पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम

October 16, 2006

भूमिका

यह विवादास्पद विषय है कि कंप्यूटर प्रोग्राम पेटेंट कराया जा सकता है कि नहीं। इस बारे में अलग-अलग देशों के नियम भी भिन्न हैं। इसमें कराये जाने के तरीके पर भी विवाद है इसको समझने के लिये इस विषय को तीन भागों में बांटना उचित होगा,

  • अलग-अलग देशों में क्या नियम हैं?
  • यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम पेटेंट हो सकते हैं तो उसकी क्या कालावधि होनी चाहिये?
  • कं‍प्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट कराने का क्या तरीका होना चाहिये ?

पहला भाग भी अपने में बहुत बड़ा है इसे भी कुछ कड़ियों में करना होगा।

  • अमेरिका में पेटेंट का कानून
  • अमेरिका में पेटेंट का कानून यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम औद्योगिक प्रक्रिया के साथ हो
  • अमेरिका में पेटेंट का कानून यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम व्यापार के तरीके के साथ हो
  • अमेरिका में कं‍प्यूटर प्रोग्राम से जुड़े पेटेंट के कुछ उदाहरण
  • यूरोप में पेटेंट का कानून
  • भारतवर्ष में पेटेंट का कानून

अमेरिका में पेटेंट का कानून

पेटें‍ट आविष्कार के लिये दिये जा सकते हैं। भारतीय पेटेंट अधिनियम की धारा 3 बताती है कि क्या आविष्कार नहीं है और जो आविष्कार नहीं है उसका पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है। अमेरिका के पेटेंट कानून में ऐसी कोई सीमा नहीं है। अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने चक्रवर्ती केस (Diamond Vs. Chakravarty 447,45303:65 LED 2d 144) में पेटेंट कानून की व्याख्या की है। न्यायालय ने कहा कि अमेरिकी काग्रेंस, उन सब का पेटें‍ट करने का आशय रखती है जो कि मनुष्य द्वारा निर्मित की जाती हैं पर यह भी स्पष्ट किया कि,

  • इसका यह अर्थ नहीं है कि पेटें‍ट कानून की कोई सीमाएं नहीं हैं और प्रत्येक खोजों को पेटें‍ट कराया जा सकता है;
  • प्रकति के नियम, भौतिक घटनाए, तथा विचारों को पेटेंट नहीं कराया जा सकता है;
  • भूमि में खोजा गया नवीन खनिज या जंगल में पाया गया नवीन पौधा को पेटेंट नहीं कराया जा सकता है।
  • न तो आइं‍स्टाइन अपने प्रसिद्ध नियम ई=एमxसी^२ को पेटें‍ट नहीं कर सकते थे और न ही न्यूटन गुरूत्वकर्षन के नियम को पेटें‍ट करा सकते थे।
  • ऐसी खोजें, प्रकृति की अभिव्यक्तियां हैं, ये सभी व्यक्तियों के लिए स्वतंत्र हैं तथा किसी के भी लिए अनन्य रूप से आरक्षित नहीं हैं।

पार्कर केस (Parker vs Flook) 437, US. 504 : 57 L.Ed 2d 451) में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने कहा कि गणितीय सूत्र का पेटेंट नहीं कराया जा सकता है।

अमेरिकी पेटेंट अधिनियम न तो कंप्यूटर प्रोग्राम और न ही व्यापार करने के तरीकों के बारे में अलग से जिक्र करता है। गॉटसचाल्क केस (Gottschalk vs Benson 40 US 63= 34 L.Ed 2d 273) में, अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने यह तय किया कि डेसीमल नम्बरो को शुद्ध बाइनरी नम्बरों में बदलने वाले कं‍प्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट नहीं किया जा सकता है। यह इसलिये क्योंकि इसे मंजूर करने का परिणाम एक विचार के लिए अनुचित रूप से पेटेंट जारी करना होगा।

संक्षेप में अमेरिका में, न तो एलगोरथिम (Algorithm) को पेटेंट कराया जा सकता है, न ही कं‍प्यूटर प्रोग्राम यदि वह अकेले में हो। लेकिन यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम, औद्योगिक प्रक्रिया या व्यापार तरीके का एक हिस्सा हो तो क्या यही स्थिति रहेगी? चलिये इसके बारे में चर्चा करें।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम - औद्योगिक प्रक्रिया के साथ

कं‍प्यूटर प्रोग्राम, औद्योगिक प्रक्रिया के साथ हो तो उसे पेटेंट कराया जा सकता है कि नहीं, इस सम्बन्ध में सबसे चर्चित और शायद सबसे विवादित मुकदमा डार्ह केस (Diamond Vs. Diehr, (1981) 450 U.S.. 175: 67 L.E.D. 2d घ/55) है। इस मुकदमे में जिस आविष्कार को पेटंट कराया जा रहा था उसमें कं‍प्यूटर प्रोग्राम को रबर साफ करने की एक प्रक्रिया के साथ प्रयोग किया गया था। रबर को साफ करने के लिये उसे गर्म किया जाता है उसे कितनी देर गर्म किया जाय यह उसके तापमान पर निर्भर है तापमान ज्यादा तो कम समय के लिये गर्म किया जायेगा यदि तापमान कम तो ज्यादा समय के लिये गर्म किया जायेगा यह आर्हेनियस नियम के अनुसार निश्चित होता है। जिस ढांचे के अन्दर रबर को गर्म किया जाता था उसके अन्दर के तापमान को कंप्यूटर में डाला जाता था जो आर्हेनियस नियम के अनुसार समय की गणना करता था और ठीक समय ढांचे को खोल देता था ताकि रबर बाहर आ जाये। सवाल यह था कि क्या यह आविष्कार था जिसका पेटें‍ट कराया जा सकता है।

अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने चार के मुकाबले पांच से अपना फैसला सुनाया कि,

  • यह पेटेंट कराया जा सकता है; और
  • पेटेंट होने योग्य दावा मात्र केवल इस बात से पेटेंट करने के लिये अयोग्य नहीं हो जाता है कि उसमें गणितीय फार्मूला, या कं‍प्यूटर प्रोग्राम, या कं‍प्यूटर का प्रयोग हुआ है।

संक्षेप में, एक कं‍प्यूटर प्रोग्राम यदि किसी एक औद्योगिक प्रक्रिया का हिस्सा है तो उसके साथ में पेटें‍ट हो सकता है। यहीं से शुरु हुआ कं‍प्यूटर प्रोग्राम का, अमेरिकी पेटेंट कानून के साथ सफर। ऐसा सफर जो कि कईयों के मुताबिक एक खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा है।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम - व्यापार के तरीके के साथ

परम्परागत तौर पर, मात्र प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित प्रक्रियाओं को ही पेटेंट किया जा सकता था। अनेक दूसरे कार्यकलाप जिनके अन्तर्गत व्यापार के ढंग या आंकड़ा विश्लेषण जो कि प्रक्रियाएं कही जा सकती है, को पेटेंट नहीं किया जाता था। पर र्डाह केस के बनाय अमेरिका में पेटें‍ट देने की प्रक्रिया में बदलाव आया है। यू.एस. पेटेंट एन्ड ट्रेड आफिस (यू.एस.पी.टी.ओ.) ने पेटेंट करने के मार्गदर्शन की मैन्युवल में परिवर्तन किया है। इसकी कं‍प्यूटर प्रोग्राम के लिए व्यापार के तरीकों से सम्बन्धित पूर्वतर पॉलिसी जो { (पैराग्राफ 706.03 (क) } निम्नलिखित थी।

‘Though seemingly within the category of a process or method, a method of doing business can be rejected as not being within the statutory classes.’

इसे बदल कर निम्न कर इस प्रकार कर दिया गया है।

‘Office personnel have had difficulty in properly treating claims directed to methods of doing business. Claims should not be categorized as methods of doing business. Instead such claims should be treated like any other process claims’.

उर्पयुक्त परिवर्तन को मद्देनजर रखते हुये स्टेट स्ट्रीट केस (State Stree Bank vs Signature Finencial Group 149 F3d ,1352) में अमेरिका के एक अपीली न्यायालय ने कहा कि कोई प्रक्रिया पेटेंट करने योग्य है या नहीं, यह इस पर नहीं तय होना चाहिए कि प्रक्रिया व्यापार करती है पर यह देखना चाहिये कि, पेटेंट की जाने वाली प्रक्रिया एक उपयोगी तरीके से प्रयोग की जा रही है अथवा नहीं। अमेरिका में व्यापार के तरीकों के के लिए दिये पेटेंट के कुछ उदाहरण निम्न है :

  • सामान खरीदने की स्वीकृत देने के लिये एक क्लिक का प्रयोग करना;
  • लेखा लिखने की एक आन-लाइन पद्धति;
  • आन-लाइन पारिश्रमिक प्रोत्साहन पद्धति;
  • आन-लाइन बारम्बार क्रेता कार्यक्रम; और
  • उपभोक्ता को अपने दिये गये दाम पर सर्विस की सूचना प्राप्त करने की सुविधा।

संक्षेप में, अमेरिका में विचार पेटें‍ट नहीं कराये जा सकते पर जब विचार व्यावहारिक तौर पर एक उपयोगी, कंक्रीट तथा मूर्त परिणाम देते हैं तो उन्हें पेटें‍ट कराया जा सकता है। आजकल अमेरिका में यू.एस.पी.टी.ओ. के मैन्युवल में व्यापार के तरीके के पेटें‍ट के ऊपर एक अध्याय है और उपयोगी व्यापार के तरीके तथा आंकड़ा विश्लेषण के लिए कंप्यूटर प्रोग्राम के पेटें‍ट मंजूर हो रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी अमेरिका का अनुसरण किया है।

अमेरिका में व्यापार करने के तरीको सुधार लाने के लिये Business Patent Improvement Act 2000 लाया गया था पर यह अभी तक पारित नहीं किया गया है और शायद यह कभी भी पारित नहीं हो।

यूरोप में पेटेंट का कानून

यूरोपियन पेटें‍ट कनवेशंन १९७३ (ई.पी.सी.) का अनुच्छेद ५२(२) कहता है कि मानसिक कार्य करने की प्रक्रिया, खेल खेलने के तरीके, व्यापार तरीके, और कं‍प्यूटर प्रोग्राम आविष्कार नहीं माने जायेगें। यानी कि, कं‍प्यूटर प्रोग्राम और व्यापार तरीकों को पेटेंट नहीं किया जा सकता। यही ई.पी.सी. के सदस्य देशों का भी कानून है। किन्तु व्यवहार में, यह नियम बदल गया है। इस तरह के पेटेंटों के लिए यदि आवेदन पत्र - कंप्यूटर प्रोग्राम या व्यापार के तरीकों की जगह - तकनीकी में बढ़ोत्तरी की तरह प्रस्तुत किये जांय तो उन पर विचार किया जा रहा है।

यूरोप के भिन्न भिन्न देशों अलग अलग नियम है और यूरोपियन कमीशन उसमें समानता लाने का वह प्रयास कर रहा है। वह इसमें सफल होगा कि नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा।

भारतवर्ष में पेटेंट का कानून

भारतवर्ष में पेटें‍ट अधिनियम की धारा ३ को २००२ संशोधन के द्वारा संशोधित किया गया है। इसने पेटेंट अधिनियम में धारा ३ (K) को प्रतिस्थापित किया है। इसमें गणित, व्यापार के तरीकों, कं‍प्यूटर प्रोग्राम अकेले में (Computer Programme per se), अल्गोरिथम को अविष्कार नहीं माना गया है। यानि कि यह पेटेंट नहीं हो सकते हैं।

यहां ‘कं‍प्यूटर प्रोग्राम’ को per se के द्वारा प्रतिबन्धित किया गया है। Per se का अर्थ अकेले में या अपने आप में है। इसका अर्थ यह हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्राम अपने आप में अविष्कार नहीं है पर इसका यह भी अर्थ हुआ कि यदि वह अकेले में न हो तो अविष्कार माने जा सकते हैं और उसका पेटेंट भी हो सकता है। आगे न्यायालय इसका क्या मतलब निकालेगें - क्या हम अमेरिका की राह जायेंगे या यूरोप की - यह तो केवल भविष्य ही बता सकता है।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम के पेटेंट की कालावधि

पुरानी तकनीक में प्रशिक्षणा‍र्थियों को प्रशिक्षण देने में लगभग सात वर्ष लगते थे तथा प्रशिक्षणार्थियों की दो पीढ़ियों को प्रशिक्षित करने में चौदह वर्ष लगते थे इसलिए पहले पेटेंट को चौदह वर्षो के लिए दिया जाता था। इंगलैण्ड में बीसवीं शताब्दी के शुरू में इसे बढ़ा कर सोलह साल कर दिया गया। हमने भी इसी का अनुसरण किया और पेटेंट १६ साल के लिए दिया जाने लगा किया गया । पेटेंट अधिनियम में इसे पुन १४ साल कर दी गयी। हांलाकि कुछ श्रेणियों के लिए पांच या सात साल ही रही। ट्रिप्स पेटेंट के लिए बीस वर्षो के लिए पेटेंट को संरक्षण करने को कहता है । हमने भी २००२ संशोधन द्वारा यही किया किया है।

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति ज्यामितीय ढ़ंग से गतिशील है। अनेक लोग यह कहते हैं कि,

  • यदि कं‍प्यूटर प्रोग्राम या इन्टरनेट पर व्यापार करने के तरीके के लिये पेटें‍ट दिया जाय तो उसके लिये 20 वर्षो की कालावधि अत्यधिक लम्बी है;
  • कंप्यूटर प्रोग्राम हर दो साल में बदल जाता है;
  • दो साल से ज्यादा समय के लिये पेटें‍ट की कालावधि बेकार है।

पर यह तब तक नहीं किया जा सकता जब तक ट्रिप्स में बदलाव न किया जाय।

कं‍प्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट कराने तरीका

जब कंप्यूटर प्रोग्राम से सम्बन्धित किसी प्रक्रिया या उत्पाद का पेटें‍ट कराया जाता है तब कंप्यूटर प्रोग्राम का सोर्स कोड नहीं बताया जाता है उसे केवल फ्लो चार्ट के द्वारा दिखाया जाता है। यह भी विचारणीय प्रश्न है कि, क्या यह‍ सही है? क्या यह उस प्रक्रिया या उत्पाद की पूरी जानकारी देता है? आशा है कि इस प्रश्न का भी उत्तर जल्दी मिलेगा।

निष्कर्ष

कंप्यूटर प्रोग्राम पेटें‍ट हो सकता है कि नहीं, के बारे में कानून स्पष्ट नहीं है। फिर भी, यदि सब किसी न किसी तरह से कंप्यूटर प्रोग्राम पेटें‍ट करा रहे हैं तो हमें भी पीछे नहीं रहना चाहिये - यदि कंप्यूटर प्रोग्राम पेटें‍ट हो सकता है तो उसे पेटेंट कराना चाहिये। यदि यह समय या खर्च के कारण पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है तो इसको वेबसाइट पर प्रकाशित करना चाहिये। इस कारण यह पूर्व कला के रूप में रहेगा और कम से कम दूसरे लोग इसको पेटेंट कराने में समर्थ नहीं होंगे।

नोट

  1. यह लेख मेरे उन्मुक्त चिठ्ठे () पर पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है। इसकी आखरी कड़ी यहां है जहां से आप पहले की कड़ियों में जा सकते हैं।
  2. यदि आप इसे सुनना चाहें तो इसे मेरे पॉडकास्ट बकबक पर सुन सकते हैं।

लिनेक्स की कहानी

June 3, 2006

शुरुवात - यूनिक्स से

लिनेक्स, ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर का सबसे कामयाब तथा सबसे लोकप्रिय सौफ्टवेयर है। यह जीपीएल्ड है और यूनिक्स से बनाया गया है । यूनिक्स का विकास, 1960 के दशक में ऐ.टी.&टी. की बेल प्रयोगशाला के द्वारा किया गया। उस समय ऐ.टी.&टी. कम्पनी एक नियंत्रित इजारेदारी (Regulated monopoly) थी इसलिये वह कमप्यूटर का सौफ्टवेयर नही बेंच सकती थी। उसने इसे, सोर्स कोड के साथ, बिना शर्त, सरकार तथा विश्वविद्यालयों को दे दिया, वे चाहे तो उसमें फेरबदल कर सकते हैं। 1980 के दशक के आते आते यूनिक्स सबसे लोकप्रिय, शक्ति शाली, एवं स्थिर औपरेटिंग सिस्टम बन गया हालांकि उस समय तक उसके कई रूपान्तर आ चुके थे।

यूनिक्स में एक कमी थी इसको समझना तथा चलाना मुश्किल है | एन्डी टेनेबौम, ऐमस्टरडैम में कमप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर हैं| उन्होंने इसकी सहायता के लिये मिनिक्स नाम का प्रोग्राम लिखा। इसमें भी कुछ कमियां थीं। लिनूस टोरवाल्ड फिनलैण्ड के हेलसिन्की विश्‍वविद्यालय में कमप्यूटर विज्ञान के छात्र थे। उन्होंने मिनिक्स की कमी को दूर करने के लिये एक प्रोग्राम लिखा जो कि बाद मे ‘लिनूस का यूनिक्स’ या छोटे में लिनेक्स कहलाया । इसका सबसे पहला कोर या करनल (Kernel) उन्होने 1991 में इन्टरनेट में पोस्ट किया । तब तक रिचर्ड स्‍टालमेन का घन्यू ( GNU) प्रोजेक्ट शुरू हो चुका था। लिनूस टोरवाल्ड ने इससे बहुत सारे प्रोग्राम अपने लिनेक्स में लिये। इसलिये रिचर्ड स्टालमेन का कहना है कि इसे घन्यू-लिनेक्स कहना चाहिये| पर यह नाम, शायद लम्बा रहने के कारण चल नहीं पाया। पर इसका अर्थ यह नहीं हैं कि लिनेक्स की सफलता में घन्यू प्रोजेक्ट का हाथ नहीं है। घन्यू प्रोजेक्ट के बिना लिनेक्स सम्भव नहीं था।

 

करनल, डिस्ट्रीब्यूशन, डेस्कटौप

लिनेक्स का कोई भी आफिस नहीं है, कोई भी कम्पनी या व्यक्ति इसका मालिक नहीं है पर दुनियां भर के प्रोग्रामर इसमें अपना योगदान देते हैं । दुनियां के इतिहास में इससे बडा, इस प्रकार का आन्दोलन, कभी नहीं हुआ । वह भी जो एक अमेरिका से बाहर के विश्वविद्यालय के छात्र ने शुरू किया| क्योंकि कमप्यूटर विज्ञान में नयी दिशायें दिखाने का वर्चस्व तो केवल अमेरीका का था ।

लिनेक्स के सौफ्टवेयर के लिये पैसा नहीं लिया जा सकता पर इसका मतलब यह नहीं है कि इससे पैसा नहीं कमाया जा सकता। बहुत सारी कम्पनियां इस पर सर्विस देकर पैसा कमा रही हैं और चल रही हैं। रेड हैट तथा सूसे (नौवल) इनमें मुख्य हैं ।

 

लिनेक्स के तीन स्तर हैं ।

  • करनल (Kernel) या कोर: करनल से सीधे कमप्यूटर नहीं चलाया जा सकता उसे चलाने से पहले कमपाईल करना पड़ता है| लिनेक्स करनल को लिनूस टोरवाल्डस देखते हैं।
  • डेस्कटौप: आपके कमप्यूटर मे औपरेटिंग सिस्टम किस प्रकार से दिखे उसमें अलग अलग काम करने वाले सौफटवेयर किस प्रकार से चले यह डेस्कटौप पर निर्भर करता है कई तरह के डेस्कटौप हैं पर नोम (Gnome) तथा के.डी.ई. (K.D.E) मुख्य हैं ।
  • डिस्ट्रीब्यूशन: किसी करनल से कमप्यूटर चलाने के लिये पहले उसे कमपाईल करना पड़ता है तब वह चलता है । यह कार्य डिस्‍ट्रीब्‍यूशन करते हैं इस तरह के लगभग 100 डिस्ट्रीब्‍यूशन हैं जिसमें रेड हैट, सूसे ( नौवल ) तथा मैनड्रिवा मुख्य हैं। हर डिस्‍ट्रीब्‍यूशन मे कम से कम नोम तथा के.डी.ई. दोनो डेस्कटौप रहते हैं | यदि आप दस मुख्य डिस्ट्रीब्‍यूशन के बारे मे जानना चाहते हों तो यहां देखें|

यूनिक्स पर चला मुकदमा

ए.टी.&टी. ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बरकले को यूनिक्स का सोर्स कोड शुरू में दिया था। इस विश्वविद्यालय ने उस पर कार्य किया तथा इसे काफी आगे बढाया। विश्वविद्यालय ने इसका अपना रूप भी निकाला जो कि बरकले सौफटवेर डिस्ट्रीब्यूशन(बी.एस.डी.) के नाम से प्रसिद्ध है। यह ओपेन सोर्स है। ए.टी.&टी. कम्पनी 1984 में टूट गयी तथा इसके एक हिस्से के पास कमप्यूटर का काम आया जिसे कमप्यूटर के व्यापार करने की स्वतंत्रता थी।

ए.टी.&टी. के इस अलग घटक ने अपना व्यापारिक यूनिक्स निकाला| इस व्यापारिक यूनिक्स तथा विश्वविद्यालय के बी.एस.डी. यूनिक्स में होड़ होने लगी तब ए.टी.&टी. ने विश्वविद्यालय पर एक मुकदमा दायर किया कि केवल ए.टी.&टी. यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार की मालिक है । विश्वविद्यालय का कहना था कि उसे बी.एस.डी. यूनिक्स वितरण करने का हक है क्योंकि इस पर उसने भी बहुत काम किया है। 1993 में ए.टी.&टी. के इस घटक ने नौवल को यूनिक्स का व्यापार बेच दिया तथा 1995 में नौवल तथा विश्वविद्यालय के बीच मुकदमें में सुलह हो गयी। लेकिन उसकी क्या शर्ते हैं यह किसी को मालुम नहीं है।

लिनेक्स - मुकदमे

इस समय लिनेक्स से सम्बन्धित मुख्य रूप से पांच मुकदमे चल रहे हैं| यह मुकदमें क्यों चल रहे हैं, इसके बारे में कई अटकलें ईन्टरनेट पर हैं, पर हम लोग अटकलों को छोड़ देते हैं और देखते हैं कि वे यह मुकदमे क्या हैं |

१. एस.सी.ओ. बनाम आई.बी.एम.: कैलडरा कम्पनी, पहले इसी नाम से लिनेक्स का एक डिस्ट्रीब्यूशन निकालती थी यह बहुत सफल नहीं था - कम से कम रेड हैट, सूसे (नौवल) तथा मैनड्रिवा के जितना तो नहीं| कैलडरा बाद मे सैन्टा क्रूज औपरेशन (एस.सी.ओ.) हो गयी| एस.सी.ओ. का कहना है कि उसने नौवल से यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार खरीद लिये हैं तथा उसने यूनिक्स का एक्स (AIX) नाम का रूपान्तर निकालने लगी जिसे उसने आई.बी.एम. को दिया है। एस.सी.ओ. ने 2003 में एक मुकदमा आई.बी.एम. पर यह कहते हुये दायर किया कि

  • आई.बी.एम. ने एस.सी.ओ. के ट्रेड सीक्रेट का हनन किया है ।
  • आई.बी.एम. ने ऐक्स यूनिक्‍स का सोर्स कोड लिनेक्स में मिला दिया है ।
  • आई.बी.एम. ने एस.सी.ओ. के साथ ऐक्‍स के बारे में हुयी संविदा का उल्लंघन किया है ।

आई.बी.एम. ने इस मुकदमें में अपना उल्टा क्लेम दाखिल किया है कि

  • आई.बी.एम. ने ऐक्स का कोई सोर्स कोड लिनेक्स में नहीं मिलाया है ।
  • उसने एस.सी.ओ. की संविदा को नहीं तोडा है ।
  • संविदा तो एस.सी.ओ. ने तोडी है ।

२. एस.सी.ओ. बनाम नॉवल: यह स्पष्ट नहीं है कि नॉवल ने एस.सी.ओ. को क्या बेचा क्योंकि नॉवल के अनुसार उसने एस.सी.ओ. को यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार नहीं बेचे हैं। उसने एस.सी.ओ. को केवल यूनिक्स का विकास करने तथा दूसरे को लाइसेंस देने का अधिकार दिया था। इस पर एस. सी. ओ. ने एक मुकदमा नॉवल पर चलाया है कि,

  • नॉवल गलत कह रहा है कि एस.सी.ओ. यूनिक्स के बौद्धिक सम्‍पदा अधिकार का मालिक नहीं है;
  • नॉवल का यह कहना कि नॉवल यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का मालिक है एस.सी.ओ. के व्यापार में रूकावट डाल रहा है उसे रोका जाय;
  • इस बात कि घोषणा की जाय कि एस.सी.ओ. यूनिक्स के बौद्धिक सम्पपदा अधिकार का मालिक है न कि नॉवल;
  • उसे नॉवल से हर्जाना दिलवाया जाय|

इस मुकदमें के मुख्य अंश,  १०  अगस्त २००७ को,  नॉवल के पक्ष में तय कर दिये गये हैं। न्यायालय के अनुसार, यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार नॉवल के पास हैं और उसे इस बात का अधिकार है कि वह एससीओ को आईबीएम के विरुद्ध अपने दावे के इस भाग को वापस लेने या छोड़ने के लिये कह सकता है।   हांलाकि संविदा तोड़ने से सम्बन्ध का मुकदमा अभी चलता रहेगा।

३-४ एस.सी.ओ. बनाम ओटोजोन तथा डैमलर क्राईसलर: एस.सी.ओ. ने १५०० कम्पनियों को नोटिस भेजा है कि,

  • वे लिनेक्स प्रयोग करने से पहले उससे लाइसेंस ले लें; और
  • वह देखें कि यूनिक्स का कोड ओपेन सोर्स सौफटवेर से न मिल जाय।

उसने ओटोजोन तथा डैमलर क्राईसलर के खिलाफ अलग अलग मुकदमे अपने अधिकार के उल्लंघन के बारे में दायर किये हैं ।

डैमलर काईसलर के खिलाफ मुकदमा, अंशत: ९-८-२००४ को खारिज हो गया| फिर मुकदमा २१-१२-२००४ को यह कहते हुये खारिज हो गया कि वह पुन: दूसरा मुकदमा तब तक नहीं ला सकते हैं जब तक डैमलर क्राईसलर के पहले मुकदमे का सारा खर्चा न अदा कर दें | एस.सी.ओ. ने इसके खिलाफ अपील प्रस्‍तुत कर रखी है ।

५ रेड हैट बनाम एस.सी.ओ.: रेड हैट लिनेक्स डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनी है। इसने एक मुकदमा इसलिये दायर किया है कि घोषणा की जाय कि उसने लिनेक्स को वितरण करने में एस.सी.ओ. के किसी भी अधिकार का अतिक्रमण नहीं किया है|

यह कहना मुश्किल है कि इन मुकदमों में क्या होगा। यह इन पर आयी गवाही पर निर्भर करेगा| सारे मुकदमे एस.सी.ओ . बनाम आई.बी.एम. के मुकदमे के निर्णय पर निर्भर करेंगे।

बहुत सी प्रमुख कम्पनियां लिनेक्स को अपना रही हैं। इनमें आई.बी.एम., रेड हैट, तथा एच.पी. मुख्य हैं इन्होने इन मुकदमो को मद्दे नज़र रखते हुये, अपने खरीदारों को कहा है कि यदि यह पाया जाता है कि उनके कोई भी सौफ्टवेर किसी के बौद्धिक सम्‍पदा अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं तो वे न ही उसके पूरे हर्जाने की क्षतिपूर्ति करेंगे पर उन्हें नया सौफ्टवेर बना कर देगें| देखिये अगले दो सालो में क्या होता है।

लिनेक्स ट्रेडमार्क – मुकदमा

लिनेक्स, लिनूस टोरवाल्ड का ट्रेडमार्क है और इस समय लिनूस टोरवाल्ड की तरफ से, लिनेक्स मार्क इंस्टिट्यूट (एल.एम.आई.) इस नाम के प्रबन्ध का कार्य देखते हैं | यह भी एक रोचक किस्सा है कि यह क्यों बनाया गया|

१९९४ मे डेला क्रोस नामक व्यक्ति ने लिनेक्स नाम पर अमेरिका मे ट्रेडमार्क ले लिया| उसने लिनेक्स बेचने वाली कम्पनियों को नोटिस भेजने शुरू किये कि वे उससे लाईसेन्स ले लें| लिनूस टोरवाल्ड और लिनेक्स से सम्बन्ध रखने वाली कम्पनियों ने उस पर एक मुक्दमा चलाया| १९९७ मे, इस मुकदमे मे एक सम्झौते के अनुसार, लिनेक्स नाम का ट्रेडमार्क लिनूस टोरवाल्ड को दे दिया गया| उसके पश्चात, लिनेक्स नाम का गलत प्रयोग न हो इसके लिये लिनूस टोरवाल्ड ने इस नाम के प्रबन्ध करने के कार्य की जिम्मेवारी एल.एम.आई. को दे दी| एल.एम.आई. लिनेक्स नाम का प्रयोग करने के लिये लाईसेन्स देती है| लिनूस टोरवाल्ड ने इस बारे मे एक ब्यान भी जारी किया है जो कि यहां पर देखा जा सकता है|

यह लेख समाप्त करते समय मै आपका ध्यान लिनूस टोरवाल की आत्म कहानी Just for fun: The story of an Accidental Revolutionary की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। यह बहुत अच्छी तथा प्रेरणादायक पुस्तक है। इसमें कुछ चैप्टर बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के बारे में हैं। यह कुछ हमारे पुरातन विचारो से मेल खाते हैं और पश्चिम के समाज पर जिस तरह से इन अधिकारों की परिभाषा तथा व्याख्या की जाती है उस पर नयी तरह से प्रकाश डालती है - पढ़ कर देंखें।

उन्मुक्त
ईमेल: unmukt.s@gmail.com

नोट:

(१) यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठे पर लिनेक्स के नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है| यदि आप इसे, चिठ्ठे पर पढ़ना चाहें तो इसकी पहली कड़ी यहां तथा अन्तिम कड़ी यहां पर देखें|

(२) यदि आप लिनेक्स मे नौसिखिया हैं और इसे अपने कमप्यूटर पर डालना (install करना) चाहते हैं, तो अंग्रेजी का यह लेख भी देखें|

(३) लिनेक्स के बारे मे कुछ मजाक यहां देखें|

यह इस लेख की पी.डी.एफ. फाईल है| आप इसे डाउनलोड कर सकते हैं|

लिनेक्स की कहानी


ओपेन सोर्स सौफ्टवेर

June 1, 2006

इस लेख को क्यों पढ़ें

इक्कीसवीं शताब्दी में बौधिक सम्पदा अधिकारों की महत्वपूण भूमिका रहेगी| ओपेन सोर्स सौफ्टवेर का बौधिक सम्पदा अधिकार से अलग तरह का रिशता है इसीलिये इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता, हो सकता है कि आने वाले कल में, सूचना प्रद्योकिकी की दिशा इसी पर निर्भर करे| इसीलिये ओपेन सोर्स सौफ्टवेर को जानना, इसके महत्व को समझना, तथा इसके एवं बौधिक सम्पदा अधिकार के साथ रिशते को आत्मसात करना नितान्त आवश्यक है|

 

ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के बारे में गलतफ़हमी

आप यह भी न सोंचे कि ओपेन सोर्स सौफ्टवेर केवल कमप्यूटर वैज्ञानिकों के लिये है पर आम व्यक्ति के लिये नहीं है| यह कुछ साल पहले ठीक हो सकता था, पर आज नहीं| मैं कोई कमप्यूटर वैज्ञानिक नहीं हूं पर मेरे कमप्यूटर मे कोई भी मालिकाना (Proprietary) सौफ्टवेर नही है| आज की तारीख में ओपेन सोर्स सौफ्टवेर में औफिस में होने वाले सारे कार्य करना, लिखना, ईन्टरनेट पर जाना, तरह तरह के PPT Presentation देना, गाने सुनना, DVD देखना, ब्लौग करना, या और कुछ जो कि हम सब करना चाहते हैं उतना ही सरल है जितना कि मालिकाना सौफ्टवेर में| सबसे अच्छी बात है यह है कि बौधिक सम्पदा अधिकारों (Intellectual Property Rights) की कोई झन्झट नहीं तथा इसमें काम करने से आम व्यक्ति को पैसे खर्चा करने से मुक्ति और सौफ्टवेर की चोरी का कोई सवाल नही|

इस लेख को समझने के लिये कमप्यूटर ज्ञान की आवश्यकता नहीं है यह लेख वास्तव में आम व्यक्ति के लिये है| यह ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के साथ, उससे जुड़े कानूनी मुद्दों की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता है जिसके बारे में हम ध्यान नहीं दे रहें हैं कहीं ऐसा न हो कि जब हम ध्यान देने की बात सोंचे तब बहुत देर हो जाय| इसलिये यदि आप कमप्यूटर विज्ञान से सम्बधं नहीं रखते हों तो आप यह न सोंचे कि यह लेख आपके लिये नही है|

आप यह भी न सोंचे कि यह आपके समझ मे नहीं आयेगा| मैं कमप्यूटर पर काम तो करता हूं पर कमप्यूटर वैज्ञानिक नही हूं, न ही मुझे कमप्यूटर के बारे में कोई जानकारी है| इस लेख में कोई भी ऐसी बात नहीं है जो एक आम व्यक्ति न समझ सके|

सौफ्टवेर क्या है

तकनीकी दृष्टि से सौफ्टवेयर के दो हिस्से होते हैं ।

  • सोर्स कोड (source code); और
  • औबजेक्ट कोड (object code)|

इन दोनों को समझने के लिये थोड़ा सौफ्टवेयर के इतिहास को जानना होगा|

सोर्स कोड: कम्प‍यूटर हम लोगो की भाषा नहीं समझते हैं| वे केवल हां या ना, अथवा 1 अथवा 0 की भाषा समझते हैं| हमारे लिये इस भाषा में प्रोग्राम लिखना बहुत मुश्किल है| पहले प्रोग्राम इसी तरह से लिखे जाते थे एक पंच-कार्ड होता था जिसे छेद किया जाता था कार्ड में छेद का मतलब हां और यदि छेद नहीं है तो मतलब ना|

(पंच कार्ड)

जब कमप्यूटर विज्ञान का विकास हुआ तो ऊचें स्तर की कमप्यूटर भाषाओं (high level languages), जैसे कि बेसिक, कोबोल , सी ++ इत्यादि, का भी ईजाद किया गया| इन भाषाओं में ख़ास सुविधा यह है कि प्रोग्राम अंग्रेजी भाषा के शब्दों एवं वर्णमाला का प्रयोग करते हुये लिखा जा सकता है| जब इस तरह से प्रोग्राम लिख लिया जाता है तो उसे हम सोर्स कोड कहते हैं| अब इसे कमप्यूटर के समझने की भाषा में बदला जाता है|

औबजेक्ट कोड: ऊचें स्तर की कमप्यूटर भाषाओं में एक प्रोग्राम होता है जिसे कम्पाइलर (complier) कहते हैं| कम्पाइलर के द्वारा सोर्स कोड को जब कम्पाइल किया जाता है तो सोर्स कोड कम्प‍यूटर की भाषा, यानी 1 या 0 की भाषा में, बदल जाता है| इसको औबजेक्ट कोड या मशीन कोड भी कहते हैं| सौफ्टवेर किस तरह से कानून में सुरक्षित होता है, इसको जानने से पहिले कुछ बात बौधिक सम्पदा अधिकारों की|

 

बौधिक सम्पदा अधिकार (Intellectual Property Rights)

बौधिक सम्पदा अधिकारों मस्तिष्क की उपज हैं| दुनिया के देश, कई सदियों से अपने-अपने कानून बना कर इन्हे सुरक्षित करते चले आ रहें हैं | सन १९९५ में विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) बना| Agreement on the Trade related aspect of intellectual property rights (TRIPS) या ट्रिप्स, इस संगठन का एक समझौता है| सारे देश जो विश्व व्यापार संगठन के सदस्य हैं, उन्हे इसे मानना है तथा अपने कानून इसी के मुताबिक बनाने हैं| हम भी बौधिक सम्पदा अधिकार से सम्बन्धित कानूनों को इसी के कारण बदल रहे हैं ताकि वह ट्रिप्स मुताबिक हो जाये| कई लोगों का इसी लिये कहना है कि हम लोग कानून इसलिये नही बदल रहें हैं कि हमें उनकी आवश्यकता है पर इस लिये कि ट्रिप्स कहता है तथा विश्व व्यापार संगठन एवं ट्रिप्स के कारण हमने अपनी प्रभुत्ता खो दी है| खैर यह विवाद अलग है हमें तो ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के बारे में बात करनी है तथा केवल इसी सम्बन्ध में बौधिक सम्पदा अधिकारों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी कर रहें हैं|

ट्रिप्स में सात तरह के बौधिक सम्पदा अधिकार के बारे में चर्चा की गयी है इसमें तीन तरह के अधिकार, यानी की कापीराइट (Copyright), ट्रेड सीक्रेट (Trade Secret), तथा पेटेन्ट (Patent), कमप्यूटर सौफ्टवेर को प्रभावित करते हैं| सौफ्टवेर को पेटेन्ट कराने का मुद्दा विवादास्पद है तथा कुछ कठिन भी| इसे फिलहाल हम छोड़ देते हैं|

 

कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट

कौपीराइट: कौपीराइट किसी चीज के वर्णन में हैं। यदि आप कोई अच्छी कहानी लिखें, या कोई गाना संगीत-बद्ध करें, या पेन्टिंग करे तो यह किसी चीज़ का वर्णन होगा| उसमें आपका कापीराइट होगा| यदि उसे प्रकाशित करें तो कोई और उसे आपकी अनुमति के बिना प्रयोग नही कर सकता है|

ट्रेड सीक्रेट: जैसा कि इसका नाम कहता है केवल उसी को मालुम होता है जो उसे निकालता या ढ़ूढता है| कोका-कोला का नुस्खा, दुनिया का सबसे अचछा ट्रेड सीक्रेट है| उसे केवल कोका-कोला के मालिक ही जानते हैं| कोका-कोला का मिश्रण गाढ़े रूप में आता है और लोग तो केवल उसमें पानी मिलाते हैं और बोतलों में भरते हैं|

ट्रेड सीक्रेट को सुरक्षित करने के लिये दुनिया के कई देशों में अलग कानून है पर अपने देश में नहीं| इसके लिये तो संविदा तोड़ने या विश्वास तोड़ने का मुकदमा ही ठोका जा सकता है| हांलाकि ट्रिप्स इस तरह का कानून बनाने को कहता है पर हमने नहीं बनाया | हमारे हिसाब से संविदा या विश्वास तोड़ने का मुकदमा दायर करना, ट्रिप्स की शर्तों को पूरा करता है| चलिये जब विश्व व्यापार संगठन में कोई यह मुद्दा उठायेगा तो देखेंगे, हम तो यह देखें कि सौफ्टवेर कैसे सुरक्षित किया जाता है|

 

सौफ्टवेर कैसे सुरक्षित होता है

१. कौपीराइट की तरह: ‘सोर्स कोड और औबजेक्ट कोड’ शीर्षक के अन्दर पर चर्चा की थी कि आजकल सोर्सकोड ऊचें स्तर की कमप्यूटर भाषाओं (high level languages) में अंग्रेजी भाषा के शब्दों एवं वर्णमाला का प्रयोग करते हुये लिखा जाता है| यह उस सौफ्टवेर के कार्य करने के तरीके को बताता है तथा यह एक तरह का वर्णन है यदि इसे प्रकाशित किया जाता है तो उस सौफ्टवेर के मालिक या जिसने उसे लिखा है उसका कौपीराइट होता है|

औबजेक्ट कोड कम्प‍यूटर को चलाता है और यह हमेशा प्रकाशित होता है परन्तु क्या यह किसी चीज का वर्णन है अथवा नहीं इस बारे में शक था| ट्रिप्स के समझौते के अन्दर यह कहा गया कि कमप्यूटर प्रोग्राम को कौपीराइट की तरह सुरक्षित किया जाय। इसलिये औबजेक्ट कोड हमारे देश में तथा संसार के देशों में इसी प्रकार से सुरक्षित किया गया है|

कमप्यूटर प्रोग्राम के औबजेक्ट कोड तो प्रकाशित होतें हैं पर सबके सोर्स कोड प्रकाशित नहीं किये जाते हैं| जिन कमप्यूटर प्रोग्राम के सोर्स कोड प्रकाशित किये जाते हैं उनमें तो वे कौपीराईट से सुरक्षित होते हैं। पर जिन कमप्यूटर प्रोग्राम के सोर्स कोड प्रकाशित नहीं किये जाते हैं वे ट्रेड सीक्रेट की तरह सुरक्षित होते हैं|

२. ट्रेड सीक्रेट की तरह: मालिकाना कमप्यूटर प्रोग्राम में समान्यत: सोर्स कोड प्रकाशित नहीं नही किया जाता है तथा वे सोर्स कोड को ट्रेड सीक्रेट की तरह ही सुरक्षित करते हैं| यह भी सोचने की बात है कि ये सोर्स कोड क्यों नही प्रकाशित करते हैं?

सोर्स कोड से औबजेक्ट कोड कम्पाईल करना आसान है; यह हमेशा किया जाता है और इसी तरह प्रोग्राम लिखा जाता है| पर इसका उलटा यानि कि औबजेक्ट कोड से सोर्स कोड मालुम करना असम्भ्व तो नहीं पर बहुत मुश्किल तथा महंगा और इस पर रिवर्स इन्जीनियरिंग का कानून भी लागू होता है| इसी लिये सोर्स कोड प्रकाशित नहीं किया जाता है सीक्रेट रख कर ज्यादा आसानी से सुरक्षित किया जा सकता है| रिवर्स इन्जीनियरिंग भी बड़ा मजेदार विषय है, इसके बारे पर फिर कभी|

३. पेटेन्ट की तरह: ‘बौधिक सम्पदा अधिकार (Intellectual Property Rights)’ शीर्षक में चर्चा हुई थी कि सौफ्टवेर को पेटेन्ट के द्वारा भी सुरक्षित करने के भी तरीके हैं कई मालिकाना साफटवेयर इस तरह से भी सुरक्षित हैं पर यह न केवल विवादास्पद हैं, पर कुछ कठिन भी हैं| इसके बारे में फिर कभी|

४. सविंदा कानून के द्वारा: सविंदा कानून(Contract Act) भी सौफ्टवेर की सुरक्षा में महत्वपूण भूमिका निभाता है| आप इस धोखे में न रहें कि आप कोई सौफ्टवेर खरीदते हैं| आप तो केवल उसको प्रयोग करने के लिये लाइसेंस लेते हैंl आप उसे किस तरह से प्रयोग कर सकते हैं यह उसकी शर्तों पर निर्भर करता है और यह सविंदा कानून के अन्दर आता है| लाइसेंस की शर्तें महत्वपूण हैं| यही किसी सौफ्टवेर को ओपेन सोर्स सौफ्टवेर भी बनाती हैं| इसके बारे में आगे चर्चा होगी|

ओपेन सोर्स सौफ्टवेर में सोर्स कोड हमेशा प्रकाशित होता है| इसके लिखने वाले इस पर अपना कौपीराइट का अधिकार जमाते हैं कि नहीं, यह लाइसेंसों की शर्तों पर निर्भर करेगा, जिनके अन्तर्गत इनको प्रकाशित किया जाता है| इसके बारे में बात करने से पहिले हम लोग बात करेगें: कौपीलेफ्ट (Copyleft), फ्री सौफ़टवेर, और जी.पी.एल. {General Public License (GPL)} की|

 

कौपीलेफ्ट

सब लोग कौपीराइट के द्वारा कम‍प्यूटर प्रोग्राम को सुरक्षित नहीं कर रहे है कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कौपीराइट का प्रयोग इस प्रकार से कर रहे हैं कि न तो वे स्वयं उस पर कोई भी अधिकार रख रहें हैं न ही कोई और व्यक्ति उनके द्वारा बनाये गये कम‍प्यूटर प्रोग्राम पर कोई भी अधिकार रख सकता है। उदाहरणार्थ, यदि मैं कोई कम‍प्यूटर प्रोग्राम लिखूं और उसका सोर्स कोड और औबजेक्ट कोड में इस तरह की घोषणा तथा शर्त लगाते हुये प्रकाशित करूं कि

  • यह मैने लिखा है; और
  • इसमें मेरा कौपीराइट है; और
  • मैं हर व्यक्ति को इस कम‍प्यूटर प्रोग्राम (सोर्सकोड और औबजेक्ट कोड) की कापी करने, वितरण करने, तथा संशोधन करने का अधिकार देता हूं इसके लिये उन्हें मुझे कोई रौयलटी नहीं देनी होगी;

पर इसकी शर्त यह है कि—

  • यदि वह व्यक्ति कम‍प्यूटर प्रोग्राम का संशोधित करके या बिना संशोधित किये वितरित करता हैं तो उसे भी सोर्सकोड और औबजेक्ट कोड प्रकाशित करना होगा; और
  • अन्य लोगों को वही स्वतंत्रता देनी होगी जैसी कि मैंने उसे दी है|

अब इस घोषणा और शर्त के कारण न तो मैं स्वयं न और कोई अन्य व्यक्ति इस कम‍प्यूटर प्रोग्राम का कौपीराइट करा सकता है| इस तरह की घोषणा के द्वारा मैने सुनिश्चित कर दिया है कि कोई अन्य व्यक्ति भी कभी इस पर किसी प्रकार का कौपीराइट न जमा सके| कौपीराइट का प्रयोग करते हुये ठीक इसका उल्टा काम हुआ| कौपीराइट का यदि कोई उल्टा शब्द हो सकता है तो वह है कौपीलेफ्ट| यह एक नया शब्द है और अभी तक अंग्रेजी के शब्द कोश में नहीं आया है हालांकि कमप्यूटर शब्दकोश में यह एक प्रचलित शब्द है| जिस कम‍प्यूटर प्रोग्राम के लाईसेंस में इस तरह की घोषणा और शर्त होती है उसे कौपीलेफ्टेड सौफ्टवेयर कहा जाता है| इस तरह का सौफ्टवेयर फ्री सौफ्टवेयर भी कहलाता है|

फ्री सौफ्टवेर: इतिहास

कौपीलेफ्ट शब्द का प्रयोग होने के पहले और अब भी ऐसे सौफ्टवेयरों के लिये फ्री शब्द प्रयोग किया जाता है|

फ्री शब्द का प्रयोग करना रिचर्ड स्टालमेन ने शुरू किया और यह आन्दोलन भी उनका ही शुरू किया गया है| वे 1980 के दशक में मैसाचुसेट इस्टिंट्यूट आफ टेक्नौलोजी में पढ़ाते थे । उनके मुताबिक पहले कम‍प्यूटर प्रोग्रामर सौफ्टवेयर में कापीराइट क्लेम नहीं करते थे और बहुत आसानी से एक दूसरे को अपना प्रोग्राम दे देते थे लेकिन बाद में कमप्यूटर प्रोग्रामरों ने अपना प्रोग्राम एक दूसरे को देना बन्द कर दिया और किसी और को उनके प्रोग्राम में संशोधन करने का अधिकार भी समाप्त कर दिया । स्टालमेन को लगा कि इस तरह से कम‍प्यूटर सौफ्टवेयर कुछ खास लोगों के पास रह जायेगा और उसका सर्वांगीण विकास नहीं हो पायेगा । इसलिये उन्‍होंने अपना इन्‍स्‍टीटयूट को छोड कर घन्यू प्रोजेक्‍ट (GNU project), फ्री सौर्स फाउण्डेशन (Free Source Foundation) के अंतर्गत शुरू किया| इसमें उस तरह के सौफ्टवेयर लिखने शुरु किये जो कि कौपीलेफ्टेड हों|

उन्होंने इस तरह के साफ्टवेयर को फ्री-सौफ्टवेयर का नाम दिया| यह इसलिये, क्यों कि उनके मुताबिक इसमें लोगों को कम‍प्यूटर प्रोग्राम या सौफ्टवेयर को संशोधन करने की स्वतंत्रता है उनका कहना है कि फ्री को ऐसे मत सोचो जैसा फ्री बीयर में है पर ऐसे देखो जैसा कि फ्रीडम आफ स्पीच में है| फ्री सौर्स फाउण्डेशन की वेबसाईट के मुताबिक, उन्ही के शब्दों में

‘Free software’ is a matter of liberty, not price. To understand the concept, you should think of ‘free’ as in ‘free speech’, not as in ‘free beer’.

फ्री तथा गीपीएल्ड (GPLed) सौफ्टवेर की शर्तें

फ्री या कापीलेफटेड सौफ्टवेयर में निम्न बातें मुख्य हैं -

  • इसमें सोर्स कोड हमेशा प्रकाशित किया जाता है
  • इस तरह के सौफ्टवेयर के लिये कोई पैसा या रौयल्टी नहीं देनी पड़ती है पर यदि उसके सम्बन्ध में यदि आप कोई सर्विस दे रहें है तो सर्विस देने का पैसा ले सकते हैं|
  • इस तरह के सौफ्टवेयर को कोई भी संशोधित कर सकता है
  • इस तरह के सौफ्टवेयर को संशोधन करने के बाद प्रकाशित करने या बाटंने की कोई आवश्यकता नही है| आप उसे बिना प्रकाशित या बाटें अपने संगठन में प्रयोग कर सकते हैं|

पर यदि इस तरह के सौफ्टवेयर को बिना संशोधन किये या संशोधित करने के बाद बांटा जाता है तो उसमें वही शर्तें रहेंगीं जो कि पहले थीं यानी कि

  • सोर्सकोड प्रकाशित करना पडेगा;
  • अन्य लोगों को संशोधन करने की स्वतंत्रता देनी होगी; तथा
  • सौफ्टवेयर के लिये कोई पैसा या रौयल्टी नहीं ली जा सकती है|

स्टालमेन ने कुछ वकीलों की मदद से जनरल पब्लिक लाइसेंस (General Public License) (GPL) लिखा, जिसमें इस तरह की घोषणा एवं शर्त है जो किसी भी साफटवेयर को कौपीलेफ्ट करता है| इसलिये इस तरह के सौफ्टवेर को गीपीएल्ड (GPLed) सौफ्टवेर भी कहा जता है| यानि कि फ्री सौफ्टवेर या कौपीलेफ्टेड सौफ्टवेर या गीपीएल्ड सौफ्टवेर एक ही तरह के सौफ्टवेर के पर्यायवाची शब्द हैं|

ओपेन सोर्स सौफ्टवेर क्या है

यदि सौफ्टवेयर के लिये पैसा नहीं मिलेगा तो काम कैसे चलेगा| तब व्यापारी वर्ग को ऐसा लगा कि यह सौफ्टवेयर बेकार है और उन्‍होंने इसे अपने से बहुत दूर रखा| हालांकि ऐसे सौफ्टवेयर से भी पैसा कमाया जा सकता है लेकिन उसका तरीका कुछ अलग है, परन्तु फ्री सौफ्टवेयर पर कुछ ऐसा ठप्पा लग गया कि व्यापारी वर्ग उन दूसरे तरीकों को भी अपनाने से दूर रहने लगे| 1997 में फ्री सौफ्टवेयर में उत्साही लोगों ने सैन-फ्रांसिस्को में एक मीटिंग की तथा ओपेन सोर्स ईनिशियेटिव (Open Source Initiative) (OSI) (ओ.एस.आई.) नाम की सार्वजनिक कारपोरेशन बनायी| इसमें १० मार्ग दर्शक सिद्धां‍त बनाये गये| और यदि सौफ्टवेयर का लाइसेंस उन १० शर्तो को सन्तुष्ट करता हो तो ऐसे सौफ्टवेयर को उन्होंने ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर की संज्ञा दी| इन १० मार्ग दर्शक सिद्धांतो में मुख्य ३ निम्न हैं:

  • सौफ्टवेयर का सोर्सकोड प्रकाशित होना चाहिये;
  • सौफ्टवेयर के लिये कोई भी रायल्टी नहीं ली जा सकती है;
  • सोर्सकोड को संशोधित करने की सभी को स्वतंत्रता रहेगी|

ओ.एस.आई. ने अपने मार्ग दर्शक सिद्धां‍तों के अंतर्गत तरह-तरह के लाइसेंसों का मुआयना किया और करीब ५८ लाइसेंसो के लिये कहा कि वह 10 मार्ग दर्शक सिद्धां‍तों को सन्तुष्ट करते हैं जो भी सौफ्टवेयर इन लाइसेंसो के अंतर्गत प्रकाशित किये जाते हैं उन्हें ही ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर कहा जाता है|

ओ.एस.आई. के द्धारा‍‍ चिन्हित लाइसेन्सों के एक छोर पर जीपीएल्ड लाइसेंस है जो किसी भी सौफ्टवेयर को सबसे ज्यादा कापीलेफ्ट करता है| ओपेन सोर्स सौफ्टवेर लाइसेन्सों में यह सबसे लोकप्रिय भी है| दूसरे छोर पर बरकले सौफ्टवेयर डिस्ट्रीब्यूशन (Berkeley Software Distribution) (बी.एस.डी.) है| जिसके अंतर्गत प्रकाशित किये हुये सौफ्टवेयर को आप संशोधित कर, अपने स्वामित्व में ले सकते हैं| बाकी सारे चिन्हित किये गये लाइसेंस में इन दो किनारों के बीच में हैं तथा अलग-अलग स्तर तक सौफ्टवेयरों को कौपीलेफ्ट करते हैं|

केवल सोर्सकोड प्रकाशित किये जाने पर सौफ्टवेयर को ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर नहीं कहा जा सकता जब तक कि उस सौफ्टवेयर का लाइसेंस ओ.एस.आई. की दसों मार्ग दर्शक सिद्धांतो को भी न सन्तुष्ट करे|

ओ.एस.आई. का लोगो

जिन सौफ्टवेयर में ओ.एस.आई. का लोगो लगा होता है इसका अर्थ है कि वह ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर है|

लोकप्रिय - ओपेन सोर्स सौफ्टवेर
कुछ लोकप्रिय ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर निम्न हैं|

१. आपरेटिंग सिस्टम वह साफटवेयर होता है जो किसी कमप्यूटर के हार्डवेयर में समंव्य लाता है तथा कमप्यूटर को चलाता है मुख्यत: तीन तरह के आपरेटिंग सिस्टम हैं

  • विन्डोज़ की तरह के: यह दुनिया में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है
  • यूनिक्स की तरह के: इसमें कई तरह के आपरेटिंग सिस्टम हैं इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय लिनेक्स (Linux) है| इसका ग्राफिकल इन्टरफेस विन्डोज़ की तरह का है परन्तु दोनों में तकनीक की भिन्नता है| मैं खुद लिनेक्स के कमप्यूटर पर काम करता हूं और मैं नहीं समझता कि इसमें काम करने में विन्डोज़ से ज्यादा मुश्किल होती है| पहले मैंने इसी सिरीज़ के लेखों में लिनेक्स के इतिहास तथा इसके बारे में चल रहे मुकदमें के बारे में बताने के लिये कहा था पर शायद इसे अलग से बताना ही ठीक रहेगा यह सिरीस बहुत लम्बी हो रही है| लिनेक्स के बारे में अलग से ही बात करना ही ठीक रहेगा|
  • मैक/ औ.एस. की तरह के: परसनल कम‍प्यूटर की शुरूआत इन्हीं से हुई थी तथा चलाने में यह सबसे आसान हैं| अपने देश में तो नहीं, पर बाहर के देशों में ज्यादा लोकप्रिय है| बरक्ले यूनिक्स, यूनिक्स का ही रूप है| मैक सिस्टम में बरक्ले यूनिक्स का काफी योगदान है|

ओ.एस.-२, आई.बी.एम. के द्वारा निकाला हुआ आपरेटिंग सिस्टम था पर अब यह नही चल रहा है| यह भी अपने में विचारणीय प्रश्न है कि ओ.एस.-२ बहुत अच्छा आपरेटिंग सिस्टम होने के बाद क्यों नही चला तथा मैक भी इतना आसान आपरेटिंग सिस्टम होने के बाद भी विन्डोज़ की तरह क्यों नहीं लोकप्रिय है | इसकी वृस्तित चर्चा तो फिर कभी करेंगे पर इसकी कुछ जानकारी यहां पर है|
अभी तो केवल इतना ही कि यूनिक्स के अधिकतर रूप ओपेन सोर्स साफटवेयर हैं| लिनेक्स ओपेन सोर्स साफटवेयर है और जी.पी.एल. के अन्दर प्रकाशित है|

२. फायरफोक्स(Firefox), थन्डरबर्ड(Thunderbird) तथा सनबर्ड (Sunbird) मौज़िला फाउन्डेशन के साफटवेयर हैं | यह मौज़िला प्बलिक लाईसेंस के अन्दर प्रकाशित है| यह लिनेक्स तथा विन्डोज़ दोनों पर चलते हैं फायरफौक्स, इन्टरनेट एक्सप्लोरर की तरह वेब ब्राउजर है| थन्डरबर्ड, आउटलुक एक्सप्रेस की तरह ई-मेल भेजने व पाने के लिये साफटवेयर है| सनबर्ड, माइक्रोसौफ्ट आउटलुक की तरह का ई-मैनेजर है|

३. जिम्प (GIMP): यह फोटो ठीक करने का फोटोशौप की तरह का सौफ्टवेयर है| यह जी.पी.एल. के अन्दर प्रकाशित है| यह लिनेक्स एवं विन्डोज़ दोनों पर चलता है|

४. ओपेन आफिस डाट ओर्ग (OpenOffice.Org): यह एल.जी.पी.एल. के अन्दर प्रकाशित है| यह माइक्रोसौफ्ट औफिस की तरह का सौफ्टवेयर है तथा आफिस में कार्य आने वाले सारे कार्य कर सकता है| यह विन्डोज़ तथा लिनेक्स दोनों पर चलता है| यह माइक्रोसॉफ्ट औफिस में बनाये गये अलग-अलग तरह के फौरमेट (Format) के दस्तावेजों, प्रस्तुतीकरण को खोल सकता है तथा उसी फौरमेट में सुरक्षित कर सकता है|

५. ऐपाचे (Apache): यह वेब सरवर के लिये सबसे ज्यादा लोकप्रिय साफटवेयर है|

यदि आप विन्डोज़ में काम करते हैं तथा लिनेक्स पर जाने की बात सोचते हैं तो आप ओपेन आफिस डाट और्ग, फायरफौक्स, थन्डरबर्ड,सनबर्ड और जिम्प पर काम करके देखें|

ओपेन सोर्स सौफ्टवेर: परिवर्णी शब्द ( acronym)

जब हम लोग ओपेन सोर्स सौफ्टवेर की बात कर रहे हैं तो उन तीन परिवर्णी शब्द ( acronym) की बात कर ली जाय जो इस सम्बन्ध में प्रयोग किये जाते हैं

  • FOSS
  • FLOSS
  • LAMP

FOSS/ FLOSS: फ्री सौफ्टवेर, ओपेन सोर्स सौफ्टवेर है पर हर ओपेन सोर्स सौफ्टवेर, फ्री सौफ्टवेर नहीं है| फ्री सौफ्टवेर के लिये उसे जी.पी.एल. लाइसेंस के अन्दर प्रकाशित होना होगा पर ओपेन सोर्स सौफ्टवेर कई अन्य तरह के लाइसेंस के अन्दर भी प्रकाशित हो सकता है| दोनों में अन्तर तो है पर सम्बन्ध भी गहरा है| फ्री सौफ्टवेर से ही यह सब शुरू हुआ है इसलिये ऐसे सौफ्टवेर को Free Open Source Software या छोटे में FOSS कहा जाता है|

यहां फ्री शब्द का अर्थ स्वतंत्रता से है पर फ्री शब्द का अर्थ बिना पैसे के भी होता है इसलिये फ्री शब्द का प्रयोग कुछ चक्कर में डाल देता है| फ्रेंच भाषा में दो अलग-अलग शब्द हैं

  • Gratis जिसका अर्थ बिना पैसे के होता है
  • Libre जिसका अर्थ स्वतंत्रता से होता है

इसलिये लोग अक्सर Free/Libre Open Source Software या FLOSS का प्रयोग करते हैं

LAMP: ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के चार मुख्य स्तम्भ हैं:
Linux
Appache
MySQL
Python, Perl, PHP इत्यादि

लिनेक्स तथा एपैचे के बारे में पहिले चर्चा हो चुकी है| MySQL एक डाटा-बेस प्रबंध करने का प्रोग्राम है| Python, Perl, PHP इत्यादि स्क्रिप्टिंग तथा प्रोग्राम लिखने की कमप्यूटर भाषायें हैं इन्हीं के पहले अक्षर को छोटा कर के LAMP शब्द बना है| आने वाला कल हो सकता है कि इसी LAMP से उज्जवलित हो इसलिये ओपेन सोर्स सौफ्टवेर को किनारे न कीजिये, ध्यान में रखिये|

ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर: महत्व

१. बौद्धिक सम्पदा अधिकार नहीं: ओपेन सोर्स सौफ्टवेर की सबसे महत्वपूर्ण बात इनका बौद्धिक सम्पदा अधिकार के साथ रिशता है| इसको लिखने वाले इनमे कोई भी बौद्धिक संपदा अधिकार क्लेम नहीं करते हैं यह बात इस तरह से स्पष्ट है कि इसे लिखने वाले स्वयं कहते हैं कि जो चाहे तो इसका प्रयोग कर सकता है, वितरित कर सकता है तथा संशोधित कर सकता है| यह सच है कि इस शताब्दी में लड़ाईयां पानी तथा तेल पर होंगी पर बहुत सी लड़ाईयां बौद्धिक संपदा अधिकारों को लेकर होंगी| ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर का प्रयोग करने से बौद्धिक संपदा अधिकार के झगडों से बचा जा सकता है|

२. बौद्धिक सम्पदा अधिकार: जब कोई व्यक्ति मालिकाना सौफ्टवेयर पर काम करता है तो वह मालिकाना सौफ्टवेयर के बौद्धिक संपदा अधिकारों को बढ़ाता करता है, पर जब वह ओपेन सोर्स सौफ्टवेर पर काम करता है तब वह अपने बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को बढ़ाता है या कम से कम किसी और के नहीं| वह अपने बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को बढ़ा रहा है या किसी के भी नहीं बढ़ा रहा है, यह उस ओपेन सोर्स सौफ्टवेर की लाईसेंस की शर्तों के ऊपर निर्भर करता है| हमारा देश दुनिया के सारे देशों में सौफ्टवेर के मामले में आगे हैं और यह विचारणीय प्रश्न है कि किसके बौद्धिक सम्पदा अधिकारो को मजबूत किया जाना चाहिये|

३. कापीराइट का कोई अतिक्रमण नहीं: ओपेन सोर्स साफटवेयर में किसी को भी कापीराइट का अधिकार नहीं होता है, इसलिये उसको प्रयोग करने से किसी के भी कापीराइट का अतिक्रमण नहीं होता है| अक्सर जब आप किसी के मालिकाना साफटवेयर को बिना पैसा दिये प्रयोग करते हैं या एक कापी लेकर एक से अधिक कमप्यूटर में प्रयोग करते हैं तो आप उसके कापीराइट अधिकार का उल्लंघन करते हैं| यह कानूनी तौर पर गलत है इसमे जेल भी हो सकती है और हर्जाना देना पड़ सकता है| यदि ओपेन सोर्स सौफ्टवेर का प्रयोग किया जाता है तो कभी कानून का उल्लंघन नहीं होता है| इसका प्रयोग बिना किसी अपराध भावना के किया जा सकता है|

४. व्यय में कमी: ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के लिये कोई भी रायल्टी नहीं ली जा सकती है| इसलिये इसका प्रयोग करने से हमेशा खर्च कम होता है| यदि कोई योजना शुरू की जाय तो ओपेन सोर्स सोर्स सौफ्टवेर प्रयोग करने से उसका खर्च हमेशा कम रहेगा|

५. सौफ्टवेर के दाम में कमी: चूंकि ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के लिये कोई भी रायल्टी नहीं ली जा सकती है तथा इसके प्रयोग करने से खर्च कम होता है इसलिये बहुत से मालिकाना सौफ्टवेर के मालिकों ने भी अपने दाम कम किये हैं|

६. मनपसंद किया जा सकता है: ओपेन सोर्स सौफ्टवेर को हमेशा संशो‍धित किया जा सकता है इसलिये आप इसे हमेंशा मनपसन्द बना सकते हैं| यह मालिकाना सौफ्टवेर में तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि मालिकाना सौफ्टवेर का मालिक स्वयं न चाहे| ओपेन सोर्स सौफ्टवेर को आप जिस भाषा में चाहे उसमें प्रयोग कर सकते हैं| हमारे देश की बहुत कम जनसंख्या अंग्रेजी जानती है| ज्यादातर लोग मार्तभाषा का प्रयोग करते हैं यदि हम लोगों को मार्तभाषा में कमप्यूटर दे सके तो सूचना प्रौद्योगिकी को जन-जन तक ले जाया जा सकता हैं और यह सूचना प्रौद्योगिकी को तेजी से ऊंचाई तक ले जाने में हमारी सहायक हो सकती है| इसी लिये इस समय कई मालिकाना सौफ्टवेरों ने भी हिन्दीमय होने का फैसला किया है|

७. वायरस नहीं: वायरस एक तरह का कमप्यूटर प्रोग्राम होता है जो कि दूसरे कमप्यूटर या कमप्यूटर के डाटा को प्रभावित करता है| ओपेन सोर्स सौफ्टवेर में भी वायरस हो सकता है परन्तु यह मालिकाना सौफ्टवेर के मुकाबिले नगण्य है| कमप्यूटर वैज्ञनिकों के अनुसार चूंकि ओपेन सोर्स सौफ्टवेर खुला है इसलिये ज्यादा स्थायी है परन्तु मैं इसके बारे में इससे अधिक कहना ठीक नहीं समझता क्योंकि यह तकनीक का विषय है और कम‍प्यूटर तकनीक से सम्बन्धित लोग इस बारे में ज्यादा अच्छा बता सकते हैं|

लिनूस टोरवाल्डस तथा बिल गेट्स के विचार

लिनूस टोरवाल्डस, जो लिनेक्स के जन्मदाता हैं, ने अपनी जीवनी डेविड डाईमन्ड के साथ लिखी है| इसका नाम है ‘Just for Fun: the Story of an Accidental Revolutionary’| यह बहुत अच्छी पुस्तक है तथा इसे पढने से जीवन में आगे बढने की प्रेरणा मिलती है वह इस पुस्तक मे ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर के बारे में कहते हैं,

‘The GPL and open source model allows for the creation of the best technology. … It also prevents the hoarding of technology and ensures that anyone with interest won’t be excluded from its development.

So open source would rather use the legal weapon of copyright as an invitation to join in the fun, rather than as a weapon against others. It’s still the same old mantra: Make Love, Not War, except on a slightly more abstract level.

Imagine an intellectual property law that actually took other people’s rights into account, too. Imagine IP laws that encouraged openness and sharing. Laws that say sure, you can still have your secrets, whether they be technological or religious, but that doesn’t mandate legal protection for such secrecy.’

जब हम लोग बात ओपेन सौफ्टवेयर में कुछ फायदे के बारे में कर रहे है तो बहुत अच्छा होगा कि कुछ दूसरा पक्ष भी देखें| बिल गेट्स, विन्डोज़ के जन्मदाता हैं| उन्होंने ‘The Road Ahead’ पुस्तक लिखी है| यह पुस्तक भी बहुत अच्छी है| अपने नाम के मुताबिक यह बताती है कि सूचना प्रद्योगिकी भविष्य में किस तरफ जायेगी| इसमें कई मुश्किल सवालों को बहुत आसानी से समझाया गया है| इसमें वे फ्री सौफ्टवेयर की कमियों को इस तरह से वर्णन करते हैं,

‘In addition to free information, there’s a lot of free software on the Internet today, some of it quite useful. Sometimes it’s commercial software given away as part of a marketing campaign. Other times the software has been written as a graduate student project or at a government-funded lab. But I think consumer desire for quality, support, and comprehensiveness in important software applications means that the demand for commercial software will continue to grow. Already many of the students and faculty members who wrote free software at their universities are busy writing business plans for start-up companies that will provide commercial versions of their software with more features, not to mention customer support and maintenance.’

यह तो कहना मुश्किल है कि सौफ्टवेयर उद्योग किस तरफ जायेगा परन्तु दुनिया के बहुत सारे देश तथा व्यापार घराने ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर को अपना हिस्सा बना रहे हैं | हम इस समय एक दोराहे पर खड़े हैं और एक ऐसी स्थिति मे हैं कि सूचना प्रद्योगिकी को नया मोड़ दे सकते हैं| हमारी अंग्रेजी अच्छी है, गणित मे तो हम हमेशा से अच्छे थे| सूचना प्रद्योगिकी के इन्जीनियरों की हमारे पास कमी नहीं है| यदि हम ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर की शक्ति को समझ सके, उसको साज़ कर सके, तो शक नहीं कि हम इस गाने के,

सुनो गौर से दुनिया वालों,

बुरी नजर न हम पर डालो|

चाहे जितना जोर लगा लो,

सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी|

दूसरे आखरी शब्द ‘होंगे’ को ‘हैं’ मे बदल सकेंगे|

 

 

 

उन्मुक्

 

ईमेल: unmukt.s@gmail.com

नोट:-

(१) यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठे पर ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के नाम से कई कड़ियों मे प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है| यदि आप इसे चिठ्ठे पर पढ़ना चाहें तो इसकी पहली कड़ी यहां पर देखें| उसके बाद अगली बार पर क्लिक कर आगे जा सकते हैं|

(२) ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर के बारे में सारी खबर आपको लिनेक्स टुडे की वेब-साईट से मिल सकती है| इसकी RSS feed भी है|
(३) यदि आप ओपेन सोर्स साफटवेयर का कोई सम्मेलन आयोजित करना चाहें तो यहां देखें|

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ओपेन सोर्स सौफ्टवेर


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