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	<title>लेख</title>
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	<description>उन्मुक्त पर है मेरी छुटपुट बातें, छुटपुट पर हैं औरों कि मुक्त बातें - यहां है मेरी पूरी बातें।</description>
	<pubDate>Sun, 11 May 2008 07:16:10 +0000</pubDate>
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	<language>hi</language>
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		<title>क्या भूलूं क्या याद करूं</title>
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		<pubDate>Sun, 11 May 2008 07:13:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[जीवनी]]></category>

		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[यह, हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के पहले भाग 'क्या भूलूं क्या याद करूं' की, समीक्षा है। This is book review of the first part of autobiography of Harivansh Rai Bachcan - 'kya bhuloon kya yaad kroon'. ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:center;"><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2008/05/kya-bhuloon-kya-yaad-kroon.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-81" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2008/05/kya-bhuloon-kya-yaad-kroon.jpg?w=150&h=239" alt="" width="150" height="239" /></a><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Amitabh_Bachchan">अमिताभ बच्चन</a> के पिता, मधुशाला के लेखक - <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harivansh_Rai_Bachchan">हरिवंश राय बच्चन</a> का जन्म २७ नवम्बर २००७ पर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Allahabad">इलाहाबाद</a> के पास <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pratapgarh%2C_Uttar_Pradesh">प्रतापगढ़</a> जिले के एक  गांव में हुआ था। उन्होने अपनी अधिकतर पढ़ायी इलाहाबाद में की और यहीं पर नौकरी भी की। १९५५ में, जवाहर लाल नहरू, इन्हें दिल्ली ले गये। वे राज्य सभा के सदस्य रहे। १९६९ में उन्हें साहित्य आकदमी का पुरुस्कार मिला। वे पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान, और यश भारती सम्मान से भी नवाज़े गये। उनकी मृत्यु १८ जनवरी २००३ में हो गयी।</p>
<p style="text-align:center;">बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। इस चिट्ठी में उनकी आत्मकथा के पहले भाग क्या भूलूं क्या याद करूं की समीक्षा है।</p>
<p><span style="font-size:medium;"> बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग &#8216;क्या भूलूं क्या याद करूं&#8217; की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और  श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माना जाता है। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;कायस्थ  के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां  के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या  बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं  कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Allahabad_University">इलाहाबाद विश्वविद्यालय</a> में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है - इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? - यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! - मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।&#8217;</span></p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2008/05/senate-hall-allahabad-university.jpg"><img class="alignnone size-medium wp-image-82" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2008/05/senate-hall-allahabad-university.jpg?w=300&h=230" alt="" width="300" height="230" /></a></p>
<p style="text-align:center;"><em>इलाहाबाद विश्वविद्याल जहां बच्चन जी अपने जीवन के सबसे सृजनात्मक साल गुजारे</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे यहां तो <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/10/blog-post.html">टौमी</a> है।  टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये - बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। कुत्तों के बारे में  बच्चन जी के विचार यह हैं,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें  इलाहाबाद के मुहल्लों,  शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका  इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर  बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो  अच्छा रहता। यह इसको नीरस बनाता है।<br />
</span></p>
<p style="text-align:center;">बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है</p>
<ul>
<li>क्या भूलूं क्या याद करूं;</li>
<li>नीड़ का निर्माण;</li>
<li>बसेरे से दूर;</li>
<li>दशद्वार से सोपान तक।</li>
</ul>
<p style="text-align:center;">मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी  चिट्ठी, &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/08/blog-post_14.html">हरिवंश राय बच्चन - विवाद</a>&#8216; पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_31.html">मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों</a>&#8216; पर पढ़ सकते हैं।</p>
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		<title>क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है?</title>
		<link>http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/</link>
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		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 15:19:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>

		<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>

		<category><![CDATA[book review]]></category>

		<category><![CDATA[feynman]]></category>

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		<category><![CDATA[science]]></category>

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		<description><![CDATA[यदि २०वीं शताब्दी के पहले भाग में सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन (Albert Einstein) थे तो दूसरे भाग में यह श्रेय रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन (Richard Philips Feynman) को है। १९६६ में उन्हें,  भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार मिला। मिशेल (Michelle Feynman) उनकी गोद ली पुत्री हैं। उन्होने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>यदि २०वीं शताब्दी के पहले भाग में सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन (Albert Einstein) थे तो दूसरे भाग में यह श्रेय <a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन</a> (Richard Philips Feynman) को है। १९६६ में उन्हें,  भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार मिला। मिशेल (Michelle Feynman) उनकी गोद ली पुत्री हैं। उन्होने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों का संकलन कर के Don’t you have time to think’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है।</p>
<p><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg" title="dont-you-have-time-to-think.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/dont-you-have-time-to-think.jpg?w=116&h=172" alt="dont-you-have-time-to-think.jpg" height="172" width="116" /></a></p>
<p>इस पुस्तक की प्रस्तावना में मिशेल अपने बचपन वा अपने पिता के बारे में बताती हैं। वे अपने पिता और अपने बड़े भाई कार्ल को एक दूसरे से विज्ञान के बारे में बात करते हुऐ सोचती हैं कि उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में क्यों नहीं कार्य किया। उन्हें लगता है कि इस कारण कार्ल अपने पिता के साथ ज्यादा पास थे।</p>
<p>उन्हें अपना घर और घरों से अलग लगता था। रविवार के दिन फाइनमेन सुबह अखबार नहीं पढ़ते थे पर वह सब लोगों के साथ, संगीत सुनाते थे; ड्रम बजाते थे; और कहानी किस्से सुनाते थे। जब कभी प्रारम्भिक शिक्षा के स्कूल में बच्चों को ले जाने की फाइनमेन की बारी होती थी तो वह अक्सर गाड़ी चलाते हुये या तो केलटेक की तरफ चले जाते थे या नाटक करते थे कि वे रास्ता भूल गये। इस पर सब बच्चे चिल्लाने लगते थे कि यह गलत रास्ता है। फिर फाइनमेन का जवाब होता था कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;अच्छा, यह रास्ता नहीं है&#8217;</p></blockquote>
<p><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-4.thumbnail.jpg" alt="feynman-4.jpg" /><em>फाईनमेन लॉस एलमॉस की प्रयोगशाला जाते समय।</em></p>
<p>यह कहकर वह पुन: दूसरा गलत रास्ता पकड़ लेते थे। बच्चे फिर चीखते थे,</p>
<blockquote><p> ‘नहीं..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ।’</p></blockquote>
<p>बच्चों को लगता था कि वे स्कूल समय से नहीं पहुंच पायेंगे और उन्हें सजा मिलेगी पर फाइनमेन हमेशा बच्चों को स्कूल समय से पहुंचा देते थे।</p>
<p>मिशेल कहती हैं कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;मेरे पिता कई हुनर में माहिर थे पर उनका वह हुनर सबसे खास था जिसमें वह अपने को एक बेवकूफ सा दिखने का नाटक करते थे और मुझे सोचने देते थे कि वे मेरी बातों से बेवकूफ बन गये हैं। इस बात ने मेरे बचपन को सबसे ज्यादा निखारा है।&#8217;</p></blockquote>
<p>मिशेल यह भी बताती हैं कि, वे बहुत सालों तक नहीं जानती थी कि सब लोग उनके पिता फाइनमेन का सम्मान एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति की तरह से करते थे। उनके मुताबिक,</p>
<blockquote><p> &#8216;मेरे पिता फाइनमेन हमेशा लोगों को अपने बारे में अश्रद्धा रखने को प्रेरित करते थे। वे अक्सर ऐसी कहानियां सुनाया करते थे जिसमें उनकी बेवकूफी झलकती थी। रात के खाने पर वे बताया करते थे कि, किस तरह वह अपना स्वेटर भूल गये; या कुछ महत्वपूर्ण सूचना भूल गये; या लोगों से बात होने के बाद उन्हें उनका नाम याद नहीं रहा। उनकी कान्फ्रेन्स नये-नये होटलों में होती थी। वे अक्सर उससे बोर होकर अपना सामान लेकर जंगल चले जाया करते थे और वहीं कैम्पिंग कर रात बिताते थे। लौट कर, चटकारे लेकर इसका अनुभव हमें सुनने को मिलता था। मेरी मां इस पर हमेशा टिप्‍पणी करती थीं “ओह रिचर्ड” वह हमेशा अपने ऊपर हंसते थे और हम उनके ऊपर।‘</p></blockquote>
<p>फाईनमेन अपने स्कूल की सहपाठी अरलीन से प्यार करते थे। नौकरी मिलने के बाद उसी के साथ शादी रचाने की बात थी। लेकिन अरलीन को तपेदिक की बीमारी हो गयी। फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे फिर भी उन्होंने उससे शादी की।</p>
<p>मैं हमेशा सोचता था कि इस तरह की बात तो केवल कहानियों या फिर फिल्मों में होता है, वास्तविक जीवन मैं नहीं, पर मैं गलत था।</p>
<p>फाइनमेन के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे में फाइनमेन ने अपनी मां को एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें लिखा कि,</p>
<blockquote><p> ‘I want to marry Arline because I love her - which means I want to take care of her. That is all there is to it. I want to take care of her.’<br />
मैं अरलीन से शादी करना चाहता हूं क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूं - इसका अर्थ यह है कि मैं उसकी देख भाल करना चाहता हूं</p></blockquote>
<p>प्यार का यह भी एक अर्थ – एकदम सत्य।  हां इसका एक और अर्थ <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-story.html">यहां</a> भी।</p>
<p>इस किताब में एक पत्र श्री वी.के. सिंह, अध्यापक भौतिक शास्त्र, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर, का भी है। ये फाइनमेन की पुस्तक Lectures on Physics की तुलना रामायण से करते है और कहते हैं कि इसका अध्ययन भी, उतनी ही बारीकी से करना चाहिए जैसे कि रामायण का किया जाता है।</p>
<p>इसमें इलाहाबाद के श्री मदन मोहन पंत के पत्र का जिक्र है जिसमें पंत ने फाइनमेन को अपना पेन टीचर के कहा है।<a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.jpg" title="feynman-3.jpg"><br />
</a></p>
<p align="center"><strong>पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</strong></p>
<p>&#8216;कयामत से कयामत तक&#8217; की पिक्चर का एक गाना है,</p>
<p>पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा,<br />
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा।<br />
मगर यह तो कोई न जाने,<br />
कि मेरी मंजिल है कहां।</p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/fvlgcnrVrOg/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>इस गाने को देखें और सुने</em></p>
<p align="left">मैंने इस पिक्चर को नहीं देखा है पर यह गाना मुझे बहुत पसन्द है। लेकिन किसी के पापा का केवल यह कहना या सोचना कि - बेटा ऐसा काम करेगा - पर्याप्त नहीं है। बेटा कोई अच्छा काम करे, इसके लिये पापा को बहुत कुछ करना पड़ेगा। अब यदि फाइनमेन के जीवन को देखें तो पायेंगे कि उसमें, उनके पिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उनको विज्ञान में रुचि पैदा करने में, उनके पिता का बहुत बड़ा हाथ था।</p>
<p>NBC टेलीविजन ने १९६१ में &#8216;About time&#8217; नामक फिल्म विज्ञान सीरीस के अर्न्तगत बनायी थी। फाइनमेन इसमें वैज्ञानिक सलाहकार थे। इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले जब इसके बारे में जब लिखा जाने लगा तो फाइनमेन से पूछा गया कि उन्हें विज्ञान मे किस प्रकार से रुचि आयी तो उन्होंने बताया कि,</p>
<blockquote><p>&#8216;My father, a businessman, had a great interest in science. He told me fascinating things about the stars, numbers, electricity, etc. Wherever we went there were always new wonders to hear about; the mountains, the forest, the sea. Before I could talk he was already interesting me in mathematical designs made with blocks. So I have always be a scientist. I have always enjoyed it, and thank him for this great gift to me.&#8217;<br />
मेरे पिता व्यपारी थे पर उन्हें विज्ञान में उन्हें रुचि थी।  वे मुझे विज्ञान की रोचक बातें बताते थे &#8230; इसलिये मैंने वैज्ञानिक बनने की सोची। मुझे इसमें हमेशा मजा आया और इसके लिये मैं अपने पिता को धन्यवाद देता हूं।</p></blockquote>
<p>१९८१ में रौडिनी ल्यूस को पत्र लिखते हुऐ फइनमेन बताते हैं कि नीरस पाठ्य पुस्तक से मत घबराओ। उनको केवल तथ्यों के लिये पढ़ो, फिर उन बातों को प्रकृति के आश्चर्य की तरह सोचो और अपनी तरह से समझने की कोशिश करो। वे आगे बताते हैं कि किस प्रकार उनके पिता ने उन्हें इस तरह से सोचने के लिये प्रेरित किया। वे कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>&#8216;My father taught me how to do that when I was a little boy on his knee and he read the Encyclopaedia Britannica to me! He would stop every once in a while and say—now what does that really mean. For example, “the head of tyrannosaurus rex was four feet wide, etc.” —it means if he stood on the long outside his head would look in at your bedroom on the second floor, and if the poked it in the window it would break casement on both sides. Then when I was a little older when would read that again he would remind me of how strong the next muscles had to be—of ratios of weight and muscle area—and why land animals can’t become size of whales—and why grasshoppers can jump just about as high as a horse can jump. All this, by thinking about the size of a dinosaur’s head!&#8217;</p></blockquote>
<p>सच, हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। उनको अच्छे संस्कार मिलना, उनका ठीक दिशा में रहना ही हमारी सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वे अच्छे व्यक्ति बने, इसका दायित्व हम पर है। पुरानी कहावत है,</p>
<blockquote><p> &#8216;पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय।&#8217;</p></blockquote>
<p>हम अक्सर अपने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हे अच्छी बातें बताना - जो कि सबसे महत्वपूर्ण है - भूल जाते हैं।</p>
<p align="center"><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.jpg" title="mischelle-1.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/mischelle-1.thumbnail.jpg" alt="mischelle-1.jpg" /></a></p>
<p align="center"><em>मिशेल का यह चित्र फइनमेन ने बनाया है</em></p>
<p align="center"><strong>गायब</strong></p>
<p> मैंने कुछ समय पहले दो चिट्ठियां &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/07/22/invisible-1/">अदृश्य हो जाने का वरदान</a>&#8216;, और &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/08/05/invisible-curse/">अदृश्य हो जाने का अभिशाप</a>&#8216; शीर्षक से छुटपुट चिट्ठे पर लिखीं। इसमें यह बताया कि अदृश्य हो जाना अभिशाप है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अन्धा हो जायेगा। लोग, अन्धे हो जाने वाली बात न समझते हुऐ, अदृश्य हो जाने कि इच्छा रखते हैं और इसके लिये तरीका ढूढते रहते हैं। नेवा नामक व्यक्ति ने एक बार फाइनमेन से यह सवाल पूछा कि क्या कोई तरीका है जिसके द्वारा अदृश्य हुआ जा सकता है। इसका उत्तर देते समय फाइनमेन अगस्त १९७५ लिखते हैं कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;I would suggest that the best way to get a good answer to your question is to ask a first-rate professional magician. I do not mean this answer to be facetious or humorous, I am serious. A magician is very good at his making things appear in an unusual way without violating any physical laws, by arranging matter in a suitable way. I know of no physical phenomenon such as X-rays, etc., which will create invisibility as you want, therefore, if it is possible at all it will be in accordance with familiar physical phenomenon. That is what a first-rate magician is good for, to create apparently impossible effect from “ordinary” causes.&#8217;</p></blockquote>
<p>इसका अर्थ तो यह हुआ कि असंभ्व है।</p>
<p align="center"><strong>मानद उपाधि</strong></p>
<p> आजकल मानद उपाधि का जमाना है। जिस विश्व विद्यालय को देखो वही दे रहा है और सब इसे स्वीकार कर रहें हैं। फाइनमेन को दुनिया के हर देश के विश्वविद्यालय मानद उपाधि से विभूषित करना चाहते थे। १९६७ में, सबसे पहले शिकागो विश्व विद्यालय ने उन्हें मानद उपाधि से विभूषित करने की बात की। उन्होने इसे अपने लिये सम्मान की बात बतायी, पर स्वीकारा नहीं। उनका कहना था कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;I remember the work I did to get a real degree at Princeton and the guys on the same platform receiving honorary degrees without work — and felt an “honorary degree” was a debasement of the idea of a “degree which confirms certain work has been accomplished.” It is like giving an “honorary electrician license”. I swore then that if by chance I was ever offered one I would not accept it.&#8217;</p></blockquote>
<p>जब कभी कोई उन्हे मानद उपाधी देने की बात करता, तो हमेशा उनका यही जवाब रहता था।</p>
<p align="center"><strong>खेलो, कूदो और सीखो</strong></p>
<p> जीवन में हमें वह करना चाहिये जो हमें पसन्द हो - चाहे उसका कोई महत्व हो अथवा नहीं। महत्व अपने आप निकल आता है। मैंने फाइनमेन के बारे में लिखते समय वह किस्सा बताया था जब वे कॉरनल विश्विद्यालय के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे २:१ का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,</p>
<blockquote><p> &#8216;इसका कोई महत्व नहीं है मैं यह सब मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।&#8217;</p></blockquote>
<p>लेकिन जब वे एलेक्ट्रॉन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कॉरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी</p>
<p><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg" title="feynman-1.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.thumbnail.jpg" alt="feynman-1.jpg" align="right" /></a></p>
<p>गणित फिर से याद आने लगी। उस काम का महत्व हो गया। उसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला।</p>
<p><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg" title="feynman-1.jpg"><br />
</a></p>
<p><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-1.jpg" title="feynman-1.jpg"> </a></p>
<p>उन्होने इस बात को न केवल अपने जीवन में उतारा पर यही सलाह औरों को भी दी।</p>
<p>एक बार सोलह साल के लड़के ने उन्हें पत्र लिख कर यह सलाह मांगी कि वह क्या करे। उनका जवाब था कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;It is wonderful if you can find something you love to do in your youth which is big enough to sustain your interest through all your adult life. Because, whatever it is, if you do it well enough (and you will, if you truly love it) people will pay you to do what you want to do anyway.&#8217;</p></blockquote>
<p>उनके मुताबिक,</p>
<ul>
<li> बहुत ज्यादा पढ़ना; या</li>
<li> किताबी कीड़ा बना रहना; या</li>
<li> अपने उम्र से ज्यादा पढ़ाई करना,</li>
</ul>
<p>ठीक नहीं।</p>
<p>वे देखने और सीखने में विश्वास करते थे। एक बार , एक भारतीय बच्चे ने उन्हें एक पत्र परमाणु विज्ञान के बारे में लिखा। उनकी सलाह थी,</p>
<blockquote><p> &#8216;Your discussion of atomic forces shows that you have read entirely too much beyond your understanding. What we are talking about is real and at hand: Nature. Learn by trying to understand simple things in terms of other ideas—always honestly and directly. What keeps the clouds up, why can’t I see stars in the day time, why do colours appear on oily water, what makes the lines on the surface of water being poured from a pitcher, why does a hanging lamp swing back and forth - and all the innumerable little things you see all around you. Then when you have learn to explain simpler things, so you have learn what an explanation really is, you can then go on to more subtle questions.<br />
Do not read so much, look about you and think what you see there.&#8217;<br />
तुम्हारी बातों से लगता है कि तुमने अपनी समझ से ज्यादा पढ़ लिया है &#8230; इतना मत पढ़ो, अपने चारों तरफ देखो और इसके बारे में सोचो।</p></blockquote>
<p>बचपन में बड़े, बूढ़ों से सुना करता था,</p>
<blockquote><p>&#8216;खेलो कूदोगे तो होगे बर्बाद,<br />
पढ़ोगे लिखोगे तो होगे नवाब।&#8217;</p></blockquote>
<p>शायद इसे इस तरह से कहना चाहिये,</p>
<blockquote><p> &#8216;खेल, कूद कर सीखोगे,<br />
केवल तब ही बनोगे, नवाब।&#8217;</p>
<p><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.jpg" title="feynman-3.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-3.thumbnail.jpg" alt="feynman-3.jpg" align="right" /></a></p>
<p align="right"><em>फाइनमेन को बॉंगो बजाना प्रिय था</em></p>
</blockquote>
<p align="center"><strong>अधिकारी, विशेषज्ञ</strong></p>
<p> फाइनमेन का हमेशा कहना था कि किसी बात को तब स्वीकार करो जब वह तर्क पर खरी उतरे, उसे केवल किसी के कहने पर न स्वीकार करो। १९७६ में मार्क को पत्र लिखते समय सलाह दी कि,</p>
<blockquote><p>&#8216;Don’t pay attention to “authorities,” think yourself.&#8217;</p></blockquote>
<p>अपनी पुस्तक Lectures on Physics में एक जगह उन्होने लिखा था कि</p>
<blockquote><p> &#8216;No static distribution of charges inside a closed conductor can produce any electric field outside.&#8217;</p></blockquote>
<p>एलिज़बेथ ने भौतिक शास्त्र में एक कोर्स लिया था। परीक्षा में एक सवाल का यही जवाब दिया। इस पर उसके शिक्षक ने उसे कोई नम्बर नहीं दिया क्योंकि यह बात गलत थी। शिक्षक ने एलिज़बेथ को यह भी बताया कि यह किस प्रकार से गलत है। एलिज़बेथ ने जब इसके बारे में फाइनमेन को पत्र लिखा। तो फाइनमेन का जवाब था,</p>
<blockquote><p>&#8216;Your instructor was right not to give you any points for your answer was wrong, as he [the teacher] demonstrated using Gauss’ Law. You should, in science, believe logic and arguments, carefully drawn, and not authorities.<br />
&#8230;<br />
You also read the book correctly and understood it. I made a mistake, so the book is wrong &#8230; I am not sure how I did it, but I goofed. And you goofed too, for believing me.<br />
तुम्हारे अध्यापक ने ठीक तुम्हें नंबर नहीं दिये क्योंकि तुम्हारा जवाब सही नहीं था   विज्ञान में तुम्हे तर्क पर विश्वास करना चाहिये न कि किसी अधिकारी,या विशेषज्ञ पर। &#8230;<br />
तुमने मेरी किताब को सही समझा, मैंने ही गलती कर दी थी &#8230; मैं नहीं जानता कि यह कैसे हो गया पर मैं गलत था और तुम भी - मुझ पर विश्वास करने के लिये।</p></blockquote>
<p>बड़े व्यक्तियों का पहला गुण – यदि वे गलत हैं, तो स्वीकार करने में कभी नहीं हिचकते।</p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/HKTSaezB4p8/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>बॉंगो बजाते हुऐ फइनमेन</em></p>
<p align="center"><strong>काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है</strong></p>
<p> हम सब के जीवन में कोई न कोई आदर्श रहा है। मेरे जीवन में - एक नहीं, कई रहे। उन्होने अलग अलग तरह से मेरे जीवन, मेरी विचारधारा पर असर डाला। इनमे से कईयों से कभी नहीं मिला। फाइनमेन उनमें से एक थे। उनके मुताबिक काम से ज्यादा महत्व उसे करने में है: जो अच्छा लगे, जिसमें मन लगे - वह करो पर करो उसे बढ़िया।</p>
<p align="right">&nbsp;</p>
<p>एक बार कोची नामक एक विद्यार्थी ने फाइनमेन को पत्र लिखा कि वह भौतिक शास्त्र के साधारण विषय पर काम कर कर रहा है और नामरहित है। इस पत्र ने फइनमेन को दुखी किया। उन्हें लगा कि कोची के अध्यापक ने उसे ठीक से नहीं बताया कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं है। फाइनमेन ने कोची को पत्र लिखा कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;The worthwhile problems are the once you can really solve or help solve, the ones you can really contribute something to. A problem is grand in science if it lies before us unsolved and we see some way for us to make a little headway into it.&#8217;</p></blockquote>
<p>फाइनमेन का सुझाव था कि पहले छोटी छोटी और आसान मुश्किलों का हल खोजो जो कि आसानी से मिल सकता है। उनके मुताबिक,</p>
<blockquote><p> &#8216;You will get the pleasure of success, and of helping your fellow man, even if it is only to answer a question in the mind of a colleague less able than you. You must not take away from yourself these pleasures because you have some erroneous idea of what is worthwhile.&#8217;</p></blockquote>
<p>फाइनमेन ने पत्र में यह भी बताया कि उन्होने स्वयं,</p>
<blockquote><p> &#8216;I have worked on innumerable problem that you would call humble, but which I enjoyed and felt very good about because I sometimes could partially succeed.&#8217;</p></blockquote>
<p>फाइनमेन का मानना था कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;You do any problem that you can, regardless of field.&#8217;</p></blockquote>
<p>न तो सरदर्द लेने की जरूरत है न ही घबराने की - कयोंकि,</p>
<blockquote><p> &#8216;In no field is all the research done. Research leads to new discoveries and new questions to answer by more research.&#8217;</p></blockquote>
<p>उनके अनुसार,</p>
<blockquote><p> &#8216;No problem is too small or too trivial if we can really do something about it.&#8217;<br />
यदि हम किसी मुश्किल का हल ढूढ़ने में कुछ कर सकते हैं तो वह न तो छोटी है और न ही बेकार।</p></blockquote>
<p>पत्र में फानमेन, आगे लिखते हैं कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;You say you are a nameless man. You are not to your wife and to your child. You will not long remain so to your immediate colleagues if you can answer their simple question when they come into your office. You are not nameless to me. Do not remain nameless to yourself — it is too sad a way to be. Know your place in the world and evaluate yourself fairly, not in terms of the naïve ideals of your own use, nor in terms of what you erroneously imagine your teacher’s ideals are.&#8217;</p></blockquote>
<p align="center"><strong>गणित</strong></p>
<p> भौतिक शास्त्र मेरा प्रिय विषय था। <a href="http://www.blogger.com/profile/15090591980327578036">मुन्ने की मां</a> को गणित अच्छी लगती है। मैं हमेशा कहता हूं कि भौतिक शास्त्र तो रानी है और गणित नौकरानी - जहां चाहो लगा लो।</p>
<p><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/"><img src="http://img.youtube.com/vi/hRAbke411Zw/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p align="center"><em>फाइनमेन तो जिज्ञासू थे। उनके कुछ अन्य विडियो <a href="http://www.youtube.com/results?search_query=richard+feynman&amp;search=Search">यहां </a>देखिये।</em></p>
<p>फ्रेड्रिक हिप्प १६ साल के नवयूवक ने १९६१ में फाइनमेन को पत्र लिख कर बताया कि भौतिक शास्त्र उसे अच्छा लगता है पर गणित पसंद नहीं आती है। वह क्या करे। फाइनमेन ने उसे लिखा कि,</p>
<blockquote><p> &#8216;To do any important work in physics a very good mathematical ability and aptitude are required. Some work in applications can be done without this, but it will not be very inspired.<br />
If you must satisfy your “personal curiosity concerning the mysteries of nature” what will happen if these mysteries turn out to be laws expressed in mathematical terms (as they do turn out to be )? You cannot understand the physical work in any deep or satisfying way without using mathematical reasoning with facility.&#8217;<br />
भौतिक शास्त्र में अच्छा काम करने के लिये अच्छी गणित का ज्ञान होना आवश्यक है &#8230; विज्ञान के बहुत सारे रहस्य, वे नियम हैं जो गणित के द्वारा ही समझे जा सकते हैं।  भौतिक विज्ञान को अच्छी तरह से बिना गणित के नहीं समझा जा सकता है।</p></blockquote>
<p>गणित के यही गुण उसे गणित को राजरानी बनाते हैं। विज्ञान में गणित के बिना ठौर नहीं। मुझे तो मालुम है कि मुन्ने की मां तो हमेशा सही रहती है, उससे जीत पाना संभव नहीं।</p>
<p><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.jpg" title="feynman-2.jpg"></a></p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.jpg" title="feynman-2.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/11/feynman-2.thumbnail.jpg" alt="feynman-2.jpg" height="107" width="141" /></a></p>
<p align="center"><em>कैल टेक में पढ़ाते हुऐ</em></p>
<p>इस पुस्तक ने मुझे कई बातों की याद दिलायी:</p>
<ul>
<li> मेरे बचपन की;</li>
<li> कई ऐसे व्यक्तियों की जिन्होने मेरे बचपन में, मुझ पर सबसे ज्यादा असर डाला;</li>
<li> कुल्लू मनाली में एक बिस्किट के पीछे, पूरी नदी पैदल पार करने की;</li>
<li> उन क्षणों की भी, जो मैंने अपने बच्चों के साथ पहेली बूझते हुऐ बिताये;</li>
<li> उनके साथ बिताये, नदी के किनारे तारों, लियोनिडस्, और पुच्छल तारे को देखते हुऐ रातों की;</li>
<li> उनके साथ बिताये, दुधुवा, जिम कौर्बेट, कान्हा, बान्धवगढ़, मदुमलाई, और बंदीपुर के जंगलों की;</li>
<li> उन पिकनिकों की, जिसमें हमने सारा समय केकड़े और मछलियां पकड़ने में बिता दिया;</li>
<li> मेले में उन रातों की, जो हमने हांथ की रेखायें पढ़ने, और नौटंकी , जादू देखने में गुजार दिये;</li>
<li> पंचमढ़ी के जंगलों की, जब हम पानी के झरने के लिये छोटे रास्ते पर चलते जंगल में खो गये थे;</li>
<li> पंचमढ़ी में पीछा करती मधुमक्खियों की, जिससे पानी के झरने में कूद कर जान बचायी;</li>
<li> बम्बई में गोरे गांव में मिल्क डेरी की, जहां पर रेलिंग ही मुन्ने के उपर गिर गयी और बस हमें वहीं छोड़ के चली गयी, तब कई किलोमीटर की दूरी मुन्ने को गोदी में ले जाने की;</li>
<li> चुनाव में उस उपद्रव की, जब चुनाव की निष्पक्षता कराने के पीछे मेरा सर पर अध्धा मार दिया गया, पांच टीके लगे, और मैं अब भी नहीं समझ पाता कि में उस दिन कैसे बच गया;</li>
<li> उस सभा की जब अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के खिलाफ बोलने पर लोग चप्पल से मारने मंच पर आ गये।</li>
</ul>
<p>यह आपको भी कुछ ऐसी ही यादों पर वापस ले जायगी।</p>
<p>इस पुस्तक में फाइनमेन के लिखे हुये बहुत सारे पत्र हैं, जिससे उनके चरित्र के बारे में पता चलता है और यह पुस्तक बेशक पढ़ने योग्य है।</p>
<p align="center"><em>यह लेख मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुका है जिसकी पहली कड़ी <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think.html">यहां </a>और अन्तिम <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/time-to-think_23.html">यहां</a> है। आप अन्तिम कड़ी से बाकी सारी कड़ियों पर जा सकते हैं।</em></p>
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		<title>आज की दुर्गा - महिला सशक्तिकरण</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 16:31:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[कानून]]></category>

		<category><![CDATA[gender justice]]></category>

		<category><![CDATA[women empowerment]]></category>

		<category><![CDATA[women rights]]></category>

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		<description><![CDATA[यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की  कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। 
दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="center"><em>यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की  कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। </em></p>
<p>दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। पुराणों में उसका वर्णन है - उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है।  ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।</p>
<p>मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है।  शक्ति, संघटन की एकता  में ही है। हमारी कथाओं में देवी दुर्गा का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं। यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं।  साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।</p>
<p>दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है? शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई। यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं। आइये नजर डाले उन किस्से कहानियों पर, उस कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्होने  महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और कुछ हद्द तक महिलाओं को दुर्गा का रूप दिया पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।</p>
<p align="center"><strong>महिला दिवस (women&#8217;s day)</strong></p>
<p>अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा।  १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल  के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।</p>
<p>१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े  के  लिये हड़ताल  पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार  २३ फरवरी को था  जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है।   इसी लिये ८ मार्च,  महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।</p>
<p>महिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द लैंगिक न्याय (Gender Justice)  प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। आइये समझें कि  हमारे देश इस समय  यह किस अर्थ में लिया जाता है।</p>
<p align="center"><strong>लैंगिक न्याय (Gender Justice)</strong></p>
<p>लैंगिक न्याय अर्थात किसी के साथ लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होना चाहिये। बहुत से लोग समलैंगिक अधिकारों को भी इसके अन्दर मानते हैं।  समलैगिंकों के साथ भेदभाव  होता है लेकिन  वह इसलिये नहीं कि उनका लिंग क्या है वह इसलिये कि वे अपने लिंग के ही लोगों में रूचि रखते हैं।  मेरे विचार से, समलैंगिग अधिकारों को लैंगिक न्याय के अन्दर रखना उचित नहीं है। उनके अधिकारों को अलग से नाम देना, या अल्पसंख्यक (Minority) या जातीय (ethnic) अधिकारों के अन्दर रखना, या Gay rights कहना ठीक होगा।</p>
<p>हम कुछ अन्य श्रेणी के व्यक्तियों के अदिकारों पर भी विचार करें, उदाहरणार्थः</p>
<ol>
<li> Trans- Sexual:  यह वह लोग हैं जो एक लिंग के होते हैं पर बर्ताव दूसरे लिंग के व्यक्तियों की तरह से करते हैं;</li>
<li> Trans gendered:  लिंग परिवर्तित:  यह वह व्यक्ति हैं जो आपरेशन करा कर अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इसमें सबसे चर्चित व्यक्ति रहे रीनी रिचर्डस्। ये पुरुष थे और आपरेशन करा कर महिला बन गये,  पर उन्हें महिलाओं की  टेनिस प्रतियोगिता में कभी भी खेलने नहीं दिया गया। उन्हें कुछ सम्मान तब मिला जब वे मार्टीना नवरोतिलोवा की कोच बनीं। मैंने इस तरह के लोगों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/06/trans-gendered.html">Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री</a> कि चिट्ठी पर लिखा है;</li>
<li> Inter-Sex बीच के: लिंग डिजिटल नहीं है। मानव जाति को  केवल  पुरूष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं। हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम (chromosome) तय करते हैं। यह जोड़े में आते हैं। हम में क्रोमोसोम के २३ जोड़े रहते हैं। हम पुरूष हैं या स्त्री, यह २३वें जोड़े पर निर्भर करता है। महिलाओं में यह दोनों बड़े अर्थात XX होते हैं पुरूषों में एक बड़ा एक छोटा यानि कि XY रहते हैं। अक्सर प्रकृति अजीब खेल खेलती है। कुछ व्यक्तियों में २३वें क्रोमोसोम जोड़े में नहीं होते:   कभी यह तीन या केवल एक होते हैं अर्थात XX,Yया XYY, या X, या Y. यह लोग पूर्ण पुरूष या स्त्री तो नहीं कहे जा सकते - शायद बीच के हैं। इसलिए इन्हें Inter-Sex कहा जाता है। संथी सुन्दराजन शायद इसी प्रकार की हैं। इसलिये दोहा  एशियाई खेलो में, उनसे रजत पदक वापस ले  लिया गया।</li>
</ol>
<p>ऊपर वर्णित तीनो तरह के व्यक्तियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव होता है। अधिकतर जगह,  यह लोग  हास्य के पात्र बनते हैं। इन्हें भी न्याय पाने का अधिकार है। पर अपने देश में लैंगिक न्याय का प्रयोग केवल महिलाओं के साथ न्याय के संदर्भ में किया जाता है और हम बात करेंगे महिलाओं के साथ न्याय, उनके सशक्तिकरण की: आज की  दुर्गा की।</p>
<p align="center"><strong>संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज</strong></p>
<p>हमारे संविधान का अनुच्छेद १५(१), लिंग के आधार पर भेदभाव करना प्रतिबन्धित करता है पर अनुच्छेद १५ (२) महिलाओं और बच्चों के लिये अलग नियम बनाने की अनुमति देता है। यहीं कारण है कि महिलाओं और बच्चों को हमेशा वरीयता दी जा सकती है।</p>
<p>संविधान में ७३वें और ७४वें  संशोधन के द्वारा स्थानीय निकायों को स्वायत्तशासी  मान्यता दी गयी । इसमें यह भी बताया गया कि इन निकायों का किस किस प्रकार से गठन किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद  २४३-डी और  २४३-टी के अंतर्गत, इन निकायों के   सदस्यों एवं उनके प्रमुखों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए  सुरक्षित की गयीं हैं। यह सच है कि इस समय इसमें चुनी महिलाओं का काम, अक्सर उनके पति ही करते हैं पर शायद एक दशक बाद यह दृश्य बदल जाय।<br />
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। हमारे देश में इसका प्रयोग उस तरह से नही किया जा रहा है जिस तरह से किया जाना चाहिये। अभी उपभोक्ताओं में और जागरूकता चाहिये। इसके अन्दर हर जिले में उपभोक्ता मंच (District Consumer Forum) का गठन किया गया है। इसमें  कम से कम एक महिला सदस्य होना अनिवार्य है {(धारा १०(१)(सी), १६(१)(बी) और २०(१)(बी)}।</p>
<p>परिवार न्यायालय अधिनियम के अन्दर परिवार न्यायालय का गठन किया गया है। पारिवारिक विवाद के मुकदमें इसी न्यायालय के अन्दर चलते हैं। इस अधिनियम की धारा ४(४)(बी) के अंतर्गत, न्यायालय में न्यायगण की नियुक्ति करते समय, महिलाओं को वरीयता दी गयी है।</p>
<p>अंर्तरार्ष्टीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Convention of Elimination of Discrimination Against Women (CEDAW) (सीडॉ) है। सन १९७९ में, संयुक्त राष्ट्र ने  इसकी पुष्टि की। हमने भी इसके अनुच्छेद ५(क), १६(१), १६(२), और २९ को छोड़, बाकी सारे अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया है।  संविधान के अनुच्छेद ५१ के अंतर्गत न्यायालय अपना फैसला देते समय या विधायिका कानून बनाते समय, अंतर्राष्ट्रीय संधि (Treaty) का सहारा ले सकते हैं।  इस लेख में आगे  कुछ उन फैसलों  और कानूनों की चर्चा रहेगी जिसमें सीडॉ का सहारा लिया गया है।</p>
<p align="center"><strong>व्यक्ति शब्द पर ६० साल का विवाद</strong></p>
<p><strong> भूमिका</strong><br />
हमारा समाज पुरुष प्रधान है। इसके मानक पुरुषों के अनुरूप रहते हैं। तटस्थ मानकों की भी व्याख्या, पुरुषों के अनुकूल  हो जाती है। कानून में हमेशा माना जाता है कि जब तक कोई खास बात न हो तब तक पुलिंग में, स्त्री लिंग सम्मिलित माना जायेगा।  कानून में कभी कभी पुलिंग, पर अधिकतर तटस्थ शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जैसे कि &#8216;व्यक्ति&#8217;। अक्सर कानून कहता है कि, यदि किसी &#8216;व्यक्ति&#8217; (person),</p>
<ul>
<li> की उम्र &#8230;.. साल है तो वह वोट दे सकता है,</li>
<li> ने   &#8212;- साल ट्रेनिंग ले रखी है तो वह वकील बन सकता है,</li>
<li> ने विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की है तो वह उसके विद्या परिषद (Academic council) का सदस्य बन सकता है,</li>
</ul>
<p>को गवर्नर जनरल, सेनेट का सदस्य नामांकित कर सकता है।</p>
<p>ऐसे कानून पर अमल करते समय, अक्सर यह सवाल उठा करता था कि इसमें &#8216;व्यक्ति&#8217; शब्द की क्या व्याख्या है। इसके अन्दर हमेशा पुरूषों को ही व्यक्ति माना गया, महिलाओं को नहीं। यह भी अजीब बात है। भाषा, प्रकृति तो महिलाओं को व्यक्ति मानती है पर कानून नहीं।  महिलाओं को, अपने आपको, कानून में व्यक्ति मनवाने के लिए  ६० साल की लड़ाई लड़नी पड़ी और  यह  लड़ाई शुरू हुई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से।</p>
<p><strong>व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय</strong></p>
<p>इस बारे में सबसे पहला प्रकाशित निर्णय Chorlton Vs. Lings (१८६९) का है । इस केस में कानून में पुरूष शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय और इस समय भी, इंगलैंड में यह नियम था कि  पुलिंग में, स्त्री लिंग भी शामिल है। इसके बावजूद यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियां को वोट देने का अधिकार नहीं है। इंगलैण्ड के न्यायालयों में इसी तरह के फैसले होते रहे जिसमें न केवल पुरूष ब्लकि व्यक्ति शब्द की व्याख्या करते समय, महिलाओं को इसमें सम्मिलित नहीं माना गया। जहां व्यक्ति शब्द का भी प्रयोग किया गया था वहां भी महिलाओं को व्यक्ति में शामिल नहीं माना गया। इन मुकदमों में Bressford Hope Vs. Lady Sandhurst (1889), Ball Vs. Incorp, society of Law Agents (1901) उल्लेखनीय है । 1906  में  इंगलैण्ड की सबसे बड़ी अदालत हाउस आफ लॉर्डस ने Nairn Vs. Scottish University में यही मत दिया। यही विचार वहीं की अपीली न्यायालय ने Benn Vs. Law Society (१९१४) में व्यक्त किये।</p>
<p>इंगलैंड में यही क्रम जारी रहा। इन न्यायालयों में लड़ाई के अतिरिक्त वहां समाज में भी यह मांग उठी कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिले। भारत के पूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन भी महिलाओं को वोट का अधिकार देने के विरोधी खेमी में थे। उनका तो यहां तक कहना था कि यदि भारत के लोगों को पता चलेगा कि इंगलैण्ड की सरकार महिलाओं के वोट पर बनी  है तो भारतवासी उस सरकार पर वह विश्वास करना छोड़ देगें। इंगलैंण्ड में महिलायें वोट देने के अधिकार से १९१८ तक वंचित रहीं। उन्हें इसी साल कानून के द्वारा वोट देने का अधिकार मिला। इंगलैण्ड में स्त्रियों के साथ बाकी भेदभाव लैंगिक अयोग्यता को हटाने के लिए १९१९ में बने अधिनियम  से हटा।</p>
<p><strong>व्यक्ति शब्द पर अमेरिका में कुछ निर्णय</strong></p>
<p>अमेरिका तथा अन्य देशों में व्यक्ति शब्द की व्याख्या का इतिहास कुछ अलग नहीं था।  अमेरिकी  उच्चतम न्यायालय ने Bradwell Vs. Illinois (१८७३) में व्यवस्था दी है कि विवाहित महिलायें व्यक्ति की श्रेणी में नहीं हैं और वकालत नहीं कर  सकतीं। इसके दो वर्ष बाद ही Minor Vs. Happier Sett  के केस में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने यह तो माना  कि महिलाएं नागरिक  हैं पर यह भी  कहा कि वे विशेष श्रेणी की नागरिक हैं और उन्हें मत  डालने का अधिकार नहीं हैं।  अमेरिका में २१ वर्ष से ऊपर की महिलाओं को मत देने की अनुमति अमेरिकी संविधान के १९वें संशोधन (१९२०) के द्वारा ही मिल पायी।</p>
<p><strong>व्यक्ति शब्द पर दक्षिण अफ्रीका में कुछ निर्णय</strong></p>
<p>इस विवाद के परिपेक्ष में, दक्षिण अफ्रीका का जिक्र करना जरूरी है। यहां पर इस तरह के पहले मुकदमे Schle Vs. Incoroporated Law Society (1909) , में महिलाओं को व्यक्ति शब्द में नहीं शामिल किया गया और उन्हें वकील बनने का हकदार नहीं माना गया। पर केपटाउन की न्यायालय ने १९१२  में माना कि  महिलाएं &#8216;व्यक्ति&#8217; शब्द में शामिल हैं और वकील बनने की हकदार हैं। कहा जाता है कि इस तरह का यह एक पहला फैसला था। लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चला। यह निर्णय  अपीलीय न्यायालय  द्वारा Incorporated Law Society Vs. Wookey (1912) में  रद्द कर दिया गया । इस अपीलीय न्यायालय के फैसले का आधार  यही था कि महिलाएं व्यक्ति शब्द की व्याख्या में नहीं आती हैं।</p>
<p><strong>व्यक्ति शब्द पर विवाद का अन्त</strong></p>
<p>इस विवाद का अन्त  कनाडा के एक मुकदमे Edwards Vs. Attorney General में हुआ। कनाडा के गर्वनर जनरल को सेनेट में किसी व्यक्ति को नामांकित करने का अधिकार था। सवाल उठा कि क्या वे किसी महिला को नामांकित कर सकते हैं। कैनाडा के उच्चतम न्यायालय ने सर्व सम्मति से निर्णय लिया कि महिलायें व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं। इसलिये वे नामित नहीं हो सकती हैं। इस फैसले के खिलाफ अपील में, प्रिवी कांऊसिल ने स्पष्ट  किया है कि, &#8216;व्यक्ति शब्द में स्त्री-पुरूष दोनों हो सकतें हैं और यदि कोई कहता है कि व्यक्ति शब्द में स्त्रियों को क्यों शामिल किया जाय तो  जवाब है कि &#8220;क्यों नहीं&#8221;?&#8217; लेकिन यह वर्ष १९२९ में हुआ। आइये देखें कि अपने देश में क्या हुआ।</p>
<p><strong>व्यक्ति शब्द पर भारतीय में कुछ निर्णय: कलकत्ता और पटना उच्च न्यायालय</strong></p>
<p>अपने देश में भी &#8216;व्यक्ति&#8217; शब्द की व्याख्या करने वाले मुकदमे हुए हैं। पहले वकील नामांकित करने का काम  उच्च न्यायालय करता था। अब यह काम बार कौंसिल करती है। वकील नामांकित करन के लिए लीगल प्रैक्टिशनर अधिनियम हुआ करता था इसमें &#8216;व्यक्ति&#8217; शब्द का इस्तेमाल किया गया था। महिलाओं ने इसी अधिनियम के अन्दर वकील बनने के लिए कलकत्ता एवं पटना उच्च न्यायालयों में आवेदन पत्र दिया।  कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्यायमूर्ति की पूर्ण पीठ ने १९१६ में {In re Reging Guha (ILR 44 Calcutta 290= 35 IC 925)} तथा पटना उच्च न्यायालय की तीन न्यायमूर्तियों की  पूर्ण पीठ ने १९२१ में {In re Sudhansu Bala Mazra (A.I.R. 1922 Patna 269) } ने निर्णय दिया कि  महिलाएं व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं और उनके आवेदन को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद यह प्रश्न नहीं उठा क्योंकि १९२३ में The Legal Practitioners (Women) Act के द्वारा महिलाओं के खिलाफ इस भेदभाव को दूर कर दिया गया। पर क्या किसी उच्च न्यायालय ने महिलाओं के पुराने कानून में व्यक्ति होना माना। जी हां-वह है इलाहाबाद उच्च न्यायालय।</p>
<p><strong>इलाहाबाद उच्च न्यायालय - क्रॉर्नीलिआ सोरबजी (Cornelia Sorabjee)</strong></p>
<p>क्रॉर्नीलिआ सोरबजी, एक पारसी महिला थीं। उनका भाई बैरिस्टर था और वह इलाहाबाद वकालत करने आया। वह उसी के साथ उसके घर का रख-रखाव करने आयीं। उन्हें वकालत का पेशा अच्छा लगा और उन्होंने वकालत करने की ठानी। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने अपना आवेदन पत्र वकील बनने के लिये दिया जो पहले खारिज कर दिया गया पर उनका १ अगस्त १९२१ को  वकील की तरह नामित करने के लिये दिया गया आवेदन पत्र, ९ अगस्त १९२१ में स्वीकार हुआ।  यह नामांकन उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक में हुआ था इसलिए यह प्रकाशित नहीं है पर पटना उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये फैसले में इसका तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ कुछ इस तरह से उल्लिखित है।</p>
<blockquote><p>&#8216;A recent instance has been brought to our notice where a lady (Miss Sorabjee) has been enrolled as a vakil of the Allahabad High Court. This was done by a decision of the English meeting of the Court consisting of the Chief Justice and the Judged present in Allahabad, under R.15 of Chap.XV of the Allahabad High Court Rules. In matters of practice, however, we generally follow the tradition of the Calcutta High Court and we do not think that we can deviate from  the decision of that Court passed on the 29th of August 1916 in Regina Guha&#8217;s case only a few months after the creation of our High Court.</p>
<p>No doubt, the recent admission of Miss Sorabjee in the Allahabad High Court might create some anomaly, inasmuch as ladies enrolled as vakils in the Allahabad High Court may claim to practise in occasional cases in the Courts subordinate to this Court under Sec.4 of the Legal Practitioners Act, although no lady will be permitted to be enrolled in our own High Court. This again is a very good ground for changing the present law.&#8217;</p></blockquote>
<p>क्रॉर्नीलिआ सोरबजी &#8216;व्यक्ति&#8217; शब्द के अन्दर नामांकित होने वाली  भारत की ही पहली महिला नहीं, बल्कि व्यक्ति खण्ड के अधीन दुनिया में कहीं भी नामांकित होने वाली पहली महिला थीं। दक्षिण अफ्रीका का मात्र एक पहला मुकदमा ज्यादा दिन तक नहीं चला। वह उसी वर्ष निरस्त कर दिया गया । क्रोनीलिआ से पहले भी कई महिलायें नामांकित हुई हैं लेकिन वे विशेष कानून की वजह से हुआ था जिसमें महिलाओं को वकील बनने का अलग से अधिकार  दिया गया था।</p>
<p><a title="cornelia-book-cover.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/10/cornelia-book-cover.jpg"></a><a title="cornelia-book-cover.jpg" href="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/10/cornelia-book-cover.jpg"><img src="http://unmukth.files.wordpress.com/2007/10/cornelia-book-cover.jpg?w=98&h=141" alt="cornelia-book-cover.jpg" width="98" height="141" /></a></p>
<p>सुश्री सुपर्णा गुप्तू (Suparna Gooptu) ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी की जीवनी Cornelia Sorabjee – India&#8217;s Pioneer Woman lawyer नाम से लिखी है इसे Oxford University Press ने प्रकाशित किया है। इसमें वे कहती हैं कि  क्रॉर्नीलिआ सोरबजी समाज सेविका तो थी पर वे अंग्रेजी हूकूमत की समर्थक भी थी। इस पुस्तक में लिखा है कि वे ३० अगस्त को १९२१ को नामांकित की गयी थीं तथा <a href="http://www.allahabadhighcourt.in/event/AdventOfWomenInTheProfessionMrsRDGupta.html">यहां</a> लिखा है कि वे २४ अगस्त को नामांकित की गयी थीं पर शायद दोनो बात सही नहीं हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक जिसमें उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया गया वह ९ अगस्त १९२१ को हुई  थी पर उच्च न्यायालय  ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी को इस बात के लिये पत्र दिन्नाक ३० अगस्त १९२१ को भेजा था।  यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि चाहे  जो भी तारीख हो   वे इस तरह की पहली महिला थीं।</p>
<p align="center"><strong>स्वीय विधी (Personal Law)</strong></p>
<p>लिंग के आधार पर सबसे ज्यादा भेद-भाव Personal Law में दिखाई देता है और इस भेदभाव को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है कि समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code)  बनाया जाय।</p>
<p>हमारे संविधान का भाग चार का शीर्षक है - &#8216;राज्य की नीति के निदेशक तत्व&#8217; (Directive Principles of the State policy)। इसके अंतर्गत रखे गये सिद्घान्त, न्यायालय द्वारा क्रियान्वित  (Enforce) नहीं किये जा सकते हैं पर  देश को चलाने में उन पर  ध्यान रखना आवश्यक है । अनुच्छेद ४४ इसी भाग में है। यह अनुच्छेद कहता है कि हमारे देश में समान सिविल संहिता बनायी जाय पर इस पर पूरी तरह से अमल नहीं हो रहा है।</p>
<p>हमारे संविधान के भाग तीन का शीर्षक है - मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)।  इनका क्रियान्वन (enforcement) न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। इस समय न्यायपालिका के द्वारा मौलिक अधिकारों और राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में संयोजन हो रहा है। न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की व्याख्या करते हुये राज्य की नीति के निदेशक तत्वों की सहायता ले रहे हैं। बहुत सारे लोग न्यायालयों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह देश में समान सिविल संहिता के लिये बड़ा कदम उठाए। उनके मुताबिक:</p>
<ul>
<li> संविधान के अनुच्छेद १३ के अंतर्गत स्वीय विधि (Personal Law) और किसी दूसरे कानून  में कोई अन्तर नहीं है। यदि  स्वीय विधि (Personal Law) में भेदभाव  है तो न्यायालय उसे अनुच्छेद १३ शून्य घोषित  कर सकता है।</li>
<li> स्वीय विधि, संविधान के अनुच्छेद १४ तथा १५ का उल्लंघन करते हैं और उन्हें निष्प्रभावी घोषित किया जाना  चाहिये।</li>
<li> संसद, राजनैतिक कारणों से इस बारे में कोई कानून नहीं बना पा रही है इसलिये न्यायालय को आगे आना चाहिये।</li>
</ul>
<p>न्यायपालिका ने इस दिशा में एक और कदम Sarla Mudgal Vs. Union of India वा Madhu Kishwar Vs. State of Bihar में  उठाया था पर इस कदम को  Ahmedabad Women Action Group (AWAG) Vs. Union of India  में यह कहते हुये वापस ले लिया कि,</p>
<blockquote><p>&#8216; यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है जिससे सामान्यत: न्यायालय का कोई संबंध नही रहता है। इसका हल कहीं और है न कि न्यायालय के दरवाजे खटखटाने पर।&#8217;</p></blockquote>
<p>न्यायपालिका आगे क्या करेगी - यह तो भविष्य ही बतायेगा पर शायद पहल उन महिलाओं को करनी पड़ेगी जो इस तरह के भेदभाव वाले स्वीय विधि से प्रभावित होती हैं।</p>
<p>यदि न्यायालयों के निर्णयों को आप देंखे तो पायेंगे कि न्यायपालिका किसी भी स्वीय विधि (Personal Law) को निष्प्रभावी  घोषित करने में हिचकिचाती है लेकिन  उस कानून की व्याख्या करते समय वह महिलाओं के पक्ष में रहता है।  यही कारण है कि अपवाद को छोड़कर न्यायालयों ने कानून की व्याख्या करते समय, उसे  महिलाओं के पक्ष में परिभाषित किया। इसके लिये चाहे उन्हें कानून के स्वाभाविक अर्थ से हटना पड़े।  यह बात सबसे स्पष्ट रूप से  Danial Latif Vs Union of India के फैसले से पता चलती है। इस मुकदमे में मुस्लिम स्त्री (विवाह-विच्छेद पर अधिकारों का समक्षण) अधिनियम १९८६ {Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act 1986} की वैधता को चुनौती दी गयी थी।</p>
<p align="center"><strong>महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता (maintenance)</strong></p>
<p>अधिकतर धर्मों के लिये स्वीय कानून (Personal Law) अलग-अलग है।  अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के भरण-पोषण भत्ता की अधिकारों की सीमा भी अलग-अलग  है पर यह अलगाव अब टूट रहा है।</p>
<p>Indian Divorce Act  ईसाइयों पर लागू होता है। इसकी धारा ३६ में यह कहा गया है कि मुकदमे के दौरान पत्नी को, पति की आय का १/५ भाग भरण-पोषण भत्ता दिया जाय। पहले, अक्सर न्यायालय  न केवल मुकदमा चलने के दौरान, बल्कि समाप्त होने  के बाद भी १/५ भाग भरण-पोषण के लिए पत्नी को दिया करते हैं। यह सीमा न केवल ईसाईयों पर बल्कि सब धर्मों पर लगती थी।  इस समय यह समीकरण बदल गया है और कम से कम पति की आय का १/३ भाग पत्नी को भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है। यदि पत्नी के साथ  बच्चे भी रह रहे हों तो उसे और अधिक भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है।</p>
<p>पत्नी को भरण-पोषण भत्ता प्राप्त करने के दफा फौजदारी  की धारा १२५ में भी प्रावधान है। इस धारा की सबसे अच्छी बात यह थी  कि यह हर धर्म पर बराबर तरह से  लागू होती थी। वर्ष १९८५ में शाहबानो का केस आया। इसमें उसके वकील पति ने शाहबानो को तलाक दे दिया।  उसे मेहर देकर,  केवल इद्दत के दोरान ही भरण-पोषण भत्ता दिया पर आगे नहीं दिया। शाहबानो ने फौजदारी की धारा १२५  के अंतर्गत एक आवेदन पत्र दिया।  १९८५ में उच्चतम न्यायालय द्वारा Mohammad Ahmad Kher Vs. Shahbano Begum   में यह फैसला दिया  कि यदि मुसलमान पत्नी,  अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पा रही है तो मुसलमान पति को  इद्दत के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना होगा।</p>
<p>शाहबानो के  फैसले का मुसलमानों के विरोध किया। इस पर संसद ने एक नया अधिनियम मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद संरक्षण अधिनियम Muslim Women (Protection of Rights on Divorce Divorce Act) 1986 बनाया। इसको पढ़ने से लगता है कि यदि मुसलमान पति, अपनी पत्नी को मेहर दे देता है तो इद्दत की अवधि के  बाद भरण-पोषण भत्ता देने का  दायित्व नहीं होगा। यह कानून मुसलमान महिलाओं के अधिकार को पीछे ले जाता था। इस अधिनियम की वैधता को  एक लोकहित जन याचिका के द्वारा चुनौती दी गयी। वर्ष २००१ में Dannial Latif  Vs. Union of India के मुकदमें में उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम को अवैध घोषित करने से तो मना करा  दिया पर इस अधिनियम के स्वाभाविक अर्थ को नहीं माना। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अधिनियम के आने के बावजूद भी यदि पत्नी अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पाती है तो मुसलमान पति को इद्दत की अवधि के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना पड़ेगा। अर्थात इस अधिनियम को शून्य तो नहीं कहा पर इसे निष्प्रभावी कर दिया।  उच्चतम न्यायालय का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के सम्बन्ध में अच्छे फैसलों में से एक है।</p>
<p><strong>Alimony - Patrimony</strong><br />
शादी शुदा व्यक्तियों के सम्बन्ध विच्छेद होने पर जो पैसा दिया जाता है, उसे Alimony कहते हैं। अक्सर महिला-पुरूष बिना शादी किये साथ रहते है। ऎसे लोगों के लिए इंगलैण्ड में एक नया शब्द निकाला गया Common Law Wife, और Common Law Husband।  लार्ड डैनिंग, २०वीं शताब्दी के एक जाने माने इंगलैण्ड के न्यायाधीश थे। उन्होंने  १९७९ में डेवीस़ बनाम जॉनसन के मुकदमे  में इस प्रकार से समझाया है,</p>
<blockquote><p>&#8216;No such woman was known to the common law, but means a woman who is living with a man in the same house hold as if she were his wife.  She is to be distinguished from a mistress, where relationship may be casual, impermanent and secret.&#8217;<br />
अथार्त,  कॉमन लॉ के अंतरगत इस तरह की कोई भी महिला नहीं जानी जाती थी पर इस का अर्थ उस महिला से है जो कि किसी पुरुष के साथ, एक ही घर में, पत्नी की तरह रहती है। यह रिश्ता रखैल के रिश्ते से अलग है जो कि अक्सर सामयिक, अस्थायी और गुप्त होता है।</p></blockquote>
<p>अमेरिका के कई राज्यों में इस तरह के रहने को कानूनन नहीं माना गया फिर भी वहां लोग बिना शादी किये रहते हैं। अक्सर वे लोग भी साथ रहते हैं जो कि आपस में शादी नहीं कर सकते। उदाहरणार्थ,</p>
<ul>
<li> एक पति या पत्नी रहते दूसरे के साथ शादी करना ; या</li>
<li> वह महिला और पुरूष जो करीबी रिश्तेदार होने के कारण कानूनन शादी नहीं कर सकते; या</li>
<li> दो एक ही लिंग के लोग।  एक ही लिंग के लोगों के बीच की शादी  या साथ रहने की मान्यता, केवल कुछ ही देशों  में   है। हमारे देश में नहीं है।</li>
</ul>
<p>ऐसे व्यक्तियों के लिए  Partners शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। यह लोग भी कभी-कभी अलग हो जाते हैं तब सवाल उठता है कि इसमें से  किसी एक को भरण-पोषण भत्ता  मिलना चाहिए या नहीं। इन Partners  के बीच में दिया गया पैसा या भरण-पोषण भत्ते को  patrimony कहा जाता  है।</p>
<p><strong>अपने देश में Patrimony  - घरेलू हिंसा अधिनियम</strong><br />
हमारे देश में दो एक ही लिंग के व्यक्ति साथ नहीं रह सकते हैं और न उन्हें कोई कानूनन मान्यता या भरण-पोषण भत्ता दिया जा सकता है।</p>
<p>यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या किसी महिला को, उस पुरुष से,  भरण-पोषण भत्ता मिल सकता है जिसके साथ वह  पत्नी की तरह रह रही हो जब,</p>
<ul>
<li> उन्होने शादी न की हो; या</li>
<li> वे शादी नहीं कर सकते हों।</li>
</ul>
<p>पत्नी का अर्थ केवल कानूनी पत्नी ही होता है। इसलिए न्यायालयों ने इस तरह की  महिलाओं को भरण-पोषण  भत्ता दिलवाने से मना कर दिया। अब यह सब बदल गया है।</p>
<p>संसद ने, सीडॉ के प्रति हमारी बाध्यता को मद्देनजर रखते हुए, Protection of Women from Domestic violence Act 2005 (Domestic Violence Act) महिलाओं की घरेलू हिंसा सुरक्षा अधिनियम २००५ (घरेलू हिंसा अधिनियम)  पारित किया है। यह  १७-१०-२००६ से लागू किया गया। यह अधिनियम आमूल-चूल परिवर्तन करता है। बहुत से लोग इस अधिनियम को अच्छा नहीं ठहराते है, उनका कथन है कि यह अधिनियम परिवार में और कलह पैदा करेगा। समान्यतः कानून अपने आप में खराब नहीं होता है पर खराबी, उसके  पालन करने वालों के, गलत प्रयोग से होती है। यही बात इस अधिनियम के साथ भी है। यदि इसका प्रयोग ठीक प्रकार से किया जाय तो मैं नहीं समझता कि यह कोई कलह  का कारण हो सकता है।</p>
<p>इसका सबसे पहला महत्वपूर्ण कदम यह है कि यह हर धर्म के लोगों में एक तरह से लागू होता है, यानि कि यह समान सिविल संहिता स्थापित करने में पहला बड़ा कदम है।</p>
<p>इस अधिनियम में घरेलू हिंसा को परिभाषित किया गया है। यह परिभाषा बहुत व्यापक है। इसमें हर तरह की हिंसा आती हैः मानसिक, या शारीरिक, या दहेज सम्बन्धित प्रताड़ना, या कामुकता सम्बन्धी आरोप। यदि कोई महिला जो कि घरेलू सम्बन्ध में किसी पुरूष के साथ रह रही हो और घरेलू हिंसा से प्रताड़ित की जा रही  है तो वह इस अधिनियम के अन्दर उपचार पा सकती है पर घरेलू संबन्ध का क्या अर्थ है।</p>
<p>इस अधिनियम में  घरेलू सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया है। इसके मुताबिक  कोई महिला किसी पुरूष के साथ घरेलू सम्बन्ध में तब रह रही होती जब वे एक ही घर में साथ  रह रहे हों या रह चुके हों और उनके बीच का  रिश्ता:</p>
<ul>
<li> खून का  हो; या</li>
<li> शादी का हो; या</li>
<li> गोद लेने के कारण हो; या</li>
<li> वह  पति-पत्नी की तरह  हो; या</li>
<li> संयुक्त परिवार की तरह का हो।</li>
</ul>
<p>इस अधिनियम में जिस तरह से  घरेलू सम्बन्धों को परिभाषित किया गया है, उसके कारण यह  उन महिलाओं को भी सुरक्षा प्रदान करता है जो,</p>
<ul>
<li> किसी पुरूष के साथ बिना शादी किये पत्नी की तरह रह रही हैं अथवा थीं; या</li>
<li> ऐसे पुरुष के साथ पत्नी के तरह रह रही हैं अथवा थीं जिसके साथ उनकी शादी नहीं हो सकती है।</li>
</ul>
<p>इस अधिनियम के अंतर्गत महिलायें, मजिस्ट्रेट के समक्ष, मकान में रहने के लिए, अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए, गुजारे के लिए आवेदन पत्र दे सकती हैं और  यदि इस अधिनियम के अंतर्गत यदि किसी भी न्यायालय में कोई भी पारिवारिक विवाद चल रहा  है तो वह  न्यायालय भी इस बारे में आज्ञा दे सकता है।</p>
<p align="center"><strong>लैंगिक न्याय और अपराध</strong></p>
<p><strong>विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में</strong></p>
<p>लैंगिक न्याय से सम्बन्धित, सबसे ज्यादा विवादास्पद विषय दण्ड न्याय का है। यहां पर न केवल लैंगिक न्याय को देखना है पर उसका अभियुक्त के अधिकारों के साथ ताल- मेल भी बैठाना है। इसके पहले कि हम इस विषय पर हम नजर डालें,   भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code) में वैवाहिक सम्बन्धी अपराध से संबन्धित धाराओं को देखना ठीक रहेगा जिन्हें भारत सरकार के द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग ने  यह कहते हुये हटाने की मांग की गयी थी कि वे १९वीं शताब्दी की मान्यता को बनाये रखती हैं  जिसमें पत्नी को पति की सम्पत्ति माना जाता था और जो पत्नियों को पति से न्याय दिलाने  में मुश्किल पैदा करता है।</p>
<p>वैवाहिक सम्बन्धी अपराध, भारतीय दण्ड संहिता के २०वें अध्याय में हैं। इस अध्याय में छः धारायें हैं पर हम बात करेंगे धारा ४९७ (Adultery) और ४९८ (Enticing or taking away or detaining with criminal intent a married woman) की।</p>
<p>आचरण कानूनी तौर पर गलत हो सकता है और अपराध भी, पर इन पर इन दोनों में अंतर है। यदि कोई आचरण, कानून के विरूद्घ है तो वह कानूनी तौर पर गलत आचरण है। सारे कानूनी तौर पर गलत आचरण के लिये सजा नहीं है और जिनके लिये है वे अपराध या फिर जुर्म कहलाते हैं। अर्थात हर अपराध, कानूनी तौर पर गलत आचरण होता है पर हर गलत आचरण अपराध नहीं होता है। कानूनी तौर पर गलत आचरण के व्यावहारिक परिणाम (civil consequences) हो सकते हैं।</p>
<p>किसी विवाहित व्यक्ति के लिए अपने पती/पत्नी की अनुमति के बिना, किसी अन्य व्यक्ति के साथ संभोग करना कानूनी तौर पर गलत आचरण है पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा ४९७ केवल उस पुरूष को दण्डित करती है जो कि किसी विवाहित महिला के साथ उसके पति की अनुमति के बिना संभोग करता है। यहाँ यह आचरण विवाहित महिला के लिए अपराध नहीं है।</p>
<p>यदि कोई विवाहित पुरूष किसी अविवाहित महिला के साथ अपनी पत्नी की अनुमति के बिना संभोग करता है तो यह अपराध नहीं है हालांकि कि यह कानूनी तौर पर गलत आचरण है।</p>
<p>जैसा मैंने पहले बताया है कि कानूनी  तौर पर गलत आचरण के  व्यावहारिक परिणाम हो सकते हैं। उपर बताये गये, कानूनी  तौर पर गलत आचरण (जो अपराध नहीं हैं) उन पर भी तलाक हो सकता है।</p>
<p>इसी तरह से भारतीय दण्ड संहिता की धारा ४९८ में, विवाहित  महिला  को गलत इरादे से संभोग करने के लिये भगा ले जाने को अपराध करार करती है।</p>
<p>दण्ड प्रक्रिया की धारा १९८ (२) के अंतर्गत, इन दोनों अपराधों की संज्ञान भी  खास परिस्थिति में ही लिया जा सकता है। अथार्त सब लोग इस बारे में शिकायत नहीं कर सकते हैं।</p>
<p>दुनिया के बहुत सारे देशों में इस तरह के आचरण को अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा गया है पर तलाक लिया जा सकता है।</p>
<p>यह दोनों धाराओं में महिलाओं से पक्षपात परिलक्षित होता है। इन दोनों धाराओं की वैधता को चुनौती दी गयी थी पर उच्चतम न्यायालय ने सबसे इन दोनों धाराओं के लिए १९५९ में Alamgir  Vs. State of Biihar  में वैध मान लिया। उच्चतम न्यायालय ने इसके बाद के निर्णयों में यही मत बहाल रखा। न्यायालय के अनुसार,</p>
<blockquote><p>‘The provisions of S. 498 like those of S 497 are intended to protect the rights of the husband and not those of the wife.</p>
<p>&#8230;</p>
<p>The policy underlying the provisions of S. 498 may no doubt sound inconsistent with the modern notions of the status of women and of the mutual rights and obligation under marriage.</p>
<p>&#8230;</p>
<p>[It] is a question of policy with which courts are not concerned.&#8217;</p>
<p>धारा ४९८, के प्राविधान धारा ४९७ की तरह पतियों के अधिकारों की सुरक्ष