यह चिट्ठी रिश्तों के बारे में है, उनसे निकलती खुशबू, जीवन के भावात्मक पहलू दर्द, प्रेम, मित्रता के बारे में है।

यह मेरे ‘उन्मुक्त‘ चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुकी है। इसका कुछ भाग मेरी पत्नी ने अपने चिट्ठे ‘मुन्ने के बापू‘ पर लिखा है। उसके कहने पर, उन चिट्ठियों को भी यहां जोड़ रहा हूं। यह लेख इन सारी कड़ियों को सम्पादित कर, प्रकाशित किया जा रहा हूं। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहते हैं तो नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।

भूमिका।। सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण – दर्द की यादें हैं। sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। प्यार में अफसोस नहीं ।। रोमन हॉलीडे – पत्रकारिता।। अनन्त प्रेम।। अम्मां – बचपन की यादों में।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। अम्मां – अन्तिम समय पर।। मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी।। पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। निष्कर्ष – प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। पुनः लेख – जीना इसी का नाम है।।

सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण – दर्द की यादें हैं

रिश्ते अक्सर दर्द दे जाते हैं। क्या इनमें दर्द ही होता है? क्या यही है रिश्तों में रमती खुशबू? क्या यही है रिश्तों का अंजाम। क्या यही है जीवन का निचोड़, या फिर कुछ और।

इसमें शक नहीं कि दर्द और मिठास में अनोखा रिश्ता है और इसे सबसे अच्छी तरह से व्यक्त करती है यह पंक्ति,

‘Our sweetest songs are those that tell of saddest thought’

हमारे सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण वह हैं जो सबसे दर्द भरे हैं।

percy_bysshe_shelley_by_curran_18191यह पंक्तियां अंग्रेजी कवि शेली (Percy Bysshe Shelley) कि कविता ‘To a Skylark‘ से ली गयी हैं।

शैली का चित्र विकिपीडिया से

अंग्रेजी साहित्य में पांच प्रसिद्घ रूमानी कवि हुए हैं, पर्सी बिश शैली उनमें से एक हैं, बाकी चार हैं – वर्डस्वर्थ (William Wordsworth), कोलरिज (Samuel Taylor Coleridge), बाइरन (Lord Byron) और कीटस् (John Keats) हैं।

शैली एक उपदेशक थे और अपनी कविता के द्वारा समाज सुधार करना चाहते थे। उनकी मृत्यु ३० साल की कम उम्र में हो गयी इसलिए कहना मुश्किल है कि यदि वे जीवित रहते तो यह सम्भव होता या नहीं। यह भी अपने में एक प्रश्न है कि कविता के द्वारा ऐसा कार्य संभव है या नहीं। मेरे विचार ऐसा कार्य केवल कर्मों से सम्भव है न कि कविता से।

शैली का जन्म ४ अगस्त १७९२ में हुआ था। इन्होंने अपना स्कूली जीवन ईटन कॉलेज (Eton College) में व्यतीत किया और उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। १९११ में, उन्होंने ‘The necessity of Atheism’ नाम से एक पर्चा प्रकाशित किया जिसके कारण उन्हें आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया।

आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से निष्कासित किये जाने के बाद ही, उन्नीस साल की उम्र में शैली का प्रेम १६ साल की हैरियट बेस्टब्रुक (Hariatte Bestbrook) से हुआ जिसके साथ उन्होंने शादी रचायी। शैली भावनात्मक व्यक्ति थे और बहुत जल्द ही उनका प्रेम एक दूसरी १६ साल की लड़की मैरी गाडविन (Mary Shelley) के साथ चलने लगा; वे उसके साथ १८१४ में यूरोप भाग गये। १८१६ में जब वे वापस इंगलैंड आये तो शैली की पहली पत्नी हैरियट की मृत्यु, दुर्घटना के कारण हो गयी। शैली ने मैरी से शादी कर ली। वे पुन: १८१८ में यूरोप गये वहां बाइरन के साथ रहे और इन दोनों के कहने पर मैरी ने फ्रैंकेस्टाइन (Frankenstein: or, The Modern Prometheus) नामक उपन्यास १८१८ में लिखा यह उपन्यास विज्ञान की कल्पित कहानियों में सबसे ज्यादा जाना-माना उपन्यास है। ८ जुलाई १९२२ में जब शैली ३० साल के भी नहीं हुये थे, इटली के पास समुद्र में, नाव डूब जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।

शैली और मैरी दोनों ही शाकाहारी होने की वकालत करते थे और उन्होंने इस बारे में कई लेख भी लिखे जिसमें कि प्रमुख है, ‘A Vindication of Natural Diet’ और ‘On the Vegetable System of Diet’.

शैली की कवितायें अंग्रेजी साहित्य की धरोहर है इनकी एक कविता ‘To a Skylark‘ है। स्काईलार्क एक छोटी सी चिड़िया है जिसकी आवाज मधुर होती है। यह ऊंचे आकाश में उड़ना पसन्द करती है। यदि आप इस चिड़िया की आवाज सुनना चाहें या फिर इसके बारे में जानना चाहें तो बीबीसी रडियो पर यहां सुन सकते हैं।

यह चित्र वीकिपीडिया से

‘To a Skylark’ कविता के पहले भाग में, शैली इस चिड़िया के बारे में बात करते हैं और दूसरे भाग में, उससे प्रेरित होकर अपनी भावनायें बताते हैं। उपर उद्धरित पंक्ति, जिस छन्द से ली गयी हैं वह इस प्रकार है,

‘We look before and after,
And pine for what is not:
Our sincerest laughter
With some pain is fraught;
Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.’

यह छन्द बताता है कि हम, भावनात्मक स्तर पर, सबसे ज्यादा बीते हुऐ पलों से जुड़े होते हैं। यह पल ही हमारे लिये बहुमूल्य हैं। वे ही हमारे जीवन के सबसे सुनहरे पल हैं। वे बीते हुऐ हैं – वापस नहीं आ सकते। इसी लिये उनके लिये हम सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। यही कारण है दर्द और मिठास के अनोखे रिश्ते का।

शैली की कविता की उद्धरित पंक्ति – कुछ उदास, कुछ मायूस, कुछ निराश, कुछ नकारात्मक सी है। यह तो बन्धन के कारण ही होता है – पर प्यार तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है। फिर यह क्यों? प्यार है क्या? क्या यह एक खामोशी है, या खामोशी के रुके हुऐ अफसाने, या केवल एक एहसास, या फिर कुछ और?

प्यार में अफसोस नहीं

एक अभिनेता की पत्नी की तबियत ठीक नहीं रहती थी। पत्नी के डाक्टर ने अभिनेता से मिलने की इच्छा जाहिर की। जब अभिनेता, डाक्टर से मिला तो उसने बताया कि उसकी पत्नी को कैंसर है और छ: महीने के अन्दर ही उसकी मृत्यु हो जायेगी। अभिनेता ने अपने काम से छुट्टी ली और वह अपनी पत्नी से यह बिना बताये कि उसकी मृत्यु होने वाली है, उन जगहों पर ले गया जहाँ उसकी पत्नी हमेशा जाना चाहती थी। उसकी पत्नी की मृत्यु ६ महीने के अन्दर ही हो गयी। इसके बाद यह सवाल उठा कि कौन अच्छा अभिनेता था: वह पति जिसने अपनी पत्नी के साथ आखिरी छ: महीने उस की पसन्द की जगह, उसे बिना यह बताये गुजारे कि उसकी ज्लद ही मृत्यु होने वाली है या फिर वह पत्नी, जो यह जानते हुए कि वह छ: महीने बाद नहीं रहेगी सारी जगह गयी और अपने पति को नहीं मालुम होने दिया कि उसे अपनी मृत्यु के बारे में मालुम है। यह मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है।

इस कहानी को एक दूसरे रूप में, एरिक सीगल (Erich Segal) ने प्रेम कहानी (Love Story) नामक पुस्तक में लिखा है। यह पुस्तक १९७० में छपी थी। यह ऑलिवर बैरेट और जेनी कैविलरी की प्रेम कहानी है। ऑलिवर अमीर है, बेहतरीन खिलाड़ी है, और हावर्ड में पढ़ता है। जैनी गरीब है, संगीत प्रेमी है, और रेडक्लिफ में पढ़ती थी।

यह कहानी कुछ इस तरह से शुरू होती है।

‘What can you say about a twenty-five-year-old girl who died ?

That she was beautiful. And brilliant. That she loved Mozart and Bach. And the Beatles. And me. Once, when she specifically lumped me with those musical types, I asked her what the order was, and she replied, smiling, “Alphabetical.” At the time I smiled too. But now I sit and wonder whether she was listing me by my first name– in which case I would trail Mozart – or by my last name, in which case I would edge in there between Bach and the Beatles. Either way I don’t come first, which for some stupid reason bothers hell out of me, having grown up with the notion that I always had to be number one. Family heritage, don’t you know?’

जेनी की भी मृत्यु ६ महीने के अन्दर कैंसर से हो जाती है। इस पुस्तक का अन्त इस प्रकार होता है कि ऑलिवर का पिता जब अस्पताल में पहुंचता है तो जेनी की मृत्यु हो चुकी होती है।

“Oliver,” said my father urgently, “I want to help.” “Jenny’s dead,” I told him. “I’m sorry,” I told him. “I’m sorry,” he said in a stunned whisper.

Not knowing why, I repeated what I had long ago learned from the beautiful girl now dead.

“Love means not ever having to say you’re sorry.”

And then I did what I had never done in his presence, much less in his arms. I cried.

इस कहानी के दूसरी अन्तिम पंक्ति है,

‘Love means not ever having to say you’re sorry.’

प्यार में कभी अफसोस करना नहीं होता।

यह पंक्ति प्यार का एक अर्थ बताती है और प्यार के संदर्भ में, सबसे ज्यादा उद्धरित पंक्ति है। इस कहानी पर, इसी नाम से एक पिक्चर भी बनी है जिसे ऑर्थर हिलर ने निर्देशित किया है और मुख्य भूमिका रायन ओ’नील एवं एली मैक्ग्रॉ ने निभायी है। यह पंक्ति पिक्चरों के डायलॉगो में, दस सबसे लोकप्रिय डायलॉग में से एक है।

यह पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई जब मैं विश्वविद्यालय में पढ़ता था। विश्वविद्यालय के जीवन में लड़कियां भी साथ पढ़ती थीं। वह उम्र ही अलग थी, वह समय भी अलग था। किशोरावस्था में पैर रखते समय, लड़कियों का साथ पढ़ना, अलग अनुभूति ही था।

सीगल की लिखी पुस्तक ‘प्रेम कहानी’ और उस पर बनी फिल्म मुझे बहुत पसन्द आयी। यह पुस्तक पढ़ने और पिक्चर देखने योग्य है। मैंने यह पुस्तक भी बहुतों को उपहार में दी। इस चिट्ठी को लिखने से पहले मैंने इसे फिर पढ़ा। मुझे यह उतनी ही अच्छी लगी जितनी कि ३५ साल पहले लगी थी। यदि आपने नहीं पढ़ी हो तो जरूर पढ़ कर देखिये।

लोग कहते हैं कि खून का रिश्ता ही सच्चा रिश्ता होता है पर यह सच नहीं। मित्रता का रिश्ता अक्सर उससे ज्यादा मजबूत होता है। आइये बात करते हैं एक और रूमानी फिल्म की और उसके कलाकारों के बीच मित्रता के रिश्ते की।

रोमन हॉलीडे

मैंने बचपन में एक अंग्रेजी की रुमानी फिल्म देखी थी। वह फिल्म, एक पत्रकार और एक राजकुमारी की प्रेम कहानी है। इस फिल्म ने, रुमानी फिल्मों में नये आयाम स्थापित किये। यह पत्रकारिता की मर्यादाओं के भी आयाम स्थापित करती है। यह फिल्म उन कलाकारो के द्वारा अभनीत की गयी है जो कि न केवल अंग्रेजी फिल्मों में बेहतरीन कलाकार हो कर उभरे पर जिनहोंने अपने वास्तविक जीवन में भी मित्रता, सम्मान का एक अनोखा रिश्ता कायम किया। जी हां, मैं बात कर रहा हूं ‘रोमन हॉलीडे’ (Roman Holiday) की।

कहा जाता है कि यह फिल्म, राजकुमारी मार्ग्रेट के रोम यात्रा में घटी घटनाओं से प्रेरित है। इस कहानी में एक देश की राजकुमारी रोम जाती है। उसे वहाँ अपने देश के प्रतिनिधि की तरह बर्ताव करना है। वहाँ वह अपने देश के राजदूत के साथ टिकती है। उसे राजकुमारी की तरह बर्ताव करना बहुत मुश्किल लगता है वह इस तरह के जीवन से ऊब चुकी है और साधारण व्यक्ति की तरह जीना चाहती है। इस कारण, वह उन्मादी (hysterial) हो जाती है तब डाक्टर उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता है। इसके पहले वह इंजेक्शन कारगर हो, वह खिड़की से निकल कर, भाग जाती है। सड़क पर, उसकी मुलाकात एक अमेरिकी पत्रकार से होती है। राजकुमारी, इंजेक्शन के कारण, रास्ते में ही सोने लगती है। इस पर पत्रकार, राजकुमारी को अपने घर ले जाता है।

अगले दिन उस राजकुमारी को पत्रकार सम्मेलन में भाग लेना था जिसमें इस पत्रकार को भी जाना था। उसमें जाने के लिये जब वह दफ्तर पहुँचता है तो उसका सम्पादक बताता है कि राजकुमारी की बीमारी के कारण पत्रकार सम्मेलन स्थगित कर दिया गया है। सम्पादक, पत्रकार को राजकुमारी का चित्र दिखाता है तब उसे पता चलता है कि राजकुमारी वही लड़की है जो उसके घर में है। वह सम्पादक से पूछता है कि यदि वह राजकुमारी की कुछ खास चित्र उसे दे दे तो उसे क्या मिलेगा। संपादक उसे बहुत पैसा देने की बात कहता है। वह वापस अपने घर आता है और अपने एक मित्र को लेकर राजकुमारी के साथ घूमने जाता है। वे लोग साधारण व्यक्ति की तरह सैर सपाटा करते हैं और मौज मस्ती करते हैं।

पत्रकार के मित्र के पास एक लाइटर है जो कि एक कैमरा है। उससे वह राजकुमारी की फोटो लेता रहता है। वे लोग रात को समुद्र तट पर पार्टी में जाते है। यहां पर राजकुमारी के देश की खुफिया पुलिस, जो उसे ढूढ़ रही होती है, पहचान लेती है और उसे वापस ले जाना चाहती है। पत्रकार और राजकुमारी, वहां से भाग जाते हैं। जब राजकुमारी वापस लौट रही होती है तो उसे लगता है कि उसका अपने देश के प्रति भी कर्तव्य है और उसे वापस जाना चाहिए। वह वापस चली जाती है।

अगले दिन, राजकुमारी पत्रकार सम्मेलन को सम्बोधित करती है जिसमें वह उनके जवाब भी देती है। यह अमेरिकी पत्रकार और उसका मित्र भी उस प्रेस कान्फ्रेंस में होते हैं। उसका मित्र, राजकुमारी का चित्र, उसी लाइटर से लेता है तब राजकुमारी को पता चलता है कि यह लोग पिछले दिन भी उसकी फोटो ले रहे थे।

प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान, राजकुमारी से सवाल पूछा जाता है,

‘आप देशों की दोस्ती के बारे में क्या सोचती हैं?’

राजकुमारी जवाब देती है,

‘मेरा उस पर उतना ही विश्वास है जितना विश्वास मुझे दो व्यक्तियों के संबंध में है।’

इस पर अमेरिकी पत्रकार कहता है,

‘राजकुमारी आपका विश्वास गलत साबित नहीं होगा।’

राजकुमारी कहती है कि उसे यह सुनकर प्रसन्नता हुई।

जब वह पत्रकार सम्मेलन समाप्त होता है तो राजकुमारी सबसे हाथ मिलाती है। अमेरिकी पत्रकार राजकुमारी को एक खास तोहफ़ा देता है जिसमें उनके द्वारा खींचे हुये सारे चित्र और निगेटिव रहते है । इसे राजकुमारी मुस्कराहट के साथ स्वीकार करती है और धीरे-धीरे वहां चली जाती है जहां से शायद यह लोग फिर कभी नहीं मिल पाये।

इस फिल्म में मुख्य भूमिका ऑड्री हेपबर्न और ग्रेगरी पेक ने निभायी है और इसका निर्देशन वाइलर ने किया है। यह आड्री हेपबर्न की पहली अमेरिकन पिक्चर थी और उन्हें इस पिक्चर में सबसे अच्छे कलाकार ऑस्कर पुरस्कार भी मिला। यह दोनो मेरे प्रिय कलाकार रहे हैं। इनका अभिनय लाजावाब था।

अंग्रेजी पिक्चरों में, अक्सर, शब्दों के उच्चारण समझने में मुश्किल होती थी। आड्री हेपबर्न तो ब्रिटानी कलाकारा थी उनका उच्चारण आसानी से समझ में आता है पर ग्रेगरी पेक अमेरिकन थे फिर भी उनका उच्चारण एकदम स्पष्ट था। इस कारण से इनकी फिल्में ज्यादा समझ में आती थीं। यह एक प्रेम कहानी है जो कि रिश्तों के बीच आदर और सम्मान की सीमा भी बताती है। यह अच्छी फिल्म है और सपरिवार देखने योग्य है।

मैं नहीं जानता कि यह वास्तविक जीवन में होता है कि नहीं। यह तो एक फिल्म थी पर मेरे विचार में यह पत्रकारिता की मर्यादा को ठीक तरह से परिभाषित करती है और मित्रता का सही अर्थ भी बताती है।

देखें इन दोनो कलाकारों का वास्तविक जीवन भी मित्रता की मिसाल था। आईये इन दोनो के बारे में कुछ और जाने।

अनन्त प्रेम

आड्री हेपबर्न (४/५/१२९२ – २०/१/१९९३) की सगाई १९५० में, जेम्स हेन्सन के साथ हुई, तारीख भी तय हो गयी पर दोनों को लगा कि उनके कैरियर उन्हें अलग रखेंगे इसलिये शादी नहीं की। आड्री हेपबर्न की पहली शादी १९५४ में मेल फेरर, कलाकार, से हुई। यह १४ साल चली। उनके लड़के के अनुसार यह ज्यादा खिंची। तलाक लेने से पहले यह दोनो अलग हो गये थे। उस समय आड्री हेपबर्न एक मनोचिकित्सक एन्ड्रिया डॉटी के यहां जाने लगी। बाद में उसी से १९६९ में शादी कर ली। यह शादी भी १३ साल तक चली।

रोमन हॉलीडे १९५३ में बनी थी। आड्री हेपबर्न इसे अपनी सबसे बेहतरीन फिल्म मानती थीं क्योंकि इस फिल्म ने उन्हें सितारा बनाया था। मैंने उनकी सारी फिल्में देखीं और रोमन हॉलीडे के अतिरिक्त जो फिल्में पसन्द आयीं वह हैं, ‘शराड’, ‘माई फेयर लेडी’, ‘वार एण्ड पीस’, ‘हाउ टू स्टील मिलियन’, ‘वेट अन्टिल डार्क’।

२००३ में, आड्री हेपबर्न के सम्मान में , अमेरीका ने एक स्टैम्प भी निकाला।

ग्रेगरी पेक (५/४/१९१६ – १२/६/२००३), रोमन हॉलीडे के बनते समय (१९५३), हॉलीवुड में बेहतरीन कलाकार के रूप में नाम कमा चुके थे हालांकि उन्हें सबसे अच्छे कलाकार के लिये ऑस्कर पुरस्कार, १९६२ में ‘हाउ टू किल ए मॉकिंग बर्ड’ के लिये मिला। यह पुरस्कार, आड्री हेपबर्न को ऑस्कर पुरस्कार के मिलने के बाद था।

ग्रेगरी पेक ने भी अपने जीवन में दो शादियां की। १९४३ में गेटा कुकोनेन और १९५५ में विरोनीक पसानी के साथ।

मैंने ग्रेगरी पेक की लगभग सारी फिल्में देखीं हैं। रोमन हॉलीडे के अतिरिक्त , ‘मोबी डिक’, ‘हाउ टू किल ए मॉकिंग बर्ड’, ‘द गन्स ऑफ नेवरॉन’, और ‘मैकेन्नाज़ गोल्ड’ उनकी बेहतरीन और देखने योग्य फिल्में हैं।

रोमन हॉलीडे, में वे और आड्री हेपबर्न ने पहली बार साथ काम किया। इन दोनों के बीच, इस फिल्म के दौरान हुई मित्रता जीवन पर्यन्त चली।

रोमन हॉलीडे फिल्म बनते समय उसके विज्ञापन देने की बात चली। इस फिल्म के निर्माताओं ने उसमें ग्रेगरी पेक को ज्यादा स्थान दिया जाने की पेशकश की। उस समय ग्रेगरी पेक हॉलीवुड में स्थापित कलाकार थे पर ऑड्री हेपबर्न की यह पहली हॉलीवुड फिल्म थी। यह ग्रेगरी पेक का बड़प्पन था कि उन्होने कहा कि आड्री हेपबर्न ने इस फिल्म में बहुत अच्छा काम किया है उसे आस्कर पुरस्कार मिलेगा। उसे मेरे बराबर स्थान दिया जाय।

ऑड्री हेपबर्न की मृत्यु के बाद, ग्रेगरी पेक ने नम आंखों के साथ ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की ‘द अनइन्डिंग लव’ (The Unending Love) कविता सुनायी।

‘I seem to have loved you in numberless forms, numberless times…

In life after life, in age after age, forever.

My spellbound heart has made and remade the necklace of songs,

That you take as a gift, wear round your neck in your many forms,

In life after life, in age after age, forever.

Whenever I hear old chronicles of love, it’s age old pain,

It’s ancient tale of being apart or together.

As I stare on and on into the past, in the end you emerge,

Clad in the light of a pole-star, piercing the darkness of time.

You become an image of what is remembered forever.

You and I have floated here on the stream that brings from the fount.

At the heart of time, love of one for another.

We have played along side millions of lovers,

Shared in the same shy sweetness of meeting,

the distressful tears of farewell,

Old love but in shapes that renew and renew forever.’

यह आड्री हेपबर्न को सबसे प्रिय कविता थी।

आड्री हेपबर्न और गेगरी पेक बेहतरीन कलाकार, बहुत अच्छे मित्र, फिर भी कभी रूमानी तौर से नहीं जुड़े। रोमन हॉलीडे फिल्म में प्रेम के साथ सम्मान की सीमा थी तो वास्तविक जीवन में मित्रता के साथ उसकी लक्षमण रेखा।

रिश्तों में सबसे पवित्र रिश्ता है मां का – कुछ बाते मेरी मां के बारे में।

अम्मां बचपन की यादों में

बसंत पंचमी १९३९ – मेरी मां, पिता की शादी। मां , उस समय ११वीं कक्षा की छात्रा थीं और पिता उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। १९४० में, पिता ने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और मां ने इण्टरमीडिएट पास किया। पिता तो, बाबा के कस्बे में, वापस आकर व्यवसाय में लग गये पर मां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर चली गयीं। वे अगले चार वर्ष छात्रावास में रह कर उन्होने स्नातक और कानून की शिक्षा पूरी की। १९४४ में, वे अपने विश्वविद्यालय की पहली महिला विधि स्नातक बनीं। उनकी उच्च शिक्षा पूरी हो जाने के बाद ही, हम भाई-बहन इस दुनिया में आए। १९५० में, मेरे पिता, इस कस्बे में, व्यवसाय की बढ़ोत्तरी के लिये आये।

पिता चाहते थे कि हमारा लालन-पालन एक सामान्य भारतीय के अनुसार हो। वह इतना पैसा जरूर कमाते थे कि हमें हिन्दुस्तान के किसी भी स्कूल में आराम से पढ़ने भेज सकते थे पर उन्होंने हम सब को वहीं पढ़ने भेजा जहाँ हिन्दुस्तान के बच्चे सामान्यत: पढ़ते हैं। हमने अपनी पढ़ाई एक साधारण से स्कूल में पूरी की।

पिता हिन्दी के समर्थक थे। हम भाई बहन हिन्दी मीडियम स्कूल में गये। घर में अंग्रेजी में बात करना मना था। मेरे पड़ोस के सारे बच्चे कस्बे के अंग्रेजी मीडियम विद्यालयों में और कई कस्बे के बाहर हिन्दुस्तान के सबसे अच्छे पब्लिक विद्यालयों में पढ़ते थे। वे सब अंग्रेजी में ही बात करते थे। यह हमें कभी, कभी शर्मिंदा भी करता था। मां हमेशा हमें दिलासा देती,

‘ये लोग अपने स्कूल पर गर्व करते हैं पर तुम्हारा स्कूल तुम पर।’

मां की अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वे अंग्रेजी के महत्व को समझती भी थीं। वे हमें बीबीसी सुनने के लिये प्रेरित करती। प्रतिदिन शाम को, हम सब भाई-बहनों को उन्हें अंग्रेजी की कोई न कोई कहानी या तो रीडर्स डाइजेस्ट से या फिर अखबार पढ़ कर सुनाना पड़ता था। वे हमारा उच्चारण ठीक करती और अर्थ समझाती थीं। किसकी बारी पड़ेगी यह तो हम लोग यह खेल से ही निकालते थे,

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल,

अस्सी नब्बे पूरे सौ।

सौ में लगा धागा,

चोर निकल भागा।

बस जिस पर भागा आया उसे ही पढ़नी पड़ती थी।

एक बार मैंने मां से पूंछा कि तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो, तुमने वकालत या कोई और काम क्यों नहीं किया। उनका जवाब था कि,

‘मैं घर की सबसे बड़ी बहूं हूं। तुम्हारे बाबा के कस्बे से तुम्हारे चाचा, बुआ, उनके लड़के, लड़कियां सब यहीं पढ़ने आए। वे सब हमारे साथ ही रहे, यदि मैं कुछ काम करती तो उनका ख्याल, तुम लोगों का ख्याल कैसे रख पाती। पैसे तो तुम्हारे पिता, हम सबके लिए कमा ही लेते हैं बस इसलिए घर के बाहर जाना ठीक नहीं समझा।’

मैंने उन्हें हमेशा सफेद रंग की साड़ी पहने हुए देखा। उनके सफेद रंग की साड़ी पहनने के कारण, गोवा में चर्च के अन्दर, क्रॉस के ऊपर सफेद कपड़े को देख कर, उनकी याद आ गयी

मैंने मां को कभी सिंदूर लगाये नहीं देखा। एक बार हम ट्रेन में सफर कर रहे थे। एक महिला ने मां से पूछा कि क्या वे विधवा हैं? मां मुस्करायीं और हमारी ओर इशारा कर बोली,

‘इनके पिता को सफेद रंग पसन्द है, बस इसलिये, मैंने इसे अपना लिया। शादी के बाद, जब भी सिंदूर लगाया तो सर में दर्द हो गया – शायद कुछ मिलावट हो। इनके पिता ने सिंदूर लगाने के लिए मना कर दिया। बस इसलिये सिंदूर नहीं लगाती।’

उस महिला ने मां से माफी मांगी पर ट्रेन पर हमारी उनसे अच्छी मित्रता हो गयी। मुझे भी, होली के रंगों से, एलर्जी हो जाती है। शायद, यह मैंने उन्हीं से पाया है।

बहन और मां के बीच में पिक्चर देखने का एक अजीब रिश्ता था। वे दोनों हर हिन्दी पिक्चर को पहले दिन, पहले प्रदर्शन पर जाया करती थीं और पिता के घर वापस पहुँचने के पहले वापस। मैं समझता हूं कि मेरी बहन ने स्कूल वा विश्वविद्यालय से भागकर जितनी फिल्में देखी हैं वह किसी और लड़की ने नहीं देखी होंगीं। जब मेरी बहन ने पढ़ाना शुरू किया तब उसका स्कूल शनिवार को आधे दिन का होता था। तब वे दोनों पहले दिन को छोड़कर शनिवार को पहला शो देखने लगी।

हमें हिन्दी पिक्चर देखने की अनुमति नहीं थी। हम केवल अंग्रेजी पिक्चर ही देख सकते थे। बहन की शादी, मेरे विश्विद्यालय के जीवन के अन्तिम चरण पर हुई। उसके बाद, मेरी मां को पिक्चर देखने के लिए साथी मिलना बन्द हो गया तब मैंने उनके साथ हिन्दी पिक्चर देखना शुरू किया। कुछ दिनों के बाद मेरे दोस्त भी हमारे गुट में शामिल हो गये। टिकट और कोकाकोला के पैसे तो मेरी मां ही देती थी। शादी के बाद मेरी अपनी पत्नी के साथ अनलिखी शर्त थी,

हिन्दी पिक्चर में मेरी मां भी साथ चलेंगी।

वे जब तक जीवित रहीं ऎसा ही रहा। ऐसे हम जब भी कस्बे के बाहर गये, वे हमारे साथ ही गयीं।

मां की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे छोटी-छोटी बातों से जीवन को भरपूर जीना जानती थीं, दशहरे की झांकी हो या कोई मेला हो, वह हमेशा उसमें जाने में उत्साहित रहती थीं और हम लोगों को भी वहां ले जाती थीं। वहां पर चाट खाना, कचौड़ी खाना उनको प्रिय था और हमें भी। मुझे यह अब भी प्रिय है पर मुन्ने की मां को नहीं। बस जब वह नहीं होती है तब ही इसका आनन्द उठाता हूं :-)

मेरी मां एक गरीब परिवार से थीं और वह कहती थीं कि उनके घर एक बार ही खाना बनता था। वे हर का, खास तौर से गरीब रिश्तेदारों का ख्याल ज्यादा ही रखती थीं। उनका कहना था कि जो जीवन में बहुत नहीं कर पाया उसका बहुत ख्याल रखना चाहिए क्योंकि वह शायद हिचक के कारण कुछ न कह पाये।

मैंने मां को पिता से कभी बात करते नहीं देखा पर उनके कुछ न कहने पर वह मेरे पिता के मन की हर इच्छा जान जाती थीं। वे पिता की हर बात नहीं मानती थीं कई बार वे हमारा साथ देती थीं पर जिसे वे मानती थी वह उनके न बताये भी जान जाती थीं जैसे कि वे उनका मन पढ़ लेती हों। मैं अक्सर सोचता हूं कि मुन्ने की मां क्यों नहीं मेरे मन की बात समझ पाती। वह मुझसे कहती है,

‘तुम्हारे मन में जो है वह मुझे बताते क्यों नहीं। मुझे कैसे मालुम चले कि तुम क्या चाहते हो।’

लगता है कि मेरी मां किसी और मिट्टी की बनी थीं। वह मेरे पिता के बिना बोले ही उनका मन जान जाती थीं।

सेक्स का विषय हर जगह वर्जित है। हांलाकि कि बीबीसी के मुताबिक बहुत कुछ बदल रहा है। सीबीएससी में यौन शिक्षा को पाठ्य-क्रम में रखा गया है। हांलाकि इसे कई राज्य सरकारों ने रखने से मना कर दिया। मैं यौन शिक्षा का पक्षधर हूं पर यह किस तरह से हो इसमें जरूर संशय है। आइये कुछ बात करते हैं मेरे परिवार में किस तरह से हुई।

परिवार में यौन शिक्षा

यह चिट्ठी रिश्तों के बारे में है। इस चिट्ठी में यौन शिक्षा के ऊपर बात करना – कुछ अजीब लग रहा है न आपको। चलिये मैं पहले यह स्पष्ट कर दूं कि यह इस चिट्ठी के अन्दर क्यों है?

महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ भीड़-भाड़ की जगह होती है पर यौन उत्पीड़न सगे संबन्धी या जान पहचान व्यक्ति के द्वारा ही ज्यादा होता है। कुछ समय पहले, मैंने इसका उल्लेख ‘उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी‘ चिट्ठी में किया है। पारिवारिक रिश्तों के अन्दर, यौन शिक्षा किस तरह से हो, एक नाजुक पर महत्वपूर्ण विषय है। इसीलिये मैं इसे इस चिट्ठी में रख रहा हूं।

मैं नहीं जानता कि इस विषय को बताने का क्या सबसे अच्छा तरीका है पर मैं वह तरीका अवश्य जानता हूं जैसा कि हमारे परिवार में हुआ। मैंने यह विषय कैसे अपनी आने वाली पीढ़ी को बताया। मुझे, अक्सर स्कूल, विद्यालय, विश्व विद्यालय में जाना पड़ता है। बच्चों से मुकालात होती है। अक्सर, मेरे पास बच्चे यह पूछने के लिये आते हैं कि वे क्या कैरियर चुने, कहां जायें। कभी कभी, मैं उनसे इस विषय पर भी बात करता हूं। मैं, क्या उन्हें बताता हूं, यहां कुछ उसी के बारे में।

मेरे बचपन का एक बहुत अच्छा मित्र, टोरंटो इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापक रहा। कुछ समय पहले उसकी मृत्यु हो गयी। बचपन में ही उसके पिता का देहान्त हो चुका था। भाई, बहनो की भी शादी के बाद, वह और उसकी मां हमारे ही कस्बे में रहते थे। अक्सर उसकी मां उसके भाई या बहनो के पास रहने चली जाती थी। उस समय उसका घर खाली रहता था। उस समय, उसके घर, काफी धमाचौकड़ी रहती थी।

यह १९६० का दशक था। हेर संगीत नाटक का मंचन हो चुका था। मैंने, इसका जिक्र ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके‘ श्रंखला की इस कड़ी में किया है। हिप्पी आंदोलन अपने चरम सीमा पर था। इस धमाचौकड़ी में, अक्सर लड़कियों भी शामिल रहती थीं। कभी कभी चरस और गांजा भी चलता था। मैं खेल में ज्यादा रुचि रखता था। मुझे जिला, विश्वविद्यालय एवं अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य मिला। इसी कारण इस तरीके की धमाचौकड़ी में शामिल नहीं रहता था।

एक बार मेरे मित्र को कुछ ब्लू फिल्में मिल गयीं। एक दूसरे मित्र ने प्रोजेक्टर का इंतजाम कर दिया। उन लोगों ने फिल्म को भी देख लिया। यह सोचा गया कि उसे फिर देखा जायगा पर सवाल था कि ब्लू फिल्म कहां रखी जाय। कोई भी उसे रखने को तैयार नहीं था। मैं ही ऐसा था जो कि इस धमाचौकड़ी मे शामिल नहीं था। इसलिये मेरे पास ही रखना सबसे सुरक्षित समझा गया या यह समझ लीजये कि मुझे उन ब्लू फिल्मों को रखने में कोई हिचक नहीं थी।

मैं ने यह ब्लू फिल्में अपने कपड़े की अलमारी में रख दी। एक दिन मेरे कपड़े लगाते समय मां को ब्लू फिल्में मिल गयीं। उनके पूछने पर मैंने सारा किस्सा बताया और यह भी बताया कि मैंने कोई भी ब्लू फिल्म नहीं देखी है। मां पूछा कि मुझे सेक्स के बारे में कितना ज्ञान है। मेरा जवाब था थोड़ा बहुत। उन्होने कहा कि,

‘ब्लू फिल्मों मे बहुत कुछ नामुमकिन बात होती है और अधिकतर जो भी होता है वह ठीक नहीं। तुम्हें मालुम होना चाहिये कि क्या ठीक नहीं है। इसलिये इसे, तुम्हें देख लेना चाहिये पर उसके पहले सेक्स का अच्छा ज्ञान भी होना चाहिये।’

हम लोग किताबों की दुकान पर गये और वहां से एक पुस्तक Everything you always wanted to know about sex but were afraid to ask by David Reuben खरीद कर लाये। यह पीले रंग की पुस्तक है इसलिये यह पीली पुस्तक के नाम से भी मशहूर हुई।

सेक्स के सम्बन्ध में उत्तेजना चित्र देख कर या उसके वर्णन से होती है। इस पुस्तक में कोई भी चित्र नहीं हैं। इसमें सारा वर्णन प्रश्न और उत्तर के रूप में है। इसे पढ़ कर कोई उत्तेजना नहीं होती है। इस पुस्तक में कुछ सूचना समलैंगिक रिश्तों और सेक्स परिवर्तन के बारे में है। यह इस तरह के विषयों को नकारती है। इसी लिये कुछ लोग इस पुस्तक पर विवाद करते हैं। यह दोनो विषय विवादस्पद हैं। मैंने इनके बारे में ‘Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री‘, ‘आईने, आईने यह तो बता – दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन‘, ‘मां को दिल की बात कैसे बतायें‘, और ‘मां को दिल की बात कैसे पता चली‘ नाम से लिखा है। यदि आप इस पुस्तक में इस विषय की सूचना को छोड़ दें तो बाकी सूचना के बारे में कोई विवाद नहीं है और लगभग सही है। मेरे विचार से यह एक अच्छी पुस्तक है।

मैंने, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ब्लू फिल्म देखना जरूरी नहीं समझा। ब्लू फिल्म न देखने के निर्णय में, कई अन्य बातों ने भी महत्वपूर्ण रोल निभाया। मां ने,

  • मुझे न तो उन फिल्मों को रखने के कारण डांटा, न ही देखने के लिये मना किया, जिसकी मनाही हो उसी के बारे में उत्सुकता ज्यादा रहती है;
  • हमेशा हमें, बाहर के खेल पर, पढ़ाई से भी ज्यादा ध्यान देने के लिये प्रोत्साहित करती थीं। उस समय पढ़ाई का वैसा बोझ नहीं था जैसा कि आजकल होता है।

मां का प्रिय वाक्य थे,

‘पढ़ाई बन्द करो और बाहर जा कर खेलो।’

यदि हम रात को देर तक पढ़ते थे तो हमेशा कहती थीं,

‘चलो, सोने जाओ। बहुत रात तक पढ़ना ठीक नहीं।’

परीक्षा के दिनो में तो हमारे कमरे की बत्ती बहुत ज्लद ही बन्द कर दी जाती थी। वे कहती थीं,

‘परीक्षा के समय दिमाग एकदम तरोताजा रहना चाहिये।’

मैंने अपने बेटे को, जब स्कूल में ही था तब यह पुस्तक पढ़ने के लिये दी। वह बारवीं के बाद आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चला गया और होस्टल में ही रहा। मैं समझता हूं कि उन्हें इस पुस्तक के पढ़ने के कारण मदद मिली।

देश के कुछ महाविद्यालयों में, पास-ऑउट करने वाले छात्रों की एक पत्रिका निकाली जाती है। आई.आई.टी. कानपुर में भी ऐसा होता है। यह पत्रिका विद्यार्थी ही निकालते हैं इसमें उनके साथी ही उन्हीं के बारे में लिखते हैं। मैं एक बार उनकी इस पत्रिका को पढ़ने लगा तो उन्होने मना किया,

‘पापा, तुम मत पढ़ो। इसे पढ़ कर तुम्हे अच्छा नहीं लगेगा।’

मैंने कहा,

‘मैं भी अपने विद्यार्थी जीवन में इन सब से गुजर चुका हूं इसलिये कोई बात नहीं।’

उनकी पत्रिका में बहुत सारी बातें स्पष्ट रूप से लिखी थीं। हमारे समय में भी उस तरह की बातें होती थी पर इतना स्पष्ट रूप से नहीं लिखा जाता था। मैंने School Reunion चिट्ठी लिखते समय लिखा था कि मेरे बेटा आई.आई.टी. कानपुर की पत्रिका में दी गयी पहली दो सूची में नहीं हैं पर विद्यार्थियों की इस पत्रिका में उनके बारे में यह अवश्य लिखा है कि वह सबसे साथ सुथरा बच्चा है। हो सकता है यह उसके संस्कारों के कारण हो पर मेरे विचार से यह उनके इस पुस्तक को पढ़ने और यौन शिक्षा को अच्छी तरह से समझने के कारण भी है।

मेरे विचार में, परिवार के अन्दर, आने वाली पीढ़ी को अच्छी किताबें बताना, मुक्त पर स्वस्थ यौन चर्चा करना, एक अच्छी बात है। अन्यथा, नयी पीढ़ी को गलत सूचना मिल सकती है और वे गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं।

करो वही, जिस पर विश्वास हो

कई दशक पहले, जून १९७५ में आपातकाल की घोषणा हुई थी। उस समय, मैं कश्मीर में था। लोग पकड़े जाने लगे। मुझे लगा कि मुझे कस्बे पहुंचना चाहिये। मेरे पिता पकड़े जा सकते हैं और मां अकेले ही रह जांयगी। यही हुआ भी। मेरे कस्बे पहुंचते पता चला कि पिता को झूठे केस में डी.आई.आर. में बन्द किया गया। उन पर इल्जाम लगाया गया कि वे यह भाषण दे रहे थे कि जेल तोड़ दो, बैंक लूट लो। यह एकदम झूट था। उस समय देश की पुलिस और कार्यपालिका से सरकारी तौर पर जितना झूट बुलवाया गया उतना तो कभी नहीं, यहां तक अंग्रेजों के राज्य में भी नहीं। डी.आई.आर. में मेरे पिता की जनामत हो गयी पर वे जेल से बाहर नहीं आ पाये। उन्हें मीसा में पकड़ लिया गया।

यह समय हमारे लिये मुश्किल का समय था। समझ में नहीं आता था कि पिता कब छूटेंगे। इस बीच, मित्रों, नातेदारों ने मुंह मोड़ लिया था। लोग देख कर कतराते थे। उनको डर लगता था कि कहीं उन्हें ही न पकड़ लिया जाय। मां यह समझती थीं। उन्होंने खुद ही ऐसे रिश्तेदारों और मित्रों को घर से आने के लिये मना कर दिया ताकि उन्हें शर्मिंदगी न उठानी पड़े। मुझे ऐसे लोगो से गुस्सा आता था। मैंने बहुत दिनो तक अपने घर कर बाहर पोस्टर लगा रखा था,

‘अन्दर संभल कर आना, यहां डिटेंशन ऑर्डर रद्दी की टोकड़ी पर पड़े मिलते हैं।’

इस मुश्किल समय पर कइयों ने हमारा साथ भी दिया। उन्हें भूलना मुश्किल है और उन्हें भी जो उस समय डर गये थे।

दो साल (१९७५-७७), मैंने न कोई पिक्चर देखी, न ही आइसक्रीम खायी, न ही कोई दावत दी, न ही किसी दावत पर गये। पैसे ही नहीं रहते थे। उस समय भी लोग, अक्सर हमसे पैसे मांगने आते थे। उन्हें भी मना नहीं किया जा सकता था वे भी मुश्किल में थे, उनके प्रिय जन भी जेल में थे।

आपातकाल के समय, कई लोग माफी मांग कर जेल से बाहर आ गये पर पिता ने नहीं मांगी। उनका कहना था,

‘मैंने कोई गलत काम नहीं किया। मैं क्यों माफी मांगू। माफी तो सरकार को मागनी चाहिये।’

वे लगभग दो साल तक जेल में रहे। १९७७ के चुनाव के बाद पुरानी सत्तारूढ़ पार्टी, चुनाव हार गयी तभी वे छूट पाये।

मां से संबन्धित आपतकाल की एक घटना मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। वे हमेशा कहती थीं,

‘करो वही, जिस पर विश्वास हो। दिखावे के लिये कुछ करने की कोई जरूरत नहीं।’

वे न इसे कहती थीं पर इसे अमल भी करती थीं। नि:संदेह, ढ़कोसलों का उनके जीवन पर कोई स्थान नहीं था।

शिव आराधना … से कोई नहीं छूटेगा

आपतकाल के दौरान, जब मेरे पिता जेल में थे तो हमारे शुभचिन्तक हमारे घर आये। उन्होंने मेरी मां से अकेले में बात करने को कहा। बाद में मैंने मां से पूछा कि वे क्यों आये थे और क्या चाहते थे। मां ने बताया,

‘वे कह रहे थे कि यदि मैं मंदिर में शिव भगवान की आराधना करूंगी, तो तुम्हारे पिता छूट सकेंगे।’

मां ने यह नहीं किया। वे आर्यसमाजी थीं और इस तरह के कर्मकाण्ड (ritual) पर उनका विश्वास नहीं था। उनका कहना था कि,

‘शिव अराधना केवल मन की शान्ति के लिये है। उससे कोई नहीं छूटेगा। लोग तो छूटेंगे न्यायालाय से या फिर जनता के द्वारा।’

उच्च न्यायालय ने तो हमारा साथ दिया पर सर्वोच्च न्यायालय ने हमें शर्मिन्दा किया। सीरवाई एक प्रसिद्ध न्यायविद रहे हैं। वे बहुत साल तक महाराष्ट्र राज्य के महाधिवक्ता रहे और उनकी भारतीय संविधान पर लिखी पुस्तक अद्वतीय है। इस पुस्तक (Constitution of India: Appendix Part I The Judiciary Of India) में वे कहते हैं कि,

‘The High Courts reached their finest hour during the emergency; that brave and courageous judgements were delivered; … the High Courts had kept the doors ajar which the Supreme Court barred and bolted’.

आपातकाल का समय, उच्च न्यालयों के लिये सुनहरा समय था। उस समय उन्होने हिम्मत और बहादुरी से फैसले दिये। उन्होने स्तंत्रता के दरवाजों को खुला रखा पर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बन्द कर दिया।

आपातकाल के बाद, वे सब हमारे पास पुन: आने लगे जिन्होंने हमसे मुंह मोड़ लिया था। मां, पिता ने उन्हें स्वीकार कर लिया, हमने भी। सरकार ने पिता को राजदूत बनाकर विदेश भेजने की बात की पर उन्होने मना कर दिया। वे अपने सिद्घान्त के पक्के थे। आपातकाल के समय न माफी मांगी और न ही बाद में कोई पद लिया। उनका कहना था,

‘मैंने किसी पद के लिये समाज सेवा नहीं की।’

मुझे अच्छा लगता है, गर्व भी होता है कि मेरी मां, मेरे पिता ऐसे थे। जिन्होंने हमेशा वह किया जो उन्हें ठीक लगता था – दुनिया के दिखावे के लिये नहीं।

जो करना है वह अपने बल बूते पर करो

मेरे पिता हमेशा अपने व्यवसाय या फिर समाजिक सेवा में व्यस्त रहते थे। उनके पास हमारे या मां के लिये कभी समय नहीं होता था। हमें, इसका हमेशा मलाल रहा।

मैं अक्सर अपने मित्रों को पिता के साथ मौज करते देखता था, जलन भी होती थी। यह सारी कमी मां ही ने पूरी की। पिता यदि चाहते तो बहुत पद मिल सकते थे हमारे लिये बहुत कुछ कर सकते थे पर कभी किया नहीं। सबके पिता करते थे इसीलिये हमें अपने पिता समझ में नहीं आते थे। उनका कहना था,

‘जो करना है वह अपने बल बूते पर करो। यही जीवन सार्थक जीवन है।’

आज, जीवन के तीन चौथाई बसन्त देख लेने के बाद, अब पिता समझ में आने लगे हैं, उनके सिद्धान्त भी समझने लगा हूं, उन पर गर्व भी होने लगा है।

मेरे विचार में, पिता की कही बातों के साथ, यह भी आवश्यक है कि हम आने वाली पीढ़ी के साथ समय व्यतीत करें। हमारे बच्चे ही हमारे सबसे बड़ी सम्पदा हैं। पिता के सिद्धन्तो के कारण हम उस स्कूल में गये जहां एक साधरण हिंदुस्तानी जाता है। शायद यही कारण हो कि मैंने अपने मुन्ने का दाखिला देहरादून में, हिन्दुस्तान के एक सबसे जाने माने बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया। दाखिले के समय उस स्कूल के प्रधानाचार्य (या शायद उप- प्रधानाचार्य) ने कहा,

‘हमारा स्कूल हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा स्कूल उन बच्चों के लिये है जिनके माता पिता के पास बच्चों के लिये समय नहीं है।’

मुझे अपना जीवन याद आया। मैंने मुन्ने को वहां नहीं भेजा। मैं नहीं चाहता था कि मेरा बेटा कभी सोचे कि हमारे पास उसके लिये समय नहीं था।

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन (Richard Philips Feynman) भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार विजेता थे। वे पिछली शताब्दी के दूसरे भाग के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक रहें हैं। उनकी गोद ली हुई पुत्री ने उनके पत्रों को सजों कर, Don’t you have time to think‘ पुस्तक लिखी है। मैंने, इस पुस्तक के बारे में क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है? नाम से श्रंखला लिखी है। अपने मुन्ने के साथ बिताये कुछ पलों का जिक्र मैंने इस श्रंखला की ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगाचिट्ठी में किया है।

अम्मा – अन्तिम समय पर

मेरे पिता अपने काम में व्यस्त रहते थे या फिर समाज सेवा में। उनके पास, हमारे या मां के लिये समय नहीं रहता था। इसलिए मां को जहां भी जाना होता था, वे हमारे साथ ही जाती थीं। यह रवैया हमारी शादी के बाद भी चला। मेरी पत्नी ने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया।

मां दूसरों के मन की बात समझती थीं और उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करती थीं। १९८० के दशक में उन्हें दिल की बीमारी हो गयी, अक्सर डाक्टर उन्हें देखने आया करते थे। मेरी सास ने कई साल अमेरिकी विश्विद्यालयों में पढ़ाया है। मेरी शादी के बाद जब वे सबसे पहले पढ़ाने के लिये गयीं तो मुन्ने की मां, मेरी मां की बीमारी के कारण उन्हें दिल्ली तक छोड़ने नहीं जा पा रही थी। उसने मुझे कहा कि मैं दिल्ली जाकर उन्हें छोड़ आऊं। मैंने दिल्ली जाने का प्रोग्राम भी बना लिया। शाम को उसने फोन करके बताया कि अम्मा की तबियत खराब है और मैं घर आ जाऊं। उसने डाक्टर को भी बुला लिया था। जब तक मैं घर पहुँचा, डाक्टर साहब मां को देख चुके थे और जाने लगे। चलते-चलते जब मैं डाक्टर साहब को उनकी कार तक छोड़ने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि,

‘अम्मा की तबियत ठीक है और तुम दिल्ली जा सकते हो।’

मैंने कहा कि मैं इस बारे में सोचूंगा। मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था और दिल्ली नहीं गया।

मां की तबियत अगले दिन बहुत अच्छी हो गयी। मुझे लगा कि मैंने बेकार ही दिल्ली प्रोग्राम रद्द किया। इसके अगले दिन ही, मां ने सुबह चाय बनायी। अखबार पढ़ते-पढ़ते, चाय की चुस्की लेते, उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे वहां चली गयी जहां से कोई वापस नहीं आता। वे अन्त तक सारे काम स्वयं करती रहीं। उन्हें न कभी किसी सहारे की जरूरत पड़ी, न ही उन्होंने किसी का सहारा लिया, न ही वे ऐसा जीवन पसन्द करती थीं। शायद भगवान भी, जिससे ज्यादा प्यार करता है – उसे इसी तरह की जिन्दगी, इसी तरह की मौत देता है। हे ईश्वर, मुझे भी इसी तरह की मौत देना।

अम्मां ने डाक्टर साहब को अपनी तबियत के बारे में न बताने कि कसम दी थी

कुछ दिनों बाद, बातचीत के दौरान मैंने मुन्ने की मां से कहा कि,

‘अच्छा हुआ कि मैं दिल्ली नहीं गया और चला जाता तो मैं कभी अपने आपको माफ नहीं कर पाता पर मेरी समझ में नहीं आया कि डाक्टर साहब ने यह कैसे कह दिया कि मैं दिल्ली जा सकता हूं जबकि अम्मां की तबियत ठीक नहीं थी।’

उसने जवाब दिया,

जब तुम नहीं थे तो अम्मा ने डाक्टर साहब से कहा था कि, तुम दिल्ली जाना चाहते हो, प्रोग्राम बना है और टिकट भी आ गया है, इसलिए डाक्टर साहब तुमसे कह दें कि उनकी तबियत एकदम ठीक है और यह न कहें कि कुछ टेस्ट करवाने हैं। जो भी टेस्ट करवाना है वे अगले दिन आकर लिख देंगे। वे उसकी फीस अलग से दे देंगी। उन्होंने मुझे और डाक्टर सहब को तुम्हें यह न बताने कि कसम भी दिलवा दी थी। इसलिए मैंने तुम्हे नहीं बताया और डाक्टर साहब ने तुम्हे दिल्ली जाने को कह दिया।’

मुझे लगा कि वह मरते समय भी, इस बात का ख्याल रखती थी कि हम क्या चाहते हैं।

हो सकता है कि आज के समय में बेटे और बेटियों का मां से रिश्ता मदर-डे पर एक कार्ड देना ही रह गया हो पर मैं नहीं समझता कि मां का अपने बेटे और बेटियों से रिश्ता कार्ड तक है। यह कहीं ज्यादा गहरा, कहीं ज्यादा सच्चा है। मैं नहीं समझता कि इसे आंकने के लिये कोई नपना है, न कभी कोई नपना बनाया जा सकेगा।

अगले दो शीर्षक ‘मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी‘ और ‘रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है‘ के अन्दर लिखी सामग्री मेरे पत्नी के चिट्ठे ‘मुन्ने के बापू‘ से है और उसी द्वारा लिखी गयी है। उसी के कहने पर उसे यहां जोड़ा जा रहा है।

मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी

अधिकतर भारतीय पति पत्नी को आपसी स्नेह प्रगट करना बहुत मुश्किल है क्या इस पर बदलाव आयेगा?

उन्मुक्त ने भी, आज तक मुझसे, स्नेह प्रगट करने वाले शब्द नहीं कहे हैं, मुझे इनका इंतजार है पर हमारे जीवन में कुछ ऐसा अवश्य हुआ है।

यह मेरा जन्मदिन हमेशा याद रखते हैं पर लगभग दो दशक पहले मेरे जन्मदिन पर एक बार मुझसे कुछ नहीं कहा। मुझे लगा कि यह मेरा जन्मदिन भूल गये हैं। मैंने भी इन्हे याद नहीं दिलाया पर बुरा जरूर लगा। उस दिन शाम को हमारे मित्र की बिटिया के जन्मदिन की पार्टी एक रेस्ट्राँ में थी। उस समय इनकी एक मीटिंग थी इसलिये ये वहां नहीं जा सकते थे। इन्होने मुझसे जाने के लिये और एक उपहार देने के लिये कहा। मुझे बहुत गुस्सा आया – मेरा तो जन्म दिन भी याद नहीं और दूसरे के लिये उपहार।

मैं और हमारा बेटा शाम को रेस्ट्राँ में गये। थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि हमारे मित्र और रेस्ट्रां मालिक मेरे बारे में बात कर रहे हैं। वे मेरी तरफ देख रहे थे और कुछ इशारा सा कर रहे थे। मुझे कुछ अजीब सा लगा। इसके बाद रेस्ट्रां मालिक, फूलों का एक सुन्दर सा गुलदस्ता लाया। मैं समझती रही कि यह तो उस लड़की के लिये होगा जिसका जन्मदिन है पर उसने वह मुझे भेंट किया और कहा कि कोई सज्जन इसे मुझे देने के लिये कह गये थे। मैंने उससे उस सज्जन का नाम पूछा तो उसने कहा कि वह उस व्यक्ति को शक्ल से पहचानता है पर नाम नहीं मालुम। गुलदस्ते के साथ लगे कार्ड में लिखा था

‘क्या बताने की जरूरत है कि यह किसकी तरफ से है।’

हमारे मित्र ने बताया कि वह रेस्ट्राँ मालिक, मुझे गुलदस्ता देने में डर रहा था कि कहीं मैं बुरा न मान जाऊं। वह हमारे मित्र से इसी बारे में पूछ रहा था। रेस्ट्राँ मालिक को वास्तव में इनका नाम नहीं मालुम था पर जब उसने हमारे मित्र को गुलदस्ता देने वाले का हुलिया बताया तो मित्र ने उसे अश्वस्त किया कि वह व्यक्ति कोई और नहीं पर मेरे पति ही हैं, वे इसी तरह के काम करते हैं। गुलदस्ता देने में कोई हर्ज नहीं।

शायद रिशतों में यह भी महत्वपूर्ण है कि जीवन में कुछ न कुछ अप्रत्याशित होते रहना चाहिये।

पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है

वर्ष २००८ में, उन्मुक्त फिर से मेरा जन्मदिन फिर भूल गये थे। यह एक बिमारी जूझ कर उठे थे … मौत के करीब से गुजरे थे। मुझे यही लगा कि यह उसी उलझन में भूल गये। यह समय इन सब बातों को याद दिलाने का नहीं है। मैं भी भूल गयी।

मेरे घर के पास एक स्वामी जी योग सिखाते हैं। शाम को वे महिलाओं को अलग से सिखाते हैं। मैं अपनी सखियों के साथ वहां पैदल जाती हूं। उस दिन शाम को लौटते समय, मेरे घर के सामने कई कारें खड़ी थीं। मेरी सखी ने मुझसे कहा,

‘क्या तुम्हारे यहां कोई दावत है।’

birthday-cakeमैंने कहा नहीं, पर लगता है कि कुछ लोग मिलने आयें हैं।

अन्दर पोर्टिको में एकदम नयी बिना नम्बर की कार खड़ी थी। उसमें रिबन लगा था। मुझे लगा कि हमारा कोई मित्र अपनी नयी कार दिखाने आया है।

अन्दर ड्रॉइंग रूम में मेरे परिवार के सदस्य, मेरे मित्र थे, एक केक था जिसमें लिखा था जन्मदिन मुबारक और मुझे बाहर नयी कार, मेरे जन्ददिन पर इनकी तरफ से उपहार।

कार मारुति की ए-स्टार है जो कि ११ नवम्बर को निकली थी। यह उसका सबसे अच्छा और सबसे मंहगा (चार लाख दस हज़ार रुपये) वाला मॉडेल है।

यह हमारे कस्बे में बिकने वाली इस तरह की पहली कार है। इस कार को, न तो मैंने न ही इन्होंने, इसे चलाया या देखा था। उसके बारे में इन्होंने बिमारी के दौरान नर्सिंग होम के कमरे में टीवी में देखा था और हमारे मित्र से इसे चुपचाप ऑर्डर देने के लिये कहा था। सबके चले जाने के बाद, मैंने इनसे पूछा,

‘इस समय इतना मंहगा उपहार क्यों? हमें इस समय न केवल पैसों की जरूरत है पर तुम्हें अपने स्वास्थ और समय का भी ध्यान रखना है। तुमने व्यर्थ में ही इस अप्रत्याशित मंहगे उपहार को खरीदा और दावत इन्तजाम करने में समय जाया किया। यह समय इसके लिये नहीं है।’

इनका जवाब था।

‘हमने ३० साल साथ साथ गुजार लिये हैं। इतने समय बाद रिश्तों में बासीपन आ जाता है। ऐसे में यदि पुराने रिश्तों में नयापान न लाया जाय तो नये रिश्ते कायम हो सकते हैं। पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें कायम होने से बेहतर है।’

महत्वपूर्ण है रिश्तों में नयापन लाना, देखना कि वे टूटें नहीं।

प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो

यह कोई बीस साल पहले की बात है, पहली बार, मुन्ने की मां लम्बे समय के लिये विदेश जा रही थी। मुन्ने को कुछ गर्व था तो कुछ दुख कि मां इतने लम्बे समय के लिये छोड़ कर जा रही है। एक दिन उसने मुझसे पूछा, क्या मां हमें प्यार नहीं करती। मैंने कहा नहीं वह हम सबसे बहुत प्यार करती है पर तुम ऐसा क्यों सोचते हो। उसने पूछा,

‘यदि वह हमसे प्यार करती है तो इतने दिन तक हमें क्यों छोड़ कर जा रही है। हमें कुछ मुश्किल होगी तो कौन बतायेगा।’

मैं उसे कैसे बताऊं ।

हमने बैठ कर कई मुद्दों पर बात की। मैंने कहा, मैं तो रहूंगा, तुम्हें कोई मुश्किल नहीं होगी। उन्होने पूछा,

‘क्या तुम्हारे पास समय है’

मैंने कहा कि जब मां थी तो वह समय निकालती थी, जब तक वह नहीं है, तब मैं निकालूंगा। उनको यह बताने का प्रयत्न किया,

‘प्यार तो विश्वास है, यह लोगों को बांधता नहीं पर उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है जो उनके जीवन में महत्वपूर्ण है। रिश्तों का बांध कर रखना ठीक नहीं।’

मैं नहीं जानता कि मुन्ना कितना समझ पाया पर यह सच है कि उसने अपनी मां का विदेश जाना, स्वीकार कर लिया। उसके पीछे, वह बहुत खुश भी रहा। मैं नहीं जानता कि वह इसलिये की उसे मेरी बात समझ में आयी या इस लिये कि उसकी मां तो आर्मी की जनरल साहिबा हैं और मैं – शायद भावना में हर पल को जीने वाला। मुन्ने को इतनी छूट कभी नहीं मिली – इस समय भी नहीं, जब वह अपना बसेरा, सात समुन्दर पार, बहुत दूर, बसाने चला गया।

पिछले साल हम सब, मेरा बेटा, बिटिया रानी (मेरी बहूरानी) साथ थे। मैंने पूछा,

‘क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?’

उनका जवाब था,

पापाऽऽ!! यह कैसा सवाल है।’

मैंने बहुत सीरियस हो कर पूछा तुम लोग बहुत दूर, सात समुंदर पार चले गये हो बस इसलिये जानना चाहा। वह, मेरी सीरियस मुद्रा देखकर समझ गया। उसने मुस्कराते हुऐ, जवाब दिया,

‘पापा, हमें तुम्हारी बीस साल पहले की बात आज भी याद है।’

वह मुझसे कहता है कि मैं भी वहीं उसके पास आ जाऊं पर मैं जानता हूं कि मेरा जीना यहां ही है और मेरी मौत भी यहीं होगी।

प्यार तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो। यदि बांध कर रोका तो यही होगा, जैसा यहां हुआ :-)

प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।

खामोशी फिल्म १९६९ में आयी। इसका निर्देशन असित सेन ने किया है। इसमें राजेश खन्ना और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका निभायी थी। कहानी इस प्रकार है कि राजेश खन्ना एक असफल प्रेम प्रसंग के कारण अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। पागलखाने में राधा नाम की एक नर्स हैं जिसका किरदार वहीदा रहमान ने निभाया है। डाक्टर, वहीदा रहमान को राजेश खन्ना के साथ प्रेम का नाटक करने को कहते हैं। राजेश खन्ना तो ठीक हो जाते हैं पर वहीदा रहमान अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है क्योंकि इसके पहले धर्मेन्द्र के साथ प्रेम का नाटक करते-करते वह सच में उससे प्रेम करने लगती है और बार-बार प्रेम का नाटक नहीं कर सकती।

खामोशी की सहृदय नर्स राधा के किरदार में वहीदा का अभिनव अद्वितीय है इसको उनकी जैसी संवेदनशील कलाकारा ही अभिनीत कर सकती थीं कोई और नहीं। हांलाकि मुझे इस फिल्म की कहानी में कोई दम या सत्यता नहीं लगती।

इस फिल्म में गुलजार का लिखा एक गीत है जिसे लता मंगेशकर ने गाया है। यह गाना मेरे प्रिय गानो में से एक है। इसके बोल इस प्रकार हैं:khamoshi

‘हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू,

हाँथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो।

सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,

प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।

प्यार कोई भूल नहीं, प्यार आवाज नहीं,

एक खामोशी है, सुनती है कहा करती है।

न ये झुकती है न रूकती है न ठहरी है कहीं,

नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है।

सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,

प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।

मुस्कराहट से खिली रहती है आँखों में कहीं,

और पलकों के उजाले से झुकी रहती है।

होंठ कुछ कहते नहीं काँपते ओठों से मगर,

इसमें खामोशी के अफसाने रूके रहते हैं।

सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,

प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।’

इस गाने का विडियो भी आप देख सकते हैं।

जहां तक मैं समझता हूं, यही है इस चिट्ठी का सरांश, यही है। इस जमाने की रमती खुशबू, यही है – रिश्तों की महकती खुशबू। रिश्ते तो हैं विश्वास, इसे बांध कर मत रखो – प्रेम तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है।

पुनःलेख – जीना इसी का नाम है

यह श्रंखला मुझे, मेरे बचपन के जीवन की यादों में, मेरे उन्मुक्त दिनों के बीच ले गयी। वे दिन ही मेरे जीवन के सबसे सुखद दिन थे, चिन्ता रहित थे।

इस श्रंखला को लिखते समय, एक शादी के समय, हम सब भाई, बहन, हमारे बेटे, बेटियां, बहुरानियां, दामाद सब साथ थे। हमने अपनी मां के साथ के, अपने बचपन के दिनों को फिर से जिया। उन चिट्ठियों को पढ़ने के बाद हम सब की आंखें नम थीं। हांलाकि हमारी आने वाली पीढ़ी उसे उतना नहीं समझ पायी जितना हम चाहते थे। समय बदल गया, समीकरण बदल गये, समाज का ढांचा बदल गया।

हम सब ने अपने सुखद दिनो की याद की, उनमें पुनः जिया। इस तरह की अनुभूति जीवन में प्रसन्नता एवं उत्साह भरता है और जीवन में कुछ नया करने को न केवल प्रेरित करता है पर इसकी हिम्मत भी देता है। इस श्रंखला ने वह सब न केवल मेरे साथ पर हमारे परिवार के साथ किया।

इस श्रंखला कि एक चिट्ठी शैली (Percy Bysshe Shelley) कि कविता ‘To a Skylark’ की एक पंक्ति ‘Our sweetest songs are those that tell of saddest thought’ है। इस कविता आप यहां पढ़ सकते हैं।

मैं अंग्रेजी या हिन्दी साहित्य का कभी भी विद्यार्थी नहीं रहा। कुछ थोड़ा बहुत अपने आप ही पढ़ा है। शैली को भी तभी पढ़ा था। जब मैं इस विषय पर लिखने की सोचने लगा तो मैंने अपने एक मित्र उसकी पत्नी से फोन कर शैली की उस पंक्ति का मतलब समझाने को कहा। वे दोनो अंग्रेजी विषय पढ़ाते हैं। तीन दिन बाद मिलना तय हुआ। हम लोग रात में देर तक शैली और रुमानी कवियों के बारे में बात करते रहे।

कुछ देर बाद मेरे मित्र की पत्नी ने मुझ धन्यवाद दिया। मझे आश्चर्य हुआ और पूछा,

‘तुम मुझे क्यों धन्यवाद दे रही हो? धन्यवाद तो, मुझे तुम लोगों को देना चाहिये।’

उसने कहा,

‘हम दोनो अंग्रेजी पढ़ाते हैं। पढ़ाना, हमारे लिय उस दैनिक कार्य की तरह है जैसे दाल रोटी खाना, बस और कुछ नहीं। तुम्हारे द्वारा, शैली की उस पंक्ति का अर्थ पूछने पर, अन्य अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच इस विषय पर चर्चा हुई और एक अच्छी बहस हुई कि उस पंक्ति का क्या अर्थ है। हमने तुम्हारे सवाल के जवाब पाने के लिये कई सुनहरे पल बहस में गुजारे। यह सब इसलिये हुआ कि तुम्हें शैली के बारे में उतनी उत्सुकता है। यह तुम्हें धन्यवाद है, हमें सुनहरे पल वापस देने का।’

Anariमुझे गोवा यात्रा से हवाई जहाज पर लौटते समय, विमान परिचारिका की कही बात, ‘अंकल तो बच्चे हैं‘, याद आ गयी। जीवन में जिज्ञासू बनना, उत्सुक रहना, कुतूहल जताना तो बच्चों का काम है।

शायद जिंदादिली ही उत्सुकता का दूसरा नाम है और यही है, जीवन, जीने का दर्शन।

जीवन को दुसरे रूप में देखने की बात तो अनाड़ी फिल्म का यह गाना भी बताता है। यह गाना मुकेश ने गाया है और इसे राज कपूर पर फिल्माया गया है। इसका भी आनन्द लीजिये।

सांकेतिक शब्द

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जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है

कहते हैं कि जहांगीर जब सबसे पहली बार कश्मीर पहुंचे तो कहा कि जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है,  यहीं है।

मैं १९७५ की जून में कश्मीर गया था। मुन्ने की मां कभी नहीं गयी। हम लोगों ने कई  बार कश्मीर  जाने का प्रोग्राम बनाया पर बस जा न सका। हमारे सारे दायित्व समाप्त हैं। इसलिये मन पक्का कर, इस गर्मी में हम लोग कश्मीर के लिये चल दिये।

दिल्ली से श्रीनगर के लिये हवाई जहाज पकड़ा। रास्ते में भोजन मिला।  प्लेट में एक प्याला भी था। चाय नहीं मिली पर  जब  प्लेट वापस जाने लगी। तो मैने परिचायिका से पूछा कि यदि चाय या कॉफी नहीं देनी थी तो  प्लेट में कप क्यों रखा था।  वह मुस्कराई और बोली,

‘आज फ्लाईट में बहुत भीड़ है।  फ्लाईट केवल एक घन्टे की है इतनी देर में सबको चाय या कॉफी दे कर सर्विस समाप्त करना मुश्किल था। इसलिये नहीं दी,  पर लौटते समय जरूर मिलेगी।’

परिचायिका का मुख्य काम तो अच्छी तरह से बात करना होता है। लौटते समय कौन किससे मिलता है।

बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है

श्रीनगर पहुंचते ही, हम टैक्सी पकड़कर पहलगांव के लिए चल दिये। पहलगांव समुद्र तट से लगभग ७५०० लगभग फीट की ऊँचाई पर है। यहां लिडर और शेषनाग नदियों का संगम है। श्रीनगर से पहलगांव का रास्ता लिडर नदी के साथ चलता है और सुन्दर है।

हमारे टैक्सी चालक का नाम ओमर था। उसने कहा कि बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम दोनो एक जैसे हैं, पता नहीं कब बदल जाय।  बहुत ज्लद ही इसका अनुभव हो गया। रास्ते में कहीं पांच मिनट बारिश, तो फिर  तेज धूप।

रास्ते में हमने रूक कर कशमीरी कहवा पिया। यह सुगंधित चाय सा था। इसमें दूध तो नहीं पर दालचीनी और बादाम पड़े थे।

पहलगांव में हम हीवान (Heevan) होटल में ठहरे।  यह होटल लिडर नदी के बगल में है। खिड़की के बाहर सफेद हिम अच्छादित पहाड़ या फिर पेड़ों से भरी हरी पहाड़ियां थीं। देखने में मन भावन दृश्य था।

पहलगांव, पहुंचते शाम हो चली थी। लिडर  नदी पर रैफ्टिंग भी होती है। मैंने सोचा क्यों न रैफ्टिंग कर ली जाय। होटेल वालों ने कार से दो किलोमीटर ऊपर नदी के किनारे छुड़वाया फिर नदी पर  रैफ्ट के ऊपर, तेज धार के साथ, तीन किलोमीटर का सफर – सर पर हैमलेट और बदन पर जैकट।  रैफ्टिंग करने में पूरी तरह भीग गये।  बीच में पानी भी बरसने लगा,  रही सही कमी भी पूरी हो गयी। रैफ्ट ने होटल के आगे छोड़ा । वहां से दौड़ लगाकर वापस होटल आए तो कुछ गर्मी आई। कमरे में आकर कपड़े बदले फिर गर्म चाय पी तो जान में जान आयी।

हम लोग पहले मां के साथ ऐसी जगहों पर जाते थे। मां हमेशा एक छोटी बोतल में ब्रांण्डी साथ रखती थी। ठंड लगने पर गर्म दूध में एक चम्मच ब्रांडी डालकर पीने के लिए देती थी।  हम लोग ब्रांडी नहीं ले गए थे।  मुझे फिर मां की याद आयी। अगली बार अवश्य साथ ले जाऊंगा।

यदि आप यह सोचते हैं कि कश्मीर में  विस्की से गर्मी पा  सकती  हैं।  तो भूल जाइये। इस्लाम में शराब पीना हराम है। वहां अधिकतर लोग मुसलमान हैं इसलिये  कश्मीर में शराब हराम है।  हां,  चोरी छिपे  जरूर पी जाती है।

यहां पर आकर लगा कि हमे छाता भी लाना चाहिए था मालुम नहीं कब, पांच मिनट के लिए बरसात।

कश्मीर में एक अनुभव और हुआ। यहां होटल अच्छे हैं। खाना अच्छा है पर तौलिये साफ नहीं होते हैं। उसका कारण यह बताया कि सूखने में मुश्किल होती है।  मुझे लगा कि अपने साथ छोटे छोटे तौलिये भी रहने चाहिये ताकि बदन पोंछा जा सके।

बहुत अच्छा हुआ कि मैंने पहुंचते ही रैफ्टिंग कर ली। मुन्ने की मां ने नहीं की थी। उसे डर लगता था। अगले दिन रैफ्टिंग नहीं हो रहीं थी। होटल वाले ने बताया कि किसी ने रैफ्टिंग वाले को पीट दिया था इसलिए उनकी हड़ताल है। एक बार का वे २०० रूपये लेते हैं। एक दिन में कम से कम १००० लोग रैफ्टिंग करते हैं। यानि हड़ताल में २ लाख का घाटा। सच है हड़ताल से, हड़ताल करने वालों का ही घाटा होता है।

अगले दिन हम लोग आड़ू गये। आड़ू ले जाने के लिये स्थानीय टैक्सी करनी होती है। हमने भी एक टैक्सी की। उसके चालक का नाम शहनवाज था। आड़ू में प्राकृतिक सौंदर्य है। वहां लोग पहुंच कर घोड़े पर घूमते हैं। हम लोग घोड़े पर नहीं गये। पैदल ही  घूमने निकल गये। यह सुन्दर जगह है।

जब हम लोग पैदल जाने लगे तो हमारा टैक्सी चालक,  शहनवाज, भी हमारे साथ था। उसका कहना था,

‘कश्मीरी पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते। वे या तो हिन्दुस्तान के साथ या फिर स्वतंत्र रहना चाहते हैं। उसके मुताबिक पाकिस्तान उग्रवाद फैला रहा है  पर पैरा-मिलिट्री फोर्स भी उग्रवादी की तरह काम कर रही है। यदि किसी के घर उग्रवादी जबरदस्ती घुस जाय। तो उसके  घर की महिलाओं  की इज्जत लूटते हैं।  आग लगा देते हैं।’

आड़ू बहुत छोटा सा गांव है जिसमें एक सरकारी मिडिल स्कूल है। दो साल पहले तक यह पांचवी तक था अब ८वीं तक है।  इसे जवाहरलाल नेहरू ने शुरू करवाया था।  मैं हमेशा स्कूल, विश्वविद्यालय में बच्चों के साथ समय व्यतीत करना चाहता हूं। उनके साथ रह कर जीवन में नया-पन आता है। इसलिये इस स्कूल में बच्चों से मिलने पहुंच गया।

इस स्कूल में लगभग १५० बच्चे हैं। हम जब वहां पहुंचे तो वे प्रार्थना कर रहे थे। उसके बाद हर बच्चा आकर कोई गीत सुनाता था या सामान्य ज्ञान का प्रश्न पूछता था। वे अध्यापक को उस्ताद शब्द से संबोधित कर रहे थे। उस्ताद के अनुसार यह उन्हे नेतृत्व करने की शिक्षा देता है। स्कूल में अंग्रेजी, उर्दू तथा कश्मीरी पढ़ाई जाती थी। कुछ बच्चों ने अंग्रेजी में सवाल पूछे और कविता भी सुनायी, कुछ ने उर्दू  में भी सुनायी।

मैनें कुछ समय बच्चों के साथ गुजारा। मैंने उनसे पूछा कि उनका सबसे पसंदीदा हीरो कौन है उनका जवाब था मिथुन चक्रवर्ती। मुझे आश्चर्य हुआ। उन्होंने इसका कारण यह बताया कि वह बहुत अच्छी फाइट करता है इसलिए वह पसन्द है। उनके उस्ताद जी ने बताया कि वहां ‘ज़ी क्लासिक’ चैनल आता है उसमें पुरानी पिक्चरें आती है इसलिए वे मिथुन चक्रवर्ती का नाम ले रहे हैं।

मैने भी विद्यार्थियों से एक सवाल पूछा।  मिथुन चक्रवर्ती के यहां एक चौकीदार था। एक दिन सुबह हवाई जहाज से मिथुन को कलकत्ता जाना था। चौकीदार ने जाने के लिए मना किया। उसने  कहा,

‘मैंने  अभी सपना देखा है कि हवाई जहाज की दुर्घटना हो गयी है और सब यात्री मर गये हैं।’

मिथुन चक्रवर्ती उस फ्लाइट से नहीं गये। उस फ्लाइट की दुर्घटना हो गयी और सब यात्री मर गये। मिथुन चक्रवर्ती ने चौकीदार को इनाम दिया पर नौकरी से निकाल दिया । मैंने पूछा,

‘इनाम तो इसलिए दिया कि जान बच गयी पर चौकीदार को  नौकरी से क्यों निकाला।’

कुछ संकेत देने के बाद एक बच्चे ने सही जवाब बता दिया।

लैपटॉप की याद सताये

मैं जहां जाता हूं वहां लैपटॉप भी ले जाता हूं शायद यह मेरे ठाकुर जी हैं पर कश्मीर ट्रिप में साथ नहीं ले गया था।

अक्सर बोलना होता है – लैपटॉप साथ हो तो यह आसान होता है।   मेरी कश्मीर की यात्रा मौज मस्ती की थी। कोई भाषण नहीं देना था इसलिए लैपटॉप साथ नहीं लाया। मेरे पास रिलायंस फोन है। इसके कारण हमेशा अंतरजाल पर जाया जा सकता है।  कशमीर में रिलायंस फोन जम्मू तक ही है और कहीं नहीं। इसलिये यह इस ट्रिप में बेकार था।

कश्मीर में जल्द ही अन्तरजाल की याद आने लगी। पहलगांव में एक ही साईबर कैफे है। वहां पहुंचा तो पता चला कि वह खराब है :-(

पहलगांव में कोई हिन्दू या सिख नहीं है पर पुलिस स्टेशन के सामने एक मंदिर और गुरूद्वारा है। मेरे पूछने पर बताया गया,

‘जब अमरनाथ की यात्रा होती है तो यात्री इसमें जातें हैं।  सिख यात्रियों के लिए गुरूद्वारा में लंगर होता है।’

पहलगांव में ९ होल का गोल्फ कोर्स है। उस पर काम चल रहा है और अन्तरराष्ट्रीय स्तर का १८ होल का गोल्फ कोर्स बन रहा है। इस समय इसके तीन होल पर ही खेल हो सकता है।

पहलगांव से पास में  चन्दरबाड़ी  भी है। यहां टैक्सी से जाया जा सकता है। यहां पर बर्फ  रहती है और स्लेजिंग की जा सकती है। हमारे लिये  समय कम था।  यह करना संभव नहीं था।  इसलिये वहां नहीं गये।

आप स्विटज़रलैण्ड में हैं

पहलगांव में बाईसरन भी देखने की जगह है।  वहां पैदल या फिर घोड़े पर बैठ कर जाया जा सकता है। वहां जाने के लिये रोड तो है पर बहुत खराब है।  घोड़े वालों की  विरोध के कारण, टैक्सी नहीं जा सकती पर आप अपनी कार से जा सकते हैं।

बाईसरन, एक घासस्थली (Meadow) है। वहां हम लोग घोड़ों पर गये। पहुंचते ही, घोड़े वाले ने कहा,

‘आप लोग स्विटज़रलैण्ड में हैं।’

मैं कभी स्विटज़रलैण्ड नहीं गया इसलिये कह नहीं सकता कि उसकी बात सच है या नहीं पर यह जगह बहुत खूबसूरत बड़ा सा मैदान है।

हम जब मुन्ने के साथ ऎसी जगह जाते  थे तो  हमेशा चटाई रखते थे और फिर शतरंज होता था। मुन्ने की मां को शतरंज पसन्द नहीं है इसलिए उसके साथ तो नहीं खेला जा सकता। हांलाकि यदि वह खेलती होती तो भी मैं उससे जीत नहीं पाता। कहीं  पत्नियों से चालों में कोई जीत सका है।

ऐसी जगह हम लोग कभी-कभी donkey-donkey भी खेलते थे। इसमें गेंद या फ्रिस्बी को एक फेकता है और दूसरा पकड़ता है। पहली बार न पकड़े जाने पर D  दूसरी बार O और इसी तरह से जो पहले Donkey  बन जाय वह बाहर।

शिव-पार्वती का निवास – गौरीमर्ग पर अब गुलमर्ग

हम लोग पहलगांव से गुलमर्ग पहुंचे। गुलमर्ग लगभग ९,००० फीट पर है। कहा जाता है कि यहां शिव-पार्वती का निवास है इसलिये यह गौरीमर्ग कहलाता था। सोलहवीं शताब्दी में कश्मीर के सुलतान यूसुफ शाह ने इसका नाम गुलमर्ग अर्थात फूलों की घाटी (Valley) कर दिया।

हम तुम बॉबी हट में बन्द हों

गुलमर्ग में एक मन्दिर है जिसमें ‘आप की कसम’  फिल्म के गाने ‘जय जय शिवशंकर’ के कुछ भाग की शूटिंग हुई है। इसकी कुछ शूटिंग श्रीनगर के शंकराचार्य मंदिर  में हुई है। गुलमर्ग में ‘बॉबी हट’  है।  इस फिल्म के एक गाने ‘हम तुम एक कमरे में बन्द हों’ की  शूटिंग इसी हट में हुई है।

गुलमर्ग में १८ होल का गोल्फ कोर्स है। यह दुनिया का सबसे ऊंचा पर स्थित  गोल्फ कोर्स  है। यह बहुत सुन्दर है पर यह बहुत अच्छी स्थिति में नहीं था। इस पर कोई भी खेल नहीं रहा था।

यहां एक तारगाड़ी (rope way) ‘गंडोला’ है। हम लोग घूमने के लिए निकले तो पानी बरसने लगा । पहलगांव में मौसम हमारे साथ रहा पर गुलमर्ग में नहीं । वापस होटल आ गये। बीच-बीच में पानी बरसता रहा,  बाहर नहीं जा पाये।  उस दिन तारगाड़ी   पर नहीं चढ़ पाये। होटेल में आ कर मैंने Every thing you desire: A journey through IIM by Harshdeep Jolly पढ़नी शुरू कर दी तो उसी में डूब गया। यह अच्छी पुस्तक है। इसकी पुस्तक समीक्षा, मैं अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर कर चुका हूं।

पाँच साल में गुजरात बाकी राज्यों को बहुत पीछे छोड़ देगा

गुलमर्ग में अगले दिन हम लोग सुबह ‘गंडोला’ तारगाड़ी पर गऐ। १० बजे टिकट मिलना था, लाइन पर लगे रहे, लगभग ११ बजे टिकट मिला। गंडोला  दो चरण में है पहला चरण खिलनमर्ग के पास तक १०,५०० फीट तक जाता है और दूसरा चरण उपर १३,००० फीट तक जाता है।

दूसरे चरण पर जाने के लिये  हम लोग ने लाइन लगायी। यहां पर मेरी मुलाकात अहमदाबाद में काम कर रहे डाक्टरों से हुई। वे मुझसे गुजराती में बात करने लगे। मैं ने बताया कि मैं गुजरात से नहीं हूं न ही गुजराती समझ पाता हूं। इसके बाद वे हिन्दी में बात करने लगे।

इन लोगों के मुताबिक गुजरात के हालात बहुत अच्छे हैं। मैने पूछा कि क्या मुसलमान भी ऎसा सोचते हैं। उन्होंने कहा,

‘हम चार परिवार एक साथ आये हैं एक मुसलमान परिवार है। आप उन्हीं से पूछ लीजये।’

मैंने मुसलमान डाक्टर से बात की तो उसका भी वही जवाब था।  इनका कहना था,

‘हमारे अस्पताल में  कोई बिजली का जेनरेटर नहीं है। क्योंकि पिछले दो साल में एक मिनट के लिए भी बिजली नहीं गयी। हालांकि  बिजली के लिए ८/-रू० प्रति यूनिट देना पड़ता है। पानी भी २४ घंटे आता है। अगले पाँच साल में गुजरात बाकी राज्यों को बहुत पीछे छोड़ देगा।’

मैंने कहा कि मीडिया तो कुछ अलग सी रिपोर्ट करता है। उनके मुताबिक, मीडिया सनसनीखेज बातों पर निर्भर है। वे अक्सर कुछ ज्यादा या गलत लिख देते हैं।

कुछ समय पहले गुजरात में पुलिस मुठभेड़ (Encounter) में कुछ लोग मार दिये गये थे। मिडिया के मुताबिक यह फर्जी मुठभेड़ था। मैंने इसके बारे में उनके क्या कहना है।  उनका जवाब था,

‘वह शक्स पुलिस को मारने के जुर्म में हत्यारा था इसलिए मुठभेड़ में मार दिया गया। ऎसा हर जगह होता है।  पुलिस ने यदि बचाव के लिये मुख्य मंत्री का नाम डाल दिया तो कोई बात नहीं। हमारे  गुजरात में रात को लड़किया सुरक्षित (Safely)  घूम सकती हैं।’

मुन्ने को जब अमेरिका जाना था तो मैं कुछ साल पहले, उसे स्पोकन इंगलिश की परीक्षा दिलवाने, अहमदाबाद ले गया था। मुझे कुछ इसी तरह का अनुभव हुआ था हांलाकि मुझे गुजरात का अधिक अनुभव नहीं है।

मुझे यह डाक्टर पसंद आये। वे अपने प्रदेश के बारे अच्छे विचार रखते थे। उत्तर भारत के कई प्रदेशों के लोग, अपने प्रदेश के बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं।

मैं उन लोगों से और बात करना चाहता था और उनके चित्र भी लेना चाहते था पर वहां ओले गिरने लगे। हमें श्रीनगर भी जाना था। हमें लगा कि हम दूसरे चरण में नहीं जा पायेंगे और वापस आ गए।

हम लोगों से गलती हो गयी थी। सुबह खिलनमर्ग तथा आसपास हमें घोड़े पर चले जाना चाहिये था दस बजे तक सारा काम कर गंडोला के पहले स्टेज पर घोड़े से पहुंचकर, दूसरे स्टेज का टिकट लेना चाहिये था। मिलता तो ठीक था नहीं तो गंडोला से वापस चले आना था। गंडोला में एक तरफ का भी टिकट मिलता है। चलिये अगली बार इसी तरह से ही करेंगे।

हेलगा कैटरीना और लीनुक्स

हम लोग गुलमर्ग से श्रीनगर आये। यहां हम हाउस बोट में रहे। यहां पर मेरी मुलाकात हेलगा कैटरीना से हुई।  वे फिनलैण्ड से हैं और डाक्टर हैं। कैटरीना साड़ी बहुत अच्छी तरह से पहने हुयी थी। मेरे उन्हें यह बताने पर,  मुस्कराईं और बोलीं,

‘मैं  भारत तीसरी बार आई हूं। मुझे यह देश बेहद पसन्द है। मुझे पढ़ना अच्छा लगता है और पहली बार, कृष्णामूर्ती को पढ़ने के बाद, मैंने भारत आने का मन बनाया था।’

कैटरीना के एक लड़का (१६साल) और एक लड़की (१४ साल) है। वे तलाकशुदा हैं पर उनकी पती से अब भी मित्रता है। इस समय उनके पती, उनके घर में रह कर बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।

Linus Torvalds फिनलैंड से है।  वे, १९९१ में, हेलसिंकी पॉलीटेक्निक में पढ़ रहे थे। उस समय, उन्होने Linux का करनल (Kernel) प्रकाशित किया था। जाहिर है हमारी बातों में Linus Torvalds भी थे।  कैटरीना ने बताया कि Linus Torvalds  का सही उच्चारण लीनुस टोरवाल्डस् है और फिनलैंड में Linux को  लीनुक्स बोलते हैं न कि लिनेक्स। क्या मालुम क्या सही और क्या नहीं।

कैटरीना में मुझसे पूंछा कि क्या मैं लीनुस के परिवार के बारे में जानता हूं। मैंने कहा कि मैंने उसकी आत्मजीवनी ‘Just for fun : The story of a accidental revolutionary’ पढ़ी है। इस लिये उनके जीवन के बारे में काफी कुछ मालुम है। यह पुस्तक कैटरीना ने नहीं पढ़ी थी। मैंने उसे बताया कि यह  पुस्तक बहुत अच्छी है और न केवल पढ़ने योग्य है पर प्रेरणा की स्रोत है। उसने वायदा किया कि वह उसे पढ़ेगी और अगली बार हम उस पर कुछ बात भी करेंगे।

कैटरीना के बताया,

‘फिनलैण्ड की सबसे अच्छी बात वहां की सुरक्षा है। हमारे देश में यहां टैक्स ज्यादा है पर चिकित्सा, पढ़ाई सब मुफ्त है। सारे विश्वविद्यालय सरकारी हैं।  मैं  बढ़ई के चार बच्चों में से एक हूं। मेरे पिता डाक्टरी की पढ़ाई का पैसा नहीं दे सकते थे पर मैं डाक्टर इसलिए बन पायीं क्योंकि पढ़ाई के लिए पैसे नहीं देना पड़ा।’

कैटरीना के पीठ पर एक चिन्ह था। मैंने पूछा कि यह  ठप्पा है या टैटू। उसने मुस्करा कर कहा,

‘यह टैटू है। इसे मैंने अपने आप को चालिसवें  जन्मदिन पर उपहार दिया है। अगले साल मैं पच्चास की हो जाउंगी। मैं नहीं समझ पा रही कि मैं अपने आप को क्या उपहार दूं।’

कैटरीना को अपने लिये उपहार तय करने में देर नहीं लगी। हम लोग शाम को हाउस बोट पहुंचे तो वहां पर बनारसी साड़ियों का मेला लगा था। चारो तरफ साड़ियों फैली हुई थी। वह बोली,

‘मैं  पच्चासिवें जन्म दिन के लिये साड़ी खरीद रहीं हूं पर तय नहीं कर पा रही हूं कि कौन सी लूं। क्या आप मेरी मदद करेंगे।’

मुझे हरे रंग वाली साड़ी  अच्छी लग रही थी। उसने वही ले ली।

मुझे कैटरीना  साहसी महिला लगीं। वह भारत अकेले आयीं हैं और कशमीर में पैदल ट्रेक कर रही थीं।  फिर बोट पर ट्रेकिंग करने जा रहीं थीं। उसने मुझे फोटो दिखाये जिसमें वह घोड़े वालों या गाइड के घर में या फिर टेंट में रूकी। मेरे पूछने पर कि क्या वह यह सब, बिना अपने बच्चों के, अकेले आनन्द से कर  पा रहीं हैं। उसने कहा,

‘मेरे बच्चे साहसी  नहीं हैं, उन्हें इस तरह ट्रेक करने में मजा नहीं आता है। वे जरा सी गन्दगी से घबरा जाते हैं इसीलिए मैं उन्हें साथ नहीं लायी।’

मुझे ट्रेकिंग अच्छी लगती है पर मुन्ने की मां को नहीं।  जब मुन्ना साथ रहता था तब हम लोगों ने कई इस तरह के ट्रिप लिये थे पर अब नहीं। अकेले हिम्मत नहीं पड़ती है। कैटरीना से बात हो गयी है अगली बार जब वह भारत  आकर ट्रेकिंग पर जायेंगी तब मैं भी साथ रहूंगा।

अच्छा तो हम चलते हैं

मैं १९७५ की गर्मी में कश्मीर आया था। यह मेरी दूसरी ट्रिप है और मेरी पत्नी की  पहली। उस समय डल झील के बीचोबीच चार चिनार के पेड़ थे और प्लेटफार्म बनाकर एक रेस्ट्राँ चला करता था, इसमें कटी पतंग के एक गाने ‘अच्छा तो हम चलते हैं’ की शूटिंग हुयी थी। यह बहुत सुन्दर जगह थी। मुझे बताया गया कि अब यह बन्द हो गया है।

हमारी हाउसबोट के बगल एक पेड़ था। उसमें चील दम्पत्ति ने अपना घोसला बना रखा था। उनके दो बच्चे भी थे। वे खाना लाकर उन्हें खिलाते थे। जब मैं उनकी फोटो ले रहा था तो वह चील मुझे घूर कर देख रही थी कि कहीं मैं उसके बच्चों को कुछ चोट न पहुंचा दूं।

मुझे यहां जहीर आलम मालिश करने वाला मिला। वे बीकानेर के रहने वाले हैं और इनकी शादी भोपाल में हुयी है वहीं पर घर जमा लिया है। वहां इनकी Face to face नाम की बाल काटने की दुकान पुराने भोपल में है। साल में ४ महीने भोपल में और ८ महीने कश्मीर में रहते हैं। मैंने उनसे मालिश करवायी। मैंने इसके पहले कभी नहीं करवायी थी। समझ में नहीं आया कि अच्छी थी कि नहीं, पर २०० रूपये जरूर जेब से निकल गये।

हमने पूथ्वी मां को  अपने बच्चों से गिरवी ले रखा है

यहां पर हाउसबोट का नगर बसा है लगता है श्रीनगर में आने वाला पर्यटक यहीं रूकता है नाव वाले फेरी लगाते रहते हैं। कोई ठण्डा बेच रहा है कोई जूता।  कोई आपको जैकेट बेचना चाहता है तो कोई आपको गहने। उसी के बीच जीवन चल रहा है। यह सब डल झील को बर्बाद भी कर रहा है।

मैं १९७५ में जून में श्रीनगर गया था मुझे याद नहीं पड़ता कि डल झील पर इतनी  हाउसबोट थीं या नहीं। डल लेक भी बहुत साफ थी। इस बार गन्दी लगी। लोगों से पूछने पर पता चला कि यह सारी हाउसबोट अवैधानिक  है।  बहुत कुछ गन्दगी इन्हीं के कारण है। वहां के लोगों का कहना है,

‘२५ साल पहले डल लेक की परिधि ३२ किलोमीटर थी। अब घटकर १६ हो गयी है। लोग इसे मिट्टी से पाटकर कब्जा करते जा रहे हैं। इसमें बदमाशी में राज्य सरकार भी भागीदार है। दो साल पहले जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय में लोकहित याचिका दाखिल की गयी जिसे कारण यह रोका जा सका  और डल लेक में कुछ सफाई शुरू की गयी।’

गोवा  में भी हमने देखा कि न्यायपालिका के कारण वहां का समुद्रीतट बचा। दिल्ली में भी यदि प्रदूषण कम हुआ तो वह न्यायपालिका के कठोर कदमों के कारण।

यह पूथ्वी मां हमें अपने पूर्वजों से नहीं मिली है इसे तो हमने अपने बच्चों से गिरवी ली है।  यह हमारे ऊपर है कि हम इसे कैसे उन्हें वापस देते हैं। यह बात शायद केवल न्यायपालिका  ही समझ पा रही  है बाकी लोग तो शायद …

लोग अक्सर न्यायपालिका के न्यायिक क्रिया-कलापों (Judicial activism) की  आलोचना  करते हैं पर यदि आप देखें तो बहुत जगह न्यायपालिका के कारण ही पर्यावरण बचा हुआ है । नेता ऎसे निर्णय नहीं लेते, जिससे उनके वोट बैंक में कमी आये।

जय-जय शिवशंकर

मैं, १९७५ की जून में एक महीने श्रीनगर रहा था। जिस घर में ठहरा था उसके बगल में पहाड़ी है उसके ऊपर शिवजी का मंदिर है। यह शंकराचार्य जी का मंदिर कहलाता है क्योंकि उन्होंने ही शिवलिंग की स्थापना की थी मैं तब कई बार पैदल उस मंदिर तक गया था। उस समय मंदिर में केवल हमी लोग होते थे। अब पक्की रोड बन गयी है और अन्त में २४० सीढ़ियां है। पहाड़ी रास्ते से जाने की इजाजत नहीं है। सब तरफ पुलिस का पहरा है। आप मंदिर तक कैमरा भी नहीं ले जा सकते हैं। इस मंदिर में ‘आपकी कसम’ फिल्म के गाने ‘जय-जय शिवशंकर’ के आधे भाग की शूटिंग हुयी है। इस बार जब हम लोग मंदिर पहुंचे तब वहां सैकड़ों लोग थे। बहुत भीड़ थी।

कश्मीर के हरियाली और फूल श्रीनगर में जगह-जगह बाग हैं मुगल राज्य के समय के दो बाग निषाद और शालीमार अब भी पुराने समय की दास्तान बिखेर रहे हैं।

निषाद बाग से हजरतबल मस्जिद दिखायी पड़ती है जिसमें कुछ साल पहले उग्रवादी घुस गये थे और मुश्किल से निकाले जा सके।

श्रीनगर में चश्मेशाही है यहां पानी निकलता है। कहा जाता है कि इसमें औषधीय तत्व हैं: पीने से पीलिया तथा पेट की बीमारी दूर हो जाती है।  मेरा पेट कुछ खराब चल रहा था।  मैंने पानी पिया। यह मनोवैज्ञानिक कारण था या वास्तविक पर मेरे दस्त ठीक हो गये। कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू के पीने के लिये पानी यहां से जाता था।

श्रीनगर में परी महल भी है इसे शाहजहां के लड़के दाराशिकोह ने सूफी संतों के रहने और अध्ययन के लिये बनवाया था। कहा जाता है कि इसका नाम पीर महल था सरकार ने इसका नाम परी महल कर दिया है। सरकार के मुताबिक परियां पवित्र जगह जाती हैं, यहां पवित्र आत्मायें रहती थीं – इसलिये इसका नाम परी महल रख दिया गया।

मालुम नहीं, क्या सच है – इस समय तो इसमें न सूफी सन्त रहते हैं न ही परियां – इसमें पैरा मिलिट्री वालों ने कब्जा जमा लिया है।

श्रीनगर में एक नया १८ होल का अन्तरराष्ट्रीय गोल्फ कोर्स बना है परी महल से पूरा दिखायी पड़ता है। यह बहुत सुन्दर है।

तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुझे बनाया

कश्मीर में सबसे अच्छी बात यह लगी कि बहुत कम महिलायें बुरका पहने दिखायी पड़ीं। मैं केरल और हैदराबाद भी जाता रहता हूं। वहां पर ज्यादा महिलायें बुरका पहने दिखायी पड़ती हैं बनिस्बत कश्मीर के। महिलायें व लड़कियां सर पर स्कार्फ लगाये, स्मार्ट और सुन्दर लगती हैं; देखने में भी अच्छा लगता है। काला बुरका जैसे सुन्दरता पर कालिख पोत दी गयी हो।

समार्ट और प्यारी युवतियों को देख कर, मुझे शम्मी कपूर के द्वारा फिल्म कश्मीर की कली में शर्मीला टैगोर के लिये गाया यह गाना याद आया,

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‘यह चांद सा रोशन चेहरा
झुल्फ़ों का रंग सुनहरा।
यह झील सी नीली आंखें,
कोई राज है इसमें गहरा।
तारीफ करूं क्या उसकी,
जिसने तुझे बनाया।’

अलविदा कश्मीर

जितनी अस्तव्यस्तता, श्रीनगर हवाई अड्डे पर है उतनी शायद कहीं नहीं। वहां पर कोई भी स्क्रीन नहीं है जो यह बताये कि आपकी उड़ान सही समय से है या लेट है या उसकी बोर्डिंग शुरू हो गयी है। इसमें टी.वी. है उसमें अलग चैनल आवाज के साथ चल रहे थे। शोर इतना कि कोई भी प्रसारण में क्या कहा जा रहा है पता नहीं चलता। सुरक्षा जांच जगह-जगह पर है। मैं यही समझता था कि यहां सारा काम बहुत तरीके से होगा, पर यहां तो सब उलटा ही है।

मुझे कश्मीर में शान्ति लगी। यह उतनी ही है जितना भारत के किसी अन्य जगह पर। जनता, आम नेताओं और पैरा मिलिट्री फोर्स से दुखी लगी। उनके मुताबिक, जितनी अशान्ति उग्रवादी फैलाते हैं उतनी ही नेता और पैरा मिलिट्री फोर्स के लोग। मीडिया की भी इसमें भागीदारी है। वहां के लोगों के अनुसार,

  • एक नेता दूसरे नेता को नीचा दिखाने के लिये उग्रवादी गतिविधियां करा देता है;
  • पैरा मिलिट्री फोर्स को वहां सर्च करने में ज्यादा पैसा मिलता है इसलिये वहां से कब्जा छोड़ना नहीं चाहती;
  • मीडिया भी वहां छोटी-छोटी घटनाओं को ज्यादा विस्तार से दिखा रहा है जिसके कारण लोगों को कश्मीर के बारे में गलतफहमी हो जाती है।

मैं नहीं कह सकता कि आम लोगों का यह सोचना ठीक है या फिर पैरा मिलिट्री फोर्स के लोगों का, या फिर मीडिया का। पर मैं पुनः कश्मीर जाना चाहूंगा। तब तक के लिये – अलविदा कश्मीर।

मुरझा गई तो फिर ना खिलूंगी

मुझे कश्मीर उतना ही सुन्दर लगा, जितना कि सायरा बानू अपनी पहली फिल्म जंगली में। यह फिल्म तब बनी (१९६१) जब मैंने अपने यौवन में कदम रखा था। सायरा उस समय केवल सोलह साल की थीं और इंग्लैण्ड से शिक्षा प्राप्त कर लौटी थीं। हांलाकि उस समय मुझे हिन्दी फिल्म देखने की अनुमति नहीं थी। यह फिल्म मैंने सालों बाद – शायद शादी के बाद – इसे अपनी पत्नी के साथ देखा। कश्मीर में, मुझे इस फिल्म का सायरा पर फिल्माया यह गीत भी बहुत याद आया।

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काश्मीर की कली हूं मैं,

मुझसे ना रूठो बाबू जी,

मुरझा गई तो फिर ना खिलूंगी,

कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं।

कश्मीर एक सुन्दर महकते गुलाब की तरह है। इस गुलाब पर आतंकवाद का साया है। हमने शुरू में गलती कर दी थी। यदि अब भी हमने ठीक कदम न उठाये तो पृथ्वी पर यह स्वर्ग, यह सुन्दर महकता गुलाब मुरझा जायगा। यदि यह एक बार मुरझा गया तो फिर कभी न खिलेगा और न ही महकेगा।


यह यात्रा विवरण मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुका है। इसकी अलग अलग कड़ियों को आप नीचे दिये गये लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।

जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।। बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है।। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने चौकीदार को क्यों निकाल दिया।। आप स्विटज़रलैण्ड में हैं।। हम तुम एक कमरे में बन्द हों।। Everything you desire – Five Point Someone।। गुलमर्ग में तारगाड़ी।। हेलगा कैटरीना और लीनुक्स।। डल झील पर जीवन।। न्यायपालिका और पर्यावरण।। अलविदा कश्मीर।।

सांकेतिक शब्द

kashmir, कश्मीर,

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इस चिट्ठी पर मेरी गोवा यात्रा का वर्णन है।

प्यार किया तो डरना क्या

अपने पैसे से तो पांच सितारा होटेल में ठहरना तो बहुत मंहगा है, कम से कम मेरे मेरे जेब के बाहर। सम्मेलन हमेशा पांच सितारा होटलों में होते हैं। उनमें जाने का यही फायदा है कि कम से कम उसी के बहाने वहां का भी नजारा देख लिया। हांलाकि जैसा फाइनमेन की पुत्री मिशेल Do you have time to think में बताती हैं कि फाइनमेन  सम्मेलनो में होटलों से बोर होकर कर जंगलों में कैम्पिंग करना पसंद करते थे पर यह अपने देश में तो सम्भव नहीं लगता है।

मुझे, दो साल पहले कलकत्ता जाना पड़ा था। हयात ग्रुप का नया होटल बना है, वहीं पर हमारी कॉन्फरेंस थी। कमरे बढ़िया इंटरनेट का कनेक्शन, पर वह मेरे लिनेक्स लैपटॉप पर चल कर नहीं दिया। मैंने होटल वालों से कहा। उन्होने एक व्यक्ति को भेजा। वह कोई विशेष्ज्ञय तो नहीं लगता था पर थोड़ा बहुत कंप्यूटर के बारे में जानता था। उसने मेरे लैपटौप को देखा और कहा कि,

‘बहुत सुन्दर स्क्रीन है। लगता है विंडोस़ की कोई नयी थीम डाली है।’

मैंने कहा कि यह विंडोस़ नहीं,  लिनेक्स है। उसने आश्चर्य से पूछा,

‘लिन्क्स? यह क्या होता है।’

मैंने, कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम के बारे में उसकी क्लास ही ले ली। बताया कि यह कितनी तरह के होते हैं, इनमें क्या अन्तर होता है, जैसा कि कुछ मैंने अपनी ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर की चिट्ठी पर बताया है। उसने मुझसे पूछा कि मैं अगली बार कब आ रहा हूं। मैंने  कहा, कि तुम यह क्यों पूछ रहे हो। उसका जवाब था,

‘मैं लिनेक्स के बारे मैं सब सीख कर रखूंगा ताकि आपको मुश्किल न हो।’

पिछले साल कोची में हयात ग्रुप में हुऐ एक सम्मेलन में रहने का मौका मिला।  यहां पर भी अनुभव कलकत्ता की तरह ही रहा।

इस साल मुझे गोवा जाना पड़ा। यहां Cidade de Goa के नाम के होटल में टहरने का मौका मिला। यह एक पांच सितारा होटेल है और बहुत अच्छा है। मुझे लगा कि लिनेक्स काफी लोकप्रिय हो चुका है इसलिये यहां बेहतर अनुभव रहेगा। पर यहां भी, मेरे लैपटॉप के साथ वही हुआ को कि मेरे साथ हयात कलकत्ता में हुआ था।

चलिये, प्यार किया तो डरना क्या। कम से कम तीन लोगों को तो मैंने लिनेक्स के बारे में बताया। वे अगली बार इसके लिये तैयार रहेंगे।

ऐसे आखिरकर, मैंने यहां पर लिनेक्स लैपटॉप की मुश्किल का हल निकाल ही लिया। बस जालक्रम विन्यास में जा कर यदि कोई लैन का कनेक्शन बना है तो इसका आईपी पता स्वचलित कर दे या नया इसी तरह का लैन कनेक्शन बना लें – बस काम फिट।

गोवा और यह होटेल दोनो बहुत अच्छे लगे। इसके बारे में आपको बताउंगा, कुछ चित्र भी लिये थे, वह भी पोस्ट करूंगा। यहां होटेल में दो खास बातें देखने को मिलीः

  • महिलाओं की तो नेकरे छोटी होती जा रहीं हैं और पुरषों की बड़ी,
  • गोरे चिट्टे (विदेशी) महिला बदन पर जितने कम कपड़े (बस चले तो सब उतार दें पर यह कानूनी तौर पर मना है), और गेहुवें तथा श्याम (मुन्ने की मां जैसे देसी) महिला बदन पर उतने ही ज्यादा।

परशुराम की शान्ती

परशुराम की शान्ती? उनकी तो शादी नहीं हुई थी फिर यह शान्ती कहां से आ गयी – अरे बाबा, मेरा मतलब शान्ति, वह शान्ति जिसकी हम सब को तलाश है।

कहते है परशुराम क्षत्रियों से क्रोधित हो गये। यह कामधेनु गौमाता के पीछे हुआ  था। भगवान ने परशुराम जी को शान्ति पाने के लिये तपस्या का मार्ग सुझाया और कहा,

‘जहां तीर गिरे वहीं तपस्या करो।’

तीर तो अरब की खाड़ी में गिरा। समुद्र देव ने वहां से पानी हटा कर जमीन उन्हें सौंप दी।  परशुराम, गौमाता के साथ वहां तपस्या करने पहुंचे इसलिये उसका जगह का नाम गोवा पड़ा।

समुद्र देव ने स्वयं जमीन परशुराम को जमीन दी थी इसलिये वहां उनकी हमेशा कृपा रहती है। आज तक कभी समुद्र के कारण कोई विपदा नहीं आयी। सुनामी का भी कोई असर नहीं पड़ा था :-)

परशुराम जी ने शिव की तपस्या की और शान्ति प्राप्त की। इसलिये कहा जाता है कि जो भी गोवा जाता है उसे वहां शान्ति मिलती है। हांलाकि इसमें पुर्तगालियों का भी बहुत बड़ा हाथ है।

पणजी (Panji) में एक प्रसिद्ध मंगेश मन्दिर है। परशुराम ने भगवान शिव की तपस्या की थी

शायद इसलिये यह भगवान शिव का मन्दिर है। गोवा के पास परुशराम का भी मंदिर है।

शिव मन्दिर पहले पुराने गोवा में था। सोलवीं शताब्दी में जब पुर्तगालियों ने हिन्दुवों पर अत्याचार करना शुरू किया तो वे है पणजी की तरफ भागे और अपने देवी देवता भी ले आये। इस मन्दिर को तब ही पणजी में स्थापित किया गया। यह भव्य है।


शिव जी के मन्दिर जाते समय रास्ते में मेरी मुलाकात रवी से हुई। वे लोगों के बदन पर जगह जगह ठप्पा लगाते हैं। उसके अनुसार यह लगभग एक माह तक रहता है। सबसे छोटे का २० रुपया और सबसे बड़े का ५० रुपया। मैंने पूछा कि दिन में कितने पैसे मिल जाते हैं। उसने बताया कि लगभग ३००-४०० रुपये मिल जाते हैं।

विदेशी महिलायें तो अजीब अजीब जगह ठप्पा लगवा रहीं थी। मैने तो हांथ में सबसे छोटा ठप्पा लगवाया।  मेरे तो ७० रुपये खर्च हो गये।

‘उन्मुक्त जी, क्या कहा ७० रुपये। लगता है कि गणित में तो हमेशा फेल होते होंगे।’

बायें हांथ पर ठप्पा देख लीजिये – विश्वास हुआ न

नहीं भाई मैने उसे तो २० ही रुपये दिये पर मेरे सहयोगी लोग कहने लगे यह ठप्पा तो शर्ट की बांह के अन्दर है, लोग कैसे देखेंगे। इसके लिये तो बिना बांह की शर्ट होनी चाहिये।

मेरे पास तो बिना बांह की कोई शर्ट नहीं है। वहां छोटी छोटी बहुत सी दुकाने थीं, जिन पर हर तरह की शर्ट मिल रहीं थी। मैंने दुकान वाली महिला से शर्ट दिखाने को कहा तो इसने ३५ रुपये की बांह वाली शर्ट दिखायी। मैंने कहा मुझे तो बिना बांह की चाहिये, क्योंकि सबको ठप्पा दिखाना है। वह समझ गयी कि आज तो एक मुर्गा फंसा  है। उसने झट से दिखायी और ५० रुपये दाम बताया। मैंने कहा कि यह तो बिना बांह की है, सस्ती होनी चाहिये। पर वह ठस से मस नहीं हुई। हार कर ५० रुपये की ली। हो गया ना ७० रुपये का चूना।

रात नशीले है

‘उन्मुक्त जी यह क्या हिन्दी है – रात नशीले  है – में।

जी हां मैंने नशीले शब्द का प्रयोग जान बूझ कर किया है। मेरी हिन्दी कमजोर नहीं है।

होटल में जगह जगह बढ़िया बार थे और सब तरह के पीने का समान। गोवा में मुन्ने की मां मेरे साथ थी। वहां वह मुझसे जो चिपकी तो बस साये की तरह लगी रही।  सब मजा चला गया। न बार जा पाया न ही उन दृश्यों का आनन्द ले पाया जिसका जिक्र मैंने पहले किया था। अगली बार तो मैं अकेले ही आऊंगा। आपको मालुम होगा कि मैं यह कर सकता हूं। क्योंकि मैं घर का बॉस हूं और  मुन्ने की मां ने, मुझे यह सबसे बताने की अनुमति दे रखी है:-)


अधिकतर भारतीय लोग अपने परिवार के साथ थे। बस हम ही दो लोग गोवा में थे। हमारे बच्चों के पंख निकल आये हैं।  वे अपना घर बसा कर, हमारे बसेरे से दूर, अपना बसेरा ढ़ूढ़ने, सात समुन्दर दूर निकल गये हैं। रेस्तरां में,  दोपहर के खाने पर  बैंड बज रहा था।  मैंने हिन्दी गाना सुनाने की प्रार्थना की, तो उसने मना कर दिया।  वहां पर बहुत से विदेशी थे। इसलिये वे लोग  या तो अंग्रेजी के गाने गाते थे या फिर कोंकणी के।

मेरे अनुरोध पर बैंड ने कोंकनी में एक  गीत सुनाया। यह कुछ ‘पुकारता, चला हूं मैं’ की धुन में था। उसने बताया कि यह एक प्रेम गीत है। मेरे  विद्यार्थी जीवन में  बीटल बहुत लोकप्रिय हुआ करता था  मैंने उनसे बीटल का कोई गाना सुनाने को कहा। उन्होने I want to hold your hand’ सुनाया। उनका यह गाना शायद सबसे चर्चित गाना है। शादी के ३० साल बाद मैं और मुन्ने की मां अपने दूसरे हनीमून पर थे – केवल हमीं नहीं,  वहां पर सब।

रात को सम्मेलन के लोगों का खाना अलग जगह समुद्र के किनारे था। खाने की जगह पर जाने लगा तो एक जगह शतरंज की बाजी बिछी थी। मैं इसे देखने लगा तो एक विदेशी महिला  की आवाज सुनायी पड़ी,

‘If I knew chess then I would have played chess with you.’

मैंने मुड़ कर देखा तो बार में एक विदेशी दम्पत्ती, बार का मजा ले रहे थे। महिला ने मु

झे अपना नाम ब्रेन्डा बताया। मैंने कुछ देर उन लोगों से बात की,  फिर चल दिया खाने पर।

Brenda, it was a pleasure to meet you. You have promised that you will learn chess and we  will play, when we meet again.


खाना दूर समुद्र के किनारे था। वहां एक ग्रुप गाना गा रहा था। धुन मस्तानी थी पर गाना समझ में नहीं आ रहा था, शब्द कुछ अजीब से इस प्रकार लगते थे।

रात नशीले है

मस्त जैंहां है

रूप तेरा मास्ताने।

फिर समझ में आया, यहां केवल भारतीय थे। इसीलिये बैंड हिन्दी पिक्चर आराधना का गाना गा रहे थे।

सुहाना सफर और यह मौसम हसी

गोवा में दो नदियां हैं: मंडोवी और जुआरी। मंडोवी नदी पर शाम को बोट की सैर होती है। यह  बोट हैं कि पूरे जहाज। लगभग २५० से ३०० व्यक्ति बैठ सकते हैं। इस पर रेस्तराँ बैन्ड सब कुछ रहता है। जो मन आये वह पीजिये, गाना सुनिये, नाच का मजा लीजये, खुद भी नाचिये, और सैर का आन्नद लीजये।

बोट पर हम लोगो ने,  कुछ लोकगीत सुने और कुछ लोक नृत्य भी देखे। साथ के लोग भी नृत्य करने में उत्सुक थे। बैण्ड वाले भी बहुत चालाक थे अधिकतर नाच उसने सैर करने वालों से ही करवाये। इन नाचने वालों में राना दम्पत्ति भी थे। हमारी इनसे मुलाकात बोट पर हुई थी। पति इंडियन एयलाइंस में और पत्नी रिलाएंस रिटेल में काम करती हैं। यह बहुत अच्छा नाचते थे। बोट में कई डेक थे हम लोग बोट के सबसे ऊपर के डेक पर चले गये। यहां कुछ ज्यादा पैसा देना पड़ता है। यहां पर कुछ कम लोग थे। थोडी देर राना दम्पत्ती भी वही आ गये। मैंने इनसे पूछा कि उन्होने नच बलिये  प्रतियोगिता में भाग लिया है कि नहीं। उनके मना करने पर मेरी उनको सलाह थी कि वे भाग लें, उन्हें अवश्य पुरुस्कार मिलेगा। राना दम्पत्ति ने मेरे कहने पर कुछ खास पोस – टाईटैनिक स्टाईल में, और कुछ नाच में चित्र खींचने दिये।

‘Hi, both of you dance well. Do participate in the next dance competition and I am sure that you will win a prize. Do let us know in advance, not only we but all Hindi bloggers will be there to cheer you.’

बोट से दृश्य बहुत सुन्दर था। दृश्य का आनन्द लेते हुऐ, जब नजर इधर उधर दौड़ायी तो देखा कि एक कोने एक दूसरा बहुत सुन्दर सा भारतीय जोड़ा खड़ा था। युवती के कपड़े एकदम नये युग के थे। वह पैरों से चिपकी हुई कप्री (capri) पैंट और स्पैगेटी टॉप (spagetti top)   पहने हुऐ थी। हम तो यही समझते हैं कि  पैंट नाभी पर रहती थी, वहीं से पहनी जाती है। पर आजकल के लड़के लड़की इसे कमर के सबसे निचले भाग पर रखते हैं। इस युवती ने कप्री इसी तरह से पहन रखी थी। उसका स्पैगेटी टॉप, शायद उसे नूडल स्ट्रैप  टॉप (noodle strap top) कहना ठीक होगा, काफी खुला हुआ था। वह नाक में नथनी, कान पर झुमके, माथे पर बिन्दिया, बहुत सारी चूड़ियां और पायल पहने हुऐ थी।  चलने में छम-छम आवाज आती थी इसी लिये मैंने उसका नाम रखा छम्मक-छल्लो। मेरी और मुन्ने की मां से शर्त लगी। मेरा कहना था की यह छम-छम चूडियों से आ रही है इसका कहना था कि चूड़ियां और पायल दोनो से।

इस लड़की के चलने में  भी एक स्टाईल था। वह कुछ अलग अलग पोस दे कर अपने साथी  को रिझा रही थी। मैने उस युवती से पूछा कि क्या वह बॉलीवुड में हैं या मॉडल हैं। वह मुस्करायी और बोली,

‘यह आप क्यों कह रहें हैं।’

मैंने कहा कि आप सुन्दर हैं, आप जिस तरह से चल रहीं हैं, जिस तरह से खड़ी हैं बस इसी के कारण लगा। उसने हंस कर जवाब दिया,

‘मैं तो मॉडल नहीं हूं पर मेरे माता पिता मॉडल थे।’

मैंने अपनी और मुन्ने की मां की शर्त के बारे में बताया। उसने कहा कि मुन्ने की मां जीत गयी है।

युवती भारतीय मूल की इंगलैण्ड की नागरिक थी. उसका लालन पालन वहीं हुआ था। लड़का पंजाबी था और इंगलैंड पढ़ने गया था। जहां दोनो कि मुलाकात हुई और शादी कर ली। वह शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल भारत आयी थी। इस समय लड़का डब्लिन, आयरलैन्ड में डौमिनोस पीट्ज़ा कम्पनी में काम करता है। इसने बताया कि दुनिया में इसके पीट्ज़ा कम्पनी की सबसे ज्यादा ब्रांच हैं और वे पीट्ज़ा हट से अलग सिद्धान्त पर काम करते हैं। वे घर पर पीट्ज़ा आधे घन्टे में पहुचाने में विश्वास करते हैं यदि नहीं कर पाये तो कोई पैसे नहीं लेते हैं।

Hi, smart ones. The next time, when  I am at a place where I can order Domino’s Pizza, I am going to have one.’

मुझे अगले दिन पता चला कि यह युगल दम्पत्ती हमारे ही होटेल में ही ठहरे थे। वे नाशता करके बाहर जा रहे थे तो  हम नाशता करने जा रहे थे। युवती ने हमें देख कर हाथ हिलाया। उसकी चूड़ियां कनखने लगी मुझे  लगा कि वह बताना चाहती है छम-छम चूड़ियों से है और शर्त मैंने जीती है न कि मुन्ने की मां ने। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गोवा में एक बहुत अच्छा ईम्पोरियम है। इसमें भारतवर्ष के सब कोने से समान रहता है। मुन्ने की मां ने जीत कि खुशी में  वहां  से पहले ही अपने लिये पशमीने का एक शॉल खरीद लिया था। मेरी जेब खाली हो चुकी थी।

डैनियल और मैक कंप्यूटर

हमारा होटेल समुद्र तट के बगल में था लेकिन उसके सामने का समुद्र तट होटेल वालों का नहीं है। फिर भी, होटेल वाले समुद्र तट को हमेशा साफ रखते हैं क्योंकि उनके यहां ८०% से अधिक लोग विदेशी हैं  और वे इसी समुद्र तट के लिये इस होटेल में आते हैं। समुद्र तट की सफाई भी देखने काबिल थी। समुद्र पर अटखेलियां करती हुई लहरें , तट पर सुन्दर लोग, बेहतरीन नज़ारा और सबसे अच्छी बात, कोई टोकने वाला नहीं।

गोवा में मुझे एक प्रस्तुतीकरण भी देना था, यह समय आभाव के कारण पूरा नहीं हो पाया  था। इसे पूरा करने के लिये, मैं सुबह ही लैपटॉप लेकर बाहर चला गया।  मुझे वहां  जर्मन इंजीनियर डैनियल मिला। वह यांत्रिक इंजीनियर है और गाड़ियों के ब्रेक बनाने वाली कम्पनी में काम करता है। उसके पास मैक कंप्यूटर था। वह विंडोस़ पर काम करता था और कुछ महीने पहले ही मैक पर काम करना शुरू किया है। उसके मुताबिक मैक सॉफ्टवेर बहुत अच्छा और सरल है। मैंने पूछा क्या विंडोस से भी। उसका जवाब था हां। उसके अनुसार जर्मनी में भी लोग चोरी की विंडोस़ प्रयोग करते हैं और यह लगभग ५०% है।

डैनियल अपनी कंपनी की तरफ से अपने सहयोगी के साथ हिन्दुस्तान आये थे। वे लोग मीटिंग में पूना गये थे फिर गोवा  में सम्मेलन में आये  थे।

डैनियल को बहुत आशचर्य हुआ कि मेरा लैपटॉप लिनेक्स पर है। मैने उसे इसके बारे में और कुछ अन्य ओपेनसोर्स के सॉफ्टवेर के बारे में जानकारी दी। कुछ देर बाद जब हम फिर मिले तो उसने बताया कि वह ओपेन ऑफिस डाट ऑर्ग  की वेबसाईट पर गया था और इसे डाउनलोड कर दिया है। वह इसका प्रयोग करेगा। होटेल में कमरे में तो लाईन से ब्रॉडबैंड था पर सार्वजनिक जगहों पर वाई फाई था। चलिये एक और व्यक्ति ओपेन सोर्स प्रयोग करने के लिये  राजी हुआ।

‘Guten Tag Daniel,
It was pleasure to meet you. I hope you have tried OpenOffice.Org suit. Do try Firefox. Thunderbird and Sunbird. They all are open source and great software. Some of Hindi bloggers  will like to know more about Mac software. Please let us know more about the same and its support for languages other than English. Till we meet again. Tschüss! (I hope my German is correct)’

चर्च में राधा कृष्ण

गोवा के चर्च प्रसिद्ध हैं उनमे सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं: बेसिलका ऑफ बॉम जीज़स और  सर कैथ्रिडल। यह दोनो आमने सामने हैं बीच में सड़क है।

बेसिलका ऑफ बॉम जीज़स को बने हुऐ ५०० साल से ज्यादा हो गये हैं।  इसमें फ्रांसिस ज़ेवियरस् का शव रखा हुआ है। इस चर्च में मोमबत्ती जलाने का रिवाज है। कहते हैं कि मन मुराद पुरी हो जाती। हम ने भी दस रुपये में पांच मोमबत्ती खरीदीं। चर्च के अन्दर का दृश्य बहुत भव्य था।  चर्च के एक अलग बड़ा सा आंगन था मोमबत्ती वहीं एक जगह जलानी थी। मुन्ने की मां ने पूछा कि तुमने क्या मन्नत मांगी। मैंने कहा वही जो कि मैंने फतेहपुर सीकरी में मांगी थी। वह  मेरे साथ फतेहपुर सीकरी नहीं गयी थी। उसने दूसरे सवाल पूछने से पहले ही,  मेरे जवाब का अनुमान करते हुऐ कहा,

‘यदि अब मैं तुमसे यह पूछूं कि तुमने फतेहपुर सीकरी में क्या मन्नत मांगी थी तो यह मत कहना कि जो तुमने यहां मांगी है।’

मुस्कराहट तो आ ही गयी।

कहा जाता है कि शाहंशाह अकबर को पुत्र नहीं था सूफी संत सलीम चिस्ती के आशिर्वाद से अकबर को तीन पुत्र रत्न प्राप्त हुऐ। उनके एक पुत्र का नाम, उन्हीं के नाम पर  सलीम रखा गया। सलीम आगे चल कर जहांगीर के नाम से शाहंशाह बना। फतेहपुर सीकरी अकबर ने सूफी संत सलीम चिस्ती के सम्मान में बनवायी थी। यहां संत सलीम की कब्र भी है। इसी पर चादर चढ़ा कर, मन्नत मांगने की बात रहती है। अकबर ने अपने पुत्र पैदा होने के उपलक्ष में इसे बनवाया था। यहां तो अपने बच्चों के भले के अलावा कोई और क्या मांग सकता है। मैंने वही मांगा जो हम सब चाहते हैं।

‘हे ईश्वर, हमारे बच्चों को संतोष, सुख, और शान्ति देना – हम दोनो से ज्यादा, चाहे वह थोड़ा ही ज्यादा क्यों न हो।’

हम लोग सड़क पार कर  सर कैथ्रडल में भी गये।  यह भी बहुत भव्य है।  इसके बाहर दृष्य हमारे गाईड के साथ यह रहा। गाईड ने बताया  कि इस चर्च में कब्रिस्तान भी है। इसमें महत्वपूर्ण  पुर्तगालियों की शव भी गड़े हैं। वहां एक चमत्कारी क्रौस  भी है। किंवदन्तियों के अनुसार इसका आकार  तब तक बढ़ता रहा जब तक ईसा मसीह स्वयं इसके ऊपर नहीं आ गये। इस क्रौस के ऊपर एक सफेद दुप्पटा पड़ा है जिसे ईसा मसीह का प्रतीक कहा जाता है।

क्रौस मुझे  हमेशा त्याग का प्रतीक लगता है। मां तो त्याग का ही रूप होती है। क्रौस पर   सफेद रंग का कपड़ा – जैसे किसी महिला ने सफेद साड़ी साड़ी का पल्लू ओढ़ रखा हो।  मेरी मां सधवा थीं पर मैंने हमेशा उन्हें  सफेद सूती धोती में ही देखा। हम सब भाई बहन की शादी में भी। मेरे पिता यही चाहते थे। मुझे इसे देख कर बस अम्मां की याद आयी।

चर्च की इमारत से बाहर निकलते ही, उसी के आहाते में,  दो छोटे सजे हुऐ बच्चे मिले। मैंने पूछा कि तुम क्या बने हो उन्होने कहा कि,

‘हम राधा कृष्ण बने हैं।’

वहीं पर उन्होने मुझे एक भजन सुनाया और पोस देकर फोटो भी खिंचवायी। पर मुझे उनकी फीस देनी पड़ी – दोनो को आइसक्रीम खिलानी पड़ी।

चर्च के अन्दर मां मिली और बाहर राधा कृष्ण – यात्रा ही सफल हो गयी।


मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती

गोवा में आमदनी का मुख्य स्रोत पर्यटन है पर इसके अलावा वहां मैगनीस और लोहे की खाने भी हैं।

खानों से मैगनीस और लोहे की कच्ची धातु  (ore) निकाल कर बड़ी बड़ी नावों  में पोर्ट पर लाया जाता है। वहां से जहाजों भर कर बाहर। मैगनीस की कच्ची धातु कुछ काली और लोहे की लाल रहती है। बोट में सैर करते समय  कच्ची धातु ले जाने वाली बोट भी दिखायी पड़ती हैं।   मैगनीस की कच्ची धातु  कोरिया और जापान भेजी जाती है और लोहे की जापान और चीन को।

नये बजट में इसमें कच्ची धातु पर ३०० रुपये प्रति टन की ड्यूटी लग गयी है जिसका वहां बहुत विरोध है। लोहे की कच्ची धातु जो चीन भेजी  जाती है उसका दाम २०० रुपये प्रति टन का होता है, उस पर ३०० रुपये प्रति टन की ड्यूटी – ठीक तो नहीं लगती। बात में कुछ दम लगता है। मैं नहीं जानता कि इस बजट में इसमें कुछ कटौती की गयी अथवा नहीं।

वहां पर कुछ लोगों ने कुछ और ही किस्सा बताया। लोहे की कच्ची धातु केवल जापान भेजी जाती थी इसके बाद जो बच जाता है उसमें लोहे की मात्रा बहुत कम होती थी तथा वह बेकार होता था। यह बेकार गोवा में पर्यावरण की मुश्कलें पैदा कर रहा था।  खान वालों को हटाने के लिये कहा गया पर उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। चीन किसी और देश से लोहे की कच्ची धातु खरीदता है जिसमें लोहे की मात्रा ज्यादा होती है। वहां की मशीने इस कार्य के लिये उपयुक्त  नहीं थी। इसलिये कम मात्रा के बेकार को इसमें मिला कर मशीन के लिये उपयोगी बनाया गया। इसमें कड़ोड़ों रुपया कमा लिया गया। यदि बेकार को बेच कर पैसा कमा लिया तो क्या गलती हुई, बस शायद सरकार को उसके किसी प्रतिशत पर ड्यूटी लगानी चाहिये।

आजकल गोवा में विकास को लेकर बहस छिड़ी हूई है। वहां पर गोवा प्लान २००१ लागू है। यह १९८६ में अधिसूचित किया गया था। सब का यह मानना है कि यह अब अनावश्यक हो गया है। १९९७ में एक नया प्लान शुरू किया गया। यह १० अगस्त २००६ में अधिसूचित किया गया।  लोगों का कहना है कि इसमें बहुत बदलाव किये गये हैं और बहुत ज्यादा जमीन नगरीय प्रयोग के लिये रख दी गयी है। इसके कारण वहां का पर्यावरण और सुन्दरता नष्ट हो रही है। इस बारे में बम्बई उच्च न्यायालय की गोवा बेन्च के समक्ष एक जनहित याचिका भी चल रही है। सरकार ने, जन मानस की भावनाओं का ध्यान रखते हुऐ  इस प्लान को २६ जनवरी २००७ को समाप्त कर दिया है। सरकार अब दुसरा प्लान २०१७ बना रही है शायद चुनाव के बाद यह आये।

न मांगू, सोना, चांदी

हम लोग गोवा में जिस  होटेल में रुके थे उसमें प्रति दिन रात में अलग अलग  रेस्तरां पर किसी न किसी थीम पर खाना होता है। एक   रात, समुद्र के किनारे, बारबेक्यू चल रहा था। खाना अफ्रीकन थीम पर था। कुछ अफ्रीकन लोग, तरह तरह के करतब दिखा रहे थे और नाच रहे थे। वे होटेल के मेहमानो को भी स्टेज पर नाचने के लिये बुलाने लगे, कई गये।  मैं भी नाचने के लिये जाने लगा तो मुन्ने की मां ने हांथ पकड़ लिया,

‘क्या करते हो, इस बुढ़ापे में क्या हो रहा है।’

मैंने कहा कि अमिताभ बच्चन भी तो करता है। वह बोली,

‘वह तो पैसे के लिये,   पिक्चर में  – सपनो की दुनिया में करता है।  यह तो असली जिन्दगी है लोग क्या कहेंगे।’

झक्क मार कर बैठ गया।

गोवा में हमारी आखरी रात पर, गोवन थीम पर भोजन था। हम भी गये। पहुंचते ही एक स्वागत ड्रिंक मिली। मैंने पी ली पर मुन्ने की मां ने नहीं ली। लगता तो संतरे का जूस था पर स्वाद कुछ अजीब  था। मैंने वेटर से पूछा कि यह क्या है। उसने बताया,

‘यह संतरे का जूस है पर इसमें थोड़ी सी काजू फेनी मिली हुई है।’


फेनी गोवा की देसी शराब है।  यह दो तरह की होती हैः काजू फेनी और नारियल फेनी। यह उसी तरह की तरह है जैसे उत्तरी भारत में महुऐ से बनी देसी शराब। महुऐ से  बनी शराब नीबू और पानी के साथ ली जाती है और फेनी किसी न किसी जूस के साथ ली जाती है। मैं शराब नहीं लेता।  वेटर के बताने पर तो धर्म संकट में फंस गया – न तो निकाली जा सके, न पचायी जा सके।

सामने स्टेज पर, एक बैण्ड संगीत सुना रहा था जिसका संचालन समार्ट  सी युवती   कर रही थी। इसने कोकण के लोकगीत  सुनाये, कुछ लोकनृत्य दिखाये। एक लोक गीत के साथ, लोकनृत्य ‘टेंपल डांस’ (Temple Dance) के नामे से भी दिखाया। इसकी धुन बहुत प्यारी ओर सुनी हुई लगी। मैंने उस युवती से इस गीत लोक नृत्य का महत्व पूछा। इसने बताया,

‘कुछ युवतियां शादी में  शामिल होना चाहती हैं पर उसके लिये नदी पार करनी है जो कि उफान में है और नाविक उन्हें नहीं ले जा रहा है। वे नाविक को गीत गा कर, नृत्य दिखा कर रिझा रहीं हैं कि उन्हें नदी पार करवा दे।’

मैंने पूछा, यदि इसका यह अर्थ है तो इसे आप टेंपल डांस   क्यों कह रहीं हैं। उसने कहा,

‘यह नृत्य दिये के साथ किया जाता है इसलिये इसे ‘टेंपल डांस’ कहा जाता है।’

मैंने उससे कहा कि लोकगीत की धुन बहुत प्यारी है क्या वह इसे बिना कोंकणी गीत के, एक बार फिर से सुनवा सकती है। उसने  कहा अवश्य और धुन बजाने के पहले स्टेज से हमें इंगित कर कहा,

‘This item is dedicated to the young couple sitting at  the left corner’

हमारा मन तो उसका हमें नवजवान जोड़े कहने से ही प्रसन्न हो गया।  धुन भी अच्छी तरह से समझ में आयी और यह भी समझ आया कि यह क्यों अच्छी लगी। इसी धुन पर तो बौबी फिल्म का यह गाना है,

न मांगू सोना चांदी,

न चांहू हीरा मोती

देती है दिल दे, बदले में दिल दे

प्यार में सौदा नहीं

है, है….

रात बहुत हो चली थी अगले दिन वापस चलना था। हम लोग वापस समुद्र के किनारे,  किनारे अपने कमरे के लिये चल दिये।

यह तो भूल ही गया

मैं दो बातें बताना भूल ही गया। चलिये उसका भी खुलासा कर देता हूं।

सबसे रोमांचक लहमां

एक दिन समुद्र तट पर  पैरा सेलिंग हो रही थी। मैंने भी पैरा सेलिंग करने की जिद्द पकड़ ली।   मुन्ने कि मां भी मेरे साथ थी,  कहने लगी बुढ़ापे में यह सब नहीं किया जाता।  पर जब ठान ही लिया और बच्चों जैसी जिद्द  करने लगा तो उसे हांमी भरनी पड़ी। वह किनारे दुसरी तरफ मुंह करके खड़ी हो गयी। उसे लगा कि मैं उड़ कर, ऊपर ही चला जांउगा।

उतरने के बाद मुन्ने की मां जैसा चित्र खींच सकी :-)

पैरा सेलिंग में मजा आ गया – बहुत रोमांच लगा।  समुद्र पर, पृथ्वी से ३०० फिट ऊंचे, नीले गगन में। नीचे आते समय दहिने तरफ की रस्सी को खीचना था जिससे हवा में मुड़ सकूं, फिर छोड़ देना था। नीचे से इशारा हुआ कि दोनो हांथ छोड़ दो में ने छोड़ दिया पर हवा चलने लगी और मैं समुद्र के बीचों बीच जाने लगा। जान सरक गयी, फिर दहिने तरफ की रस्सी खींची तो सही सलामत नीचे आया। जान में जान आयी। मैंने मुन्ने की मां की मां को देखा, कैमरा उसके गले में टंगा था, उसने कस के आखें भींच रखी थी।

भाषण और मेरा प्रस्तुतिकरण

आप  ही सोचिये कि – ऐसी दिल फेंक जगह पर, लहरों की अटखेलियों के बीच, जब आपकी नजरें लैपटॉप पर न हो कर कहीं और हों, मन कहीं और हो – तब प्रस्तुतिकरण कैसा बना होगा। भाषण सुनने वालों का भी ध्यान भी वहीं था जहां बनाने वाले का मन। शुरु हुऐ कुछ मिनट ही हुऐ नहीं की तालियों की बौछार, सीना चौड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद देखा  तो लोग जम्हाई ले रहे थे। खाना बहुत अच्छा था,सोचा कि लोगों ने ज्यादा खा लिया होगा। थोड़ी देर बाद एक टोकरी में लाल, लाल रंग का कुछ दिखायी पड़ा। सब समझ में आ गया। भाषण बन्द कर स्टेज से भागने में ही भलाई समझी।

मुझे सड़े टमाटर बिलकुल पसन्द नहीं हैं और जब से मालुम चला है कि नये टमाटर में चमक, आकार, और ज्यादा समय चलने के लिये चूहे की जीनस् मिलायी गयी है तब से टमाटर भी कम पसन्द आने लगे हैं – जी हां, टमाटर में चूहे की जीनस्,  चमक आकार और ज्यादा चलने के लिये। आजकल Genetically Modified Food (जीएमएफ) में जो न हो, वही कम है। इसलिये दुनिया में बहुत सारे लोग इस तरह के खाने को नहीं खाते हैं।

राज कपूर ने तीसरी कसम फिल्म में तीन कसमें खायी। मैंने भी  गोवा से लौट कर तीन कसमें खायीं:

  • मैं गोवा फिर से जाउंगा (हो सके तो बिना … );
  • मैं गोवा के नशे में डूबना चाहूंगा; पर
  • गोवा में कभी भाषण नहीं  दूंगा।

अंकल तो बच्चे हैं

गोवा से अपने कसबे पंहुचने के लिये, हमें पहले हवाई जहाज से फिर ट्रेन की यात्रा करनी थी। एयरपोर्ट से  रेलवे  स्टेशन पंहुंचने समान्यतः ४५ मिनट का समय लगता था। हवाई जहाज के पहुंचने तथा ट्रेन के चलने में ३ घंटे का समय था। हमारे विचार से यह काफी था और आराम से ट्रेन पकड़ सकते थे।  गोवा एयरपोर्ट पर हवाई जहाज की फ्लाइट फिर से निर्धारित कर, ढ़ाई घन्टा देर से उड़ी। हम लोग कुछ तनाव में आ गये, लगा कि कहीं गाड़ी न छूट जाये।

हवाई जहाज में उड़ते समय परिचायिका  ने उद्घोषणा  की,

‘उड़ते तथा उतरते समय, खिड़की शटर खुले रखें। अन्तरराष्ट्रीय नियम के अनुसार हवाई जहाज के अन्दर की रोशनी बन्द कर दी जायगी।’

शटर इसलिये खुले रखे जाते हैं कि यदि कोई बाहर  दुर्घटना हो तो वह दिखायी पड़ जाय पर मुझे यह नहीं मालुम था कि  हवाई जहाज के अन्दर की रोशनी क्यों बन्द कर दी जाती है। मैंने परिचायिका को बुलाने वाला बटन दबाया। वह कुछ देर बाद आयी तब तक मैं The Economics Times में डूब चुका था। एक मीठी अवाज, बनावटी मुस्कराहट के साथ, सुनायी पड़ी,

‘May I help you, Sir’

मैंने अखबार से नजर उठाते हुऐ कहा,

‘मुझे अंग्रेजी कम समझ में आती है क्या हम हिन्दी में बात कर सकते हैं।’

परिचायिका ने The Economics Times की तरफ  कड़ी नजर डाली, फिर मुस्करायी। इस बार मुझे उसकी मुसकराहट बनावटी नहीं लगी। मुझे तो वह बिलकुल अपनी बिटिया जैसी लगी। उसकी मुस्कराहट जैसे कह रही हो कि पापा तुम्हें तो झूट बोलना भी नहीं आता पर उसने मुस्करा कहा कि,

‘अंकल मुझे भी हिन्दी अच्छी लगती है पर क्या करूं  यहां पर अंग्रेजी बोलने को कहा आता है।’

वह काफी देर तक बतियाती रही। बिलकुल वैसे ही जैसे कि बिटिया रानी लड़ियाती है। उसने मुझे बताया कि परिचायिका की ट्रेनिंग में क्या क्या सिखाया जाता है  और यह भी बताया कि हवाई जहाज के अन्दर की रोशनी इसलिये बन्द कर दी जाती है कि दुर्घटना हो और बहर जाना पड़े तो आंखे न चौधियाऐं। मेरे यह सब पूछने पर उसे कुछ आश्चर्य हुआ। उसने इसका कारण जानना चाहा। मैंने उसे बताया,

मुझे न केवल उड़ान के बारे में पर शायद जीवन में उन सब बातों में रुचि है जो मुझे नहीं मालुम हैं।

इस पर वह मुन्ने की मां से बोली,

‘दीदी, अंकल तो बच्चे हैं।’

वह नये युग की थी। जानती थी कि, अब किसी भी महिला को आंटी नहीं कहा जाता है केवल दीदी या भाभी।

एयरपोर्ट पर मेरे सहयोगी ने अपनी कार ड्राईवर के साथ भेजी थी।  कार में बैठने और ट्रेन छूटने में केवल ३० मिनट शेष था। ड्राईवर बहुत  कुशल था। उसने हमें केवल २९ मिनट में रेवले स्टेशन पंहुचाया।  मैं लैपटॉप लेकर प्लेटफॉर्म पर डिब्बे के सामने पहुंचा तो ट्रेन ने चलना शुरू कर रही थी। मैं तो चढ़ गया। मुन्ने की मां एक हाथ में पर्स और दूसरे हाथ में एक  हैण्ड बैग पकड़े  थी।  चढ़ते समय उसका पैर फिसला, पर उसका पैर वापस प्लेटफॉर्म पर। मैंने उससे बैग लिया और दूसरे हाथ से   उसे ट्रेन में चढ़ने में सहायात की। समान भी और लोगों ने चलती ट्रेन में चढ़ाया।

कुछ देर बाद समान ठीक से रख कर मैंने उससे कहा कि वह हैण्ड बैग क्यों पकड़े थी कहीं वह वास्तव में ऊपर चली जाती तो। उसने कहा कि वह निश्चिंत थी कि वह चढ़ जायगी इसलिये उसने ट्रेन में चढ़ने का प्रयत्न किया। वह कुछ आगे और भी कह रही थी पर तब तक मेरा लैपटॉप खुल चुका था। मेरी उंगलियां गोवा की यात्रा का संस्मरण लिखने के लिये थिरकने लगी थीं। फिर भी मैंने उसे कहते हुऐ सुना,


‘इतनी जल्दी मुझसे पल्ला झाड़ रहे थे। सुना नहीं था कि परिचारिका कह रही थी कि तुम बच्चे हो अभी तो तुम्हें २५ साल  और देखना है जब तक बड़े न हो जाओ।’

मैंने उसकी बात अनुसुनी कर दी। २५ साल तो बहुत समय होता है, मेरे पास शायद केवल १० या १२ साल का समय है। बहुत कुछ करना है, बहुत कुछ लिखना है लोगों तक अपनी बात पहुचानी है। इसीलिये मैं काफी हड़बड़ी में रहता हूं और मेरी चिट्ठियां, मेरे पॉडकास्ट सब कॉपीलेफ्टेड हैं आपको सारे जहां को उन्हें कॉपी करने संशोधन करने या किसी प्रकार से प्रयोग करने की स्वतंत्रता है। हां यदि लिंक दे देंगे तो मुझे प्रसन्नता होगी।

यह लेख मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुका है। इसकी अलग अलग कड़ियों को आप नीचे दिये गये लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।

सांकेतिक शब्द
Travel, travel and places, Travel journal, Travel literature, travel, travelogue, सिक्किम, सैर सपाटा, सैर-सपाटा, यात्रा वृत्तांत, यात्रा-विवरण, यात्रा विवरण, यात्रा संस्मरण,

यह बच्चन जी की जीवनी का चौथा एवं अंतिम भाग है। बच्चन जी इलाहाबाद में क्लाईव रोड पर जिस बंगले में रहते थे, उसके कमरों में दरवाजे, खिड़कियों और रोशनदान को मिलाकर १०-१० खुली जगहें थी, इसलिये उसका नाम उन्होंने दशद्वार रख दिया।

सोपान का अर्थ है: सीढ़ी। बच्चन जी जब दिल्ली गये तो वहां पर वे लेखकों व पत्रकारों की सहकारी समिति के सदस्य बन गये। इस सहकारी समिति को गुलमोहर पार्क में कुछ जमीन मिली जिसमें एक प्लाट बच्चन जी को भी मिला। इस पर वहां बच्चन जी ने एक तिमंजिला मकान बनाया। जिसकी मजिंलो को एक लम्बी सीढ़ी जोड़ती है जो नीचे से ऊपर तक एक साथ देखी जा सकती है। इस घर में प्रवेश करने पर सबसे पहले  दिखती है , इसलिये इस मकान का नाम उन्होंने सोपान रखा।

इस भाग में, बच्चन जी ने इलाहाबाद से निकल कर जो जीवन बिताया, उसका वर्णन है। जाहिर है, इसमें उनके विदेश मंत्रालय से सम्बन्धित संस्मरण, दिल्ली की राजनैतिक गतिविधियां (जिसमें इमरजेंसी भी है), अमिताभ बच्चन का सिनेमा जगत में उदय और करोड़ों लोगों का चहेता अभिनेता बनने की कहानी है। यह उनके जीवन का सबसे खुशहाल समय भी रहा।  इन क्षणों में वे इलाहाबाद की अच्छी बातों को याद करते हैं और कहीं न कहीं उसके अहसान-मन्द भी दीखते हैं।

अमिताभ बच्चन जया भादुड़ी

अमिताभ बच्चन ने‍ जिन ऊंचाइयों को छुआ, वह किसी भी पिता के लिये एक हर्ष की बात  हो सकती है और इस भाग में वे बहुत कुछ अमिताभ बच्चन के बारे में है। अमिताभ के अभिनय की क्षमता के बारे में कहते हैं कि,

‘मुझे याद है १९४२ के “भारत छोड़ो” आंदोलन के समय जब इमर्जेसी लगा दी गई थी, और युनिवर्सिटी दो-तीन महीने के लिए बंद करा दी गई थी तो हम दोनों घर पर शेक्सपियर के नाटकों की प्ले-रीडिंग किया करते थे। अमित पेट में था। अब हमसे लोग पूछते हैं कि अमिताभ में अभिनय की प्रतिभा कहॉं से आई। मैं उन दिनों की याद कर एक प्रति-प्रश्न उछाल देता हूँ, “अभिमन्‍यु ने चक्रव्‍यूह भेदने की क्रिया कहॉं से सीखी?”


अमिताभ बच्चन शुरू में इलाहाबाद में ब्यॉज़ हाई स्कूल में पढ़े और फिर शेरवुड, नैनीताल  पढ़ने के लिए चले गये। वे,  स्कूल के नाटकों में भाग लेते थे और पर जीवन में वे इंजीनियर बनना चाहते थे। बी.एस.सी. के बाद उनका यह सपना टूट गया और वे कलकत्ता नौकरी करने चले गये।  इसका बात को वे कुछ इस प्रकार से बताते हैं,

‘अमिताभ अपने इंजीनियर बनने का सपना से रहे थे।
तीन वर्ष बाद कम्पार्टमेन्टल से उन्होंने बी.एस.सी. की।
इंजीनियर बनने का सपना पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था।

अमिताभ ने अपने स्नातकीय डिग्री के लिए विज्ञान लेकर अपनी मूल प्रवृत्ति को पहचानने में भूल की थी; परीक्षा-परिणाम संतोषजनक नहीं हुआ। विज्ञान लेकर आगे पढ़ने का रास्ता अब बंद हो गया था।’

सुना था कि अमिताभ बच्चन ने ऑल इन्डिया रेडियो पर समाचार पढ़ने के लिये आवेदन पत्र दिया था जो कि स्वीकर नहीं हुआ था – उनकी आवाज ठीक नहीं पायी गयी थी। मुझे इस पर कभी विश्वास नही होता था, पर यह सच है।    बच्चन जी लिखते हैं कि,

‘आल इंडिया रेडियो में कुछ समाचार पढ़ने वाले लिए जाने वाले थे। अमित ने प्रार्थना पत्र भेज दिया। उन्हें आवाज-परीक्षण के लिए बुलाया गया, पर उनकी आवाज ना-काबिल पाई गई। पता नहीं रेडियों वालों के पास अच्छी आवाज का मापदंड क्या था। आज तो अमिताभ के अभिनय में आवाज उनका खास आकर्षण माना जाता है। पर अच्छा हुआ वे रेडियो में नहीं लिए गए। वहॉं चरमोत्कर्ष पर भी पहुँच कर वे क्या  बनते? – “मूस मोटाई लोढ़ा होई।” हमारी असफलता और नैराश्य में भी कभी-कभी हमारा सौभाग्य छिपा रहता है।’

अमिताभ बच्चन की बात हो और जया भादुड़ी का जिक्र न आये – यह तो हो ही नहीं सकता। बच्चन जी पर उसकी पहली छाप के बारे में तो उन्ही से सुनना ठीक रहेगा,

‘जया कद में नाटी, शरीर से न पतली, न मोटी, रंग से गेहुँआ; उसकी गणना सुंदरियों में तो न की जा सकती थी, पर उसमें अपना एक आकर्षण था, विशेषकर उसके दीर्घ-दीप्त नेत्रों का, और उसके सुस्पष्ट मधुर कंठ का। एक अभाव भी उसमें साफ था—समान अवस्था की लड़कियों की सहज सुलभ लज्जा का, पर फिल्म में काम करने वाली लड़की से उसकी प्रत्याशा भी न की जा सकती थी।’

इस भाग को पढ़ने के बाद, मुझे अमिताभ बच्चन की दो बातें बहुत अच्छी लगीं।

  • उन्होने अपने माता-पिता को हमेशा सम्मान दिया। अक्सर लोग अपने वृद्ध माता-पिता को भूल जाते हैं।
  • उनका अपने पुराने सहयोगियों तथा कर्मचारियों के साथ व्यवहार।

अक्सर लोग जब  बड़े आदमी हो जाते हैं तो  अपने मुश्किल समय के लोगों को भूल जाते हैं, अमिताभ बच्‍चन ने  ऐसा नहीं किया। यह बात बच्चन जी को भी बहुत अच्छी लगी। एक बार कलकत्ता में पिक्चर शूटिंग के दौरान उनके व्यवहार के बारे में बच्चन जी लिखते हैं,

‘कलकत्ता प्रवास में अमिताभ  जी एक व्यवहार मुझे बहुत पसंद आया। एक शाम को उन्होंने याद कर-करके बर्ड और ब्लैकर्स के अपने पूर्व सहयोगियों को चाय पर आमंत्रित किया और एक-एक से ऐसे मिले जैसे अब भी उनके बीच ही काम कर रहे हों। … कभी उनके दफ्तर के पुराने चपरासी आदि भी आते तो वे उनको बुला लेते, खुशी से मिलते’

इस भाग को पढ़ने से यह भी पता लगा कि अमिताभ को अभिनेता के मार्ग में प्रोत्साहित करने में सबसे बड़ा हाथ उनके छोटे भाई अजिताभ का था।  बच्चन जी को कई बार रूस जाने का मौका मिला। एक बार अजिताभ  ने उनसे एक खास तरह का कैमरा मंगवाया जो बहुत ही मंहगा था। उस समय, यह उनकी समझ में नहीं आया कि वह क्यों  इतना महंगा कैमरा मगंवा रहा है। इसका भेद तो बाद में खुला।  उसने कैमरे से अमिताभ बच्चन  की खास फोटो लेकर फिल्म जगत के लोगों को दिया ताकि अमिताभ बच्चन का फिल्म जगत में रास्ता खुल सके।

रुस यात्रा

इस भाग में बच्चन जी की रूस यात्रा और वहां के कई शहरों का भी वर्णन है। वे वहां बीमार हो गये। वे इस अनुभव को इस प्रकार से बताते हैं,

‘विदेश में कोई बीमार न पड़े, खासकर ऐसे विदेश में जहाँ उसकी भाषा न समझी जाय, या वह वहां की भाषा न समझे। इस दुर्भाग्य का शिकार भी मुझे होना था।’

बच्चन जी को रूस में अस्पताल से तब तक नहीं छोड़ा गया जब तक उन्होनें यह नहीं कह दिया कि वे ठीक हो गये। बच्चन जी इसे कुछ इस प्रकार बताते हैं,

‘मुझसे पहले किसी ने गंभीरतापूर्वक या मजाक-मजाक में कहा था कि रूसी अधिकारी अस्पताल में दाखिल होने पर मरीज को या तो अच्छे होने पर बाहर जाने देते हैं, या फिर उसकी लाश को। वे नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि मरीज़ बाहर जा कर कहे कि उसका मर्ज़ रूसी डाक्टरों से अच्छा नहीं किया जा सका।’

मैं रूस कभी नहीं गया पर मुन्ने की मां लगभग बीस वर्ष पहले, एक सम्मेलन में बाकू गयी थी। उसके बाद, वह उन शहरो में गयी, जहां बच्चन जी गये थे। वह वहां बिमार तो नहीं पड़ी पर वहां पर अपने अनुभवों के बारे में कहती है,

‘बाकू … शहर एजरबजान में है और कैस्पियन समुद्र के तट पर बसा है। कॉन्फ्रेन्स का आयोजन समुद्र के तट पर बने एक सैनिटोरियम में किया गया था। सब लोग एक हाल में भोजन करते थे, जहां अक्सर गुजिया एवं अन्य पकवान खाने को मिलते थे।
विश्व के मशहूर शतरंज खिलाड़ी कैस्पारोव बाकू के हैं। पूरे शहर में जैसे शतरंज छाया रहता था, जैसे यहां पर क्रिकेट। पेड़ों के नीचे, व्यक्तियों को शतरंज खेलते अक्सर देखा जा सकता था।
यहां सभी ने कहा कि रूस जा रही हो तो लेनिनग्राड अवश्य जाना, वह उत्तर का ‘वेनिस’ कहलाता है। मैं वहां भी गयी थी। वहॉं पहुँच कर मैंने देखा कि पूरे शहर में नहरें बह रही हैं जो कि समुद्र में जाकर मिलती हैं। वहां का सेन्ट पीटर्सबर्ग संग्रहालय विख्यात है।
लेनिनग्राड में कुछ भारतीय लड़के लड़कियों से भेंट हुई जो वहां पढ़ने के लिए गये हुए थे। उन्होंने मुझे भारतीय खाना बनाकर खिलाया- दाल, चावल और पापड़ की रसेदार तरकारी बनायी। … लेनिनग्राड में सब्जी की दुकान पर सिर्फ आलू बिकता दिखाई देता था और फल की दुकान पर केवल हरा सेब – पता नहीं, वहां अब क्या क्या मिलता है।
वापस भारत आने के लिए, मॉस्को से होते हुए आना था। मैं मॉस्को विश्वविद्यालय देखने गयी जो मॉस्कवा नदी के किनारे बना हुआ है। सभी इमारतों में एक अद्भुत सुन्दरता थी। मॉस्को में उस समय भारतीय राजदूत श्री टी.एन.कौल थे। मैंने उनसे फोन पर बात की … वे शुद्ध हिन्दी में बोल रहे थे। हाँ, मॉस्को के सब-वे स्टेशन अपनी सुन्दर मूर्तियों और स्वच्छता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
जिस समय मैं रूस गयी थी वह समय रूस देश के लिये बहुत मुश्किल का समय था। नये बदलाव आने को थे और लोग कुछ डरे से लगते थे, मुझे कोई भी हंसता हुआ नहीं दिखता था। यह बात कुछ अजीब सी लगती थी।’

बच्चन जी और नारी मन

कहा जाता है कि नारी को समझ पाना, पुरषों के लिये सुलभ नहीं  है। बच्चन जी  संवेनदशील थे – कई महिलाओं के नजदीक रहे। अपनी जीवनी कुछ ऐसे सम्बन्धों की भी चर्चा की जिसे भारतीय समाज में दबी जुबान से बात की जाती है। मेरे लिये कहना मुश्किल है कि वे नारी मन को अच्छा समझ पाये कि नहीं। यह तो वही व्यक्ति कह सकता है जो स्वयं इसमें पारंगत रहा हो – मैं नहीं। पर मैं, बच्चन जी के नारी विश्लेषण से सहमत नहीं हूं। ऐसा क्यों है, मैं नहीं बता सकता हूं, मैं स्वयं न तो इसे समझ पा रहा हूं और नही इसे तर्क पर रख पा रहा हूं।

बच्चन जी कहते हैं कि तुलसी दास जी ने,

‘एक ओर तो उन्होंने सीता के रूप में आदर्श नारी की कल्पना की और दूसरी ओर, जहॉं भी मौका मिला नारी की निंदा करते रहे, प्राय: उसकी कामुकता की ओर संकेत करते हुए।’

इसका कारण वे इस तरह से बताते हैं,

‘विवाह हो गया था, पर पत्नी उनकी अनुपस्थिति में, बिना उनकी अनुमति के मायके भाग गई थी। आधी रात को तुलसीदास को पत्नी की याद सताती है … पहुँच जाते हैं [पत्नी] के कमरे में। … कहा तो यह जाता है कि … [पत्नी] ने कहा कि जैसी प्रीति आपको मेरे हाड़-मांस के शरीर से है वैसी प्रीति यदि आप रघुनाथ जी से करते तो आपका जन्म-जन्मांतर सुधर जाता … क्षमा करेंगे, इस विषय में मेरी अलग ही कल्पना है। अधिक संभावना इसकी है कि उस रात तुलसीदास ने … [अपनी पत्नी] को किसी और के साथ देखा। उस रात उनकी मोहनिद्रा नहीं टूटी। नारी के प्रति उनका मोह भंग हुआ—‘ Frailty thy name is woman’ (नारी तेरा नाम छिन्नरपन)।’

हो सकता है कि वे ठीक हों, पर मेरे विचार उनसे नहीं मिलते। मैं इस बात पर उनसे बिलकुल सहमत नहीं हूं – शायद मैं कम संवेदनशील हूं या फिर महिलाओं को नजदीक से कम परखा है।

वे भारतीय नारी की मुश्किलों के बारे में लिखते हैं कि,

‘परंपरागत मर्यादाओं में बँधी भारतीय नारी की बड़ी मुसीबत है। किसी पुरूष के प्रति यदि उसमें प्रेम जागे तो वह सीधे-साफ शब्दों में यह नहीं कह पाती कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। प्राय: वह उसे अपना भाई बनाती है। उसकी कलाई पर राखी बांधती है और इस प्रकार उससे किसी संबंध से जुड़ उसे अपना सखा, साथी, मित्र, प्रेमी  बना पति के रूप में भी पाने की कामना करती है।’

उनके मुताबिक शूर्पणखा भी अनाड़ी थी। उनके अनुसार,

‘यदि वह [शूर्पणखा] बहन बनकर राम के हाथ में राखी बॉंधने के लिए आई होती, तो … अरण्य कांड के बाद रामायण की कथा कुछ और ही तरह लिखी जाती।’

वे साहित्य की दुनिया से दो उदाहरण भी देते हैं,

‘सुनता हूं कि पुष्पा ने भी भारती के हाथ में पहले राखी बांधी थी; आज वे उनसे एक पुत्र, एक पुत्री की मां हैं। नंदिता जी को आज प्राय: सभी लोग भगवतीचरण वर्मा की पत्नी के रूप में जानते हैं। उन्होंने भी पहले वर्मा जी के हाथ में राखी ही बांधकर उनसे बहन का रिश्ता कायम किया था।’

बच्चन जी के अनुसार अजिताभ और रोमेला का प्रेम भी, शायद इसी तरह से शुरु हुआ। यह सब सच है कि नहीं यह तो वे ही लोग बता सकते हैं। मेरे विचार से, शायद यह उस समय भी सच नहीं था। मैं बच्चन जी के समय का तो नहीं पर उनके पुत्रों के समय का हूं।  मेरे कई मित्रों ने प्रेम विवाह किया पर उनका पत्नी से रिश्ता कभी भी बहन के रूप में नहीं शुरु हुआ।  अक्सर सोचने और विचार करने में भिन्नता का कारण, अलग अलग वातावरण में बड़े होना होता है। शायद मेरे और उनकी सोचने और विचार में फर्क होने का यही कारण हो।

ईमरजेंसी

यदि किसी के व्यक्तित्व का सही आंकलन करना है तो उसे मुश्किल के समय पर देखें न कि खुशहाली के समय पर।

अपने देश में भी मुश्किल समय का दौर आया: १९७५-७७ का समय। यह देश के लिये मुश्किल का समय था।  लोगों के चरित्र का  सही आंकलन,  उस समय उनके बर्ताव से किया जा सकता है।  इस समय कई बुद्धिजीवियों ने शासक दल का सर्मथन दिया। बच्चन जी उनमें से एक थे। बाद में शायद उन्हें इसका कुछ पछतावा रहा। वे इसे, इस तरह से समझाते दिखते हैं।

‘एक दिन किसी ने मुझे प्रधान मंत्री निवास से फोन किया, शायद संजय ने, कि क्या मेरा नाम आपात्कालीन स्थिति के समर्थकों में दिया जा सकता है? और अगर मैं सच कहूँ तो केवल गांधी परिवार से अपनी मैत्री और निकटता के कारण मैंने फोन पर ही हामी भर दी। बाद को कई दिनों तक रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से कई और लेखकों के साथ मेरा नाम भी इमर्जेसी के समर्थकों में प्रसारित किया गया। जहाँ तक मुझे याद है, उनमें दो प्रमुख नाम थे गुरूमुख सिंह ‘मुसाफिर’ के और सरदार जाफरी के।’

इमरजेंसी के बाद इस तरह की बात बहुत से बुद्धजीवियों यहां तक कुछ न्यायधीशों ने की। आप स्वयं उनके चरित्र का स्तर आंक सकते हैं।  यह बात आपको कठोर लग सकती है पर इमरजेंसी के मेरे अनुभव कड़ुवे हैं। मेरे पिता दो साल तक अकारण बन्द रहे। इस दौरान  सरकार के द्वारा पुलिस, और अफसरशाही का जितना पतन हुआ, उतना अंग्रेजों के समय भी नहीं हुआ था। मैंने इसके बारे में यहां लिखा है।

अनुवाद नीति, हिन्दी की दुर्दशा

बच्चन जी दिल्ली में  विदेश मंत्रालय में अनुवाद करने का कार्य करते थे। वे अनुवाद की नीति के बारे में कहते हैं,

‘भाषा सरल-सुबोध होगी
पर बोलचाल के स्तर पर गिरकर नहीं
लिखित भाषा के स्तर पर उठकर, अगर अनुवाद को
सही भी होना है।
और मेरा दावा है कि लिखित हिन्दी अंग्रेजी के ऊंचे से ऊंचे स्तर को छूने की क्षमता आज भी रखती है।’

वे भाषा के प्रथम आयोग के परिणामो के बारे में दुख प्रगट करते हुऐ कहते हैं कि,

‘सबसे दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम था कि १५ वर्ष तक यानी १९६५ तक अंग्रेजी  की जगह पर हिंदी लाना न आवश्यक है, न संभव; सिद्धान्तत: हिंदी राजभाषा मानी जायगी, अंग्रेजी सहचरी भाषा; (व्यवहार में उसके विपरीत: अंग्रेजी राजभाषा, हिंदी सहचरी – अधिक उपयुक्त होगा कहना ‘अनुचरी’)। सरकारी प्रयास हिंदी के विभिन्न पक्षों को विकसित करने का होगा – प्रयोग करने का नहीं – जिसमें कितने ही १५ वर्ष लग सकते हैं। मेरी समझ में प्रयोग से विकास के सिद्धान्त की उपेक्षा कर बड़ी भारी गलती की गई; अंततोगत्वा जिसका परिणाम यह होना है कि हिंदी तैयारी ही करती रहेगी और प्रयोग में शायद ही कभी आए – “डासत ही सब निशा बीत गई, कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो”।’

मुझे बच्चन जी की यह बात ठीक लगती है। हिन्दी की दुर्दशा का यह भी एक कारण है।

बच्चन – पन्त विवाद

१९७१ में बच्चन जी ‘पंत के दो सौ पत्र’ का प्रकाशन करना चाहते थे। इनके मुताबिक वे उसे उसी रूप में छपवाना चाहते थे जिस रूप में वे लिखे गये थे पर पन्त जी उसे कुछ सेंसर करना चाहते थे।   इसी से दोनो के बीच में कुछ मनमुटाव हो गया और वह इतना बढ़ गया कि पन्त जी ने इसका प्रकाशन रोकने के लिये, इलाहाबाद में  एक मुकदमा ठोक दिया। बच्चन जी के मुताबिक, बाद में,  पंत जी ने  अपने वकील की सलाह पर प्रकाशक से इस तरह का समझौता कर लिया कि वे पंत जी पत्रों से वे अंश निकाल देंगे जिस पर पंत जी को आपत्ति है और इसी आधार पर  पंत जी ने मुकदमा वापस ले लिया।  बच्चन जी लिखते हैं कि,

‘पंत जी ने –शायद अपने पक्ष की दुर्बलता देखकर –मुकदमा वापस लेने का ही फैसला किया।’

मैंने अपने सहपाठी तथा वकील मित्र इकबाल से पूछा क्या यह सही है। उसका कहना है,

‘किसी के लिखे पत्र उसके कॉपीराइट होतें है और उसकी अनुमति के बिना छापे नहीं जा सकते। पंत जी का मुकदमा कमजोर नहीं था कमजोर तो बच्चन जी का पक्ष था।
पंत जी बहुत बड़े थे।  छोटे (बच्चन जी) की जिद्द देख कर खुद ही झुक गये।’

मैंने इस विवाद के बारे में संक्षेप में लिखा। इस भाग में, इस विवाद के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। जिसे न मैं उचित समझता हूं, न ही उसका  इससे अधिक जिक्र करना – पढ़ने के बाद दुख हुआ।  शायद बड़ा व्यक्ति होने के लिये केवल बड़ा साहित्यकार होना जरूरी नहीं, इसके लिये कुछ और होना चाहिये। यह भाग पढ़ कर मन खट्टा हो गया।

हरिवंश राय बच्चन का चित्र बीबीसी के आ�ार से

हरिवंश राय बच्चन का चित्र बीबीसी के आभार से

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन – विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं – इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

सांकेतिक चिन्ह

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‘बसेरे से दूर’, बच्चन जी की आत्म कथा का तीसरा भाग है। इसमें उस समय की बात है जब वे इलाहाबाद से दूर रहे।

इस भाग में लिखी घटनाओं के बारे में विवाद है। मेरे कई मित्र इलाहाबाद के पुराने बाशिन्दे रहे हैं। उनके पिताओं से कभी कभी  मुलाकात होती है। एक बार जब मैंने इस भाग कि कुछ घटनाओं (जैसे, तेजी जी के साथ घटित घटना, या फिर कैम्ब्रिज़ से लौटते समय मिस्र में भारतीय राजदूत की चर्चा) की बात की तो उनका कहना था कि यह घटनायें सही तरह से वर्णित नहीं हैं और वास्तविकता इसके विपरीत है। मैं नहीं जानता कि क्या सच है पर लगा कि इस  बारे में विवाद अवश्य है।

इस भाग में बच्चन जी के इलाहाबाद से जुड़े खट्टे मीठे अनुभव हैं – ज्यादातर तो खट्टे ही हैं। यदि आप इलाहाबाद प्रेमी हैं, तो शायद यह भाग आपको न अच्छा लगे, पर एक जगह बच्चन जी इलाहाबाद के बारे में यह भी कहते हैं।

‘इलाहाबाद भी क्या अजीबोगरीब शहर है। यह इसी शहर में सम्भव था कि एक तरु तो यहां ऐसी नई कविता लिखी जाय जिस पर योरोप और अमरीका को रश्क हो और दूसरी तरु यहां से एक ऐसी पत्रिका प्रकाशित हो जिसका  आधुनिकता से कोई संबंध न हो – संपादकीय को छोडकर। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी “सरस्वती” को द्विवेदी युग से भी पीछे ले जाकर जिलाए जा रहे  थे, आश्चर्य इस पर था।‘

तो दूसरी जगह यह भी कहते हैं,

‘इलाहाबाद की मिटटी में एक खसूसियत  है – बाहर से आकर उस पर जमने वालों के लिये वह बहुत अनुकूल पडती है। इलाहाबाद में जितने जाने-माने, नामी-गिरामी लोग हैं, उनमें से ९९% आपको ऐसे मिलेंगे जो बाहर से आकर इलाहाबाद में बस गए, खासकर उसकी सिविल लाइन में – स्यूडो इलाहाबादी। और हां, एक बात और गौर करने के काबिल है कि  इलाहाबाद का पौधा तभी पलुहाता है, जब वह इलाहाबाद छोड दे।‘

इसमें कुछ तो सच है। नेहरू, सप्रू, काटजू, बैनर्जी वगैरह तो इलाहाबाद में बाहर से आये और फूले फले।  नेहरू की सन्तानें और आगे तब बढ़ी जब वे इलाहाबाद से बाहर गयीं। यह बात हरिवंश राय बच्चन के पुत्र  अमिताभ बच्चन पर भी लागू होती है – वे तभी फूले फले जब पहुंचे बॉलीवुड पर यह बात बच्चन जी के लिये सही नहीं है।

मेरे इलाहाबादी मित्र कहते हैं कि,

‘इलाहाबाद शहर अपने मैं अनूठा है – न ही किसी शहर ने देश को इतने प्रधान मन्त्री दिये, न ही साहित्यकार, न ही इतने सरकारी अफसर, न ही इतने वैज्ञनिक, और न ही न्यायविद। इससे सम्बन्धित  लोग दुनिया में फैले हैं।’

वे लोग यह भी कहते हैं कि,

‘जहां तक साहित्यकारों की बात है जब तक वे इलाहाबाद में रहे सरस्वती उनके साथ रहीं, जब  उन्होंने इलाहाबाद छोड़ा लक्ष्मी तो मिली, पर सरस्वती ने साथ छोड़ दिया। उन्हें प्रसिद्धि उस काम के लिये मिली जो  उन्होंने  इलाहाबाद में किया – चाहें वे  हरिवंश राय बच्चन हों या  धर्मवीर भारती। सुमित्रा नन्दन पन्त, या महादेवी वर्मा, या राम कुमार वर्मा इस लिये लिख पाये क्योंकि वे इलाहाबाद में ही रहे।
हरिवंश राय बच्चन माने या न माने उन्होने अपनी सबसे अच्छी कृति (मधुशाला) उनके इलाहाबाद  रहने के दौरान लिखी गयी। उन्हें जो भी प्रसिद्धि मिली वह उन कृतियों के लिये मिली, जो उन्होने इलाहाबाद में लिखी।’

मैं साहित्य का ज्ञाता नहीं हूं। मैं नहीं कह सकता  कि यह सच है कि नहीं और न ही कुछ टिप्पणी करने का सार्मथ्य रखता हूं।

क्या इलाहाबाद की मिट्टी कुछ अलग है?  क्या इलाहाबाद वासी अपने शहर के लिये एहसान फरामोश हैं: मालुम नहीं – इलाहाबाद वासी ही जाने।

इलाहाबाद के बारे में सदियों से लिखा जा रहा है – शायद इतना जितना किसी और शहर के बारे में नहीं।  अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा ने   ‘द लास्ट बंगलो’ (The Last Bunglow: writings on Allahabad) नामक पुस्तक में इन सारे लेखों को संकलित किया है।


ह्स्युआन त्संग (Hsiuan Tsang) सातवीं शताब्दी में भारत आये थे। उन्होंने  उस समय इलाहाबाद के कुंभ मेले के बारे में लिखा। इस पुस्तक में, इलाहाबाद के बारे में लिखने वाले  अन्य प्रमुख लोग हैं गालिब (Ghalib), रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling), मार्क ट्वैन (Mark Twain), जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru), अमर नाथ झा (Amar Nath Jha), राजेश्वर दयाल (Rajeshwar Dayal), सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (Suryakant  Tripathi ‘Nirala’, नयनतारा सहगल (Nayantara Sehgal), सईद ज़ाफरी (Saeed Jafrey), वेद मेहता (Ved Mehta), पंकज  मिश्रा (Pankaj Misra), और कई अन्य। इन सब के लेख इसी पुस्तक में संकलित हैं। इन लोगों ने कुछ न कुछ समय इलाहाबाद में बिताया है। यदि आपका इलाहाबाद से कोई संबन्ध है, या इन लोगो से – तो ‘द लास्ट बंगलो’ पुस्तक को पढें। यह इलाहाबाद को उनके नज़रिये देखती है।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन – विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं – इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

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नीड़ का निर्माण फिर बच्चन जी की जीवनी का दूसरा भाग है, यह भाग उनकी पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु से शुरू होकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुनः दाखिले, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नियुक्ति, तेजी जी से मिलन, अमिताभ एवं अजिताभ पुत्र रत्न की प्राप्ति, और उनके शिखर पर पहुंचने की कथा है। इस दौरान उन्होने अपने बसेरे का निर्माण किया शायद इसलिये इस भाग का नाम उन्होंने ‘नीड़ का निर्माण फिर’ रखा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यापक

बीसवीं शताब्दी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय Oxford of East के नाम से जाना जाता था यह भारतवर्ष का सबसे अच्छा विश्‍वविद्यालय था। नीड़ के निर्माण फिर में वह विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पढ़ाई पूरी करने की कथा बताते हैं कि उन्हें कैसे वहां नौकरी मिली।अंग्रेजी विभाग के दो प्रसिद्ध अध्यापक अमर नाथ झा और एम.सी. देव के बारे में बताते हैं।

‘पंडित अमरनाथ झा अंग्रेजी-साहित्‍य का इतिहास और शेक्सपियर पढ़ाते थे। साहित्य के इतिहास पर उनका एक व्याख्यान प्रति सप्ताह होता था और उसमें बी.ए. कें लड़के भी आकर बैठ सकते थे-विभाग के बीचोंबीच वाले सबसे बड़े हाल में, जिसमें अपराहन में लॉ के क्लास होते थे। शेक्सपियर वाला क्लास वे अपने कमरे में लेते थे। हाजिरी लेने में वे अपना वक्त नहीं खराब करते थे । लड़के उनके क्लास में पहुंचे, उन्होंने एक नजर सब पर दौड़ाई, रजिस्टर खोला और अनुपस्थित लड़कों के नाम के आगे बिन्दी धर दी। किसी प्रकार का नोट हाथ में लेकर पढ़ाते मैंने कभी न देखा था; प्रो.एस.सी. देब को भी यह कमाल हासिल था, पर दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर था। झा साहब जब किसी विषय पर व्याख्यान देने लगते तो महसूस होता थ कि आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसकी पतवार ठीक दिशा में लगी हुई है और जिसका खेवनहार नाव को समगति से खेता आपको ४५ मिनट के निश्चित घाट पर उतार देगा। देब साहब की नाव में न पतवार होती थी न डांड़। वह शब्दों के तूफान में डगमग डोलती कभी कभी दाएं-बाएं, कभी आगे, और कभी पीछे भी खिंचती, किसी भी जगह जाकर टकरा सकती थी।‘

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज़ियानगरम् हॉल

एक साल गर्मियों में बच्‍चन जी तेजी जी के साथ झा साहब के साथ मसूरी में रहे। उसके अनुभव पर बच‍चन जी कहते हैं कि,

‘झा साहब के साथ कोई कितने ही दिन रहे, उनसे निकटता का अनुभव नहीं कर सकता था। वे अपने भीतर कहीं बहुत एकाकी, स्वकेन्द्रित और स्वयं-पर्याप्त थे। वे यह तो चाहते थे कि उनके आस-पास लोग रहें पर अपने निकट वे किसी को न आने देते थे। झा साहब में बहुत गुण थे, पर वे अच्छे मेजबान नहीं थे। धर्मशाला और घर रहने में कुछ अन्तर का अनुभव तो होना चाहिए। उनके घर में सब-कुछ ठंडा-ठंडा सा था ! हृदय की गर्माहट की प्रतीति कहीं नहीं होती थी।
कैसे अनासक्त भाव से रहता था वह शख्स! सुबह से शाम तक सारे काम बिना किसी घबराहट के, थकावट के, बिना किसी शिकवा-शिकायत के, कर्तव्य की गरिमा से करते जाना रोज-ब-रोज, माह-ब-माह, साल-ब-साल। इतना जब्त करने वाला, इतना अपने को जाब्ते में रखने वाला मैंने दूसरा आदमी नहीं जाना।‘

आइरिस, और अंग्रेजी

बच्चन जी के जीवन में कई लड़कियां आयीं कुछ का नाम वह बताते हैं तो कुछ का नाम छिपा जाते हैं। इन सम‍बन्धों का जिक्र करने का उनका ढंग भी निराला है। विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते समय आइरिस‍ नाम की इसाई लड़की उनके सम्पर्क में आयी और उसे वे दिल से चाहने लगे । वे कहते हैं कि,

‘आइरिस ने प्रथम दृष्टि में ही मुझे आकर्षित किया। वैसे तो मुझमें कुछ विशेष आकर्षक नहीं था, पर मेरे बालों ने उसे आकर्षित किया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। यदि पहले से मेरा परिचय उसे कवि के रूप में दे दिया गया होता तो बालों के सम्बन्ध में मेरी रोमानी लापरवाही उसे अप्रत्याशित और अस्वाभाविक न लगी होगी। कद से लम्बी, बदन से इकहरी, और रंग से विशेष गौर वर्ण की, उसमें कहीं ऐंग्‍लो-इंडियन रक्त का मिश्रण अवश्य था। गर्दन लम्बी, चेहरा आयताकार, आंखें नीली, गाल की हड्डियां उभरी, होठ भरे, बाल सुनहरे, कटे, फिर भी इतने बड़े कि दायेँ-बायेँ कन्धों पर और पीठ के उपरी भाग पर लहराते। शायद उसके शरीर में उसके बाल ही उसके मनोभावों के सबसे अधिक अभिव्यंजक थे। वह थोड़ी-थोड़ी देर पर उन्हें कभी दाहिने और कभी बायेँ झटकती और इससे उसके सौन्दर्य में एक गतिशीलता –सी आ जाती।‘

आयरिस ने बच्चन जी के प्रेम प्रणय को अस्वीकार कर दिया। उससे पत्र व्यवहार अंग्रेजी में होता था। अस्वीकार होने के बाद बच्चन जी ने अंग्रेजी के पत्रों को नष्ट कर दिया। ‘नीड़ का निर्माण फिर’ लिखते समय उन्हें लगा कि उन्होंने उन पत्रों का गलत अर्थ शायद इसलिये लगा लिया था कि पत्र अंग्रेजी भाषा में थे। उन पत्रों को याद कर अंग्रेजी के बारे में कहते हैं कि,

‘अंग्रेजी बिना लेशमात्र कृतज्ञता अनुभव किए ‘थैंक यू’ कह सकती है। जब यह ‘सारी’ कहती है तब अफसोस इसे शायद ही कहीं छूता हो। ‘आई ऐम ऐफ्रेड’ से इसका तात्‍पर्य बिलकुल यह नहीं होता कि यह जरा भी डरी है; और इसकी उक्ति ‘एक्‍सक्यूज मी’ (यानी मुझे क्षमा करें) आपके गालों पर थप्‍पड़ लगाने की भूमिका भी हो सकती है। मेरी ‘मधुशाला’ की अंग्रेजी अनुवादिका कुमारी मार्जरी बोल्टन की एक बात मुझे याद आ गई। जब मैं इंग्लैंड-प्रवास में एक छुट्टी में उनके घर गया तो एक शाम को वे अपने जीवन की दुखद अनुभूति मुझसे बताने लगीं। उनके एक प्रेमी ने कई वर्षो तक उनसे पत्र-व्यवहार किया। क्या भावना में भीगे पत्र थे वे! और एक दिन सहसा उसने उन्हें भुला दिया! मैं मार्जरी का वाक्‍य नहीं भूला-Since that day I have lost faith in English language [उस दिन से अंग्रेजी भाषा पर से मेरा विश्वास उठ गया]। अंग्रेजी औपचारिक शिष्टता, पटुता, प्रदर्शन और डिसेप्शन यानी धोखा-धड़ी की इतनी परिपूर्ण माध्यम हो गई है कि आज अभिव्यक्ति से अधिक यह गोपन और डिसटार्शन यानी विरूपन की भाषा है। क्या भाषाएँ विकसित और परिष्कृत होकर अपनी सूक्ष्म अभिव्यंजन शक्ति, सच्चाई, सिधाई, गहराई और ईमानदारी खो देती हैं?‘

मुझे बच्चन जी की यह बात ठीक नहीं लगती। यह दूसरी संस्कृति के संस्कार हैं न कि भाषा की कमी – अंग्रेजी भाषा किसी प्रकार से हिन्दी से कम नहीं। किसी स्त्री द्वारा किसी पुरुष का प्रणय अस्वीकार किया जाना हमेशा उसके सम्मान को ठेस पहुंचता है। यह कहना इस कारण भी हो सकता है।

तेजी जी से मिलन

आइरिस के द्वारा बच्चन जी का प्रेम निवेदन स्वीकार न किये जाने पर वे अकेले हो गये और जीवन में नारी को ढूढ़ने लगे। वे अपने मित्र प्रकाश के पास बरेली गये थे वहां पर उनकी मुलाकात तेजी जी से हुई जो कि लाहौर में साइकोलोजी पढ़ाती थीं। प्रथम मुलाकात के अनुभव को बच्चन जी इस प्रकार से वर्णित करते हैं।

‘आज प्रेमा ने अपनी सहेली का परिचय मुझसे कराया है, और बारह वर्ष पहले लिखी अपनी एक तुकबन्दी मेरे कानों में बार-बार गूँजती रही -
इसीलिये सौन्दर्य देखकर
शंका यह उठती तत्काल,
कहीं फँसाने को तो मेरे
नहीं बिछाया जाता जाल
पर अदृश‍य देख रहा था कि जाल बिछ चुका था और करूणा अवसाद के जाल में फँस चुकी थी या अवसाद ने करूणा को अपने पाश-अपने बाहुपाश- में बाँध लिया था ! यह तो मैं दूसरे दिन कह सकता था, लेकिन उस दिन मैं उस सौन्दर्य से असंपृक्त, उदासीन, दूर, डरा-डरा रहा- ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का क्या कोई रहस्यपूर्ण अर्थ है?’

रात्रि में कविता पाठ पर उनका तेजी जी से भावात्मक मिलन होता है जिसका वर्णन वे कुछ इस प्रकार करते हैं,

‘न जाने मेरे स्वर में कहाँ की वेदना भर गयी कि पहले पद पर ही सब लोग बहुत गम्भीर हो गए। जैसे ही मैंने यह पंक्ति पूरी की
उस नयन में बह सकी कब
इस नयन की अश्रुधरा
कि देखता हूँ कि मिस [तेजी] सूरी की ऑंखें डबडबाती हैं और टप-टप उनके ऑँसू की बूँदें प्रकाश के कंधे पर गिर रही हैं, और यह देखकर मेरा कंठ भर आता है—मेरा गला रूंध जाता है—मेरे भी आँसू नहीं रूक रहे हैं। — और अब मिस सूरी की आँखों से गंगा -जमुना बह चली है — मेरी आँखों से जैसे सरस्वती — कुछ पता नहीं कब प्रकाश, प्रेमा, आदित्य और उमा कमरे से निकल गये र्हैं और हम दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे हैं और आँसुओं के उस संगम से हमने एक-दूसरे से कितना कह डाला है, एक-दूसरे को कितना सुन लिया है, … चौबीस घंटे पहले हमने इस कमरे में अजनबी की तरह प्रवेश किया था, और चौबीस घंटे बाद हम उसी कमरे से जीवन-साथी (पति-पत्नी नहीं) बनकर निकल रहे हैं- यह नए वर्ष का नव प्रभात है जिसका स्वागत करने को हम बाहर आए हैं।
शादी का प्रण लिया, सगाई वहीं की। कुछ दिन बाद शादी इलाहाबाद में।’

इन्दिरा जी से मित्रता

बच्चन परिवार एवं नेहरू परिवार के सम्बन्ध आजकल वैसे नहीं है जैसे के पहले थे। इसका क्या कारण है यह तो वह ही लोग जानते हैं पर कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन ने राहुल गांधी के कथन पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि बच्चन परिवार और नेहरू परिवार के सम्बन्ध बहुत पुराने हैं और शायद राहुल गांधी को इसका अन्दाजा नहीं है।

यह चित्र टाईमस् ऑफ इंडिया के इस पेज से है।

बच्चन परिवार और गांधी परिवार कर सम्बन्धों की शुरूवात कैसे हुई, कैसे थे वे सम्बन्ध, इसके बारे में बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में कहते हैं कि,

‘उस फरवरी में सरोजिनी नायडू प्रयाग आई थीं ; आनन्द-भवन में ठहरी थीं। झा साहब ने एक रात को उनके सम्मान में भोज दिया था और उसमें सम्मिलित होने को तेजी को और मुझे निमन्त्रित किया था। तेजी के सौन्दर्य, सुरूचिपूर्ण पहनाव, शिष्टतापूर्ण बौद्धिक वार्तालाप से मिसेज नायडू इतनी प्रभावित हुई कि दूसरे दिन उन्‍होंने हमें आनन्द-भवन में चाय पर निमन्त्रित कर दिया। जब मैं तेजी के साथ वहाँ पहुँचा तो उन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से हमारा परिचय नेहरू-परिवार से कराया। हमारी ओर हाथ करके बोलीं, ‘The Poet and the poem’- ‘आप कवि, आप कविता’। इस परिचय के फलस्वरूप तेजी सबसे अधिक निकट इंदिरा जी के आई – उस समय तक उनका विवाह नहीं हुआ था – और तब से आज तक उनकी मैत्री बनी हुई है।‘

बच्चन जी ने मांस और मदिरा क्यों छोड़ी

कायस्थ, मांस खाने और मदिरा पीने में कोई परहेज नहीं करते हैं। बच्चन जी भी इसका उपभोग करते थे पर उन्होंने इसको छोड़ दिया। इसके छोड़ने का कारण उनके पुत्रों की बीमारी थी।

जब अमिताभ बीमार पड़े तो उस समय वह महू में विश्वविद्यालय के एन.सी.सी. से सम्‍बन्धित 8 सप्ताह की ट्रेनिंग में थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि ‘अगर अमित अच्‍छा हो जाएगा तो वे कभी शराब नहीं पियेंगे।’ नीड़ का निर्माण फिर में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं कि,

‘इस प्रण से ही मेरा मन कुछ शान्त हो गया।
तेजी का जो दूसरा पत्र आया, उसमें लिखा था कि अमित की दशा में सुधार हो चला है।
मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहा, भले ही कोई अफसर या अफसर का चचा बुरा माने।
तेजी के तीसरे पत्र से अमित के और अच्छे होने की खबर आई।
और एक समाचार आया कि अमित बिल्‍कुल अच्छा हो गया है।
पचीस वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। तब से मैंने शराब छुई नहीं।’

इसी तरह की कुछ बात तब हुई जब अजिताभ बीमार पड़े वह २-३ महीने का था तो उसे दाने निकल आये और लोगों ने समझा कि उसे चेचक हो गयी है। बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में कहते हैं,

‘मैंने किसी तरह की प्रार्थना-विनती न की। एक पिछली बात याद आई। अमित के लिए मैंने सदा के लिए मदिरा छोड़ दी थी। मैंने अपने मन से कहा, यदि अजित बच जाएगा तो मैं कभी मांस नहीं खाऊंगा। रात का पिछला पहर था या सुबह का मुँह अँधेरा तेजी ने मुझे जोर से आवाज दी! मैंने समझा, कुछ अनिष्ट हो गया। पर वह तो तेजी के हर्ष-आश्चर्य का स्वर था। अजित के बदन से सारे दाने गायब हो गए थे! उसका बुखार उतर गया था और वह मुस्करा रहा था! चमत्कार हो गया था, चमत्कार ! मैंने किसी अज्ञात को धन्यवाद दिया।’

बच्चन जी, पन्त जी और निराला जी

कलाकार भी कुछ अजीब होते हैं सुमित्रा नन्दन पंत जहां सुकुमार, वहां निराला जी पहलवान। इनके सम्बन्ध भी कुछ अजीब थे। एक दिन तो दोनों में कुश्ती ही हो गयी।

यह छवि निराला जी के युवा अवस्था यानी 1939 की है। तब वे 43-44 साल के थे। यह चित्र सरस्वती पत्रिका के 1961 के दीपावली अंक के सौजन्य से है। यह मुझे यहां से मिला है।

बच्चन जी नीड़ का निर्माण फिर में लिखते हैं कि,

‘पंत और निराला एक-दूसरे से जितने “एलर्जिक” (एक-दूसरे के लिए कितने असह्य) थे, इसका अनुभव पहली बार मुझे हुआ।

निराला जी पंत जी को देखते तो अवज्ञा से पीठ या मुंह फेर लेते । पंत जी निराला को देखते तो अपने कमरे में जा बैठते। एक दिन तो निराला जी मेरे ड्राइंग रूम में आ धमके और उन्होंने पंत जी को कुश्ती के लिए ललकारा।

अपने मनोविकारों से ग्रस्त-विवश निराला मुझे इससे दयनीय कभी नहीं दिखे।‘

बच्चन जी – नियम और सिद्धान्त

बच्चन जी नियमों और सिद्धान्तों से नहीं बंधना चाहते थे इसलिये किसी क्लब या कला सदस्य के सदस्य नहीं रहे पर यदि निमंत्रण होता तो अवश्य जाते थे। इसके बारे में कहते हैं कि,

’मेरा कार्य युनिवर्सिटी में पढ़ाने और अपने अध्ययन-कक्ष में पढ़ने-लिखने तक सीमित हो गया। मैं कभी किसी क्लब वगैरह का सदस्य नहीं बना, किसी कला-साहित्य संस्था का भी नहीं। … संस्थाऍ किसी-न-किसी सिद्धान्त से बंधती हैं- मैं अपने को किसी सिद्धान्त से बांधना नहीं चाहता था। … संस्था … मैंने अपने घर पर ही खोल दी थी। इसका नाम मैंने ‘निशान्त’ रख दिया था। इसके न कोई नियम थे, न सदस्यता की कोई फीस थी। कुछ लोग जिनमें अधिकतर युनिवर्सिटी के नाते मेरे विद्यार्थी थे – महीने के अन्तिम शनिवार को १० बजे रात से बैठते थे। और काव्‍य-पाठ, साहित्य चर्चा में रात बिताते थे। एक या दो बजे रात को हमीं लोग मिल-मिलाकर कॉफी अथवा कोई ताजी-गरम खाने की चीज बनाते, खाते-पीते, और तारों की महफिल के उठने तक हम अपनी बैठक जमाए रहते।’


मैंने पिछली बार अमिताभ बच्चन के द्वारा मधुशाला का पाठ की चिट्ठी में लगाया था। इसे भी आप सुने। यह किसी तरह उससे कम नहीं है

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन – विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं – इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

सांकेतिक चिन्ह

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अमिताभ बच्चन के पिता, मधुशाला के लेखक – हरिवंश राय बच्चन का जन्म २७ नवम्बर १९०७ में इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होने अपनी अधिकतर पढ़ायी इलाहाबाद में की और यहीं पर नौकरी भी की। १९५५ में, जवाहर लाल नहरू, इन्हें दिल्ली ले गये। वे राज्य सभा के सदस्य रहे। १९६९ में उन्हें साहित्य आकदमी का पुरुस्कार मिला। वे पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान, और यश भारती सम्मान से भी नवाज़े गये। उनकी मृत्यु १८ जनवरी २००३ में हो गयी।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। इस चिट्ठी में उनकी आत्मकथा के पहले भाग क्या भूलूं क्या याद करूं की समीक्षा है।

बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माना जाता है। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,

‘कायस्थ के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,

‘मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है – इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? – यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! – मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।’

इलाहाबाद विश्वविद्याल जहां बच्चन जी अपने जीवन के सबसे सृजनात्मक साल गुजारे

बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे यहां तो टौमी है। टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये – बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। कुत्तों के बारे में बच्चन जी के विचार यह हैं,

‘देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।’

यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें इलाहाबाद के मुहल्लों, शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो अच्छा रहता। यह इसको नीरस बनाता है।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

  • क्या भूलूं क्या याद करूं;
  • नीड़ का निर्माण;
  • बसेरे से दूर;
  • दशद्वार से सोपान तक।

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन – विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं – इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

अमिताभ बच्चन मधुशाला का पाठ करते हुऐ

सांकेतिक चिन्ह

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यह लेख रिचार्ड फाइनमेन के लिखे पत्रों संग्रहीत कर लिखी गयी पुस्तक ‘क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है’ (Don’t you have time to think) की पुस्तक समीक्षा है और इन पत्रों के माध्यम से उनके दर्शन, उनके जीवन के मूल्यों पर भी एक नज़र डालती है।

यह लेख मेरे ‘उन्मुक्त‘ चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुकी है। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहते हैं तो नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।

पुस्तक – Don’t you have time to think?।। पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा।। गायब।। मानद उपाधि।। खेलो कूदो और सीखो।। अधिकारी, विशेषज्ञ।। काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है।। गणित।।

यदि २०वीं शताब्दी के पहले भाग में सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन (Albert Einstein) थे तो दूसरे भाग में यह श्रेय रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन (Richard Philips Feynman) को है। १९६६ में उन्हें, भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार मिला। मिशेल (Michelle Feynman) उनकी गोद ली पुत्री हैं। उन्होने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों का संकलन कर के ‘Don’t you have time to think’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है।

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इस पुस्तक की प्रस्तावना में मिशेल अपने बचपन वा अपने पिता के बारे में बताती हैं। वे अपने पिता और अपने बड़े भाई कार्ल को एक दूसरे से विज्ञान के बारे में बात करते हुऐ सोचती हैं कि उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में क्यों नहीं कार्य किया। उन्हें लगता है कि इस कारण कार्ल अपने पिता के साथ ज्यादा पास थे।

उन्हें अपना घर और घरों से अलग लगता था। रविवार के दिन फाइनमेन सुबह अखबार नहीं पढ़ते थे पर वह सब लोगों के साथ, संगीत सुनाते थे; ड्रम बजाते थे; और कहानी किस्से सुनाते थे। जब कभी प्रारम्भिक शिक्षा के स्कूल में बच्चों को ले जाने की फाइनमेन की बारी होती थी तो वह अक्सर गाड़ी चलाते हुये या तो केलटेक की तरफ चले जाते थे या नाटक करते थे कि वे रास्ता भूल गये। इस पर सब बच्चे चिल्लाने लगते थे कि यह गलत रास्ता है। फिर फाइनमेन का जवाब होता था कि,

‘अच्छा, यह रास्ता नहीं है’

feynman-4.jpgफाईनमेन लॉस एलमॉस की प्रयोगशाला जाते समय।

यह कहकर वह पुन: दूसरा गलत रास्ता पकड़ लेते थे। बच्चे फिर चीखते थे,


‘नहीं..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ।’

बच्चों को लगता था कि वे स्कूल समय से नहीं पहुंच पायेंगे और उन्हें सजा मिलेगी पर फाइनमेन हमेशा बच्चों को स्कूल समय से पहुंचा देते थे।

मिशेल कहती हैं कि,


‘मेरे पिता कई हुनर में माहिर थे पर उनका वह हुनर सबसे खास था जिसमें वह अपने को एक बेवकूफ सा दिखने का नाटक करते थे और मुझे सोचने देते थे कि वे मेरी बातों से बेवकूफ बन गये हैं। इस बात ने मेरे बचपन को सबसे ज्यादा निखारा है।’

मिशेल यह भी बताती हैं कि, वे बहुत सालों तक नहीं जानती थी कि सब लोग उनके पिता फाइनमेन का सम्मान एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति की तरह से करते थे। उनके मुताबिक,


‘मेरे पिता फाइनमेन हमेशा लोगों को अपने बारे में अश्रद्धा रखने को प्रेरित करते थे। वे अक्सर ऐसी कहानियां सुनाया करते थे जिसमें उनकी बेवकूफी झलकती थी। रात के खाने पर वे बताया करते थे कि, किस तरह वह अपना स्वेटर भूल गये; या कुछ महत्वपूर्ण सूचना भूल गये; या लोगों से बात होने के बाद उन्हें उनका नाम याद नहीं रहा। उनकी कान्फ्रेन्स नये-नये होटलों में होती थी। वे अक्सर उससे बोर होकर अपना सामान लेकर जंगल चले जाया करते थे और वहीं कैम्पिंग कर रात बिताते थे। लौट कर, चटकारे लेकर इसका अनुभव हमें सुनने को मिलता था। मेरी मां इस पर हमेशा टिप्‍पणी करती थीं “ओह रिचर्ड” वह हमेशा अपने ऊपर हंसते थे और हम उनके ऊपर।‘

फाईनमेन अपने स्कूल की सहपाठी अरलीन से प्यार करते थे। नौकरी मिलने के बाद उसी के साथ शादी रचाने की बात थी। लेकिन अरलीन को तपेदिक की बीमारी हो गयी। फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे फिर भी उन्होंने उससे शादी की।

मैं हमेशा सोचता था कि इस तरह की बात तो केवल कहानियों या फिर फिल्मों में होता है, वास्तविक जीवन मैं नहीं, पर मैं गलत था।

फाइनमेन के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे में फाइनमेन ने अपनी मां को एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें लिखा कि,


‘I want to marry Arline because I love her – which means I want to take care of her. That is all there is to it. I want to take care of her.’
मैं अरलीन से शादी करना चाहता हूं क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूं – इसका अर्थ यह है कि मैं उसकी देख भाल करना चाहता हूं

प्यार का यह भी एक अर्थ – एकदम सत्य। हां इसका एक और अर्थ यहां भी।

इस किताब में एक पत्र श्री वी.के. सिंह, अध्यापक भौतिक शास्त्र, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर, का भी है। ये फाइनमेन की पुस्तक Lectures on Physics की तुलना रामायण से करते है और कहते हैं कि इसका अध्ययन भी, उतनी ही बारीकी से करना चाहिए जैसे कि रामायण का किया जाता है।

इसमें इलाहाबाद के श्री मदन मोहन पंत के पत्र का जिक्र है जिसमें पंत ने फाइनमेन को अपना पेन टीचर के कहा है।

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा

‘कयामत से कयामत तक’ की पिक्चर का एक गाना है,

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा,
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा।
मगर यह तो कोई न जाने,
कि मेरी मंजिल है कहां।

इस गाने को देखें और सुने

मैंने इस पिक्चर को नहीं देखा है पर यह गाना मुझे बहुत पसन्द है। लेकिन किसी के पापा का केवल यह कहना या सोचना कि – बेटा ऐसा काम करेगा – पर्याप्त नहीं है। बेटा कोई अच्छा काम करे, इसके लिये पापा को बहुत कुछ करना पड़ेगा। अब यदि फाइनमेन के जीवन को देखें तो पायेंगे कि उसमें, उनके पिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उनको विज्ञान में रुचि पैदा करने में, उनके पिता का बहुत बड़ा हाथ था।

NBC टेलीविजन ने १९६१ में ‘About time’ नामक फिल्म विज्ञान सीरीस के अर्न्तगत बनायी थी। फाइनमेन इसमें वैज्ञानिक सलाहकार थे। इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले जब इसके बारे में जब लिखा जाने लगा तो फाइनमेन से पूछा गया कि उन्हें विज्ञान मे किस प्रकार से रुचि आयी तो उन्होंने बताया कि,

‘My father, a businessman, had a great interest in science. He told me fascinating things about the stars, numbers, electricity, etc. Wherever we went there were always new wonders to hear about; the mountains, the forest, the sea. Before I could talk he was already interesting me in mathematical designs made with blocks. So I have always be a scientist. I have always enjoyed it, and thank him for this great gift to me.’
मेरे पिता व्यपारी थे पर उन्हें विज्ञान में उन्हें रुचि थी। वे मुझे विज्ञान की रोचक बातें बताते थे … इसलिये मैंने वैज्ञानिक बनने की सोची। मुझे इसमें हमेशा मजा आया और इसके लिये मैं अपने पिता को धन्यवाद देता हूं।

१९८१ में रौडिनी ल्यूस को पत्र लिखते हुऐ फइनमेन बताते हैं कि नीरस पाठ्य पुस्तक से मत घबराओ। उनको केवल तथ्यों के लिये पढ़ो, फिर उन बातों को प्रकृति के आश्चर्य की तरह सोचो और अपनी तरह से समझने की कोशिश करो। वे आगे बताते हैं कि किस प्रकार उनके पिता ने उन्हें इस तरह से सोचने के लिये प्रेरित किया। वे कहते हैं कि,

‘My father taught me how to do that when I was a little boy on his knee and he read the Encyclopaedia Britannica to me! He would stop every once in a while and say—now what does that really mean. For example, “the head of tyrannosaurus rex was four feet wide, etc.” —it means if he stood on the long outside his head would look in at your bedroom on the second floor, and if the poked it in the window it would break casement on both sides. Then when I was a little older when would read that again he would remind me of how strong the next muscles had to be—of ratios of weight and muscle area—and why land animals can’t become size of whales—and why grasshoppers can jump just about as high as a horse can jump. All this, by thinking about the size of a dinosaur’s head!’

सच, हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। उनको अच्छे संस्कार मिलना, उनका ठीक दिशा में रहना ही हमारी सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वे अच्छे व्यक्ति बने, इसका दायित्व हम पर है। पुरानी कहावत है,

‘पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय।’

हम अक्सर अपने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हे अच्छी बातें बताना – जो कि सबसे महत्वपूर्ण है – भूल जाते हैं।

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मिशेल का यह चित्र फइनमेन ने बनाया है

गायब

मैंने कुछ समय पहले दो चिट्ठियां ‘अदृश्य हो जाने का वरदान‘, और ‘अदृश्य हो जाने का अभिशाप‘ शीर्षक से छुटपुट चिट्ठे पर लिखीं। इसमें यह बताया कि अदृश्य हो जाना अभिशाप है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अन्धा हो जायेगा। लोग, अन्धे हो जाने वाली बात न समझते हुऐ, अदृश्य हो जाने कि इच्छा रखते हैं और इसके लिये तरीका ढूढते रहते हैं। नेवा नामक व्यक्ति ने एक बार फाइनमेन से यह सवाल पूछा कि क्या कोई तरीका है जिसके द्वारा अदृश्य हुआ जा सकता है। इसका उत्तर देते समय फाइनमेन अगस्त १९७५ लिखते हैं कि,

‘I would suggest that the best way to get a good answer to your question is to ask a first-rate professional magician. I do not mean this answer to be facetious or humorous, I am serious. A magician is very good at his making things appear in an unusual way without violating any physical laws, by arranging matter in a suitable way. I know of no physical phenomenon such as X-rays, etc., which will create invisibility as you want, therefore, if it is possible at all it will be in accordance with familiar physical phenomenon. That is what a first-rate magician is good for, to create apparently impossible effect from “ordinary” causes.’

इसका अर्थ तो यह हुआ कि असंभ्व है।

मानद उपाधि

आजकल मानद उपाधि का जमाना है। जिस विश्व विद्यालय को देखो वही दे रहा है और सब इसे स्वीकार कर रहें हैं। फाइनमेन को दुनिया के हर देश के विश्वविद्यालय मानद उपाधि से विभूषित करना चाहते थे। १९६७ में, सबसे पहले शिकागो विश्व विद्यालय ने उन्हें मानद उपाधि से विभूषित करने की बात की। उन्होने इसे अपने लिये सम्मान की बात बतायी, पर स्वीकारा नहीं। उनका कहना था कि,

‘I remember the work I did to get a real degree at Princeton and the guys on the same platform receiving honorary degrees without work — and felt an “honorary degree” was a debasement of the idea of a “degree which confirms certain work has been accomplished.” It is like giving an “honorary electrician license”. I swore then that if by chance I was ever offered one I would not accept it.’

जब कभी कोई उन्हे मानद उपाधी देने की बात करता, तो हमेशा उनका यही जवाब रहता था।

खेलो, कूदो और सीखो

जीवन में हमें वह करना चाहिये जो हमें पसन्द हो – चाहे उसका कोई महत्व हो अथवा नहीं। महत्व अपने आप निकल आता है। मैंने फाइनमेन के बारे में लिखते समय वह किस्सा बताया था जब वे कॉरनल विश्विद्यालय के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे २:१ का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,

‘इसका कोई महत्व नहीं है मैं यह सब मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।’

लेकिन जब वे एलेक्ट्रॉन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कॉरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी
feynman-1.jpg गणित फिर से याद आने लगी। उस काम का महत्व हो गया। उसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला।


उन्होने इस बात को न केवल अपने जीवन में उतारा पर यही सलाह औरों को भी दी।

एक बार सोलह साल के लड़के ने उन्हें पत्र लिख कर यह सलाह मांगी कि वह क्या करे। उनका जवाब था कि,

‘It is wonderful if you can find something you love to do in your youth which is big enough to sustain your interest through all your adult life. Because, whatever it is, if you do it well enough (and you will, if you truly love it) people will pay you to do what you want to do anyway.’

उनके मुताबिक,

  • बहुत ज्यादा पढ़ना; या
  • किताबी कीड़ा बना रहना; या
  • अपने उम्र से ज्यादा पढ़ाई करना,

ठीक नहीं।

वे देखने और सीखने में विश्वास करते थे। एक बार , एक भारतीय बच्चे ने उन्हें एक पत्र परमाणु विज्ञान के बारे में लिखा। उनकी सलाह थी,

‘Your discussion of atomic forces shows that you have read entirely too much beyond your understanding. What we are talking about is real and at hand: Nature. Learn by trying to understand simple things in terms of other ideas—always honestly and directly. What keeps the clouds up, why can’t I see stars in the day time, why do colours appear on oily water, what makes the lines on the surface of water being poured from a pitcher, why does a hanging lamp swing back and forth – and all the innumerable little things you see all around you. Then when you have learn to explain simpler things, so you have learn what an explanation really is, you can then go on to more subtle questions.
Do not read so much, look about you and think what you see there.’
तुम्हारी बातों से लगता है कि तुमने अपनी समझ से ज्यादा पढ़ लिया है … इतना मत पढ़ो, अपने चारों तरफ देखो और इसके बारे में सोचो।

बचपन में बड़े, बूढ़ों से सुना करता था,

‘खेलो कूदोगे तो होगे बर्बाद,
पढ़ोगे लिखोगे तो होगे नवाब।’

शायद इसे इस तरह से कहना चाहिये,

‘खेल, कूद कर सीखोगे,
केवल तब ही बनोगे, नवाब।’

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फाइनमेन को बॉंगो बजाना प्रिय था

अधिकारी, विशेषज्ञ

फाइनमेन का हमेशा कहना था कि किसी बात को तब स्वीकार करो जब वह तर्क पर खरी उतरे, उसे केवल किसी के कहने पर न स्वीकार करो। १९७६ में मार्क को पत्र लिखते समय सलाह दी कि,

‘Don’t pay attention to “authorities,” think yourself.’

अपनी पुस्तक Lectures on Physics में एक जगह उन्होने लिखा था कि

‘No static distribution of charges inside a closed conductor can produce any electric field outside.’

एलिज़बेथ ने भौतिक शास्त्र में एक कोर्स लिया था। परीक्षा में एक सवाल का यही जवाब दिया। इस पर उसके शिक्षक ने उसे कोई नम्बर नहीं दिया क्योंकि यह बात गलत थी। शिक्षक ने एलिज़बेथ को यह भी बताया कि यह किस प्रकार से गलत है। एलिज़बेथ ने जब इसके बारे में फाइनमेन को पत्र लिखा। तो फाइनमेन का जवाब था,

‘Your instructor was right not to give you any points for your answer was wrong, as he [the teacher] demonstrated using Gauss’ Law. You should, in science, believe logic and arguments, carefully drawn, and not authorities.

You also read the book correctly and understood it. I made a mistake, so the book is wrong … I am not sure how I did it, but I goofed. And you goofed too, for believing me.
तुम्हारे अध्यापक ने ठीक तुम्हें नंबर नहीं दिये क्योंकि तुम्हारा जवाब सही नहीं था विज्ञान में तुम्हे तर्क पर विश्वास करना चाहिये न कि किसी अधिकारी,या विशेषज्ञ पर। …
तुमने मेरी किताब को सही समझा, मैंने ही गलती कर दी थी … मैं नहीं जानता कि यह कैसे हो गया पर मैं गलत था और तुम भी – मुझ पर विश्वास करने के लिये।

बड़े व्यक्तियों का पहला गुण – यदि वे गलत हैं, तो स्वीकार करने में कभी नहीं हिचकते।

बॉंगो बजाते हुऐ फइनमेन

काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है

हम सब के जीवन में कोई न कोई आदर्श रहा है। मेरे जीवन में – एक नहीं, कई रहे। उन्होने अलग अलग तरह से मेरे जीवन, मेरी विचारधारा पर असर डाला। इनमे से कईयों से कभी नहीं मिला। फाइनमेन उनमें से एक थे। उनके मुताबिक काम से ज्यादा महत्व उसे करने में है: जो अच्छा लगे, जिसमें मन लगे – वह करो पर करो उसे बढ़िया।

एक बार कोची नामक एक विद्यार्थी ने फाइनमेन को पत्र लिखा कि वह भौतिक शास्त्र के साधारण विषय पर काम कर कर रहा है और नामरहित है। इस पत्र ने फइनमेन को दुखी किया। उन्हें लगा कि कोची के अध्यापक ने उसे ठीक से नहीं बताया कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं है। फाइनमेन ने कोची को पत्र लिखा कि,

‘The worthwhile problems are the once you can really solve or help solve, the ones you can really contribute something to. A problem is grand in science if it lies before us unsolved and we see some way for us to make a little headway into it.’

फाइनमेन का सुझाव था कि पहले छोटी छोटी और आसान मुश्किलों का हल खोजो जो कि आसानी से मिल सकता है। उनके मुताबिक,

‘You will get the pleasure of success, and of helping your fellow man, even if it is only to answer a question in the mind of a colleague less able than you. You must not take away from yourself these pleasures because you have some erroneous idea of what is worthwhile.’

फाइनमेन ने पत्र में यह भी बताया कि उन्होने स्वयं,

‘I have worked on innumerable problem that you would call humble, but which I enjoyed and felt very good about because I sometimes could partially succeed.’

फाइनमेन का मानना था कि,

‘You do any problem that you can, regardless of field.’

न तो सरदर्द लेने की जरूरत है न ही घबराने की – कयोंकि,

‘In no field is all the research done. Research leads to new discoveries and new questions to answer by more research.’

उनके अनुसार,

‘No problem is too small or too trivial if we can really do something about it.’
यदि हम किसी मुश्किल का हल ढूढ़ने में कुछ कर सकते हैं तो वह न तो छोटी है और न ही बेकार।

पत्र में फानमेन, आगे लिखते हैं कि,

‘You say you are a nameless man. You are not to your wife and to your child. You will not long remain so to your immediate colleagues if you can answer their simple question when they come into your office. You are not nameless to me. Do not remain nameless to yourself — it is too sad a way to be. Know your place in the world and evaluate yourself fairly, not in terms of the naïve ideals of your own use, nor in terms of what you erroneously imagine your teacher’s ideals are.’

गणित

भौतिक शास्त्र मेरा प्रिय विषय था। मुन्ने की मां को गणित अच्छी लगती है। मैं हमेशा कहता हूं कि भौतिक शास्त्र तो रानी है और गणित नौकरानी – जहां चाहो लगा लो।

फाइनमेन तो जिज्ञासू थे। उनके कुछ अन्य विडियो यहां देखिये।

फ्रेड्रिक हिप्प १६ साल के नवयूवक ने १९६१ में फाइनमेन को पत्र लिख कर बताया कि भौतिक शास्त्र उसे अच्छा लगता है पर गणित पसंद नहीं आती है। वह क्या करे। फाइनमेन ने उसे लिखा कि,

‘To do any important work in physics a very good mathematical ability and aptitude are required. Some work in applications can be done without this, but it will not be very inspired.
If you must satisfy your “personal curiosity concerning the mysteries of nature” what will happen if these mysteries turn out to be laws expressed in mathematical terms (as they do turn out to be )? You cannot understand the physical work in any deep or satisfying way without using mathematical reasoning with facility.’
भौतिक शास्त्र में अच्छा काम करने के लिये अच्छी गणित का ज्ञान होना आवश्यक है … विज्ञान के बहुत सारे रहस्य, वे नियम हैं जो गणित के द्वारा ही समझे जा सकते हैं। भौतिक विज्ञान को अच्छी तरह से बिना गणित के नहीं समझा जा सकता है।

गणित के यही गुण उसे गणित को राजरानी बनाते हैं। विज्ञान में गणित के बिना ठौर नहीं। मुझे तो मालुम है कि मुन्ने की मां तो हमेशा सही रहती है, उससे जीत पाना संभव नहीं।

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कैल टेक में पढ़ाते हुऐ

इस पुस्तक ने मुझे कई बातों की याद दिलायी:

  • मेरे बचपन की;
  • कई ऐसे व्यक्तियों की जिन्होने मेरे बचपन में, मुझ पर सबसे ज्यादा असर डाला;
  • कुल्लू मनाली में एक बिस्किट के पीछे, पूरी नदी पैदल पार करने की;
  • उन क्षणों की भी, जो मैंने अपने बच्चों के साथ पहेली बूझते हुऐ बिताये;
  • उनके साथ बिताये, नदी के किनारे तारों, लियोनिडस्, और पुच्छल तारे को देखते हुऐ रातों की;
  • उनके साथ बिताये, दुधुवा, जिम कौर्बेट, कान्हा, बान्धवगढ़, मदुमलाई, और बंदीपुर के जंगलों की;
  • उन पिकनिकों की, जिसमें हमने सारा समय केकड़े और मछलियां पकड़ने में बिता दिया;
  • मेले में उन रातों की, जो हमने हांथ की रेखायें पढ़ने, और नौटंकी , जादू देखने में गुजार दिये;
  • पंचमढ़ी के जंगलों की, जब हम पानी के झरने के लिये छोटे रास्ते पर चलते जंगल में खो गये थे;
  • पंचमढ़ी में पीछा करती मधुमक्खियों की, जिससे पानी के झरने में कूद कर जान बचायी;
  • बम्बई में गोरे गांव में मिल्क डेरी की, जहां पर रेलिंग ही मुन्ने के उपर गिर गयी और बस हमें वहीं छोड़ के चली गयी, तब कई किलोमीटर की दूरी मुन्ने को गोदी में ले जाने की;
  • चुनाव में उस उपद्रव की, जब चुनाव की निष्पक्षता कराने के पीछे मेरा सर पर अध्धा मार दिया गया, पांच टीके लगे, और मैं अब भी नहीं समझ पाता कि में उस दिन कैसे बच गया;
  • उस सभा की जब अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के खिलाफ बोलने पर लोग चप्पल से मारने मंच पर आ गये।

यह आपको भी कुछ ऐसी ही यादों पर वापस ले जायगी।

इस पुस्तक में फाइनमेन के लिखे हुये बहुत सारे पत्र हैं, जिससे उनके चरित्र के बारे में पता चलता है और यह पुस्तक बेशक पढ़ने योग्य है।

सांकेतिक चिन्ह

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Zemanta Pixie

यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है।

दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। पुराणों में उसका वर्णन है – उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है। ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।

मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है। शक्ति, संघटन की एकता में ही है। हमारी कथाओं में देवी दुर्गा का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं। यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं। साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।

दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है? शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई। यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं। आइये नजर डाले उन किस्से कहानियों पर, उस कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्होने महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और कुछ हद्द तक महिलाओं को दुर्गा का रूप दिया पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।

महिला दिवस (women’s day)

अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।

१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

महिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द लैंगिक न्याय (Gender Justice) प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। आइये समझें कि हमारे देश इस समय यह किस अर्थ में लिया जाता है।

लैंगिक न्याय (Gender Justice)

लैंगिक न्याय अर्थात किसी के साथ लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होना चाहिये। बहुत से लोग समलैंगिक अधिकारों को भी इसके अन्दर मानते हैं। समलैगिंकों के साथ भेदभाव होता है लेकिन वह इसलिये नहीं कि उनका लिंग क्या है वह इसलिये कि वे अपने लिंग के ही लोगों में रूचि रखते हैं। मेरे विचार से, समलैंगिग अधिकारों को लैंगिक न्याय के अन्दर रखना उचित नहीं है। उनके अधिकारों को अलग से नाम देना, या अल्पसंख्यक (Minority) या जातीय (ethnic) अधिकारों के अन्दर रखना, या Gay rights कहना ठीक होगा।

हम कुछ अन्य श्रेणी के व्यक्तियों के अदिकारों पर भी विचार करें, उदाहरणार्थः

  1. Trans- Sexual: यह वह लोग हैं जो एक लिंग के होते हैं पर बर्ताव दूसरे लिंग के व्यक्तियों की तरह से करते हैं;
  2. Trans gendered: लिंग परिवर्तित: यह वह व्यक्ति हैं जो आपरेशन करा कर अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इसमें सबसे चर्चित व्यक्ति रहे रीनी रिचर्डस्। ये पुरुष थे और आपरेशन करा कर महिला बन गये, पर उन्हें महिलाओं की टेनिस प्रतियोगिता में कभी भी खेलने नहीं दिया गया। उन्हें कुछ सम्मान तब मिला जब वे मार्टीना नवरोतिलोवा की कोच बनीं। मैंने इस तरह के लोगों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री कि चिट्ठी पर लिखा है;
  3. Inter-Sex बीच के: लिंग डिजिटल नहीं है। मानव जाति को केवल पुरूष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं। हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम (chromosome) तय करते हैं। यह जोड़े में आते हैं। हम में क्रोमोसोम के २३ जोड़े रहते हैं। हम पुरूष हैं या स्त्री, यह २३वें जोड़े पर निर्भर करता है। महिलाओं में यह दोनों बड़े अर्थात XX होते हैं पुरूषों में एक बड़ा एक छोटा यानि कि XY रहते हैं। अक्सर प्रकृति अजीब खेल खेलती है। कुछ व्यक्तियों में २३वें क्रोमोसोम जोड़े में नहीं होते: कभी यह तीन या केवल एक होते हैं अर्थात XX,Yया XYY, या X, या Y. यह लोग पूर्ण पुरूष या स्त्री तो नहीं कहे जा सकते – शायद बीच के हैं। इसलिए इन्हें Inter-Sex कहा जाता है। संथी सुन्दराजन शायद इसी प्रकार की हैं। इसलिये दोहा एशियाई खेलो में, उनसे रजत पदक वापस ले लिया गया।

ऊपर वर्णित तीनो तरह के व्यक्तियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव होता है। अधिकतर जगह, यह लोग हास्य के पात्र बनते हैं। इन्हें भी न्याय पाने का अधिकार है। पर अपने देश में लैंगिक न्याय का प्रयोग केवल महिलाओं के साथ न्याय के संदर्भ में किया जाता है और हम बात करेंगे महिलाओं के साथ न्याय, उनके सशक्तिकरण की: आज की दुर्गा की।

संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज

हमारे संविधान का अनुच्छेद १५(१), लिंग के आधार पर भेदभाव करना प्रतिबन्धित करता है पर अनुच्छेद १५ (२) महिलाओं और बच्चों के लिये अलग नियम बनाने की अनुमति देता है। यहीं कारण है कि महिलाओं और बच्चों को हमेशा वरीयता दी जा सकती है।

संविधान में ७३वें और ७४वें संशोधन के द्वारा स्थानीय निकायों को स्वायत्तशासी मान्यता दी गयी । इसमें यह भी बताया गया कि इन निकायों का किस किस प्रकार से गठन किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद २४३-डी और २४३-टी के अंतर्गत, इन निकायों के सदस्यों एवं उनके प्रमुखों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित की गयीं हैं। यह सच है कि इस समय इसमें चुनी महिलाओं का काम, अक्सर उनके पति ही करते हैं पर शायद एक दशक बाद यह दृश्य बदल जाय।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। हमारे देश में इसका प्रयोग उस तरह से नही किया जा रहा है जिस तरह से किया जाना चाहिये। अभी उपभोक्ताओं में और जागरूकता चाहिये। इसके अन्दर हर जिले में उपभोक्ता मंच (District Consumer Forum) का गठन किया गया है। इसमें कम से कम एक महिला सदस्य होना अनिवार्य है {(धारा १०(१)(सी), १६(१)(बी) और २०(१)(बी)}।

परिवार न्यायालय अधिनियम के अन्दर परिवार न्यायालय का गठन किया गया है। पारिवारिक विवाद के मुकदमें इसी न्यायालय के अन्दर चलते हैं। इस अधिनियम की धारा ४(४)(बी) के अंतर्गत, न्यायालय में न्यायगण की नियुक्ति करते समय, महिलाओं को वरीयता दी गयी है।

अंर्तरार्ष्टीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Convention of Elimination of Discrimination Against Women (CEDAW) (सीडॉ) है। सन १९७९ में, संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पुष्टि की। हमने भी इसके अनुच्छेद ५(क), १६(१), १६(२), और २९ को छोड़, बाकी सारे अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया है। संविधान के अनुच्छेद ५१ के अंतर्गत न्यायालय अपना फैसला देते समय या विधायिका कानून बनाते समय, अंतर्राष्ट्रीय संधि (Treaty) का सहारा ले सकते हैं। इस लेख में आगे कुछ उन फैसलों और कानूनों की चर्चा रहेगी जिसमें सीडॉ का सहारा लिया गया है।

व्यक्ति शब्द पर ६० साल का विवाद

भूमिका
हमारा समाज पुरुष प्रधान है। इसके मानक पुरुषों के अनुरूप रहते हैं। तटस्थ मानकों की भी व्याख्या, पुरुषों के अनुकूल हो जाती है। कानून में हमेशा माना जाता है कि जब तक कोई खास बात न हो तब तक पुलिंग में, स्त्री लिंग सम्मिलित माना जायेगा। कानून में कभी कभी पुलिंग, पर अधिकतर तटस्थ शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जैसे कि ‘व्यक्ति’। अक्सर कानून कहता है कि, यदि किसी ‘व्यक्ति’ (person),

  • की उम्र ….. साल है तो वह वोट दे सकता है,
  • ने —- साल ट्रेनिंग ले रखी है तो वह वकील बन सकता है,
  • ने विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की है तो वह उसके विद्या परिषद (Academic council) का सदस्य बन सकता है,

को गवर्नर जनरल, सेनेट का सदस्य नामांकित कर सकता है।

ऐसे कानून पर अमल करते समय, अक्सर यह सवाल उठा करता था कि इसमें ‘व्यक्ति’ शब्द की क्या व्याख्या है। इसके अन्दर हमेशा पुरूषों को ही व्यक्ति माना गया, महिलाओं को नहीं। यह भी अजीब बात है। भाषा, प्रकृति तो महिलाओं को व्यक्ति मानती है पर कानून नहीं। महिलाओं को, अपने आपको, कानून में व्यक्ति मनवाने के लिए ६० साल की लड़ाई लड़नी पड़ी और यह लड़ाई शुरू हुई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से।

व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय

इस बारे में सबसे पहला प्रकाशित निर्णय Chorlton Vs. Lings (१८६९) का है । इस केस में कानून में पुरूष शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय और इस समय भी, इंगलैंड में यह नियम था कि पुलिंग में, स्त्री लिंग भी शामिल है। इसके बावजूद यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियां को वोट देने का अधिकार नहीं है। इंगलैण्ड के न्यायालयों में इसी तरह के फैसले होते रहे जिसमें न केवल पुरूष ब्लकि व्यक्ति शब्द की व्याख्या करते समय, महिलाओं को इसमें सम्मिलित नहीं माना गया। जहां व्यक्ति शब्द का भी प्रयोग किया गया था वहां भी महिलाओं को व्यक्ति में शामिल नहीं माना गया। इन मुकदमों में Bressford Hope Vs. Lady Sandhurst (1889), Ball Vs. Incorp, society of Law Agents (1901) उल्लेखनीय है । 1906 में इंगलैण्ड की सबसे बड़ी अदालत हाउस आफ लॉर्डस ने Nairn Vs. Scottish University में यही मत दिया। यही विचार वहीं की अपीली न्यायालय ने Benn Vs. Law Society (१९१४) में व्यक्त किये।

इंगलैंड में यही क्रम जारी रहा। इन न्यायालयों में लड़ाई के अतिरिक्त वहां समाज में भी यह मांग उठी कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिले। भारत के पूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन भी महिलाओं को वोट का अधिकार देने के विरोधी खेमी में थे। उनका तो यहां तक कहना था कि यदि भारत के लोगों को पता चलेगा कि इंगलैण्ड की सरकार महिलाओं के वोट पर बनी है तो भारतवासी उस सरकार पर वह विश्वास करना छोड़ देगें। इंगलैंण्ड में महिलायें वोट देने के अधिकार से १९१८ तक वंचित रहीं। उन्हें इसी साल कानून के द्वारा वोट देने का अधिकार मिला। इंगलैण्ड में स्त्रियों के साथ बाकी भेदभाव लैंगिक अयोग्यता को हटाने के लिए १९१९ में बने अधिनियम से हटा।

व्यक्ति शब्द पर अमेरिका में कुछ निर्णय

अमेरिका तथा अन्य देशों में व्यक्ति शब्द की व्याख्या का इतिहास कुछ अलग नहीं था। अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने Bradwell Vs. Illinois (१८७३) में व्यवस्था दी है कि विवाहित महिलायें व्यक्ति की श्रेणी में नहीं हैं और वकालत नहीं कर सकतीं। इसके दो वर्ष बाद ही Minor Vs. Happier Sett के केस में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने यह तो माना कि महिलाएं नागरिक हैं पर यह भी कहा कि वे विशेष श्रेणी की नागरिक हैं और उन्हें मत डालने का अधिकार नहीं हैं। अमेरिका में २१ वर्ष से ऊपर की महिलाओं को मत देने की अनुमति अमेरिकी संविधान के १९वें संशोधन (१९२०) के द्वारा ही मिल पायी।

व्यक्ति शब्द पर दक्षिण अफ्रीका में कुछ निर्णय

इस विवाद के परिपेक्ष में, दक्षिण अफ्रीका का जिक्र करना जरूरी है। यहां पर इस तरह के पहले मुकदमे Schle Vs. Incoroporated Law Society (1909) , में महिलाओं को व्यक्ति शब्द में नहीं शामिल किया गया और उन्हें वकील बनने का हकदार नहीं माना गया। पर केपटाउन की न्यायालय ने १९१२ में माना कि महिलाएं ‘व्यक्ति’ शब्द में शामिल हैं और वकील बनने की हकदार हैं। कहा जाता है कि इस तरह का यह एक पहला फैसला था। लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चला। यह निर्णय अपीलीय न्यायालय द्वारा Incorporated Law Society Vs. Wookey (1912) में रद्द कर दिया गया । इस अपीलीय न्यायालय के फैसले का आधार यही था कि महिलाएं व्यक्ति शब्द की व्याख्या में नहीं आती हैं।

व्यक्ति शब्द पर विवाद का अन्त

इस विवाद का अन्त कनाडा के एक मुकदमे Edwards Vs. Attorney General में हुआ। कनाडा के गर्वनर जनरल को सेनेट में किसी व्यक्ति को नामांकित करने का अधिकार था। सवाल उठा कि क्या वे किसी महिला को नामांकित कर सकते हैं। कैनाडा के उच्चतम न्यायालय ने सर्व सम्मति से निर्णय लिया कि महिलायें व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं। इसलिये वे नामित नहीं हो सकती हैं। इस फैसले के खिलाफ अपील में, प्रिवी कांऊसिल ने स्पष्ट किया है कि, ‘व्यक्ति शब्द में स्त्री-पुरूष दोनों हो सकतें हैं और यदि कोई कहता है कि व्यक्ति शब्द में स्त्रियों को क्यों शामिल किया जाय तो जवाब है कि “क्यों नहीं”?’ लेकिन यह वर्ष १९२९ में हुआ। आइये देखें कि अपने देश में क्या हुआ।

व्यक्ति शब्द पर भारतीय में कुछ निर्णय: कलकत्ता और पटना उच्च न्यायालय

अपने देश में भी ‘व्यक्ति’ शब्द की व्याख्या करने वाले मुकदमे हुए हैं। पहले वकील नामांकित करने का काम उच्च न्यायालय करता था। अब यह काम बार कौंसिल करती है। वकील नामांकित करन के लिए लीगल प्रैक्टिशनर अधिनियम हुआ करता था इसमें ‘व्यक्ति’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था। महिलाओं ने इसी अधिनियम के अन्दर वकील बनने के लिए कलकत्ता एवं पटना उच्च न्यायालयों में आवेदन पत्र दिया। कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्यायमूर्ति की पूर्ण पीठ ने १९१६ में {In re Reging Guha (ILR 44 Calcutta 290= 35 IC 925)} तथा पटना उच्च न्यायालय की तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ ने १९२१ में {In re Sudhansu Bala Mazra (A.I.R. 1922 Patna 269) } ने निर्णय दिया कि महिलाएं व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं और उनके आवेदन को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद यह प्रश्न नहीं उठा क्योंकि १९२३ में The Legal Practitioners (Women) Act के द्वारा महिलाओं के खिलाफ इस भेदभाव को दूर कर दिया गया। पर क्या किसी उच्च न्यायालय ने महिलाओं के पुराने कानून में व्यक्ति होना माना। जी हां-वह है इलाहाबाद उच्च न्यायालय।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय – क्रॉर्नीलिआ सोरबजी (Cornelia Sorabjee)

क्रॉर्नीलिआ सोरबजी, एक पारसी महिला थीं। उनका भाई बैरिस्टर था और वह इलाहाबाद वकालत करने आया। वह उसी के साथ उसके घर का रख-रखाव करने आयीं। उन्हें वकालत का पेशा अच्छा लगा और उन्होंने वकालत करने की ठानी। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने अपना आवेदन पत्र वकील बनने के लिये दिया जो पहले खारिज कर दिया गया पर उनका १ अगस्त १९२१ को वकील की तरह नामित करने के लिये दिया गया आवेदन पत्र, ९ अगस्त १९२१ में स्वीकार हुआ। यह नामांकन उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक में हुआ था इसलिए यह प्रकाशित नहीं है पर पटना उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये फैसले में इसका तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ कुछ इस तरह से उल्लिखित है।

‘A recent instance has been brought to our notice where a lady (Miss Sorabjee) has been enrolled as a vakil of the Allahabad High Court. This was done by a decision of the English meeting of the Court consisting of the Chief Justice and the Judged present in Allahabad, under R.15 of Chap.XV of the Allahabad High Court Rules. In matters of practice, however, we generally follow the tradition of the Calcutta High Court and we do not think that we can deviate from the decision of that Court passed on the 29th of August 1916 in Regina Guha’s case only a few months after the creation of our High Court.

No doubt, the recent admission of Miss Sorabjee in the Allahabad High Court might create some anomaly, inasmuch as ladies enrolled as vakils in the Allahabad High Court may claim to practise in occasional cases in the Courts subordinate to this Court under Sec.4 of the Legal Practitioners Act, although no lady will be permitted to be enrolled in our own High Court. This again is a very good ground for changing the present law.’

क्रॉर्नीलिआ सोरबजी ‘व्यक्ति’ शब्द के अन्दर नामांकित होने वाली भारत की ही पहली महिला नहीं, बल्कि व्यक्ति खण्ड के अधीन दुनिया में कहीं भी नामांकित होने वाली पहली महिला थीं। दक्षिण अफ्रीका का मात्र एक पहला मुकदमा ज्यादा दिन तक नहीं चला। वह उसी वर्ष निरस्त कर दिया गया । क्रोनीलिआ से पहले भी कई महिलायें नामांकित हुई हैं लेकिन वे विशेष कानून की वजह से हुआ था जिसमें महिलाओं को वकील बनने का अलग से अधिकार दिया गया था।

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सुश्री सुपर्णा गुप्तू (Suparna Gooptu) ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी की जीवनी Cornelia Sorabjee – India’s Pioneer Woman lawyer नाम से लिखी है इसे Oxford University Press ने प्रकाशित किया है। इसमें वे कहती हैं कि क्रॉर्नीलिआ सोरबजी समाज सेविका तो थी पर वे अंग्रेजी हूकूमत की समर्थक भी थी। इस पुस्तक में लिखा है कि वे ३० अगस्त को १९२१ को नामांकित की गयी थीं तथा यहां लिखा है कि वे २४ अगस्त को नामांकित की गयी थीं पर शायद दोनो बात सही नहीं हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक जिसमें उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया गया वह ९ अगस्त १९२१ को हुई थी पर उच्च न्यायालय ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी को इस बात के लिये पत्र दिन्नाक ३० अगस्त १९२१ को भेजा था। यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि चाहे जो भी तारीख हो वे इस तरह की पहली महिला थीं।

स्वीय विधी (Personal Law)

लिंग के आधार पर सबसे ज्यादा भेद-भाव Personal Law में दिखाई देता है और इस भेदभाव को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है कि समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code) बनाया जाय।

हमारे संविधान का भाग चार का शीर्षक है – ‘राज्य की नीति के निदेशक तत्व’ (Directive Principles of the State policy)। इसके अंतर्गत रखे गये सिद्घान्त, न्यायालय द्वारा क्रियान्वित (Enforce) नहीं किये जा सकते हैं पर देश को चलाने में उन पर ध्यान रखना आवश्यक है । अनुच्छेद ४४ इसी भाग में है। यह अनुच्छेद कहता है कि हमारे देश में समान सिविल संहिता बनायी जाय पर इस पर पूरी तरह से अमल नहीं हो रहा है।

हमारे संविधान के भाग तीन का शीर्षक है – मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)। इनका क्रियान्वन (enforcement) न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। इस समय न्यायपालिका के द्वारा मौलिक अधिकारों और राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में संयोजन हो रहा है। न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की व्याख्या करते हुये राज्य की नीति के निदेशक तत्वों की सहायता ले रहे हैं। बहुत सारे लोग न्यायालयों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह देश में समान सिविल संहिता के लिये बड़ा कदम उठाए। उनके मुताबिक:

  • संविधान के अनुच्छेद १३ के अंतर्गत स्वीय विधि (Personal Law) और किसी दूसरे कानून में कोई अन्तर नहीं है। यदि स्वीय विधि (Personal Law) में भेदभाव है तो न्यायालय उसे अनुच्छेद १३ शून्य घोषित कर सकता है।
  • स्वीय विधि, संविधान के अनुच्छेद १४ तथा १५ का उल्लंघन करते हैं और उन्हें निष्प्रभावी घोषित किया जाना चाहिये।
  • संसद, राजनैतिक कारणों से इस बारे में कोई कानून नहीं बना पा रही है इसलिये न्यायालय को आगे आना चाहिये।

न्यायपालिका ने इस दिशा में एक और कदम Sarla Mudgal Vs. Union of India वा Madhu Kishwar Vs. State of Bihar में उठाया था पर इस कदम को Ahmedabad Women Action Group (AWAG) Vs. Union of India में यह कहते हुये वापस ले लिया कि,

‘ यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है जिससे सामान्यत: न्यायालय का कोई संबंध नही रहता है। इसका हल कहीं और है न कि न्यायालय के दरवाजे खटखटाने पर।’

न्यायपालिका आगे क्या करेगी – यह तो भविष्य ही बतायेगा पर शायद पहल उन महिलाओं को करनी पड़ेगी जो इस तरह के भेदभाव वाले स्वीय विधि से प्रभावित होती हैं।

यदि न्यायालयों के निर्णयों को आप देंखे तो पायेंगे कि न्यायपालिका किसी भी स्वीय विधि (Personal Law) को निष्प्रभावी घोषित करने में हिचकिचाती है लेकिन उस कानून की व्याख्या करते समय वह महिलाओं के पक्ष में रहता है। यही कारण है कि अपवाद को छोड़कर न्यायालयों ने कानून की व्याख्या करते समय, उसे महिलाओं के पक्ष में परिभाषित किया। इसके लिये चाहे उन्हें कानून के स्वाभाविक अर्थ से हटना पड़े। यह बात सबसे स्पष्ट रूप से Danial Latif Vs Union of India के फैसले से पता चलती है। इस मुकदमे में मुस्लिम स्त्री (विवाह-विच्छेद पर अधिकारों का समक्षण) अधिनियम १९८६ {Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act 1986} की वैधता को चुनौती दी गयी थी।

महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता (maintenance)

अधिकतर धर्मों के लिये स्वीय कानून (Personal Law) अलग-अलग है। अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के भरण-पोषण भत्ता की अधिकारों की सीमा भी अलग-अलग है पर यह अलगाव अब टूट रहा है।

Indian Divorce Act ईसाइयों पर लागू होता है। इसकी धारा ३६ में यह कहा गया है कि मुकदमे के दौरान पत्नी को, पति की आय का १/५ भाग भरण-पोषण भत्ता दिया जाय। पहले, अक्सर न्यायालय न केवल मुकदमा चलने के दौरान, बल्कि समाप्त होने के बाद भी १/५ भाग भरण-पोषण के लिए पत्नी को दिया करते हैं। यह सीमा न केवल ईसाईयों पर बल्कि सब धर्मों पर लगती थी। इस समय यह समीकरण बदल गया है और कम से कम पति की आय का १/३ भाग पत्नी को भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है। यदि पत्नी के साथ बच्चे भी रह रहे हों तो उसे और अधिक भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है।

पत्नी को भरण-पोषण भत्ता प्राप्त करने के दफा फौजदारी की धारा १२५ में भी प्रावधान है। इस धारा की सबसे अच्छी बात यह थी कि यह हर धर्म पर बराबर तरह से लागू होती थी। वर्ष १९८५ में शाहबानो का केस आया। इसमें उसके वकील पति ने शाहबानो को तलाक दे दिया। उसे मेहर देकर, केवल इद्दत के दोरान ही भरण-पोषण भत्ता दिया पर आगे नहीं दिया। शाहबानो ने फौजदारी की धारा १२५ के अंतर्गत एक आवेदन पत्र दिया। १९८५ में उच्चतम न्यायालय द्वारा Mohammad Ahmad Kher Vs. Shahbano Begum में यह फैसला दिया कि यदि मुसलमान पत्नी, अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पा रही है तो मुसलमान पति को इद्दत के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना होगा।

शाहबानो के फैसले का मुसलमानों के विरोध किया। इस पर संसद ने एक नया अधिनियम मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद संरक्षण अधिनियम Muslim Women (Protection of Rights on Divorce Divorce Act) 1986 बनाया। इसको पढ़ने से लगता है कि यदि मुसलमान पति, अपनी पत्नी को मेहर दे देता है तो इद्दत की अवधि के बाद भरण-पोषण भत्ता देने का दायित्व नहीं होगा। यह कानून मुसलमान महिलाओं के अधिकार को पीछे ले जाता था। इस अधिनियम की वैधता को एक लोकहित जन याचिका के द्वारा चुनौती दी गयी। वर्ष २००१ में Dannial Latif Vs. Union of India के मुकदमें में उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम को अवैध घोषित करने से तो मना करा दिया पर