रमा गोलाकार कक्षा में नहीं कर रहें हैं, उसके मुताबिक यह कक्षा अंड़ाकार (Elliptical) है। यह बात सही है।</li>
<li>गैलिलियो (१५६४-१६४२) एक इटैलियन खगोलशास्त्री था उसे टेलिस्कोप का आविष्कारक कहा जाता है पर शायद उसने बेहतर टेलिस्कोप बनाये और सबसे पहले उनका खगोलशास्त्र में प्रयोग किया।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;">टौलमी के सिद्धान्त के अनुसार शुक्र ग्रह पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है और वह पृथ्वी और सूरज के बीच रहता है इसलिये वह हमेशा बालचन्द्र (Crescent) के रूप में दिखाई देगा। कोपरनिकस के मुताबिक शुक्र सारे ग्रहों की तरह सूरज के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है इसलिये चन्द्रमा की तरह उसकी सारी कलायें (phases) होनी चाहिये। गैलिलियो ने टेलिस्कोप के द्वारा यह पता किया कि शुक्र ग्रह की भी चन्द्रमा की तरह सारी कलायें होती हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि ग्रह – कम से कम शुक्र तो &#8211; सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं। गैलिलियो ने सबसे पहले ग्रहों को सूरज का चक्कर लगाने का प्रयोगात्मक सबूत दिया। पर उसे इसका क्या फल मिला। चर्च ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह बात ईसाई धर्म के विरूद्ध है और गैलिलियो को घर में नजरबन्द कर दिया गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">भौतिक शास्त्र में हर चीज देखी नहीं जा सकती है और किसी बात को सत्य केवल इसलिये कहा जाता है कि उसको सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जा सकता है। यदि पृथ्वी को सौरमंडल का केन्द्र मान लिया जाय तो किसी भी तरह से इन ग्रहों की गति को नहीं समझा जा सकता है पर यदि सूरज को सौरमंडल का केन्द्र मान लें तो इन ग्रहों और तारों दोनों की गति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। इसलिए यह बात सत्य मान ली गयी कि सूरज ही हमारे सौरमंडल के केन्द्र में है जिसके चारों तरु पृथ्वी एवं ग्रह घूम रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong><a class="zem_slink" title="Hair (musical)" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Hair_%28musical%29">Hair</a> Musical  हेयर संगीत नाटक</strong><br />
<span style="font-size:medium;">१९६० के दशक में, हेयर संगीत नाटक {<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Hair_%28musical%29">Hair (musical</a>)} का मंचन अमेरिका में शुरू किया गया। इसका सबसे पहले मंचन १७ अक्टूबर १९६७ को हुआ। इसका मंचन आज तक अलग-अलग देशों में हो रहा है पर अपने देश में कभी नहीं हुआ। यह उस समय शुरू हुआ जब अमेरिका में लोग वियतनाम जंग के खिलाफ हो रहे थे, हिप्पी सभ्यता जन्म ले रही थी। बहुत से लोगों का कहना है कि हिप्पी सभ्यता, इसी संगीत नाटक से जन्मी। इसमें लड़के और लड़कियां राशि के चिन्हों को दर्शाते थे, कुछ दृश्यों में निर्वस्त्र होते थे कुछ में वे अमेरिकी झण्डे को पहने होते थे। इसलिये शायद यह चर्चित तथा विवादास्पद हो गया।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसका शीर्षक गीत इस प्रकार है This is the dawning age of Aquarius है। इस गाने के शब्द <a href="http://www.geocities.com/hairpages/lyrics.html">यहां</a> हैं और इसे आप <a href="http://www.youtube.com/watch?v=2nWLAwN8-aU">यहां</a> देख वा सुन सकते हैं। यह गाना अपने देश में भी प्रचलित है। इस गाने का शब्दिक अर्थ है कि कुम्भ राशि का समय आने वाला है लोग इसका शब्दिक अर्थ तो जानते हैं &#8211; पर यह नहीं समझते कि यह क्या है। क्या वास्तव में कुम्भ राशि का समय आ रहा है? यह क्यों कहा जा रहा है? इसका गाने के अर्थ का भी हमारे विषय से सम्बन्ध है। इसको समझने के लिये जरूरी है कि पृथ्वी की गतियों एवं राशियों को समझें।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>पृथ्वी की गतियां</strong><br />
<span style="font-size:medium;">हमारी पृथ्वी की बहुत सारी गतियां हैं:</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>पृथ्वी अपनी धुरी पर २४ घंटे में एक चक्कर लगा रही है। इसलिये दिन और रात होते हैं।</li>
<li>पृथ्वी सूरज के चारों तरफ एक साल में एक चक्कर लगाती है। यदि हम उस तल (plane) की कल्पना करें जिसमें पृथ्वी और सूरज का केन्द्र, तथा उसकी परिक्रमा है तो पायेंगे कि पृथ्वी की धुरी, इस तल से लगभग साढ़े २३ डिग्री झुकी है पृथ्वी के धुरी झुके रहने के कारण अलग-अलग ऋतुयें आती हैं। हमारे देश में गर्मी के दिनों में सूरज उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है और जाड़े में दक्षिणी गोलार्द्ध में चला जाता है। यानी कि साल के शुरू होने पर में सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है पर वहां से चलकर उत्तरी गोलार्द्ध और फिर वापस दक्षिणी गोलार्द्ध के उसी विन्दु पर पहुंच जाता है।</li>
<li>पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और पृथ्वी की धुरी लगभग २५७०० साल में एक बार घूमती है। इस समय हमारी धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है और दूसरे तारे घूमते दिखाई देते हैं। हजारों साल पहले हमारी धुरी न तो ध्रुव तारा पर थी और न हजारों साल बाद यह ध्रुव तारा पर होगी। तब ध्रुवतारा भी रात में पूरब की तरफ से उदय होगा और पश्चिम में अस्त होता दिखायी देगा।</li>
<li>हमारा सौरमंडल एक निहारिका में है जिसे आकाश गंगा कहा जाता है। इसका व्यास लगभग १,००,००० प्रकाश वर्ष है। हमारी पृथ्वी आकाश गंगा के केन्द्र से लगभग ३०,००० प्रकाश वर्ष दूर है और हमारा सौरमंडल भी इस आकाश गंगा के चक्कर लगा रहा है और हमारी पृथ्वी भी उसके चक्कर लगा रही है।</li>
<li>हमारी आकाश गंगा और आस-पास की निहारिकायें भी एक दूसरे के पास आ रही हैं। यह बात डाप्लर सिद्धान्त से पता चलती है। हमारी पृथ्वी भी इस गति में शामिल है।</li>
<p></span></ul>
<p>मु<span style="font-size:medium;">ख्य रूप से हम पृथ्वी की पहली और दूसरी गति ही समझ पाते हैं, तीसरी से पांचवीं गति हमारे जीवन से परे है। वह केवल सिद्धान्त से समझी जा सकती है, उसे देखा नहीं जा सकता है। हमारे विषय के लिये दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>तारा समूह</strong><br />
<span style="font-size:medium;">ब्रम्हाण्ड में अनगिनत तारे हैं और अनगिनत तारा समूह। कुछ चर्चित तारा समूह  इस प्रकार हैं:</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>सप्त ऋषि ( Great/ Big bear or Ursa Major): यह उत्तरी गोलार्ध के सात तारे हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।</li>
<li>ध्रुवमत्स्य/ अक्षि ( Little Bear or Ursa Minor): यह सप्त ऋषि के पास उसी शक्ल का है इसके सबसे पीछे वाला तारा ध्रुव तारा है।</li>
<li>कृतिका (कयबचिया) Pleiades: पास-पास कई तारों का समूह है हमारे खगोलशास्त्र में इन्हें सप्त ऋषि की पत्नियां भी कहा गया है।</li>
<li>मृगशीर्ष (हिरन- हिरनी) Orion: अपने यहां इसे हिरण और ग्रीक में इसे शिकारी के रूप में देखा गया है पर मुझे तो यह तितली सी लगती  है।</li>
<li>बृहल्लुब्धक (Canis Major): इसकी कल्पना कुत्ते की तरह की गयी पर मुझे तो यह घन्टी की तरह लगता है। व्याध (Sirius) इसका सबसे चमकीला तारा है। अपने देश में इसे मृगशीर्ष पर धावा बोलने वाले के रूप में देखा गया जब कि ग्रीक पुराण में इसे Orion (शिकारी) के कुत्ते के रूप में देखा गया।</li>
<li>शर्मिष्ठा (Cassiopeia): यह तो मुझे कहीं से सुन्दरी नहीं लगती यह तो W के आकार की दिखायी पड़ती है और यदि इसके बड़े कोण वाले भाग को विभाजित करने वाली रेखा को उत्तर दिशा में ले जायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचेगी।</li>
<li>महाश्व (Pegasus): इसकी कल्पना अश्व की तरह की गयी पर यह  तो मुझे टेनिस के कोर्ट जैसा लगता है।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;">जाहिर है मैं इन सब तारा समूह के सारे तारे देख कर आकृतियों कि कल्पना नहीं कर रहा हूं, पर इन तारा समूह के कुछ खास तारों को ले कर ही कल्पना कर रहा हूं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>राशियां Signs of Zodiac</strong><br />
<span style="font-size:medium;">यह तो थे आकाश पर कुछ मुख्य तारा समूह। इन सब का नाम हमने कभी न कभी सुना है। इनके अलावा बारह तारा समूह जिन्हें राशियां कहा जाता है उनका नाम हम अच्छी तरह से जानते हैं। इन सब को छोड़ कर, किसी तारा समूह के लिये तो खगोलशास्त्र की पुस्तक ही देखनी पड़ेगी। बारह तारा समूह, जिन्हें राशियां कहा जाता है, उनके नाम तो हम सब को मालुम हैं पर साधरण व्यक्ति के लिये इन्हें आकाश में पहचान कर पाना मुश्किल है। यह बारह राशियां हैं,</span></span></p>
<ol> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>मेष              (Aries)</li>
<li>वृष                 ( Taurus)</li>
<li>मिथुन             (Gemini)</li>
<li>कर्क                (Cancer)</li>
<li>सिंह                (Leo)</li>
<li>कन्या              (Virgo)</li>
<li>तुला               (Libra)</li>
<li>वृश्चिक            (Scorpio)</li>
<li>धनु                 (Sagittarius)</li>
<li>मकर             (Capricorn)</li>
<li>कुम्भ              (Aquarius)</li>
<li>मीन               (Pisces)</li>
<p></span></ol>
<p><span style="font-size:medium;">इन बारह तारा समूहों को ही क्यों इतना महत्व दिया गया? इसके लिये पृथ्वी की दूसरी और तीसरी  गति महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p>य<span style="font-size:medium;">दि पृथ्वी, सूरज के केन्द्र और पृथ्वी की परिक्रमा के तल को चारो तरफ ब्रम्हाण्ड में फैलायें, तो यह ब्रम्हाण्ड में एक तरह की पेटी सी बना लेगा। इस पेटी को हम १२ बराबर भागों में बांटें तो हम देखेंगे कि इन १२ भागों में कोई न कोई तारा समूह आता है। हमारी पृथ्वी और ग्रह, सूरज के चारों तरफ घूमते हैं या इसको इस तरह से कहें कि सूरज और सारे ग्रह पृथ्वी के सापेक्ष इन १२ तारा समूहों से गुजरते हैं। यह किसी अन्य तारा समूह के साथ नहीं होता है इसलिये यह १२ महत्वपूर्ण हो गये हैं। इस तारा समूह को हमारे पूर्वजों ने कोई न कोई आकृति दे दी और इन्हे राशियां कहा जाने लगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>विषुव अयन (precession of equinoxes)</strong><br />
<span style="font-size:medium;">विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग २० मार्च तथा २३ सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर २४ घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी २५,७०० साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग २५,७०० साल में एक बार घूमती है। वह १/१२वें हिस्से को २१४१ या लगभग २१५० साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से १६५० साल पहले (१६५०BC) से, ईसा के ५०० साल बाद (५०० AD) तक लगभग २१५० साल रहा। अलग अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसी लिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के ५०० साल बाद (५०० AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है &#8211; तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ईसा के ५०० साल (५०० AD) के २१५० साल बाद तक यानि कि २७वीं शताब्दी (२६५० AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति &#8216;This is the dawning age of Aquarius&#8217; का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते &#8211; ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।<br />
</span></p>
<p style="text-align:center;"><em>इस बात को यदि आप देख कर समझना चाहें तो नीचे देखें</em></p>
<p style="text-align:center;">
<p style="text-align:center;">
<span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/"><img src="http://img.youtube.com/vi/oQPFoDkGFrU/2.jpg" alt="" /></a></span>
</p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>ज्योतिष या अन्धविश्वास</strong><br />
<span style="font-size:medium;">सूरज और चन्द्रमा हमारे लिये में महत्वपूर्ण हैं। यदि सूरज नहीं होता तो हमारा जीवन ही नहीं शुरू होता। सूरज दिन में, और चन्द्रमा रात में रोशनी दिखाता है। सूरज और चन्द्रमा, समुद्र को भी प्रभावित करते हैं। ज्वार और भाटा इसी कारण होता है। समुद्री ज्वार-भाटा के साथ यह हवा को भी उसी तरह से प्रभावित कर, उसमें भी ज्वार भाटा उत्पन करते हैं। ज्वार-भाटा में किसी और ग्रह का भी असर होता होगा, पर वह नगण्य के बराबर है। इसके अलावा यह बात अप्रसांगिक है कि हमारा जन्म जिस समय हुआ था उस समय,</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>सूरज किस  राशि में था, या</li>
<li>चन्द्रमा किस राशि पर था, या</li>
<li>कोई अन्य ग्रह किस राशि पर था,</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;">इसका कोई सबूत नहीं है कि पैदा होने का समय या तिथि महत्वपूर्ण है। यह केवल अज्ञानता ही है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमारे पूर्वजों ने इन राशियों को याद करने के लिये स्वरूप दिया। पुराने समय के ज्योतिषाचार्य बहुत अच्छे खगोलशास्त्री थे। पर समय के बदलते उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि किसी व्यक्ति के पैदा होने के समय सूरज जिस राशि पर होगा, उस आकृति के गुण उस व्यक्ति के होंगे। इसी हिसाब से उन्होंने राशि फल निकालना शुरू कर दिया। हालांकि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि आप ज्योतिष को उसी के तर्क पर परखें, तो भी ज्योतिष गलत बैठती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि ज्योतिष का ही तर्क लगायें तो &#8211; विषुव अयन के समय सूरज की स्थिति बदल जाने के कारण &#8211; जो गुण ज्योतिषों ने मेष राशि में पैदा होने वाले लोगों को दिये थे वह अब मीन राशि में पैदा होने वाले व्यक्ति को दिये जाने चाहिये। यानी कि, हम सबका राशि फल एक राशि पहले का हो जाना चाहिये पर ज्योतिषाचार्य तो अभी भी वही गुण उसी राशि वालों को दे रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सच में हम बहुत सी बातो को उसे तर्क या विज्ञान से न समझकर उस पर अंध विश्वास करने लगते हैं, जिसमें ज्योतिष भी एक है। ज्योतिष या टोने टोटके में कोई अन्तर नहीं। यह एक ही बात के, अलग अलग रूप हैं। यही बात अंक विद्या और हस्तरेखा विद्या के लिये लागू होती है। अंक विद्या पर बात करने से पहले हम लोग ओमेन नाम की फिल्म की चर्चा करेंगे।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">डेमियन: ओमेन – फिल्म</span></strong><br />
<span style="font-size:medium;"> <span style="font-size:medium;">1976 में एक फिल्म आयी थी जिसका नाम ओमेन (Omen) था। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार की है कि एक अमेरिकन राजनयिक (Diplomat) के पुत्र की म़ृत्यु हो जाती है और उसकी जगह एक दूसरा बच्चा रख दिया जाता है। इस बच्चे का नाम डेमियन (Damien) है। यह बच्चा वास्तव में एक शैतान का बच्चा है और आगे चलकर इसके एन्टीक्राइस्ट (Antichrist) बनने की बात है। यह बात बाइबिल की एक भविष्यवाणी में है। कुछ लोगों को पता चल जाता है कि यह शैतान का बच्चा है और उसे मारने का प्रयत्न किया जाता है पर पुलिस जिसे नहीं मालुम कि वह शैतान का बच्चा है, उसे बचा लेती है। यह फिल्म यहीं पर समाप्त हो जाती है।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस फिल्म के बाद, १९७८ में दूसरी फिल्म Damien: Omern II नाम से आयी। यह डैमियन के तब की कहानी है, जब वह १३ साल का हो जाता है। १९८१ में इस सीरीज में तीसरी फिल्म Oemn III: The Final Conflict आयी। इस सिरीस की चौथी फिल्म टीवी के लिये १९९१ में Omen IV : The Awakening के नाम से बनी। इन फिल्मों में यह महत्वपूण है कि डेमियन के शैतान का बच्चा होने की बात कैसे पता चली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">डेमियन के सर की खाल (Scalp) पर बालों से छिपा ६६६ अंक लिखा था। इस नम्बर को शैतान का नम्बर कहा जाता है। इससे पता चला कि यह शैतान का बच्चा है। पर क्या आप जानते हैं कि इस नम्बर को क्यों शैतान का नम्बर क्यों कहा जाता है। चलिये कुछ अंक लिखने के इतिहास के बारे में जाने, जिससे यह पता चलेगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>अंक लिखने का इतिहास</strong><br />
<span style="font-size:medium;">अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को ५ का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें १,२,३ आदि कहा गया और एक चिन्ह ० भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया। फिर वहां से 16वीं शताब्दी के लगभग पाश्चात्य देशों में गया, इसलिये इसे अरेबिक अंक कहा गया। वास्तव में इसका नाम हिन्दू अंक होना चाहिये था। यह नयी अंक प्रणाली जब तक आयी तब तक वर्णमाला के अक्षरों और अंकों के बीच में सम्बन्ध जुड़ चुका था। जिसमें काफी कुछ गड़बड़ी और उलझनें (Confusion) पैदा हो गयीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस कारण सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई कि किसी भी शब्द के अक्षरों से उसका अंक निकाला जाने लगा और उस शब्द को उस अंक से जोड़ा जाने लगा। कुछ समय बाद गड़बड़ी और बढ़ी। उस अंक वही गुण दिये जाने लगे जो कि उस शब्द के थे। यदि वह शब्द देवी या देवता का नाम था तो उस अंक को अच्छा माना जाने लगा। यदि वह शब्द किसी असुर या खराब व्यक्ति का था तो उस अंक को खराब माना जाने लगा। यहीं से शुरू हुई अंक विद्या: इसका न तो कोई सर है न तो पैर, न ही इसका तर्क से सम्बन्ध है न ही सत्यता से। यह केवल महज अन्धविश्वास है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>६६६ &#8211; शैतान का नम्बर</strong><br />
<span style="font-size:medium;">नीरो एक रोमन बादशाह हुआ था। वह बहुत क्रूर था लेकिन कोई यह खुले <span style="font-size:medium;">तौर पर नहीं कह सकता था। उसके नाम के अक्षरों का अंक ६६६ था। इसलिये इसे शैतान का अंक कहा जाने लगा। चलिये अब हस्तरेखा विद्या पर चलते हैं पर पहले डा. जोसेफ बेल के बारे में बात करते हैं जो कि शर्लौक होल्मस की कहानियां लिखने की प्रेणना रहे।</span></span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>हस्तरेखा विद्या</strong><br />
<span style="font-size:medium;">इरविंग वैलेस, कल्पित (fiction) उपन्यास के बादशाह हैं, पर उनका मन हमेशा अकल्पित (non-fiction) लेख लिखने में रहता है। उनके अनुसार वे कल्पित उपन्यास इसलिये लिखते हैं क्योंकि उसमें पैसा मिलता है। उन्होंने बहुत सारे अकल्पित लेख लिखे हैं। इन लेखों को मिलाकर एक पुस्तक निकाली है, उसका नाम है, The Sunday Gentleman है यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। इसमें एक लेख The Incredible Dr. Bell के नाम से है। यह लेख डा. जोसेफ बेल के बारे में है।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">डा. जोसेफ बेल वे १९वीं शताब्दी के अंत तथा २०वीं शताब्दी के शुरू में, एडिनबर्ग में सर्जन थे और एक वहां के विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। वे हमेशा अपने विद्यार्थियों को कहते थे कि लोग देखते हैं पर ध्यान नहीं देते। यदि आप किसी चीज को ध्यान से देखें तो उसके बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं। उन्होंने बहुत सारे विद्यार्थी को पढ़ाया, उनमें से एक विद्यार्थी का नाम था आर्थर कैनन डॉयल, जो कि शर्लौक होल्मस के रचयिता हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस लेख में डा. बेल के बहुत सारे उदाहरण बताये गये हैं जब उन्होंने किसी व्यक्ति को देखकर उसके बारे में बहुत कुछ बता दिया। शर्लोक होल्मस एक जासूस थे और कहानियों में ध्यान पूर्वक देखकर बहुत कुछ सुराग ढूढ़ कर हल निकालते थे। आर्थर कैनन डॉयल ने जब शर्लोक होल्मस की कहानियां लिखना शुरू किया तो उसका चरित्र डा. बेल के चरित्र पर और डा. वाटसन का चरित्र अपने ऊपर ढ़ाला।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि आप किसी कागज को मोड़ें तो हमेशा पायेंगे कि उस कागज को जहां से मोड़ा जाता है, उसमें चुन्नट (Crease) पड़ जाती है। इस तरह से जब हम हंथेली को मोड़ते हैं तो जिस जगह हमारी हथेली मुड़ती है, उस जगह एक चुन्नट, रेखा के रूप में पड़ जाती है। हथेलियों की रेखायें, हाथ के मुड़ने के कारण ही पड़ती हैं।</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">हम किसी के हाथ को ध्यान से देखें तो कुछ न कुछ उस व्यक्ति के बारे में पता चल भी सकता है। शायद यह भी पता चल जाय कि वह व्यक्ति बीमार है या नहीं। पर उसकी हंथेली की रेखाओं को देखकर यह बता पाना कि उस व्यक्ति की शादी कब होगी, वह कितनी शादियां करेगा, कितने बच्चे होंगे, या नहीं होंगे। यह सब बता पाना नामुमकिन है। यह सब भी ढ़कोसला है।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<strong><span style="font-size:medium;">निष्कर्ष</span></strong></span>
</p>
<p align="left"><span style="font-size:medium;">ज्योतिष, अंक विद्या, और हस्त रेखा विद्या में कोई भी तर्क नहीं है: यह महज अन्धविश्वास है। फिर भी, हमारे समाज में बहुत सारे काम इनके अनुसार होते हैं। बड़े से बड़े लोग इन बातों को विचार में रख कर कार्य करते हैं। शायद यह सब इसलिये क्योंकि यह कभी कभी एक मनश्चिकित्सक (psychiatrist) की तरह काम करते हैं। आप परेशान हैं कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। मुश्किल तो अपने समय से जायगी पर इसमें अक्सर ध्यान बंट जाता है और मुश्किल कम लगती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सत्यता है या यह अन्धविश्वास नहीं है या ये टोने टुटके से कुछ अलग है।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><em>पिछली शताब्दी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में जब भी लोगों का नाम लिया जायगा तो उसमें दो लोग अवश्य रहेंगे &#8211; आइज़ेक एसीमोवव और कार्ल सेगन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Carl_sagan">Carl Sagan</a>)।<br />
यदि आपको १९८० के दशक में दूरदर्शन की याद हो तो आप हर रविवार को आने वाले टीवी सीरियल <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Cosmos:_A_Personal_Voyage">Cosmos</a> को नहीं भूले होंगे। यह कार्ल सेगन ने ही बनायी थी। इसके बाद इसी नाम से यह <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Cosmos_%28book%29">पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुई</a>। यहां ज्योतिष पर कार्ल सेगन के विचारों  को भी सुने।</em></span></p>
<p style="text-align:center;">
<span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/"><img src="http://img.youtube.com/vi/Iunr4B4wfDA/2.jpg" alt="" /></a></span>
</p>
<p align="left">नोट: मेरे हर चिठ्ठे की तरह इस लेख की सारी चिठ्ठियां भी कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को) दें और अच्छा हो कि इस चिट्ठे की चिट्ठी से लिंक दे दें।</p>
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