<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"
	>

<channel>
	<title>लेख &#187; विज्ञान</title>
	<atom:link href="http://unmukth.wordpress.com/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://unmukth.wordpress.com</link>
	<description>उन्मुक्त पर हैं मेरी छुटपुट बातें, छुटपुट पर हैं औरों कि मुक्त बातें - यहां है मेरी पूरी बातें।</description>
	<lastBuildDate>Wed, 02 Dec 2009 03:03:14 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.com/</generator>
	<language>hi</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<cloud domain='unmukth.wordpress.com' port='80' path='/?rsscloud=notify' registerProcedure='' protocol='http-post' />
<image>
		<url>http://www.gravatar.com/blavatar/56edebd9e2c63eea53ff4dbdd89df259?s=96&#038;d=http://s.wordpress.com/i/buttonw-com.png</url>
		<title>लेख &#187; विज्ञान</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com</link>
	</image>
			<item>
		<title>क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है?</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/</link>
		<comments>http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 15:19:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवनी]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[book review]]></category>
		<category><![CDATA[feynman]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[noble laureate]]></category>
		<category><![CDATA[science]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/don%e2%80%99t-you-have-time-to-think-michelle-feynman/</guid>
		<description><![CDATA[यह चिट्ठी रिचर्ड मिशेल फाइनमेन के द्वारा फिलिप्स फाइनमेन के पत्रों को संकलित कर प्रकाशित पुस्तक 'डोन्ट यू हैव टाइम' की समीक्षा है। This is book review of the book 'Don’t you have time to think’ written by Michelle Feynman.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=72&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="center"><em>यह लेख रिचार्ड फाइनमेन के लिखे पत्रों संग्रहीत कर लिखी गयी पुस्तक &#8216;क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है&#8217; (Don&#8217;t you have time to think) की पुस्तक समीक्षा है और इन पत्रों के माध्यम से उनके दर्शन, उनके जीवन के मूल्यों पर भी एक नज़र डालती है।</em></p>
<p align="center"><em>यह लेख मेरे ‘<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com">उन्मुक्त</a>‘ चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुकी है। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहते हैं तो नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।</em></p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think.html">पुस्तक &#8211; Don’t you have time to think?</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/do-you-have-time-to-think.html">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think_29.html">गायब</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/time-to-think.html">मानद उपाधि</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/time-to-think_10.html">खेलो कूदो और सीखो</a>।।  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/time-to-think_25.html">अधिकारी, विशेषज्ञ</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/time-to-think.html">काम  से ज्यादा महत्व,  उसे करने में है</a>।।  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/time-to-think_23.html">गणित</a>।।</p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि २०वीं शताब्दी के पहले भाग में सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन (<a class="zem_slink" title="Albert Einstein" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Albert_Einstein">Albert Einstein</a>) थे तो दूसरे भाग में यह श्रेय <a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन</a> (<a class="zem_slink" title="Richard Feynman" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Feynman">Richard Philips Feynman</a>) को है। १९६६ में उन्हें,  भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार मिला। मिशेल (<a class="zem_slink" title="Michelle Feynman" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Michelle_Feynman">Michelle Feynman</a>) उनकी गोद ली पुत्री हैं। उन्होने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों का संकलन कर के &#8216;Don’t you have time to think’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है।</span></p>
<p><a title="dont-you-have-time-to-think.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg?w=116&#038;h=172" alt="dont-you-have-time-to-think.jpg" width="116" height="172" /></a></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस पुस्तक की प्रस्तावना में मिशेल अपने बचपन वा अपने पिता के बारे में बताती हैं। वे अपने पिता और अपने बड़े भाई कार्ल को एक दूसरे से विज्ञान के बारे में बात करते हुऐ सोचती हैं कि उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में क्यों नहीं कार्य किया। उन्हें लगता है कि इस कारण कार्ल अपने पिता के साथ ज्यादा पास थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">उन्हें अपना घर और घरों से अलग लगता था। रविवार के दिन फाइनमेन सुबह अखबार नहीं पढ़ते थे पर वह सब लोगों के साथ, संगीत सुनाते थे; ड्रम बजाते थे; और कहानी किस्से सुनाते थे। जब कभी प्रारम्भिक शिक्षा के स्कूल में बच्चों को ले जाने की फाइनमेन की बारी होती थी तो वह अक्सर गाड़ी चलाते हुये या तो केलटेक की तरफ चले जाते थे या नाटक करते थे कि वे रास्ता भूल गये। इस पर सब बच्चे चिल्लाने लगते थे कि यह गलत रास्ता है। फिर फाइनमेन का जवाब होता था कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;अच्छा, यह रास्ता नहीं है&#8217;</span></p></blockquote>
<p><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-4.thumbnail.jpg" alt="feynman-4.jpg" /><em>फाईनमेन लॉस एलमॉस की प्रयोगशाला जाते समय।</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह कहकर वह पुन: दूसरा गलत रास्ता पकड़ लेते थे। बच्चे फिर चीखते थे,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>‘नहीं..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ।’</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">बच्चों को लगता था कि वे स्कूल समय से नहीं पहुंच पायेंगे और उन्हें सजा मिलेगी पर फाइनमेन हमेशा बच्चों को स्कूल समय से पहुंचा देते थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मिशेल कहती हैं कि,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>&#8216;मेरे पिता कई हुनर में माहिर थे पर उनका वह हुनर सबसे खास था जिसमें वह अपने को एक बेवकूफ सा दिखने का नाटक करते थे और मुझे सोचने देते थे कि वे मेरी बातों से बेवकूफ बन गये हैं। इस बात ने मेरे बचपन को सबसे ज्यादा निखारा है।&#8217;</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मिशेल यह भी बताती हैं कि, वे बहुत सालों तक नहीं जानती थी कि सब लोग उनके पिता फाइनमेन का सम्मान एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति की तरह से करते थे। उनके मुताबिक,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>&#8216;मेरे पिता फाइनमेन हमेशा लोगों को अपने बारे में अश्रद्धा रखने को प्रेरित करते थे। वे अक्सर ऐसी कहानियां सुनाया करते थे जिसमें उनकी बेवकूफी झलकती थी। रात के खाने पर वे बताया करते थे कि, किस तरह वह अपना स्वेटर भूल गये; या कुछ महत्वपूर्ण सूचना भूल गये; या लोगों से बात होने के बाद उन्हें उनका नाम याद नहीं रहा। उनकी कान्फ्रेन्स नये-नये होटलों में होती थी। वे अक्सर उससे बोर होकर अपना सामान लेकर जंगल चले जाया करते थे और वहीं कैम्पिंग कर रात बिताते थे। लौट कर, चटकारे लेकर इसका अनुभव हमें सुनने को मिलता था। मेरी मां इस पर हमेशा टिप्‍पणी करती थीं “ओह रिचर्ड” वह हमेशा अपने ऊपर हंसते थे और हम उनके ऊपर।‘</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाईनमेन अपने स्कूल की सहपाठी अरलीन से प्यार करते थे। नौकरी मिलने के बाद उसी के साथ शादी रचाने की बात थी। लेकिन अरलीन को तपेदिक की बीमारी हो गयी। फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे फिर भी उन्होंने उससे शादी की।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं हमेशा सोचता था कि इस तरह की बात तो केवल कहानियों या फिर फिल्मों में होता है, वास्तविक जीवन मैं नहीं, पर मैं गलत था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे में फाइनमेन ने अपनी मां को एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें लिखा कि,<br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>‘I want to marry Arline because I love her &#8211; which means I want to take care of her. That is all there is to it. I want to take care of her.’<br />
<span style="font-size:medium;">मैं अरलीन से शादी करना चाहता हूं क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूं &#8211; इसका अर्थ यह है कि मैं उसकी देख भाल करना चाहता हूं</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार का यह भी एक अर्थ – एकदम सत्य।  हां इसका एक और अर्थ <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-story.html">यहां</a> भी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस किताब में एक पत्र श्री वी.के. सिंह, अध्यापक भौतिक शास्त्र, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर, का भी है। ये फाइनमेन की पुस्तक <a class="zem_slink" title="The Feynman Lectures on Physics" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Feynman_Lectures_on_Physics">Lectures on Physics</a> की तुलना रामायण से करते है और कहते हैं कि इसका अध्ययन भी, उतनी ही बारीकी से करना चाहिए जैसे कि रामायण का किया जाता है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसमें इलाहाबाद के श्री मदन मोहन पंत के पत्र का जिक्र है जिसमें पंत ने फाइनमेन को अपना पेन टीचर के कहा है।<a title="feynman-3.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.jpg"><br />
</a><br />
</span></p>
<p align="center"><strong><span style="font-size:medium;">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">&#8216;कयामत से कयामत तक&#8217; की पिक्चर का एक गाना है,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा,<br />
<span style="font-size:medium;">बेटा हमारा ऐसा काम करेगा।<br />
<span style="font-size:medium;">मगर यह तो कोई न जाने,<br />
<span style="font-size:medium;">कि मेरी मंजिल है कहां।</span><br />
</span></span></span></p>
<p align="center"><em>इस गाने को देखें और सुने</em>
</p>
<p align="center"><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/cFAtfdFHaDk/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">
<p align="left">मैंने इस पिक्चर को नहीं देखा है पर यह गाना मुझे बहुत पसन्द है। लेकिन किसी के पापा का केवल यह कहना या सोचना कि &#8211; बेटा ऐसा काम करेगा &#8211; पर्याप्त नहीं है। बेटा कोई अच्छा काम करे, इसके लिये पापा को बहुत कुछ करना पड़ेगा। अब यदि फाइनमेन के जीवन को देखें तो पायेंगे कि उसमें, उनके पिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उनको विज्ञान में रुचि पैदा करने में, उनके पिता का बहुत बड़ा हाथ था।</p>
<p><span style="font-size:medium;">NBC टेलीविजन ने १९६१ में &#8216;About time&#8217; नामक फिल्म विज्ञान सीरीस के अर्न्तगत बनायी थी। फाइनमेन इसमें वैज्ञानिक सलाहकार थे। इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले जब इसके बारे में जब लिखा जाने लगा तो फाइनमेन से पूछा गया कि उन्हें विज्ञान मे किस प्रकार से रुचि आयी तो उन्होंने बताया कि,</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<blockquote>&#8216;My father, a businessman, had a great interest in science. He told me fascinating things about the stars, numbers, electricity, etc. Wherever we went there were always new wonders to hear about; the mountains, the forest, the sea. Before I could talk he was already interesting me in mathematical designs made with blocks. So I have always be a scientist. I have always enjoyed it, and thank him for this great gift to me.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">मेरे पिता व्यपारी थे पर उन्हें विज्ञान में उन्हें रुचि थी।  वे मुझे विज्ञान की रोचक बातें बताते थे &#8230; इसलिये मैंने वैज्ञानिक बनने की सोची। मुझे इसमें हमेशा मजा आया और इसके लिये मैं अपने पिता को धन्यवाद देता हूं।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">१९८१ में रौडिनी ल्यूस को पत्र लिखते हुऐ फइनमेन बताते हैं कि नीरस पाठ्य पुस्तक से मत घबराओ। उनको केवल तथ्यों के लिये पढ़ो, फिर उन बातों को प्रकृति के आश्चर्य की तरह सोचो और अपनी तरह से समझने की कोशिश करो। वे आगे बताते हैं कि किस प्रकार उनके पिता ने उन्हें इस तरह से सोचने के लिये प्रेरित किया। वे कहते हैं कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p>&#8216;My father taught me how to do that when I was a little boy on his knee and he read the Encyclopaedia Britannica to me! He would stop every once in a while and say—now what does that really mean. For example, “the head of tyrannosaurus rex was four feet wide, etc.” —it means if he stood on the long outside his head would look in at your bedroom on the second floor, and if the poked it in the window it would break casement on both sides. Then when I was a little older when would read that again he would remind me of how strong the next muscles had to be—of ratios of weight and muscle area—and why land animals can’t become size of whales—and why grasshoppers can jump just about as high as a horse can jump. All this, by thinking about the size of a dinosaur’s head!&#8217;</p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">सच, हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। उनको अच्छे संस्कार मिलना, उनका ठीक दिशा में रहना ही हमारी सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वे अच्छे व्यक्ति बने, इसका दायित्व हम पर है। पुरानी कहावत है,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">हम अक्सर अपने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हे अच्छी बातें बताना &#8211; जो कि सबसे महत्वपूर्ण है &#8211; भूल जाते हैं।</span></p>
<p align="center"><a title="mischelle-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.thumbnail.jpg" alt="mischelle-1.jpg" /></a></p>
<p align="center"><em>मिशेल का यह चित्र फइनमेन ने बनाया है</em></p>
<p align="center"><strong>गायब</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कुछ समय पहले दो चिट्ठियां &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/07/22/invisible-1/">अदृश्य हो जाने का वरदान</a>&#8216;, और &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/08/05/invisible-curse/">अदृश्य हो जाने का अभिशाप</a>&#8216; शीर्षक से छुटपुट चिट्ठे पर लिखीं। इसमें यह बताया कि अदृश्य हो जाना अभिशाप है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अन्धा हो जायेगा। लोग, अन्धे हो जाने वाली बात न समझते हुऐ, अदृश्य हो जाने कि इच्छा रखते हैं और इसके लिये तरीका ढूढते रहते हैं। नेवा नामक व्यक्ति ने एक बार फाइनमेन से यह सवाल पूछा कि क्या कोई तरीका है जिसके द्वारा अदृश्य हुआ जा सकता है। इसका उत्तर देते समय फाइनमेन अगस्त १९७५ लिखते हैं कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;I would suggest that the best way to get a good answer to your question is to ask a first-rate professional magician. I do not mean this answer to be facetious or humorous, I am serious. A magician is very good at his making things appear in an unusual way without violating any physical laws, by arranging matter in a suitable way. I know of no physical phenomenon such as X-rays, etc., which will create invisibility as you want, therefore, if it is possible at all it will be in accordance with familiar physical phenomenon. That is what a first-rate magician is good for, to create apparently impossible effect from “ordinary” causes.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इसका अर्थ तो यह हुआ कि असंभ्व है।<br />
</span></p>
<p align="center"><strong>मानद उपाधि</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">आजकल मानद उपाधि का जमाना है। जिस विश्व विद्यालय को देखो वही दे रहा है और सब इसे स्वीकार कर रहें हैं। फाइनमेन को दुनिया के हर देश के विश्वविद्यालय मानद उपाधि से विभूषित करना चाहते थे। १९६७ में, सबसे पहले शिकागो विश्व विद्यालय ने उन्हें मानद उपाधि से विभूषित करने की बात की। उन्होने इसे अपने लिये सम्मान की बात बतायी, पर स्वीकारा नहीं। उनका कहना था कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;I remember the work I did to get a real degree at Princeton and the guys on the same platform receiving honorary degrees without work — and felt an “honorary degree” was a debasement of the idea of a “degree which confirms certain work has been accomplished.” It is like giving an “honorary electrician license”. I swore then that if by chance I was ever offered one I would not accept it.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">जब कभी कोई उन्हे मानद उपाधी देने की बात करता, तो हमेशा उनका यही जवाब रहता था।<br />
</span></p>
<p align="center"><strong>खेलो, कूदो और सीखो</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">जीवन में हमें वह करना चाहिये जो हमें पसन्द हो &#8211; चाहे उसका कोई महत्व हो अथवा नहीं। महत्व अपने आप निकल आता है। मैंने फाइनमेन के बारे में लिखते समय वह किस्सा बताया था जब वे कॉरनल विश्विद्यालय के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे २:१ का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;इसका कोई महत्व नहीं है मैं यह सब मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">लेकिन जब वे एलेक्ट्रॉन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कॉरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी<br />
<a title="feynman-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.thumbnail.jpg" alt="feynman-1.jpg" align="right" /></a> गणित फिर से याद आने लगी। उस काम का महत्व हो गया। उसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला।</span></p>
<p><a title="feynman-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg"><br />
</a></p>
<p><a title="feynman-1.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg"> </a></p>
<p><span style="font-size:medium;">उन्होने इस बात को न केवल अपने जीवन में उतारा पर यही सलाह औरों को भी दी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><span style="font-size:medium;">एक बार सोलह साल के लड़के ने उन्हें पत्र लिख कर यह सलाह मांगी कि वह क्या करे। उनका जवाब था कि,<br />
</span></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;It is wonderful if you can find something you love to do in your youth which is big enough to sustain your interest through all your adult life. Because, whatever it is, if you do it well enough (and you will, if you truly love it) people will pay you to do what you want to do anyway.&#8217;</span></p></blockquote>
<p>उनके मुताबिक,</p>
<ul>
<li> <span style="font-size:medium;">बहुत ज्यादा पढ़ना; या</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> किताबी कीड़ा बना रहना; या</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">अपने उम्र से ज्यादा पढ़ाई करना,</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size:medium;">ठीक नहीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">वे देखने और सीखने में विश्वास करते थे। एक बार , एक भारतीय बच्चे ने उन्हें एक पत्र परमाणु विज्ञान के बारे में लिखा। उनकी सलाह थी,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Your discussion of atomic forces shows that you have read entirely too much beyond your understanding. What we are talking about is real and at hand: Nature. Learn by trying to understand simple things in terms of other ideas—always honestly and directly. What keeps the clouds up, why can’t I see stars in the day time, why do colours appear on oily water, what makes the lines on the surface of water being poured from a pitcher, why does a hanging lamp swing back and forth &#8211; and all the innumerable little things you see all around you. Then when you have learn to explain simpler things, so you have learn what an explanation really is, you can then go on to more subtle questions.<br />
<span style="font-size:medium;">Do not read so much, look about you and think what you see there.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">तुम्हारी बातों से लगता है कि तुमने अपनी समझ से ज्यादा पढ़ लिया है &#8230; इतना मत पढ़ो, अपने चारों तरफ देखो और इसके बारे में सोचो।</span></span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">बचपन में बड़े, बूढ़ों से सुना करता था,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;खेलो कूदोगे तो होगे बर्बाद,<br />
<span style="font-size:medium;">पढ़ोगे लिखोगे तो होगे नवाब।&#8217;</span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">शायद इसे इस तरह से कहना चाहिये,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;खेल, कूद कर सीखोगे,<br />
<span style="font-size:medium;">केवल तब ही बनोगे, नवाब।&#8217;</span></span></p></blockquote>
<p><a title="feynman-3.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.thumbnail.jpg" alt="feynman-3.jpg" align="right" /></a></p>
<p align="right"><em>फाइनमेन को बॉंगो बजाना प्रिय था</em></p>
<p align="center"><strong>अधिकारी, विशेषज्ञ</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन का हमेशा कहना था कि किसी बात को तब स्वीकार करो जब वह तर्क पर खरी उतरे, उसे केवल किसी के कहने पर न स्वीकार करो। १९७६ में मार्क को पत्र लिखते समय सलाह दी कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Don’t pay attention to “authorities,” think yourself.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">अपनी पुस्तक Lectures on Physics में एक जगह उन्होने लिखा था कि<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;No static distribution of charges inside a closed conductor can produce any electric field outside.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">एलिज़बेथ ने भौतिक शास्त्र में एक कोर्स लिया था। परीक्षा में एक सवाल का यही जवाब दिया। इस पर उसके शिक्षक ने उसे कोई नम्बर नहीं दिया क्योंकि यह बात गलत थी। शिक्षक ने एलिज़बेथ को यह भी बताया कि यह किस प्रकार से गलत है। एलिज़बेथ ने जब इसके बारे में फाइनमेन को पत्र लिखा। तो फाइनमेन का जवाब था,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Your instructor was right not to give you any points for your answer was wrong, as he [the teacher] demonstrated using Gauss’ Law. You should, in science, believe logic and arguments, carefully drawn, and not authorities.<br />
&#8230;<br />
<span style="font-size:medium;">You also read the book correctly and understood it. I made a mistake, so the book is wrong &#8230; I am not sure how I did it, but I goofed. And you goofed too, for believing me.<br />
<span style="font-size:medium;">तुम्हारे अध्यापक ने ठीक तुम्हें नंबर नहीं दिये क्योंकि तुम्हारा जवाब सही नहीं था   विज्ञान में तुम्हे तर्क पर विश्वास करना चाहिये न कि किसी अधिकारी,या विशेषज्ञ पर। &#8230;<br />
<span style="font-size:medium;">तुमने मेरी किताब को सही समझा, मैंने ही गलती कर दी थी &#8230; मैं नहीं जानता कि यह कैसे हो गया पर मैं गलत था और तुम भी &#8211; मुझ पर विश्वास करने के लिये।</span></span></span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">बड़े व्यक्तियों का पहला गुण – यदि वे गलत हैं, तो स्वीकार करने में कभी नहीं हिचकते।</span></p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/HKTSaezB4p8/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>बॉंगो बजाते हुऐ फइनमेन</em></p>
<p align="center"><strong>काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">हम सब के जीवन में कोई न कोई आदर्श रहा है। मेरे जीवन में &#8211; एक नहीं, कई रहे। उन्होने अलग अलग तरह से मेरे जीवन, मेरी विचारधारा पर असर डाला। इनमे से कईयों से कभी नहीं मिला। फाइनमेन उनमें से एक थे। उनके मुताबिक काम से ज्यादा महत्व उसे करने में है: जो अच्छा लगे, जिसमें मन लगे &#8211; वह करो पर करो उसे बढ़िया।</span></p>
<p align="right">
<p><span style="font-size:medium;">एक बार कोची नामक एक विद्यार्थी ने फाइनमेन को पत्र लिखा कि वह भौतिक शास्त्र के साधारण विषय पर काम कर कर रहा है और नामरहित है। इस पत्र ने फइनमेन को दुखी किया। उन्हें लगा कि कोची के अध्यापक ने उसे ठीक से नहीं बताया कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं है। फाइनमेन ने कोची को पत्र लिखा कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;The worthwhile problems are the once you can really solve or help solve, the ones you can really contribute something to. A problem is grand in science if it lies before us unsolved and we see some way for us to make a little headway into it.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन का सुझाव था कि पहले छोटी छोटी और आसान मुश्किलों का हल खोजो जो कि आसानी से मिल सकता है। उनके मुताबिक,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;"><span style="font-size:medium;">&#8216;You will get the pleasure of success, and of helping your fellow man, even if it is only to answer a question in the mind of a colleague less able than you. You must not take away from yourself these pleasures because you have some erroneous idea of what is worthwhile.&#8217;</span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन ने पत्र में यह भी बताया कि उन्होने स्वयं,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;I have worked on innumerable problem that you would call humble, but which I enjoyed and felt very good about because I sometimes could partially succeed.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">फाइनमेन का मानना था कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;You do any problem that you can, regardless of field.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">न तो सरदर्द लेने की जरूरत है न ही घबराने की &#8211; कयोंकि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;In no field is all the research done. Research leads to new discoveries and new questions to answer by more research.&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उनके अनुसार,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;No problem is too small or too trivial if we can really do something about it.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">यदि हम किसी मुश्किल का हल ढूढ़ने में कुछ कर सकते हैं तो वह न तो छोटी है और न ही बेकार।</span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">पत्र में फानमेन, आगे लिखते हैं कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;You say you are a nameless man. You are not to your wife and to your child. You will not long remain so to your immediate colleagues if you can answer their simple question when they come into your office. You are not nameless to me. Do not remain nameless to yourself — it is too sad a way to be. Know your place in the world and evaluate yourself fairly, not in terms of the naïve ideals of your own use, nor in terms of what you erroneously imagine your teacher’s ideals are.&#8217;</span></p></blockquote>
<p align="center"><strong>गणित</strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">भौतिक शास्त्र मेरा प्रिय विषय था। <a href="http://www.blogger.com/profile/15090591980327578036">मुन्ने की मां</a> को गणित अच्छी लगती है। मैं हमेशा कहता हूं कि भौतिक शास्त्र तो रानी है और गणित नौकरानी &#8211; जहां चाहो लगा लो।</span></p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/hRAbke411Zw/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>फाइनमेन तो जिज्ञासू थे। उनके कुछ अन्य विडियो <a href="http://www.youtube.com/results?search_query=richard+feynman&amp;search=Search">यहां </a>देखिये।</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">फ्रेड्रिक हिप्प १६ साल के नवयूवक ने १९६१ में फाइनमेन को पत्र लिख कर बताया कि भौतिक शास्त्र उसे अच्छा लगता है पर गणित पसंद नहीं आती है। वह क्या करे। फाइनमेन ने उसे लिखा कि,<br />
</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;To do any important work in physics a very good mathematical ability and aptitude are required. Some work in applications can be done without this, but it will not be very inspired.<br />
<span style="font-size:medium;">If you must satisfy your “personal curiosity concerning the mysteries of nature” what will happen if these mysteries turn out to be laws expressed in mathematical terms (as they do turn out to be )? You cannot understand the physical work in any deep or satisfying way without using mathematical reasoning with facility.&#8217;<br />
<span style="font-size:medium;">भौतिक शास्त्र में अच्छा काम करने के लिये अच्छी गणित का ज्ञान होना आवश्यक है &#8230; विज्ञान के बहुत सारे रहस्य, वे नियम हैं जो गणित के द्वारा ही समझे जा सकते हैं।  भौतिक विज्ञान को अच्छी तरह से बिना गणित के नहीं समझा जा सकता है।</span></span></span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">गणित के यही गुण उसे गणित को राजरानी बनाते हैं। विज्ञान में गणित के बिना ठौर नहीं। मुझे तो मालुम है कि मुन्ने की मां तो हमेशा सही रहती है, उससे जीत पाना संभव नहीं।</span></p>
<p><a title="feynman-2.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.jpg"></a></p>
<p style="text-align:center;"><a title="feynman-2.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.thumbnail.jpg" alt="feynman-2.jpg" width="141" height="107" /></a></p>
<p align="center"><em>कैल टेक में पढ़ाते हुऐ</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस पुस्तक ने मुझे कई बातों की याद दिलायी:</span></p>
<ul>
<li> <span style="font-size:medium;">मेरे बचपन की;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">कई ऐसे व्यक्तियों की जिन्होने मेरे बचपन में, मुझ पर सबसे ज्यादा असर डाला;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">कुल्लू मनाली में एक बिस्किट के पीछे, पूरी नदी पैदल पार करने की;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उन क्षणों की भी, जो मैंने अपने बच्चों के साथ पहेली बूझते हुऐ बिताये;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उनके साथ बिताये, नदी के किनारे तारों, लियोनिडस्, और पुच्छल तारे को देखते हुऐ रातों की;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उनके साथ बिताये, दुधुवा, जिम कौर्बेट, कान्हा, बान्धवगढ़, मदुमलाई, और बंदीपुर के जंगलों की;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> उन पिकनिकों की, जिसमें हमने सारा समय केकड़े और मछलियां पकड़ने में बिता दिया;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">मेले में उन रातों की, जो हमने हांथ की रेखायें पढ़ने, और नौटंकी , जादू देखने में गुजार दिये;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">पंचमढ़ी के जंगलों की, जब हम पानी के झरने के लिये छोटे रास्ते पर चलते जंगल में खो गये थे;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">पंचमढ़ी में पीछा करती मधुमक्खियों की, जिससे पानी के झरने में कूद कर जान बचायी;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> बम्बई में गोरे गांव में मिल्क डेरी की, जहां पर रेलिंग ही मुन्ने के उपर गिर गयी और बस हमें वहीं छोड़ के चली गयी, तब कई किलोमीटर की दूरी मुन्ने को गोदी में ले जाने की;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;"> चुनाव में उस उपद्रव की, जब चुनाव की निष्पक्षता कराने के पीछे मेरा सर पर अध्धा मार दिया गया, पांच टीके लगे, और मैं अब भी नहीं समझ पाता कि में उस दिन कैसे बच गया;</span></li>
<li> <span style="font-size:medium;">उस सभा की जब अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के खिलाफ बोलने पर लोग चप्पल से मारने मंच पर आ गये।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size:medium;">यह आपको भी कुछ ऐसी ही यादों पर वापस ले जायगी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस पुस्तक में फाइनमेन के लिखे हुये बहुत सारे पत्र हैं, जिससे उनके चरित्र के बारे में पता चलता है और यह पुस्तक बेशक पढ़ने योग्य है।</span></p>
<p style="text-align:center;">सांकेतिक चिन्ह</p>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">पुस्तक समीक्षा</a>, book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/books/">books</a>,  <a href="http://hi.wordpress.com/tag/book-review/">book review</a>, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://wordpress.com/tag/review/">Review</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/reviews/">Reviews</a>, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
<div class="zemanta-pixie" style="margin-top:10px;height:15px;"><a class="zemanta-pixie-a" title="Zemified by Zemanta" href="http://www.zemanta.com/"><img class="zemanta-pixie-img" style="border:medium none;float:right;" src="http://img.zemanta.com/pixie.png" alt="Zemanta Pixie" /></a></div>
<p></span></span></p>
<p></span></span></span></span></span></p>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/unmukth.wordpress.com/72/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/unmukth.wordpress.com/72/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/unmukth.wordpress.com/72/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/unmukth.wordpress.com/72/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=72&subd=unmukth&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>3</slash:comments>
	
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/92696fd2b445089be0ffc7bc65fea57c?s=96&#38;d=http%3A%2F%2F1.gravatar.com%2Favatar%2Fad516503a11cd5ca435acc9bb6523536%3Fs%3D96" medium="image">
			<media:title type="html">उन्मुक्त</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">dont-you-have-time-to-think.jpg</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-4.thumbnail.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">feynman-4.jpg</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://img.youtube.com/vi/cFAtfdFHaDk/2.jpg" medium="image" />

		<media:content url="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.thumbnail.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">mischelle-1.jpg</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.thumbnail.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">feynman-1.jpg</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.thumbnail.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">feynman-3.jpg</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://img.youtube.com/vi/HKTSaezB4p8/2.jpg" medium="image" />

		<media:content url="http://img.youtube.com/vi/hRAbke411Zw/2.jpg" medium="image" />

		<media:content url="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.thumbnail.jpg" medium="image">
			<media:title type="html">feynman-2.jpg</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://img.zemanta.com/pixie.png" medium="image">
			<media:title type="html">Zemanta Pixie</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/</link>
		<comments>http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 31 Dec 2006 12:11:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[खगोलशास्त्र]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[Alpha Centauri]]></category>
		<category><![CDATA[Astronomy]]></category>
		<category><![CDATA[Centaurus]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/</guid>
		<description><![CDATA[This post in Hindi (Devnagree) explains that astology, numerology and palmistry have no science behind them: they are merely supertitious but they often please your mind. In order to read it in Roman or any other Indian script - see right hand widget.
is chitthi mein bataya gayaa hai ki jyotish, ank vidya, aur hast vidya ke peeche koi bhi vigyaan nheen hai: yeh andhvishvaas hai. lekin log ise prayog karate hain kyonkee yh aapke mastikshk ko kabhee kabhee tasalee deti hai. ise roman ya kisee aur bharteeya lipi mein pardhne ke liye daahine tarf ka widget dekhein. <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=62&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:center;"><em>यह लेख <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त चिठ्ठे</a> पर &#8216;ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके&#8217; के नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहें तो नीचे कड़ियों पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।</em></p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_30.html">भूमिका</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_07.html">तारे और ग्रह</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_10.html">प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_15.html">यूरोप में खगोल शास्त्र</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/hair-musical.html">हेर संगीत नाटक</a> (Hair Musical)।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_26.html">पृथ्वी की गतियां</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/signs-of-zodiac.html">राशियां</a> (Signs of Zodiac)।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/precession-of-equinoxes.html">विषुव अयन</a> (<a class="zem_slink" title="Precession (astronomy)" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Precession_%28astronomy%29">precession of equinoxes</a>): हेयर संगीत नाटक के शीर्ष गीत का अर्थ।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/blog-post_21.html">ज्योतिष या अन्धविश्वास</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/11/blog-post_26.html">अंक विद्या, डैमियन &#8211; शैतान का बच्चा</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_13.html">अंक लिखने का इतिहास</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_25.html">हस्तरेखा विद्या और निष्कर्ष</a>।।</p>
<p><span style="font-size:medium;">आज ज्योतिष, अंक, और हस्तरेखा विद्या समाज के अंग बन चुके हैं पर इनके पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं है। यह विद्यायें कुछ लोगो के जीवन व्यापन का साधन हैं तो कुछ लोगो को, कष्ट से मुक्ति दिलाने की झूटी दिलासा दे कर, शान्ति पहुंचाते हैं। इस लेख में उन बातों की चर्चा होगी जिससे पता चलता है कि इनका विज्ञान से कोई संबन्ध नहीं है। सबसे पहले हम ज्योतिष विद्या के बारे में बात करेंगे, पर पहले तारे, ग्रह और तब राशि के बारे में।<br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<strong>तारे और ग्रह</strong><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
रात में आकाश में कई पिण्ड चमकते रहते हैं, इनमें से अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं और एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा (Star) कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्ड के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे &#8211; यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है जिसका अर्थ इधर-उधर घूमने वाला है। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया।</span></span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
हमारे लिये आकाश में सबसे चमकीला पिण्ड सूरज है, फिर चन्द्रमा और उसके बाद रात के तारे या ग्रह। तारे स्वयं में एक सूरज हैं। ज्यादातर, हमारे सूरज से बड़े ओर चमकीले, पर इतनी दूर हैं कि उनकी रोशनी हमारे पास आते आते बहुत क्षीण हो जाती है इसलिये दिन में नहीं दिखायी पड़ते पर रात में दिखायी पड़ते हैं। कुछ प्रसिद्ध तारे इस प्रकार हैं:</span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>सबसे प्रसिद्ध तारा,  <a href="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/ap991006.html">ध्रुव तारा</a> (<a class="zem_slink" title="Polaris" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Polaris">Polaris</a> या North star) है। यह इस समय पृथ्वी की धुरी पर है इसलिये अपनी जगह पर स्थिर दिखायी पड़ता है। ऐसा पहले नहीं था या आगे नहीं होगा। ऐसा क्यों है, इसके बारे में आगे चर्चा होगी।</li>
<li>तारों में सबसे चमकीला तारा <a href="http://apod.gsfc.nasa.gov/apod/ap000611.html">व्याध</a> (<a class="zem_slink" title="Sirius" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sirius">Sirius</a>) है। इसे Dog star भी कहा जाता है क्योंकि यह <a class="zem_slink" title="Canis Major" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Canis_Major">Canis major</a> (बृहल्लुब्धक) नाम के तारा समूह का हिस्सा है।</li>
<li><a href="http://apod.gsfc.nasa.gov/apod/ap030323.html">मित्रक</a> (<a class="zem_slink" title="Alpha Centauri" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Alpha_Centauri">Alpha Centauri</a>), नरतुरंग (<a class="zem_slink" title="Centaurus" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Centaurus">Centaurus</a>) तारा समूह का एक तारा है। यदि सूरज को छोड़ दें तो तारों में यह हमसे सबसे पास है। प्रकाश की किरणें १ सेकेन्ड मे ३x(१०)८ मीटर की दूरी तय करती हैं। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जो कि प्रकाश की किरणें एक साल में तय करती हैं। इसकी हमसे दूरी लगभग ४.३ प्रकाश वर्ष है। वास्तव में यह एक तारा नहीं है पर तीन तारों का समूह है जो एक दूसरे के तरफ चक्कर लगा रहें हैं, इसमें Proxima Centauri हमारे सबसे पास आता है।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
ग्रह और चन्द्रमा, सूरज नहीं हैं। यह अपनी रोशनी में नहीं चमकते पर सूरज की रोशनी को परिवर्तित करके चमकते हैं।, तारे टिमटिमाते हैं पर ग्रह नहीं। तारों की रोशनी का टिमटिमाना, हवा में रोशनी के अपवर्तन (refraction) के कारण होता है। यह तारों की रोशनी पर ही होता है क्योंकि तारे हमसे बहुत दूर हैं और इनके द्वारा आती रोशनी की किरणें हम तक पहुंचते पहुंचते समान्तर हो जाती हैं पर ग्रहों कि नहीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
<strong>प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र</strong><span style="font-size:medium;"><br />
पहले के ज्योतिषाचार्य वास्तव में उच्च कोटि के खगोलशास्त्री थे और अपने देश के खगोलशास्त्री दुनिया में सबसे आगे। अपने देश में तो ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ चक्कर लगाती है। यजुर्वेद के अध्याय ३ की कण्डिका ६ इस प्रकार है,</span></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">आयं गौ: पृश्रिनरक्रमीदसदन् मातरं पुर: ।<br />
पितरं च प्रचन्त्स्व:।।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
डा. कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह द्वारा इसका काव्यानुवाद एवं टिप्पणी की है। इसे भुवन वाणी ट्रस्ट, मौसम बाग, सीतापुर रोड, लखनऊ-२२६०२० ने प्रकाशित किया है। उन्होंने इस कण्डिका में काव्यानुवाद व टिप्पणी इस प्रकार की है,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;प्रत्यक्ष वर्तुलाकार सतत गतिशीला।<br />
है अंतरिक्ष में करती अनुपम लीला।।<br />
अपनी कक्षा में अंतरिक्ष में संस्थित।<br />
रवि के सम्मुख हैं अविरत प्रदक्षिणा-रत।।<br />
दिन, रात और ऋतु-क्रम से सज्जित नित नव।<br />
माता यह पृथ्वी अपनी और पिता दिव।।<br />
हे अग्नि। रहो नित दीपित, इस धरती पर।<br />
शत वर्णमयी ज्वालाओं से चिर भास्वर।।<br />
फैले द्युलोक तक दिव्य प्रकाश तुम्हारा।<br />
मेघों में विद्युन्मय हो वास तुम्हारा।।<br />
लोकत्रय में विक्रम निज करो प्रकाशित।<br />
त्रयताप- मुक्त हो मानव पर निर्वृत्तिरत।।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
टिप्पणी &#8211; यह मंत्र बड़ा कवित्वपूर्ण है। इसमें अग्नि के पराक्रम का चित्रात्मक वर्णन है। इसमें श्लेषालंकार है। ‘गौ पृश्नि:’ का अर्थ गतिशील बहुरंगी ज्वालाओं वाला अग्नि किया गया है। महर्षि दयानन्‍द ने ‘गौ:’ का अर्थ पृथ्वी किया है। यह पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर अंतरिक्ष में घूमती है। इसी से दिन-रात, कृष्ण-शुक्ल पक्ष, अयन, वर्ष, ऋतु आदि का क्रम चलता है। अनुवाद में यही अर्थ ग्रहण किया गया है। अग्नि पृथ्वी का पुत्र भी कहा गया है। इस मंत्र में विशेष ध्यान देने की बात है- पृथ्वी का अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमना। इससे सिद्ध है कि वैदिक ऋषि को पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने का ज्ञान था।&#8217;</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><br />
प्राचीन भारत में अन्य प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:</span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>याज्ञवल्क्य (ईसा से दो शताब्दी पूर्व) हुऐ थे। उन्होने यजुर्वेद पर काम किया था। इसलिये यह कहा सकता है कि अपने देश ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है। यूरोप में इस तरह से सोचना तो 14वीं शताब्दी में शुरु हुआ।</li>
<li>आर्यभट्ट (प्रथम) (४७६-५५०) ने आर्य भटीय नामक ग्रन्थ की रचना की। इसके चार खंड हैं &#8211; गीतिकापाद, गणितपाद, काल क्रियापाद, और गोलपाद। गोलपाद खगोलशास्त्र (ज्योतिष) से सम्बन्धित है और इसमें ५० श्लोक हैं। इसके नवें और दसवें श्लोक में यह समझाया गया है कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है।</li>
<li>भास्कराचार्य ( १११४-११८५) ने सिद्धान्त शिरोमणी नामक पुस्तक चार भागों में लिखी है &#8211; पाटी गणिताध्याय या लीलावती (Arithmetic), बीजागणिताध्याय (Algebra), ग्रह गणिताध्याय (Astronomy), और गोलाध्याय। इसमें प्रथम दो भाग स्वतंत्र ग्रन्थ हैं और अन्तिम दो सिद्धांत शिरोमणी के नाम से जाने जाते हैं। सिद्धांत शिरोमणी में पृथ्वी के सूरज के चारो तरफ घूमने के सिद्धान्त को और आगे बढ़ाया गया है।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>यूरोप में खगोल शास्त्र</strong><br />
<span style="font-size:medium;">यूरोप के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>टौलमी (९०-१६८) नाम का ग्रीक दर्शनशास्त्री दूसरी शताब्दी में हुआ था। इसने पृथ्वी को ब्रम्हाण्ड का केन्द्र माना और सारे पिण्डों को उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हुये बताया। इस सिद्धान्त के अनुसार सूरज एवं तारों की गति तो समझी जा सकती थी पर ग्रहों की नहीं।</li>
<li>कोपरनिकस (१४७३-१५४३) एक पोलिश खगोलशास्त्री था, उसका जन्म १५वीं शताब्दी में हुआ। यूरोप में सबसे पहले उसने कहना शुरू किया कि सूरज सौरमंडल का केन्द्र है और ग्रह उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हैं।</li>
<li>केपलर (१५७१-१६३०) एक जर्मन खगोलशास्त्री था, उसका जन्म १६वीं शताब्दी में हुआ था। वह गैलिलियो के समय का ही था। उसने बताया कि ग्रह सूरज की परिक्रमा गोलाकार कक्षा में नहीं कर रहें हैं, उसके मुताबिक यह कक्षा अंड़ाकार (Elliptical) है। यह बात सही है।</li>
<li>गैलिलियो (१५६४-१६४२) एक इटैलियन खगोलशास्त्री था उसे टेलिस्कोप का आविष्कारक कहा जाता है पर शायद उसने बेहतर टेलिस्कोप बनाये और सबसे पहले उनका खगोलशास्त्र में प्रयोग किया।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;">टौलमी के सिद्धान्त के अनुसार शुक्र ग्रह पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है और वह पृथ्वी और सूरज के बीच रहता है इसलिये वह हमेशा बालचन्द्र (Crescent) के रूप में दिखाई देगा। कोपरनिकस के मुताबिक शुक्र सारे ग्रहों की तरह सूरज के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है इसलिये चन्द्रमा की तरह उसकी सारी कलायें (phases) होनी चाहिये। गैलिलियो ने टेलिस्कोप के द्वारा यह पता किया कि शुक्र ग्रह की भी चन्द्रमा की तरह सारी कलायें होती हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि ग्रह – कम से कम शुक्र तो &#8211; सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं। गैलिलियो ने सबसे पहले ग्रहों को सूरज का चक्कर लगाने का प्रयोगात्मक सबूत दिया। पर उसे इसका क्या फल मिला। चर्च ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह बात ईसाई धर्म के विरूद्ध है और गैलिलियो को घर में नजरबन्द कर दिया गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">भौतिक शास्त्र में हर चीज देखी नहीं जा सकती है और किसी बात को सत्य केवल इसलिये कहा जाता है कि उसको सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जा सकता है। यदि पृथ्वी को सौरमंडल का केन्द्र मान लिया जाय तो किसी भी तरह से इन ग्रहों की गति को नहीं समझा जा सकता है पर यदि सूरज को सौरमंडल का केन्द्र मान लें तो इन ग्रहों और तारों दोनों की गति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। इसलिए यह बात सत्य मान ली गयी कि सूरज ही हमारे सौरमंडल के केन्द्र में है जिसके चारों तरु पृथ्वी एवं ग्रह घूम रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong><a class="zem_slink" title="Hair (musical)" rel="wikipedia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Hair_%28musical%29">Hair</a> Musical  हेयर संगीत नाटक</strong><br />
<span style="font-size:medium;">१९६० के दशक में, हेयर संगीत नाटक {<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Hair_%28musical%29">Hair (musical</a>)} का मंचन अमेरिका में शुरू किया गया। इसका सबसे पहले मंचन १७ अक्टूबर १९६७ को हुआ। इसका मंचन आज तक अलग-अलग देशों में हो रहा है पर अपने देश में कभी नहीं हुआ। यह उस समय शुरू हुआ जब अमेरिका में लोग वियतनाम जंग के खिलाफ हो रहे थे, हिप्पी सभ्यता जन्म ले रही थी। बहुत से लोगों का कहना है कि हिप्पी सभ्यता, इसी संगीत नाटक से जन्मी। इसमें लड़के और लड़कियां राशि के चिन्हों को दर्शाते थे, कुछ दृश्यों में निर्वस्त्र होते थे कुछ में वे अमेरिकी झण्डे को पहने होते थे। इसलिये शायद यह चर्चित तथा विवादास्पद हो गया।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसका शीर्षक गीत इस प्रकार है This is the dawning age of Aquarius है। इस गाने के शब्द <a href="http://www.geocities.com/hairpages/lyrics.html">यहां</a> हैं और इसे आप <a href="http://www.youtube.com/watch?v=2nWLAwN8-aU">यहां</a> देख वा सुन सकते हैं। यह गाना अपने देश में भी प्रचलित है। इस गाने का शब्दिक अर्थ है कि कुम्भ राशि का समय आने वाला है लोग इसका शब्दिक अर्थ तो जानते हैं &#8211; पर यह नहीं समझते कि यह क्या है। क्या वास्तव में कुम्भ राशि का समय आ रहा है? यह क्यों कहा जा रहा है? इसका गाने के अर्थ का भी हमारे विषय से सम्बन्ध है। इसको समझने के लिये जरूरी है कि पृथ्वी की गतियों एवं राशियों को समझें।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>पृथ्वी की गतियां</strong><br />
<span style="font-size:medium;">हमारी पृथ्वी की बहुत सारी गतियां हैं:</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>पृथ्वी अपनी धुरी पर २४ घंटे में एक चक्कर लगा रही है। इसलिये दिन और रात होते हैं।</li>
<li>पृथ्वी सूरज के चारों तरफ एक साल में एक चक्कर लगाती है। यदि हम उस तल (plane) की कल्पना करें जिसमें पृथ्वी और सूरज का केन्द्र, तथा उसकी परिक्रमा है तो पायेंगे कि पृथ्वी की धुरी, इस तल से लगभग साढ़े २३ डिग्री झुकी है पृथ्वी के धुरी झुके रहने के कारण अलग-अलग ऋतुयें आती हैं। हमारे देश में गर्मी के दिनों में सूरज उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है और जाड़े में दक्षिणी गोलार्द्ध में चला जाता है। यानी कि साल के शुरू होने पर में सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है पर वहां से चलकर उत्तरी गोलार्द्ध और फिर वापस दक्षिणी गोलार्द्ध के उसी विन्दु पर पहुंच जाता है।</li>
<li>पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और पृथ्वी की धुरी लगभग २५७०० साल में एक बार घूमती है। इस समय हमारी धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है और दूसरे तारे घूमते दिखाई देते हैं। हजारों साल पहले हमारी धुरी न तो ध्रुव तारा पर थी और न हजारों साल बाद यह ध्रुव तारा पर होगी। तब ध्रुवतारा भी रात में पूरब की तरफ से उदय होगा और पश्चिम में अस्त होता दिखायी देगा।</li>
<li>हमारा सौरमंडल एक निहारिका में है जिसे आकाश गंगा कहा जाता है। इसका व्यास लगभग १,००,००० प्रकाश वर्ष है। हमारी पृथ्वी आकाश गंगा के केन्द्र से लगभग ३०,००० प्रकाश वर्ष दूर है और हमारा सौरमंडल भी इस आकाश गंगा के चक्कर लगा रहा है और हमारी पृथ्वी भी उसके चक्कर लगा रही है।</li>
<li>हमारी आकाश गंगा और आस-पास की निहारिकायें भी एक दूसरे के पास आ रही हैं। यह बात डाप्लर सिद्धान्त से पता चलती है। हमारी पृथ्वी भी इस गति में शामिल है।</li>
<p></span></ul>
<p>मु<span style="font-size:medium;">ख्य रूप से हम पृथ्वी की पहली और दूसरी गति ही समझ पाते हैं, तीसरी से पांचवीं गति हमारे जीवन से परे है। वह केवल सिद्धान्त से समझी जा सकती है, उसे देखा नहीं जा सकता है। हमारे विषय के लिये दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>तारा समूह</strong><br />
<span style="font-size:medium;">ब्रम्हाण्ड में अनगिनत तारे हैं और अनगिनत तारा समूह। कुछ चर्चित तारा समूह  इस प्रकार हैं:</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>सप्त ऋषि ( Great/ Big bear or Ursa Major): यह उत्तरी गोलार्ध के सात तारे हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।</li>
<li>ध्रुवमत्स्य/ अक्षि ( Little Bear or Ursa Minor): यह सप्त ऋषि के पास उसी शक्ल का है इसके सबसे पीछे वाला तारा ध्रुव तारा है।</li>
<li>कृतिका (कयबचिया) Pleiades: पास-पास कई तारों का समूह है हमारे खगोलशास्त्र में इन्हें सप्त ऋषि की पत्नियां भी कहा गया है।</li>
<li>मृगशीर्ष (हिरन- हिरनी) Orion: अपने यहां इसे हिरण और ग्रीक में इसे शिकारी के रूप में देखा गया है पर मुझे तो यह तितली सी लगती  है।</li>
<li>बृहल्लुब्धक (Canis Major): इसकी कल्पना कुत्ते की तरह की गयी पर मुझे तो यह घन्टी की तरह लगता है। व्याध (Sirius) इसका सबसे चमकीला तारा है। अपने देश में इसे मृगशीर्ष पर धावा बोलने वाले के रूप में देखा गया जब कि ग्रीक पुराण में इसे Orion (शिकारी) के कुत्ते के रूप में देखा गया।</li>
<li>शर्मिष्ठा (Cassiopeia): यह तो मुझे कहीं से सुन्दरी नहीं लगती यह तो W के आकार की दिखायी पड़ती है और यदि इसके बड़े कोण वाले भाग को विभाजित करने वाली रेखा को उत्तर दिशा में ले जायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचेगी।</li>
<li>महाश्व (Pegasus): इसकी कल्पना अश्व की तरह की गयी पर यह  तो मुझे टेनिस के कोर्ट जैसा लगता है।</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;">जाहिर है मैं इन सब तारा समूह के सारे तारे देख कर आकृतियों कि कल्पना नहीं कर रहा हूं, पर इन तारा समूह के कुछ खास तारों को ले कर ही कल्पना कर रहा हूं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>राशियां Signs of Zodiac</strong><br />
<span style="font-size:medium;">यह तो थे आकाश पर कुछ मुख्य तारा समूह। इन सब का नाम हमने कभी न कभी सुना है। इनके अलावा बारह तारा समूह जिन्हें राशियां कहा जाता है उनका नाम हम अच्छी तरह से जानते हैं। इन सब को छोड़ कर, किसी तारा समूह के लिये तो खगोलशास्त्र की पुस्तक ही देखनी पड़ेगी। बारह तारा समूह, जिन्हें राशियां कहा जाता है, उनके नाम तो हम सब को मालुम हैं पर साधरण व्यक्ति के लिये इन्हें आकाश में पहचान कर पाना मुश्किल है। यह बारह राशियां हैं,</span></span></p>
<ol> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>मेष              (Aries)</li>
<li>वृष                 ( Taurus)</li>
<li>मिथुन             (Gemini)</li>
<li>कर्क                (Cancer)</li>
<li>सिंह                (Leo)</li>
<li>कन्या              (Virgo)</li>
<li>तुला               (Libra)</li>
<li>वृश्चिक            (Scorpio)</li>
<li>धनु                 (Sagittarius)</li>
<li>मकर             (Capricorn)</li>
<li>कुम्भ              (Aquarius)</li>
<li>मीन               (Pisces)</li>
<p></span></ol>
<p><span style="font-size:medium;">इन बारह तारा समूहों को ही क्यों इतना महत्व दिया गया? इसके लिये पृथ्वी की दूसरी और तीसरी  गति महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p>य<span style="font-size:medium;">दि पृथ्वी, सूरज के केन्द्र और पृथ्वी की परिक्रमा के तल को चारो तरफ ब्रम्हाण्ड में फैलायें, तो यह ब्रम्हाण्ड में एक तरह की पेटी सी बना लेगा। इस पेटी को हम १२ बराबर भागों में बांटें तो हम देखेंगे कि इन १२ भागों में कोई न कोई तारा समूह आता है। हमारी पृथ्वी और ग्रह, सूरज के चारों तरफ घूमते हैं या इसको इस तरह से कहें कि सूरज और सारे ग्रह पृथ्वी के सापेक्ष इन १२ तारा समूहों से गुजरते हैं। यह किसी अन्य तारा समूह के साथ नहीं होता है इसलिये यह १२ महत्वपूर्ण हो गये हैं। इस तारा समूह को हमारे पूर्वजों ने कोई न कोई आकृति दे दी और इन्हे राशियां कहा जाने लगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>विषुव अयन (precession of equinoxes)</strong><br />
<span style="font-size:medium;">विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग २० मार्च तथा २३ सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर २४ घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी २५,७०० साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग २५,७०० साल में एक बार घूमती है। वह १/१२वें हिस्से को २१४१ या लगभग २१५० साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से १६५० साल पहले (१६५०BC) से, ईसा के ५०० साल बाद (५०० AD) तक लगभग २१५० साल रहा। अलग अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसी लिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के ५०० साल बाद (५०० AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है &#8211; तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ईसा के ५०० साल (५०० AD) के २१५० साल बाद तक यानि कि २७वीं शताब्दी (२६५० AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति &#8216;This is the dawning age of Aquarius&#8217; का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते &#8211; ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।<br />
</span></p>
<p style="text-align:center;"><em>इस बात को यदि आप देख कर समझना चाहें तो नीचे देखें</em></p>
<p style="text-align:center;">
<p style="text-align:center;">
<span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/"><img src="http://img.youtube.com/vi/oQPFoDkGFrU/2.jpg" alt="" /></a></span>
</p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>ज्योतिष या अन्धविश्वास</strong><br />
<span style="font-size:medium;">सूरज और चन्द्रमा हमारे लिये में महत्वपूर्ण हैं। यदि सूरज नहीं होता तो हमारा जीवन ही नहीं शुरू होता। सूरज दिन में, और चन्द्रमा रात में रोशनी दिखाता है। सूरज और चन्द्रमा, समुद्र को भी प्रभावित करते हैं। ज्वार और भाटा इसी कारण होता है। समुद्री ज्वार-भाटा के साथ यह हवा को भी उसी तरह से प्रभावित कर, उसमें भी ज्वार भाटा उत्पन करते हैं। ज्वार-भाटा में किसी और ग्रह का भी असर होता होगा, पर वह नगण्य के बराबर है। इसके अलावा यह बात अप्रसांगिक है कि हमारा जन्म जिस समय हुआ था उस समय,</span></span></p>
<ul> <span style="font-size:medium;"></p>
<li>सूरज किस  राशि में था, या</li>
<li>चन्द्रमा किस राशि पर था, या</li>
<li>कोई अन्य ग्रह किस राशि पर था,</li>
<p></span></ul>
<p><span style="font-size:medium;">इसका कोई सबूत नहीं है कि पैदा होने का समय या तिथि महत्वपूर्ण है। यह केवल अज्ञानता ही है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमारे पूर्वजों ने इन राशियों को याद करने के लिये स्वरूप दिया। पुराने समय के ज्योतिषाचार्य बहुत अच्छे खगोलशास्त्री थे। पर समय के बदलते उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि किसी व्यक्ति के पैदा होने के समय सूरज जिस राशि पर होगा, उस आकृति के गुण उस व्यक्ति के होंगे। इसी हिसाब से उन्होंने राशि फल निकालना शुरू कर दिया। हालांकि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि आप ज्योतिष को उसी के तर्क पर परखें, तो भी ज्योतिष गलत बैठती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि ज्योतिष का ही तर्क लगायें तो &#8211; विषुव अयन के समय सूरज की स्थिति बदल जाने के कारण &#8211; जो गुण ज्योतिषों ने मेष राशि में पैदा होने वाले लोगों को दिये थे वह अब मीन राशि में पैदा होने वाले व्यक्ति को दिये जाने चाहिये। यानी कि, हम सबका राशि फल एक राशि पहले का हो जाना चाहिये पर ज्योतिषाचार्य तो अभी भी वही गुण उसी राशि वालों को दे रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सच में हम बहुत सी बातो को उसे तर्क या विज्ञान से न समझकर उस पर अंध विश्वास करने लगते हैं, जिसमें ज्योतिष भी एक है। ज्योतिष या टोने टोटके में कोई अन्तर नहीं। यह एक ही बात के, अलग अलग रूप हैं। यही बात अंक विद्या और हस्तरेखा विद्या के लिये लागू होती है। अंक विद्या पर बात करने से पहले हम लोग ओमेन नाम की फिल्म की चर्चा करेंगे।</span></p>
<p><strong><span style="font-size:medium;">डेमियन: ओमेन – फिल्म</span></strong><br />
<span style="font-size:medium;"> <span style="font-size:medium;">1976 में एक फिल्म आयी थी जिसका नाम ओमेन (Omen) था। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार की है कि एक अमेरिकन राजनयिक (Diplomat) के पुत्र की म़ृत्यु हो जाती है और उसकी जगह एक दूसरा बच्चा रख दिया जाता है। इस बच्चे का नाम डेमियन (Damien) है। यह बच्चा वास्तव में एक शैतान का बच्चा है और आगे चलकर इसके एन्टीक्राइस्ट (Antichrist) बनने की बात है। यह बात बाइबिल की एक भविष्यवाणी में है। कुछ लोगों को पता चल जाता है कि यह शैतान का बच्चा है और उसे मारने का प्रयत्न किया जाता है पर पुलिस जिसे नहीं मालुम कि वह शैतान का बच्चा है, उसे बचा लेती है। यह फिल्म यहीं पर समाप्त हो जाती है।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस फिल्म के बाद, १९७८ में दूसरी फिल्म Damien: Omern II नाम से आयी। यह डैमियन के तब की कहानी है, जब वह १३ साल का हो जाता है। १९८१ में इस सीरीज में तीसरी फिल्म Oemn III: The Final Conflict आयी। इस सिरीस की चौथी फिल्म टीवी के लिये १९९१ में Omen IV : The Awakening के नाम से बनी। इन फिल्मों में यह महत्वपूण है कि डेमियन के शैतान का बच्चा होने की बात कैसे पता चली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">डेमियन के सर की खाल (Scalp) पर बालों से छिपा ६६६ अंक लिखा था। इस नम्बर को शैतान का नम्बर कहा जाता है। इससे पता चला कि यह शैतान का बच्चा है। पर क्या आप जानते हैं कि इस नम्बर को क्यों शैतान का नम्बर क्यों कहा जाता है। चलिये कुछ अंक लिखने के इतिहास के बारे में जाने, जिससे यह पता चलेगा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>अंक लिखने का इतिहास</strong><br />
<span style="font-size:medium;">अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को ५ का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें १,२,३ आदि कहा गया और एक चिन्ह ० भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया। फिर वहां से 16वीं शताब्दी के लगभग पाश्चात्य देशों में गया, इसलिये इसे अरेबिक अंक कहा गया। वास्तव में इसका नाम हिन्दू अंक होना चाहिये था। यह नयी अंक प्रणाली जब तक आयी तब तक वर्णमाला के अक्षरों और अंकों के बीच में सम्बन्ध जुड़ चुका था। जिसमें काफी कुछ गड़बड़ी और उलझनें (Confusion) पैदा हो गयीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस कारण सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई कि किसी भी शब्द के अक्षरों से उसका अंक निकाला जाने लगा और उस शब्द को उस अंक से जोड़ा जाने लगा। कुछ समय बाद गड़बड़ी और बढ़ी। उस अंक वही गुण दिये जाने लगे जो कि उस शब्द के थे। यदि वह शब्द देवी या देवता का नाम था तो उस अंक को अच्छा माना जाने लगा। यदि वह शब्द किसी असुर या खराब व्यक्ति का था तो उस अंक को खराब माना जाने लगा। यहीं से शुरू हुई अंक विद्या: इसका न तो कोई सर है न तो पैर, न ही इसका तर्क से सम्बन्ध है न ही सत्यता से। यह केवल महज अन्धविश्वास है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>६६६ &#8211; शैतान का नम्बर</strong><br />
<span style="font-size:medium;">नीरो एक रोमन बादशाह हुआ था। वह बहुत क्रूर था लेकिन कोई यह खुले <span style="font-size:medium;">तौर पर नहीं कह सकता था। उसके नाम के अक्षरों का अंक ६६६ था। इसलिये इसे शैतान का अंक कहा जाने लगा। चलिये अब हस्तरेखा विद्या पर चलते हैं पर पहले डा. जोसेफ बेल के बारे में बात करते हैं जो कि शर्लौक होल्मस की कहानियां लिखने की प्रेणना रहे।</span></span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><strong>हस्तरेखा विद्या</strong><br />
<span style="font-size:medium;">इरविंग वैलेस, कल्पित (fiction) उपन्यास के बादशाह हैं, पर उनका मन हमेशा अकल्पित (non-fiction) लेख लिखने में रहता है। उनके अनुसार वे कल्पित उपन्यास इसलिये लिखते हैं क्योंकि उसमें पैसा मिलता है। उन्होंने बहुत सारे अकल्पित लेख लिखे हैं। इन लेखों को मिलाकर एक पुस्तक निकाली है, उसका नाम है, The Sunday Gentleman है यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। इसमें एक लेख The Incredible Dr. Bell के नाम से है। यह लेख डा. जोसेफ बेल के बारे में है।</span></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">डा. जोसेफ बेल वे १९वीं शताब्दी के अंत तथा २०वीं शताब्दी के शुरू में, एडिनबर्ग में सर्जन थे और एक वहां के विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। वे हमेशा अपने विद्यार्थियों को कहते थे कि लोग देखते हैं पर ध्यान नहीं देते। यदि आप किसी चीज को ध्यान से देखें तो उसके बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं। उन्होंने बहुत सारे विद्यार्थी को पढ़ाया, उनमें से एक विद्यार्थी का नाम था आर्थर कैनन डॉयल, जो कि शर्लौक होल्मस के रचयिता हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस लेख में डा. बेल के बहुत सारे उदाहरण बताये गये हैं जब उन्होंने किसी व्यक्ति को देखकर उसके बारे में बहुत कुछ बता दिया। शर्लोक होल्मस एक जासूस थे और कहानियों में ध्यान पूर्वक देखकर बहुत कुछ सुराग ढूढ़ कर हल निकालते थे। आर्थर कैनन डॉयल ने जब शर्लोक होल्मस की कहानियां लिखना शुरू किया तो उसका चरित्र डा. बेल के चरित्र पर और डा. वाटसन का चरित्र अपने ऊपर ढ़ाला।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यदि आप किसी कागज को मोड़ें तो हमेशा पायेंगे कि उस कागज को जहां से मोड़ा जाता है, उसमें चुन्नट (Crease) पड़ जाती है। इस तरह से जब हम हंथेली को मोड़ते हैं तो जिस जगह हमारी हथेली मुड़ती है, उस जगह एक चुन्नट, रेखा के रूप में पड़ जाती है। हथेलियों की रेखायें, हाथ के मुड़ने के कारण ही पड़ती हैं।</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">हम किसी के हाथ को ध्यान से देखें तो कुछ न कुछ उस व्यक्ति के बारे में पता चल भी सकता है। शायद यह भी पता चल जाय कि वह व्यक्ति बीमार है या नहीं। पर उसकी हंथेली की रेखाओं को देखकर यह बता पाना कि उस व्यक्ति की शादी कब होगी, वह कितनी शादियां करेगा, कितने बच्चे होंगे, या नहीं होंगे। यह सब बता पाना नामुमकिन है। यह सब भी ढ़कोसला है।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><br />
</span><br />
<span style="font-size:medium;"><br />
<strong><span style="font-size:medium;">निष्कर्ष</span></strong></span>
</p>
<p align="left"><span style="font-size:medium;">ज्योतिष, अंक विद्या, और हस्त रेखा विद्या में कोई भी तर्क नहीं है: यह महज अन्धविश्वास है। फिर भी, हमारे समाज में बहुत सारे काम इनके अनुसार होते हैं। बड़े से बड़े लोग इन बातों को विचार में रख कर कार्य करते हैं। शायद यह सब इसलिये क्योंकि यह कभी कभी एक मनश्चिकित्सक (psychiatrist) की तरह काम करते हैं। आप परेशान हैं कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। मुश्किल तो अपने समय से जायगी पर इसमें अक्सर ध्यान बंट जाता है और मुश्किल कम लगती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सत्यता है या यह अन्धविश्वास नहीं है या ये टोने टुटके से कुछ अलग है।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><em>पिछली शताब्दी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में जब भी लोगों का नाम लिया जायगा तो उसमें दो लोग अवश्य रहेंगे &#8211; आइज़ेक एसीमोवव और कार्ल सेगन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Carl_sagan">Carl Sagan</a>)।<br />
यदि आपको १९८० के दशक में दूरदर्शन की याद हो तो आप हर रविवार को आने वाले टीवी सीरियल <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Cosmos:_A_Personal_Voyage">Cosmos</a> को नहीं भूले होंगे। यह कार्ल सेगन ने ही बनायी थी। इसके बाद इसी नाम से यह <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Cosmos_%28book%29">पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुई</a>। यहां ज्योतिष पर कार्ल सेगन के विचारों  को भी सुने।</em></span></p>
<p style="text-align:center;">
<span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/"><img src="http://img.youtube.com/vi/Iunr4B4wfDA/2.jpg" alt="" /></a></span>
</p>
<p align="left">नोट: मेरे हर चिठ्ठे की तरह इस लेख की सारी चिठ्ठियां भी कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को) दें और अच्छा हो कि इस चिट्ठे की चिट्ठी से लिंक दे दें।</p>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/unmukth.wordpress.com/62/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/unmukth.wordpress.com/62/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/unmukth.wordpress.com/62/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/unmukth.wordpress.com/62/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/unmukth.wordpress.com/62/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/unmukth.wordpress.com/62/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/unmukth.wordpress.com/62/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/unmukth.wordpress.com/62/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/unmukth.wordpress.com/62/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/unmukth.wordpress.com/62/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/unmukth.wordpress.com/62/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/unmukth.wordpress.com/62/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=62&subd=unmukth&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>42</slash:comments>
	
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/92696fd2b445089be0ffc7bc65fea57c?s=96&#38;d=http%3A%2F%2F1.gravatar.com%2Favatar%2Fad516503a11cd5ca435acc9bb6523536%3Fs%3D96" medium="image">
			<media:title type="html">उन्मुक्त</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://img.youtube.com/vi/oQPFoDkGFrU/2.jpg" medium="image" />

		<media:content url="http://img.youtube.com/vi/Iunr4B4wfDA/2.jpg" medium="image" />
	</item>
		<item>
		<title>२ की पॉवर के अंक, पहेलियां, और कमप्यूटर विज्ञान</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2006/08/15/binary-puzzle/</link>
		<comments>http://unmukth.wordpress.com/2006/08/15/binary-puzzle/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 15 Aug 2006 07:53:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
				<category><![CDATA[गणित/ पहेली]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">https://unmukth.wordpress.com/2006/08/15/binary-puzzle/</guid>
		<description><![CDATA[भूमिका

कुछ दिन पहले, पहेली  चिठ्ठे पर नारद जी की छड़ी नाम की यह पहेली बूझी गयी।
&#8216;तो हुआ ऐसा कि नारद जी एक बार अपनी ७ इन्च लम्बी सोने की छड़ी लेकर धरती पर भ्रमण को आए। अब उन्हें सारे चिट्ठों की जानकारी वाले सजाल बनाने में सप्ताह भर का समय लगना था। तो वे [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=48&subd=unmukth&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="center">भूमिका
</p>
<p align="left">कुछ दिन पहले, <a href="http://pahelee.wordpress.com/">पहेली</a>  चिठ्ठे पर नारद जी की छड़ी नाम की यह पहेली बूझी गयी।</p>
<blockquote><p>&#8216;तो हुआ ऐसा कि नारद जी एक बार अपनी ७ इन्च लम्बी सोने की छड़ी लेकर धरती पर भ्रमण को आए। अब उन्हें सारे चिट्ठों की जानकारी वाले सजाल बनाने में सप्ताह भर का समय लगना था। तो वे एक होटल में एक कक्ष लेने का विचार बना कर वहाँ पहुँच गए। अब इनके पास कोई धनराशि तो थी नहीं , पर सात दिन के किराए के रूप में होटल के मैनेजर ने नारद जी से ७ (सात) इन्च लम्बी सोने की छड़ी लेना स्वीकार कर लिया। पर मैनेजर ने हर रोज का किराया उसी दिन लेना चाहा। तो इस बार की पहेली यह है कि नारद जी को कम से कम छड़ी के कितने टुकड़े करने होंगे, ताकि वो,<br />
होटल का किराया चुका सकें? और<br />
उन टुकड़ों की लम्बाई क्या होगी?&#8217;</p>
</blockquote>
<p>श्री र.च. मिश्र ने इसका  सही जवाब दिया और वह है, १, २ और ४ इन्च के टुकड़े करने होंगे।</p>
<p>इस पहेली के कई रूप हैं और यह रूप इसका सबसे आसान रूप है। इसके कठिन रूप का जवाब इतनी आसानी से नहीं दिया जा सकता है। यह जवाब २ की पॉवर के अंक (१, २, ४, ८, १६, &#8230;.) की एक सिरीस है; अंकों की यह सिरीस मूलभूत है। इसका सम्बन्ध बहुत चीजों से है,</p>
<ul>
<li>शतरंज के जादू;</li>
<li>सृष्टि के अन्त; और</li>
<li>उससे भी, जिससे हम सब जुड़े हैं यानि कि कमप्यूटर विज्ञान से।</li>
</ul>
<p>शतरंज का जादू , सृष्टि का अन्त? यह क्या बला है? चलिये एक क्रम से चर्चा करते हैं ताकि हम कहीं चक्कर न खा जायें। चर्चा का क्रम यह रहेगा:</p>
<ul>
<li>शतरंज का जादू क्या है;</li>
<li>सृष्टि का अन्त;</li>
<li>नारद जी की छड़ी वाली पहेली के अन्य रूप;</li>
<li>इस पहेली के हल का शतरंज के जादू एवं सृष्टि का अन्त से रिश्ता;</li>
<li>इस पहेली के हल का कमप्यूटर विज्ञान से सम्बन्धों का जिक्र।</li>
</ul>
<p>पहेलियों की कई अच्छी पुस्तके हैं जिनका जिक्र मैने <a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/07/11/puzzles-martin-gardner/">पहेलियां और मर्टिन गर्डनर</a> नाम के लेख पर किया है। इसमे हिन्दी की एक अच्छी पुस्तक &#8216;गणित की पहेलियां&#8217; है। इसके लेखक गुणाकर मुले हैं। इसे १९६१ मे राजकमल प्रकाशन ने छापा था और लगभग इसी समय मेरे बाबा ने यह पुस्तक मुझे भेंट की थी। गुणाकर मुले मेरे बचपन मे अकसर इस तरह के लेख लिखते थे। मालुम नहीं आप में से कितनो को इनकी याद है या उस समय के हैं। यह पहेलियों की मेरी पहली पुस्तक थी।</p>
<p align="center">शतरंज का जादू<br />
गुणाकर मुले की किताब &#8216;गणित की पहेलियां&#8217; मे एक अध्याय &#8216;अंकगणित की पहेलियों&#8217; पर है इसी मे वह &#8216;शतरंज के जादू&#8217; के बारे मे बताते हैं। इसका बयान करने से पहले मैं आपको एक सांकेतिक चिन्ह के बारे मे बता दूं क्योंकि इसका प्रयोग मै करूंगा।<br />
१=२/२=२^०<br />
२=२=२^१<br />
४=२x२=२^२<br />
८=२x२x२=२^३<br />
१६= २x२x२x२=२^४</p>
<p>यह सब नम्बर दो को दो से एक बार या दो से कई बार गुणा करके मिले हैं या यह कह लीजये कि ये दो की पावर (power) हैं। इन्टरनेट पर पावर को लिखने के लिये ^ चिन्ह का प्रयोग किया जाता है और मै भी इस चिठ्ठे पर इसी प्रकार से लिखूंगा। अब देखते हैं कि गुणाकर मुले किस तरह से शतरंज के जादू के बारे मे ब्यान करते हैं। यह उन्ही के शब्दों मे,</p>
<blockquote><p>&#8216;शतरंज के खेल के नियमों को आप न भी जानते हों तो कम से कम इतना तो सभी जानते हैं कि शतरंज चौरस पटल पर खेला जाता है । इस पटल पर ६४ छोटे-छोटे चौकोण होते हैं।</p>
<p>प्राचीन काल में पर्सिया में शिर्म नाम का एक बादशाह था। शतरंज की अनेकानेक चालों को देखकर यह खेल उसे बेहद पसंद आया। शतरंज के खेल का आविष्कर्ता उसी के राज्य का एक वृद्ध फकीर है, यह जानकर बादशाह को खुशी हुई। उस फकीर को इनाम देने के लिये दरबार में बुलाया गया: &#8220;तुम्हारी इस अदभुत खोज के लिये मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हूं । मांगो, जो चाहे मांगो,&#8221; बादशाह ने कहा।</p>
<p>फकीर &#8211; उसका नाम सेसा था &#8211; चतुर था। उसने बादशाह से अपना इनाम मांगा &#8211; &#8220;हुजूर, इस पटल में ६४ घर हैं। पहले घर के लिये आप मुझे गेहूं का केवल एक दाना दें, दूसरे घर के लिये दो दाने, तीसरे घर के लिये ४ दाने, चौथे घर के लिये ८ दाने और &#8230;. इस प्रकार ६४ घरों के साथ मेरा इनाम पूरा हो जाएगा।&#8221;</p>
<p>&#8220;बस इतना  ही ?&#8221; बादशाह कुछ चिढ गया,&#8221; खैर, कल सुबह तक तुम्‍हें तुम्‍हारा इनाम मिल जाएगा।  &#8220;</p>
<p>सेसा मुस्कराता हुआ दरबार से लौट आया और अपने इनाम की प्रतीक्षा करने लगा।</p>
<p>बादशाह ने अपने दरबार के एक पंडित को हिसाब करके गणना करने का हुक्म दिया। पंडित ने हिसाब लगाया &#8230; १+ २+ ४+ ८+ १६+ ३२+ ६४+ १२८&#8230; (६४ घरों तक ) अर्थात १+ २^२ + २^३ + २^४&#8230; = (२^६४)-१ अर्थात १८,४४६,७४४,०७३,७०९,५५१,६१५ गेहूं के दाने। गेहूं के इतने दाने बादशाह के राज्य में तो क्या संपूर्ण पृथ्वी पर भी नहीं थे। बादशाह को अपनी हार स्वीकार कर लेनी पड़ी।&#8217;</p>
</blockquote>
<p>राजा तो समझ रहा था कि फकीर ने बहुत छोटा इनाम मांगा है उसकी समझ मे  नहीं आया कि उसे कितना गेहूं देना था &#8211; यही है शतरंज का जादू।</p>
<p>गौर फरमाइयेगा कि हर खाने मे कितने गेहूं के दाने रखे जा रहे हैं क्योंकि यही हमारे इस विषय के लिये महत्वपूर्ण है।</p>
<p align="center">सृष्टि का अन्त<br />
गुणाकर मुले अपनी किताब मे सृष्टि का अन्त की कथा का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं। यह उन्ही के शब्दों मे,</p>
<blockquote><p>&#8216;कथा बहुत प्राचीन है। उस समय काशी में एक विशाल मन्दिर था। कहा जाता है कि ब्रम्हा ने जब इस संसार की रचना की, उसने इस मंदिर में हीरे की बनी हुई तीन छड़ें रखी और फिर इनमें से एक में छेद वाली सोने की ६४ तश्तरियां रखीं सबसे बडी नीचे और सबसे बडी उपर। फिर ब्रम्हा ने वहां पर एक पुजारी को नियुक्त किया। उसका काम था कि वह एक छड की तश्तरियां दूसरी छड़ में बदलता जाए। इस काम के लिए वह तीसरी छड़ का सहारा ले सकता था। परन्तु एक नियम का पालन जरूरी था। पुजारी एक समय केवल एक ही तश्तरी उठा सकता था और छोटी तश्तरी के उपर बडी तश्तरी वह रख नहीं सकता था। इस विधि से जब सभी ६४ तश्तरियां एक छड से दूसरी छड़ में पहुंच जाएंगी, सृष्टि का अन्त हो जाएगा।</p>
<p>आप कहेंगे, &#8220;तब तो कथा की सृष्टि का अन्त हो जाना चाहिए था। ६४ तश्तरियों को एक छड़ से दूसरी छड़ में स्थानान्तरित करने में समय ही कितना लगता है।&#8221;</p>
<p>नहीं, यह &#8216;ब्रम्ह-कार्य&#8217; इतनी शीघ्र समाप्त नहीं हो सकता। मान लीजिए कि एक तश्तरी के बदलने में एक सेकेंड का समय लगता है। इसके माने यह हुआ कि एक घंटे में आप ३६०० तश्तरियां बदल लेंगे। इसी प्रकार एक दिन में आप लगभग १००,००० तश्तरियों और १० दिन में लगभग १,०००,००० तश्तरियां बदल लेंगे।</p>
<p>आप कहेंगे, &#8220;इतने परिवर्तनो में तो ६४ तश्तरियां निश्चित रूप से एक छड़ से दूसरी छड़ में पहुंच जाएगीं।&#8221; लेकिन आपका अनुमान गलत है । उपरोक्त &#8216;ब्रम्ह-नियम&#8217; के अनुसार ६४ तश्‍तरियों को बदलने में पुजारी महाशय को कम से कम ५००,०००,०००,००० वर्ष लगेंगे ।</p>
<p>इस बात पर शायद यकायक आप विश्वास न करें । परन्तु गणित के हिसाब से कुल परिवर्तनों की संख्या होती है, (२^६४)-१ अर्थात १८,४४६,७४४,०७३,७०९,५५१,६१५&#8217;</p>
</blockquote>
<p>आपने गौर किया कि यह वही नम्बर है जितने गेहूं के दाने राजा को देने थे। इसका हल भी गुणाकर मुले की किताब मे इस प्रकार है,</p>
<blockquote><p>&#8216;उपरोक्त गणना को एक संवाद द्वारा स्पष्ट कर देना उचित होगा । अपने बचपन की एक घटना मुझे याद आती है। एक दिन मेरे बडे भाई साहब ने सिक्कों का एक खेल समझाया। उन्होंने मेज पर तीन प्लेटें रखीं और इनमें से एक में 5 अलग अलग सिक्के रखें, क्रमश: एक के उपर एक &#8211; रूपया, अठन्नी, चवन्नी, एकन्नी और एक पैसा। इन पांचों सिक्‍कों को, इसी क्रम में, दूसरी प्लेट में रखना था। परन्तु तीन नियमों का पालन जरूरी था,</p>
<p>(१) एक समय  में  केवल एक  ही  सिक्का उठाया जा  सकता  था।<br />
(२) छोटे  सिक्के पर बडे  सिक्के को रखने की मनाही  थी।<br />
(३) इस परिवर्तन &#8211; क्रिया में तीसरी प्लेट का उपयोग किया जा सकता था। परन्तु अन्त में सभी सिक्के दूसरी प्लेट में पहुंच जाने चाहिए थे, और वह भी अपने आरंभिक क्रम में ( रूपया, अठन्नी, चवन्नी, एकन्नी और पैसा) &#8211; एक के उपर दूसरा।<br />
&#8220;नियम तुम्हें समझ में आ गए ‍ होंगे, अब अपना काम शुरू  करो ! &#8221;  भैया ने मुझसे कहा।<br />
मैंने पैसा उठाया और तीसरी तश्तरी में रखा। फिर इकन्नी उठाकर दूसरी तश्तरी में रखी। फिर चवन्नी उठाई, परन्तु इसे कहां रखूं? (सिक्‍कों के आकार पर विचार न करें, इनके मूल्यों के अनुसार ही इन्‍हें हम छोटा-बडा मानेंगे)। यह तो दोनों से बड़ी है।<br />
भाई साहब  ने मदद की,&#8221; पैसे को इकन्नी पर रखो। तब तुम्हें तीसरी तश्तरी खाली मिलेगी।&#8221;<br />
मैंने वैसा ही किया । परन्तु इससे मेरी कठिनाइयों का अन्त नहीं हुआ। अब अठन्‍नी कहां रखूं? थोडा सोचने पर रास्ता निकल आया। पैसे को मैंने दूसरी तश्तरी से पहली तश्तरी में रख दिया और इकन्नी को तीसरी तश्तरी में चवन्नी के उपर। फिर पहली तश्तरी का पैसा तीसरी तश्तरी में इकन्नी पर रख दिया। अब अठन्नी रखने के लिए दूसरी तश्तरी खाली थी । इसी प्रकार, कई परिवर्तनों के बाद, सभी सिक्के दूसरी तश्तरी में बदलने में मुझे सफलता मिली।<br />
भाई साहब ने प्रशंसा करते हुए पूछा, &#8220;अच्छा, अब यह  तो  बताओ कि तुमने कुल कितने परिवर्तन किये ?&#8221;<br />
&#8220;नहीं  जानता, मैंने गिनती ही नहीं  की ।&#8221; मैंने जवाब दिया।<br />
&#8220;खैर  आओं  हम  गिनती करें। मान लो कि पांच की बजाय हमारे पास केवल दो ही सिक्के हैं   इकन्नी और पैसा । तब कितने परिवर्तन होंगे ?&#8221;<br />
&#8220;तीन।&#8221;  उत्तर आसान  था।<br />
&#8220;और  यदि  तीन  सिक्के  हों  तो?&#8221;<br />
मैंने  थोडा  और  हिसाब  लगाकर  उत्तर  दिया  &#8212; &#8220;३+१+३= ७ परिवर्तन।&#8221;<br />
&#8220;और  चार  सिक्के  हों  तो?&#8221;<br />
&#8220;७+१+७= १५ परिवर्तन, मैंने  उत्साह  से कहा।<br />
&#8220;बहुत  अच्छे ! और यदि  पांच  सिक्के  हों  तो?&#8221;<br />
&#8220;१५+१+१५= ३१ परिवर्तन,&#8221;  मैंने  उत्तर दिया।<br />
&#8220;अब तुम इस समस्या को ठीक  तरह  से  समझ गए  हो। परन्तु मैं तुम्हें और  सरल  तरीका बताता हूं।&#8221;  भाई  ने  कहा।<br />
इन  संख्याओं &#8211; ३, ७, १५, ३१, &#8230;  &#8211; को   तुम  निम्न तरीके  से  रख सकते हो,<br />
३  =  (२x२) -1<br />
७  =  (२x२x२) &#8211; 1<br />
१५ = (२x२x२x२) &#8211; 1<br />
३१ = (२x२x२x२x२) &#8211; 1<br />
इस (उपरोक्त‍त) तालिका पर विचार करने से यह स्प‍ष्ट हो जाता है कि जितने सिक्के हों, उतनी बार २ को अपने आप से गुणा करके और फिर उसमें से १ को घटा देने से इच्छित परिवर्तनों की संख्या प्राप्त होती है । जैसे, यदि ५ की बजाय ६ सिक्के हों तो हमें (२x२x२x२x२x२) &#8211; १ या १२७ परिवर्तन होंगे।&#8217;</p>
</blockquote>
<p align="center">पहेली के अन्य रूप<br />
नारद जी की छड़ी पहेली के कई स्तर हैं और कई अन्य रूप। यह पहेली जिस रूप मे पूछी गयी है वह इसका सबसे आसान रूप है इस पहेली के कुछ कठिन स्तर हैं उनके बारे मे बात करने से पहले इसका एक दूसरा रूप देखें।</p>
<p>नारद जी को अपने भक्तों को लड्डू बांटने हैं नारद जी थोड़े से नये युग के हो गये हैं वे लड्डू डिब्बे मे रख कर देना चाहते हैं। समय न बर्बाद हो इसलिये पहले से पैक करके रखना है वे अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते जिसने जितने मांगे उतने दे दिये उनके पास ७ लड्डू हैं डिब्बों की कमी है इसलिये कम से कम डिब्बों का प्रयोग करना है। हर एक डिब्बे मे कितने लड्डू पैक किये जांये कि यदि उनसे कोई १ से ७ तक जितने भी लड्डू मांगे, वे दे सकें।</p>
<p>इसका जवाब है कि उन्हे ३ डिब्बे चाहिये और पहले मे १, दूसरे २, और तीसरे मे ४ लड्डू रखने होंगे।</p>
<p>चलिये अब इसके दूसरे स्तर पर चले &#8211; लड्डूवों कि संख्या बढ़ा देते हैं। मान लिया जाय कि १०२३ लड्डू हों तो हर डिब्बे मे कितने लड्डू रखे जायेंगे। इसका जवाब है १० डिब्बे और उनमे लड्डू निम्न क्रम मे रखें जायेंगे<br />
१, २, ४, ८, १६, ३२, ६४, १२८, २५६, ५१२</p>
<p>यदि १००० लड्डू होते तो पहले ९ डिब्बे मे तो उतने ही पर आखरी डिब्बे मे ५१२-२३=४८९ लड्डू रखने होंगे। यदि नारद जी के पास ५१२ से १०२३ तक लड्डू हों तो उन्हे हमेशा १० डिब्बों की जरूरत होगी। पहले ९ डिब्बों मे उतने ही जिनका योग है ५११ और दसवें मे बाकी सारे।</p>
<p>चलिये थोड़ा और ऊपर चले। यदि उनके पास अनगिनत लड्डू हों तो वह डिब्बों मे किस तरह से रखें। जवाब सरल है उनको निम्न क्रम मे रखें<br />
१, २, ४, ८, १६, ३२, ६४, १२८, २५६, ५१२, १०२४, २०४८, &#8230;..<br />
यानि कि उन्हे २ की पावर मे रखें।</p>
<p>इस पहेली का एक इससे भी कठिन स्तर है पर उसकी यहां जरूरत नहीं है इस लिये छोड़ देता हूं, वह फिर कभी।</p>
<p align="center">शतरंज के जादू और सृष्टि का अन्त का इस पहेली के हल से सम्बन्ध<br />
क्या आपने नारद जी की छड़ी की पहेली के जवाब पर गौर किया। नारद जी की छड़ जितने दिन रुकना चाहेंगे उतनी लम्बी छड़ होगी पर टुकड़े हमेशा १, २, ४, ८, १६ &#8230;.. के होंगे। यदि इसे लड्डू के रूप मे देखें तो डिब्बों मे लड्डू हमेशा १, २, ४, ८, १६, &#8230;. के नम्बर से रखने होंगे। यह सब नम्बर दो को दो से एक बार या दो से कई बार गुणा करके मिले हैं या यह कह लीजये कि ये दो की पावर (power) हैं। शतरंज के खानो मे गेहूँ के दाने और सृष्टि का अन्त मे छड़ों के बदलाव की संख्या का भी सम्बन्ध २ की पावर से है।</p>
<p>शतरंज का जादू और सृष्टि का अन्त इस पहेली के एक ही रूप हैं तथा नारद जी की छड़ी या नारद जी के लड्डू इसका दूसरा रूप हैं नारद जी की छड़ी या लड्डू &#8211; जोड़ से शुरू होकर उसके टुकड़ों तक जाती है तो शतरंज का जादू &#8211; टुकड़ों से शुरू होकर उसके जोड़ तक जाता है। यानि कि नारद जी की छड़ी कि पहेली का अन्त शतरंज के जादू की शुरुवात है और शतरंज का जादू का अन्त नारद जी की छड़ी की शुरुवात है: यह पहेलियां एक दूसरे विलोम रूप हैं।</p>
<p align="center">इस पहेली के हल का कमप्यूटर विज्ञान से सम्बन्ध<br />
अब कुछ शब्द इसके हमारे साथ के सम्बन्ध से, हालांकि इसकी वृस्तित चर्चा कभी और &#8211; शायद &#8216;गणित, चिप और कमप्यूटर विज्ञान सिरीस&#8217; मे &#8211; यहां केवल भूमिका।</p>
<p>इस विषय पर चर्चा शुरू करने से पहले मैने कहा था कि इस पहेली का सम्बन्ध उससे भी है जिससे हम सब जुड़े हैं। जी हां, इन नम्बरों का बहुत गहरा सम्बन्ध कमप्युटरों से है आप देखें तो पायेंगे कि इन नम्बरों मे दो खास बाते हैं।<br />
पहली, यह वह नम्बर हैं,</p>
<ul>
<li>जिसकी दूरी पर नारद जी की छड़ को काटने पर सबसे कम बार काटा जायेगा; या</li>
<li>यह वह नम्बर है जिसमे लड्डुवों को डिब्बों मे रखने पर सबसे कम डिब्बों की जरूरत होगी; और</li>
<li>जिनकी सहायता से हम हर दिन को अलग अलग छड़ से मिला कर निश्चित रूप से चिन्हित कर सकते हैं; या</li>
<li>जिनकी सहायता से जो भक्त जितने लड्डू चाहे उसे अलग अलग डिब्बों मे रख कर दे सकते हैं।</li>
</ul>
<p>दूसरी, यह वह नम्बर हैं,</p>
<ul>
<li>जिसकी दूरी पर नारद जी की छड़ को काटने पर सबसे कम बार काटा जायेगा; या</li>
<li>यह वह नम्बर है जिसमे लड्डुवों को डिब्बों मे रखने पर सबसे कम डिब्बों की जरूरत होगी; और</li>
<li>इनकी सहायता से हम हर दिन को अलग अलग छड़ से मिला कर निश्चित रूप से चिन्हित कर सकते हैं; या</li>
<li>जो भक्त जितने लड्डू चाहे उसे अलग अलग डिब्बों की सहायता से दे सकते हैं।</li>
</ul>
<p>कमप्यूटर विज्ञान मे दो बाते अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं</p>
<ul>
<li>किसी कार्य को कितने कम से कम steps में किया जा सकता है; और</li>
<li>हम analog से digital पर कैसे पहुंचे।</li>
</ul>
<p>हम digital तभी हो सकतें है जब हम किसी भी चीज को नम्बरों के द्वारा निश्चित रूप चिन्हित कर सकें। यह यदि आप नारद जी की छड़ी के हल पर गौर करें तो उससे यह दोनो कार्य होते हैं।</p>
<p>हमारा जीवन, हमारी गणित, डेसीमल सिस्टम पर आधारित है, यानि कि १० नम्बरों से (०, १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, और ९) बाकी सारे नम्बर लिखे जा सकते हैं। बाइनरी सिस्टम दो नम्बर पर आधारित होता है इसमे दो नम्बर ० और १ हैं इसी से बाकी नम्बर लिखे जाते हैं कम्प्यूटर विज्ञान बाइनरी सिस्टम पर आधारित है तथा १, २, ४, ८, १६ &#8230;. नम्बर इन दोनो सिस्टम को आपस मे जोड़ते हैं। यह नम्बर (१, २, ४, ८, १६ &#8230;.) हमारी दुनिया को डिजिटल-दुनिया से, कम्प्यूटर की दुनिया से, जोड़ते हैं।</p>
<p>विज्ञान के हर क्षेत्र के विषेशज्ञों का योगदान, कमप्यूटर विज्ञान में है पर सबसे बड़ा योगदान गणितज्ञों का है। कम्प्यूटर विज्ञान अपने पठार पर पहुंच रहा है और इसका ज्यादा विस्तार applications में हो रहा है। पर</p>
<ul>
<li>क्या कम्प्यूटर विज्ञान का विस्तार यहीं समाप्त हो जायगा और केवल applications  मे सीमित हो जायेगा? या</li>
<li>क्या इसमे कोई क्रान्ति (quantm jump) आयेगी?</li>
<li>यदि आयेगी तो किस तरफ से आने की सम्भावना सबसे अधिक है?</li>
</ul>
<p>जाहिर है कि क्रान्ति गणित की तरफ से आयेगी  और इसमे शायद गणित के निम्न दो क्षेत्र महत्वपूण भूमिका निभायें।</p>
<ul>
<li>Artificial Intelligence</li>
<li>Knot theory/ Topology</li>
</ul>
<p>इसकी चर्चा हम  फिर कभी करेंगे</p>
<p>कम्प्यूटर विज्ञान मे क्रान्ति गणित के किसी भी क्षेत्र से आये पहेलियां उसका हमेशा से उसका हिस्सा रहेंगी। इसलिये बहुत सारी कमप्यूटर फर्म नौकरी देने से पहले पहेलियों कि भी परीक्षा लेती हैं। गूगल ने तो कुछ समय पहले अमेरिका की सड़कों पर, सार्वजनिक रूप से पहेली बूझ कर, नौकरी दी। उसके बारे मे इन्टरनेट पर देख सकते हैं। इसलिये गणित और पहेलियों को नज़रअन्दाज मत कीजये, उन्हे मुन्ने और मुन्नी के साथ सुलझाते जाईये। क्या मालुम स्वयं आप या आपका मुन्ना या मुन्नी कम्प्यूटर विज्ञान मे क्रान्ति ले आये।
</p>
<p align="center"><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2006/08/powers-of-2-puzzles-and-computer.pdf" id="p49" title="२ की पॉवर के अंक, पहेलियां, और कमप्यूटर विज्ञान">२ की पॉवर के अंक, पहेलियां, और कमप्यूटर विज्ञान</a></p>
<p align="center">यह इस  लेख की pdf फाईल है इसे आप डाउनलोड कर सकते हैं।<br />
नोट<br />
(१) यह लेख <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त</a> चिठ्ठेपर &#8216;नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू&#8217; के नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है।<br />
(२) मेरे हर चिठ्ठे की तरह इस लेख की सारी चिठ्ठियां भी कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को) दें और अच्छा हो कि इस चिट्ठे की चिट्ठी से लिंक दे दें।</p>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/unmukth.wordpress.com/48/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/unmukth.wordpress.com/48/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/unmukth.wordpress.com/48/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/unmukth.wordpress.com/48/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/unmukth.wordpress.com/48/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/unmukth.wordpress.com/48/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/unmukth.wordpress.com/48/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/unmukth.wordpress.com/48/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/unmukth.wordpress.com/48/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/unmukth.wordpress.com/48/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/unmukth.wordpress.com/48/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/unmukth.wordpress.com/48/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&blog=230997&post=48&subd=unmukth&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://unmukth.wordpress.com/2006/08/15/binary-puzzle/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
	
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/92696fd2b445089be0ffc7bc65fea57c?s=96&#38;d=http%3A%2F%2F1.gravatar.com%2Favatar%2Fad516503a11cd5ca435acc9bb6523536%3Fs%3D96" medium="image">
			<media:title type="html">उन्मुक्त</media:title>
		</media:content>
	</item>
	</channel>
</rss>