पहेलियां और मार्टिन गार्डनर

जिस तरह से गणित के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, उसी तरह से पहेलियों को भी नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता। पहेलियां आदि काल से हमारा हिस्सा रहीं हैं और रहेंगी। वे न हमारा मनोरंजन करती हैं पर हमारे दिमाग को चुस्त एवं तरो-ताजा भी रखती हैं।

मार्टिन गार्डनर ने अपनी एक किताब की भूमिका मे पहेलियों के महत्व को इस प्रकार से समझाया है,

‘In one of L. Frank Baum’s funniest fantasies, ‘The Emerald City of Oz’, Dorothy (together with the wizard and her uncle and aunt) visit the city of Fuddlecumjig in the quadling section of Oz. Its remarkable inhabitants, the fuddles, are made of pieces of painted wood cleverly fitted together like three dimensional jigsaw puzzles. As soon as an outsider approaches they scatter in a heap of disconnected pieces on the floor so that the visitor will have the pleasure of putting them together again. As Dorothy’s party leaves the city, aunt Em remarks:
“Those are certainly strange people, but I really can’t see what use they are, at all.”
“Why, they amused us for several hours,” replies the wizard. “That is being of use to us, I am sure.”
“I think they’re more fun than playing solitaire or mumbletypeg,” uncle Henry adds. “For my part, I’m glad we visited the fuddles.”

द विन्ची कोड
इस वर्ष (२००६) की सबसे बहुचर्चित पहेली, एक ज़ज साहब के द्वारा एक फैसला देते समय पूछी गयी। यह फैसला ‘द विन्ची कोड’ नामक पुस्तक के बौधिक सम्पदा अधिकार से सम्बन्धित मुकदमे मे दिया गया है। इस फैसले के तथ्य इस प्रकार हैं।

डैन ब्राउन ने ‘द विन्ची कोड’ (da vinci code) नाम की पुस्तक लिखी है तथा इसे रैन्डम हाउस ने छापी है। यह काल्पनिक कहानी है। लेखक के शब्दों में यह यहां http://www.danbrown.com/novels/davinci_code/plot.html है।

इसकी कहानी कुछ इस तरह की है कि यीशू मसीह ने शादी की थी तथा उनके वंशज भी हैं यह बात वेटिकन ने छिपा कर रखी है। एक संग्रहाध्यक्ष को यह मालुम थी। उसकी हत्या हो जाती है। वह मरते समय लियोनार्दो द विन्ची के एक चित्र की आकृति बनाते हुये, फिबोनाकी सिरीस (अन्त मे नोट-१ देखें) के नम्बरो के साथ, संकेत के रूप में छोड़ जाता है। आगे क्या होता है यह जानने के लिये तो किताब पढ़नी पड़ेगी पर रैन्डम हाऊस के उपर इस किताब के पीछे एक मुकदमा दायर हो गया और हमें तो इसके फैसले से मतलब है।

कुछ साल एक और किताब ‘द होली ब्लड ऐन्ड होली ग्रेल’ तीन लेखकों ने छापी थी उसमें से दो ने रैन्डम हाउस के उपर एक मुकदमा यह कहते हुऐ दायर किया कि

  • द विन्ची कोड की पुस्तक में उनकी किताब का सार ले लिया है;
  • इससे उनके बौधिक सम्पदा अधिकारों का हनन हुआ है।

यह मुकदमा इंगलैंड मैं चला तथा न्यायमूर्ती पीटर स्मिथ ने इसे ७ अप्रैल २००६ को खारिज कर दिया। यह फैसला इस जगह http://www.hmcourts-service.gov.uk/images/judgment-files/baigent_v_rhg_0406.pdf
पर है। इस मुकदमे मे कुछ शब्दों का एक अक्षर तिरछे (italics) में टाईप है। यह कुछ अजीब बात है। फैसले मे पूरे, पूरे शब्द तो अकसर तिरछे रहते हैं पर किसी शब्द का एक अक्षर कभी तिरछा नहीं रहता। पहले तो लोगों ने यह समझा कि यह गलती है पर बाद मे यह लगा कि इसमे भी कोई रहस्य हो।

पहले नौ तिरछे अक्षरों को देखें तो वे smithcode हैं, या इन्हे ठीक से रखें तो यह हो जाता है smith code. जज़ साहब का नाम भी smith है। इससे लगा कि वह भी ‘द विन्ची कोड’ की तरह रहस्यमयी बात कहना चाहते हैं। लेकिन बाद के तिरछे अक्षरों का कोई मतलब नहीं निकल रहा था। जज़ साहब ने पहले तो अपने फैसले के बारे में कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया पर बाद में ईमेल से पुष्टि की यह एक पहेली है। उन्होने किताब के उस पेज नम्बर पर इशारा किया जहां पर फिबोनाकी सिरीस का जिक्र है (अन्त मे नोट-२ देखें)। इन नम्बरों की सहायता से तिरछे अक्षरों का रहस्य खुला (अन्त मे नोट-३ देखें)। वे सौ साल पहले, नेवी के एडमिरल जैकी फिशर के बारे मे लोगों का ध्यान आर्कषित करना चाह रहे थे। शायद पहले कभी किसी जज़ ने इस तरह से अपने फैसले मे पहेली नहीं बूझी है।

मैं और मार्टिन गार्डनर का संसार
नवीन युग में गणित को लोकप्रिय बनाने में जितना काम मार्टिन गार्डनर ने किया शायद उतना किसी और ने नही किया। मैंने १९६० के दशक में स्नातक की कक्षा में कदम रखा। उस समय, मेरे अमेरिका में रहने वाले एक चाचा ने, मेरे लिये साईंटिफिक अमेरिकन (अन्त मे नोट-४ देखें) नाम की पत्रिका भिजवानी शुरू की। मार्टिन गार्डनर उस समय इसमें मनोरंजनात्मक गणित पर एक स्तम्भ लिखा करते थे। इस तरह, से मेरा उनसे पहली बार परिचय हुआ।

मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें
साईंटिफिक अमेरिकन मे मार्टिन गार्डनर के लेखों मे बहुत सारे लेख पहेलियों के बारे में होते थे। यह बहुत ज्ञानवर्धक और मनोरंजक थे। मार्टिन गार्डनर के लेख मुझे तब से पसन्द हैं। मार्टिन गार्डनर ने आगे चल कर कई पुस्तकें भी लिखीं जिसमें कई पहेलियों के बारे में थीं। उनमे से मेरी मन पसन्द पुस्तकें निम्न हैं।

  • Mathematical puzzles and diversions;
  • More mathematical puzzles and diversions;
  • Further mathematical diversions;
  • mathematical carnival;
  • Mathematics magic and mystery;
  • Entertaining mathematical rules;
  • Science fiction, puzzle tales;
  • Aha! gotcha, paradoxes to puzzle and delight.

मार्टिन गार्डनर ने न केवल पहेलियों के बारे में किताबें लिखीं पर विज्ञान के कुछ पहलुवों के बारे में भी लिखा है। इनमे से कुछ किताबें अलग अलग नाम से प्रकाशित की गयीं हैं। मैं नही कह सकता कि ऐसा क्यों किया गया पर इसके कारण कुछ भ्रम अवश्य पैदा होता है। इस तरह की कुछ अच्छी पुस्तकें हैं,

  • The Ambidextrous Universe.
  • Science: Good, Bad, and Bogus यह Fads and Fallacies in the Name of Science नामक किताब का नया रूपान्तर है। इसमें ये ESP और UFO के अन्धविश्वास को दूर करते हैं।
  • The Relativity Explosion. यह Relativity for the Million नामक किताब का नया रूपान्तर है।

मार्टिन गार्डनर की पहेलियों पर तथा विज्ञान पर लिखीं पुस्तकें बहुत आसान भाषा में, सरल तरीके से लिखी गयी हैं और पढ़ने लायक हैं। पर उनकी कुछ और किताबें जो कि दर्शन पर लिखी गयीं हैं, उनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। इनमे से कुछ पुस्तकों को मैं समाप्त ही नही कर पाया, यह पुस्तकें निम्न हैं,

  • The whys of a Philosophical Scrivener; और
  • The Night is Large.

पहेलियों की अन्य पुस्तकें
मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के अलावा पहेलियों की अन्य अच्छी पुस्तकें निम्न हैं,

  1. Vicious circle and infinity: an anthology of paradoxes by Patrick Hughes & George Brecht;
  2. The lady orthe tiger? and other logical puzzles by Raymond Smullyan;
  3. What is the name of the book? The riddle of Dracula and other logical puzzles by Raymond Smullyan;
  4. The Moscow Puzzles by Boris A. Kordemsky;
  5. Which way did the bicycle go? … and other intriguing mathmatical mystries by Joseph De Konhauser, Dan Velleman, Stan Wagon; और हिन्दी में
  6. गणित की पहेलियां लेखक गुणाकर मुले।

यह सब बहुत अच्छी हैं। इसमे से पहली चार पेंग्विन ने तथा पांचवीं Mathematical Association of America Dolciani Mathematical Exposition no. 18 ने छापी है। इसमे से पांचवीं पुस्तक का स्तर ऊंचा है, थोड़ी गणित ज्यादा है।

उपर लिखी अनुमोदित पुस्तकें बहुत अच्छी हैं और मेरी मन पसन्द हैं। साईंटिफिक अमेरिकन अब भारतवर्ष में प्रकाशित होने लगी है। आप इन्हे पढ़िये। यदि आपके मुन्ने या मुन्नी ग्यारवीं कक्षा या उसके उपर पढ़ते हों तथा विज्ञान मे रुचि रखते हों, तो इसे उनके लिये मंगवाइये।

यह पुस्तकें कहां से खरीदें
मैने यह पुस्तकें पिछले ४० सालों में पढ़ी हैं इस बीच इन सब के प्रकाशक बदल गये और कईयों के नाम भी। इसलिये महत्वपूण यह है कि इस समय इनका क्या नाम है तथा कौन प्रकाशक है। यह पता करने का सबसे अच्छा तरीका, www.amazon.com पर जा कर किताबों के मेनू पर इस बात का पता करना। मैने कई पुस्तकें यहां से अपने अमेरिकी दोस्तों से मंगवायी है पर यह पुस्तकें मंहगी पड़ती हैं। इसलिये पुस्तक के बारे मे पता करने का यह तरीका तो ठीक है पर खरीदने के लिये नहीं।

आजकल अपने देश में भी, इन्टरनेट पर बहुत सारे पुस्तकों के स्टोर खुल गये हैं। जो अच्छे हैं और भरोसे मन्द भी। मैं इनमे से एक http://www.firstandsecond.com/ से किताबें मंगवाता हूं। आप कहीं भी हों किताबें अपने देश के किसी इन्टरनेट बुक स्टोर से मंगवा सकते हैं। यहां भी आप मेनू पर ढ़ूढ़ सकते हैं।

पहेलियों या विज्ञान से सम्बंधित किताबें न तो हर किताबों कि दुकानो पर मिलती हैं न ही हर दुकान वालों को इन किताबों का ज्ञान होता है हांलाकि कुछ बड़ी किताबों की चेन (जैसे क्रौसर्वड, लैन्डमार्क) खुल गयी हैं, वंहा मिल जाती हैं। मैं दिल्ली-गुड़गांव, अहमदाबाद, बम्बई कि क्रौसर्वड पर तथा चेन्नाई एवं बैंगलोर की लैन्डमार्क पर गया हूं कभी मौका मिले तो जरूर जाइये, अच्छी दुकाने हैं।

दिल्ली में इस तरह की किताबों की सबसे अच्छी दुकान कनौट प्लेस में बुक-वर्म है। यह छोटी दुकान है पर इस तरह कि किताबों के लिये सबसे अच्छी है। इसके मालिक को जितना अच्छा ज्ञान इस तरह की किताबों के बारे में है, शायद उतना किसी और किताब के दुकान मालिक को नहीं है। कभी लखनऊ जाने का मौका मिले तो कपूरथला में पहली मंजिल पर, युनिर्वसल की दुकान पर जाना न भूलें।

उन्मुक्त

नोट: १. फिबोनाकी सिरीस १ नम्बर से शुरू होती है बाद के नम्बर पिछले दो नम्बर का जोड़ होते हैं। यानि कि सिरीस में नम्बर १, (०+१) =१, (१+१)=२, (१+२)=३, (२+३)=५, (३+५)=८, इत्यादि होते हैं। इनका प्रकृति से अपना सम्बन्ध है इसके बारे मे जानने के लिये यहां देखें।

२. यह सब आप कुछ विस्तारसे पढ़ना चाहें तो यह सब न्यू यौर्क टाईम्स के इस लेख में यहां है।

३. यदि आप इस पहेली का हल कुछ विस्तारसे पढ़ना चाहें तो न्यू यौर्क टाईम्स का यह लेख देखें। डैन टेन्च वकील हैं तथा गार्जियन नाम के आखबार के लिये लिखते हैं। उन्होने इसका हल निकाला और यदि आप उन्ही की भाषा में इसका हल पढ़ना चाहें तो वह यहां पर है।

४. यह लेख उन्मुक्त चिठ्ठे पर तीन प्रकाशित चिठ्ठियों को संग्रहीत कर के बनाया गया है।

इस चिट्ठी की pdf फाईल puzzles-and-martin-gardner.pdf है। इसे आप चाहें तो इसे डाउनलोड कर के पढ़ सकते हैं या इसका वितरण कर सकते हैं।

One Response to “पहेलियां और मार्टिन गार्डनर”

  1. Mitul Says:

    आप बहुत ही अच्छा लिखते है। आपके लेखन मे काफी ज्ञान-विज्ञान है। आपके लेखन का उपयोग अगर मै विकिपीडिया पे करू तो क्या आपको कोई आपत्ती है? अगर आप भी हिन्दी विकिपीडिया मे सहयोग करे तो हिन्दी विकिपीडिया का विकास मे तेजी आ सकती है।

    मितुल जी, आपका स्वागत है आप मेरे तीनो चिट्ठों - उन्मुक्त, छुटपुट, लेख - पर लिखीं चिट्ठियों को, विकीपीडिया या और जहां आप चाहें, प्रयोग कर सकते हैं। मुझे बतायें कि मैं विकीपीडिया में किस प्रकार से, और क्या सहयोग कर सकता हूं। सहायता करने का भरसक प्रयत्न करूंगा - उन्मुक्त।

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    जी हां, मै उन्मुक्त ही हूं। भारत के एक कसबे से, एक आम भारतीय। मैं वर्ड-प्रेस पर भी छुटपुट के नाम से एक ब्लौग लिखता हूं; ब्लौगर पर उंमुक्त के नाम से एक ब्लौग लिखता हूं। फिर यह तीसरा ब्लौग क्यों?

    छुटपुट मे इस दुनिया मे और लोग क्या कह रहें हैं मेरी टिप्पणी के साथ रहता है। उन्मुक्त मे मेरे विचार रहते हैं पर यह अक्सर कड़ियों मे रहते हैं। किसी भी विचार पर लिखने के पहले मे रूप रेखा तो बना लेता हूं पर लेख कड़ियों के साथ ही लिखता हूं - एक साथ बड़ा लेख लिखना मुशकिल रहता है।

    लेखों को कड़ियों मे लिखने मे आसानी होती है पर पढ़ने मे पूरे लेख ही अच्छे लगते हैं - कारण,

    इससे लगा कि बाद मे सारी कड़ियों को जोड़ कर पूरा लेख एक जगह कर दिया जाय और यदि उस विषय पर कुछ नया आये तो कड़ियों पर जोड़ने की जगह उसे पूरे लेख पर ही जोड़ा जाय तो ठीक रहेगा तथा उस विषय पर एक जगह पूरी जानकारी भी रहेगी। पूरे लेख को एक साथ पढ़ने का आनंद ही अलग है।

    ब्लौगर के अपने फायदे हैं तो वर्ड-प्रेस के अपने। बस इसी उधेड़-बुन मे यह नया चिठ्ठा शुरू कर दिया। जो लेख पहले कड़ियों मे उन्मुक्त मे प्रकाशित हो चुके हैं उसमे से कुछ लेखों की कड़ियों को एक लेख मे परिवर्तित करके यहां प्रकाशित किया जा रहा है। इन लेखों मे कुछ संशोधन तारत्म्यता क